सत्ता की बिसात पर 2022

देवेन्द्र आर्य

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सियासत सम्भावनाओं का खेल है । खेल है तो नहीं परन्तु कुर्सी-केंद्रित सियासत ने इसे खेल बना दिया है। वर्तमान चुनाव प्रणाली और बहुमत फलित सत्ता में येनकेन प्रकारेण खेल में विजयी होने की भावना ने सियासी खेल की सारी नैतिकता ताख पर रख दी है। वरना आपने दो विपरीत ध्रुवों को गलबहियां करते या एक ही पंथ के हमराही को खंज़र घोंपते नहीं देखा होता। स्वतंत्रता पूर्व की भाजपा और मुस्लिम लीग का बंगाल में मिल कर सरकार बनाने से लेकर अभी कश्मीर में तथाकथित देशद्रोही पीडीपी के साथ एक झंडा, एक संविधान वाली राष्ट्रवादी भाजपा का चाल चरित्र और चेहरा आपने न देखा होता। बचा कौन है ? बहुजन वाली नीली बहन जी कि लाल टोपी वाली सपा कि मुट्ठी ताने कांघ छुपाए लाल झंडे वाली वामपंथी पार्टियां कि लगभग सभी पार्टियों की नानी, ठुलमुल तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली कांग्रेस !

तो राजनीति के इस फलित ज्योतिष वाली बिसात पर कब क्या हो, इसकी कोई गारंटी नहीं। बंगाल और बिहार का चुनाव याद करिए। जो कांग्रेस एक जगह वाम के साथ है, दूसरी जगह उसके विरुद्ध, तीसरी जगह स्वतंत्र। फ़िलहाल सबसे बड़ी ख़बर यही है कि अगिया बैताल  कन्हैया को एक रंग (लाल) की जगह तिरंगा पसंद आ गया है।

सियासत में पसंदगी और ना पसंदगी के दो ही कारण होते हैं। एक तो पैसा और कुर्सी दूसरा जनता के बीच सियासी क़द। योगी लगातार संकेत दे रहे हैं कि वे मोदी प्रशस्ति करेंगे पर अपने क़द की क़ीमत पर नहीं। कभी गोरखपुर में नारा लगता था, गोरखपुर में रहना है तो योगी योगी कहना है। अब नारा विस्तार पा चुका है, यूपी में गर रहना है तो योगी योगी कहना है।

यूपी के 2022 के चुनाव का गणित जितना खुल रहा है, उससे अधिक उलझ रहा है। अभी कल तक और ख़ासतौर पर ग्राम पंचायत के चुनावों के बाद यही लग रहा था कि  2022 का यूपी का चुनाव अखिलेश बनाम योगी होने जा रहा है। लखीमपुर कांड के बाद मंज़र बदलता सा दिखता है। प्रियंका के संघर्ष को भाजपा मौन समर्थन देती लग रही है ताकि ज़मीन पर वास्तव में टक्कर देने वाली सपा को नया और डमी विरोधी नम्बर एक बना कर, वोट छितराकर, टक्कर दी जा सके। माना कि लखीमपुर कांड का राजनीतिक फ़ायदा उठा पाने में सुविधावादी राजनीति के आदी हो चुके अखिलेश चूक गए, भले कितने भी कारण गिनाते रहें। फिर भी उनकी पार्टी की जड़ें वहां तक हैं जहां प्रियंका को पहुंचने में उतना वक़्त लगेगा जितने में यूपी का चुनाव बीत चुका होगा। बेशक इसका फ़ायदा कांग्रेस को 2024 के केन्द्र के चुनाव में मिले, पर कहीं यह सफलता 2022 में यूपी योगी को सौंपने की क़ीमत पर तो नहीं होगी। और यदि होगी तो विपक्ष के लिए और केंद्र के संदर्भ में कांग्रेस के लिए मोदी को हटा पाना टेढ़ी खीर होगा। कारण ? आप जानते हैं कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर जाता है।

इस सियासी खेल में एक और मोड़ दिख रहा है। वही गले लगाकर गला दबाने वाला खेल। इस समय माहौल यूपी वर्सेज गुजरात का भी बन रहा है। याद कीजिए उत्तर प्रदेश की गद्दी जो मनोज सिन्हा को सौंपी जानी थी, वह अचानक योगी को परोस दी गयी। क्यों, कैसे, मन से या बेमन से, वह पुरानी बात है। पर सियासत में कोई बात पुरानी नहीं होती। ज़ख्म कब हरे हो जाएं, कोई नहीं जानता। पिछले छः महीने में यूपी की सियासी उठा पटक इशारा कर रही है कि गुजरात को यूपी की नाथ परम्परा वाला कनफटा पसंद नहीं आ रहा। सियासत में पसंदगी और ना पसंदगी के दो ही कारण होते हैं। एक तो पैसा और कुर्सी दूसरा जनता के बीच सियासी क़द। योगी लगातार संकेत दे रहे हैं कि वे मोदी प्रशस्ति करेंगे पर अपने क़द की क़ीमत पर नहीं। कभी गोरखपुर में नारा लगता था, गोरखपुर में रहना है तो योगी योगी कहना है। अब नारा विस्तार पा चुका है, यूपी में गर रहना है तो योगी योगी कहना है। और यह स्थिति गुजरात शासित केंद्र को कतई पसंद नहीं। रास्ता एक ही है कि योगी को निपटा दिया जाए। और सियासत में निपटाना, ठोंक देना नहीं होता। वहां तो जमालो आग लगवा कर दूर खड़ी तमाशा देखती है।  सो अगले कुछ महीने सियासी ऊंट किस करवट बैठेगा, यह देखना वाक़ई राजनीति शास्त्र के विद्यार्थियों के लिए दिलचस्प होगा।

 वैसे अपन ठहरे गोरखपुरिया । सो मोदी-योगी के दंगल में अपना पक्ष साफ़ है । कम से कम पी एम के खाने पहनने और घूमने का ख़र्चा तो बचेगा । कई एम्स तो उसी से खुल जाएंगे । इहां तो एक हो ख़र्चा है, कल्लू के लिए पारले जी ।

देवेन्द्र आर्य जाने-माने ग़ज़लकार और कवि हैं ।

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