एक महिला कुली जिसने शिक्षा की मशाल जगाई

अनीता भारती

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दलित आंदोलन की सशक्त क्रांतिकारी नेत्री, दलित बच्चियों की पढ़ाई के लिए विशेष रुप से प्रथम कन्या विद्यालय चोखा मेला कन्या पाठशाला खोलने वाली प्रथम दलित महिला प्रिंसीपल, प्रथम महिला कुली और कोई नहीं दलित महिला आंदोलन को दिशा देने वाली महार समुदाय में जन्मी जाई बाई चौधरी थीं। दलित नेत्री जाई बाई चौधरी का नाम अभी दलित इतिहास के पटल पर जगमगाना बाकी है। बहुत अफसोस होता है कि भारतीय समाज में और खासकर दलित समाज में किए गए उनके योगदान और उपलब्धियों पर कभी खुलकर चर्चा नही हुई है। गाहे-बगाहे जरुर उनका नाम दलित महिला आंदोलन में लिया जाता रहा है। परंतु मुझे विश्वास है कि वह समय दूर नहीं जब उनके द्वारा किए गए समस्त कार्य, चाहे वह लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में हो या फिर दलित महिला आंदोलन की रीढ़ बनकर उसकी मशाल जलाने के लिए किए गए सारे महत्वपूर्ण कार्य जब समाज के सामने लाये जायेगे तो हमारे दलित आंदोलन के इतिहास में हमारी एक और पुरखिन पुरोधा का नाम जुड़कर हमें नई ऊर्जा और रोशनी देगा।

सामाजिक क्रांतिकारी सावित्रीबाई फुले के परिनिर्वाण से कुल पाँच वर्ष पहले जन्मी और बाबा साहेब से एक वर्ष बाद जन्मी जाई बाई चौधरी के रास्ते आगे चलकर सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब के रास्ते में जा मिले। सिर्फ रास्ते ही नहीं मिले बल्कि उनके भी पार जाकर, जाई बाई चौधरी ने आगे बढ़ चढ़ कर सावित्रीबाई फुले और बाबा साहेब द्वारा शुरु की गई ज्ञान की परंपरा को बखूबी आगे बढ़ाया।

जाई बाई ने कौशल्या बैसन्त्री के परिवार में शिक्षा की ज्योति जला दी, जिससे कौशल्या बैसन्त्री के परिवार की सारी बहनें पढ़-लिख गई। कौशल्या बैसन्त्री जो बाद मे चलकर एक समाज सेविका और प्रसिद्ध साहित्यकार बनीं, उनके अंदर पढ़ लिखकर समाज सेविका बनने का जज्बा पैदा करने और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को संवारने का काम निसंदेह जाई बाई चौधरी का ही था।

दलित महिला आंदोलन की पुरोधा जाई बाई चौधरी का जन्म 2 मई 1892 में नागपुर शहर से पन्द्रह किलोमीटर दूर उमरेर में हुआ। भारत में 1896 में पड़े भयंकर अकाल की विभीषिका से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। लोग भूखे मरने लगे। ऐसी कठिन परिस्थिति में गरीब अशिक्षित मेहनती माता-पिता अपनी बेटी जाई बाई चौधरी की नन्हीं सी अंगुलियां थामे जीवनयापन के लिए काम की तालाश में उमरेर छोड़कर नागपुर आ गए। बस यहीं नागपुर में मजदूरी करते हुए जाई बाई चौधरी की प्रारम्भिक प्राइमरी की शिक्षा हुई। मात्र 9 साल की अल्पायु में उनका विवाह बापूजी चौधरी से कर दिया गया। जाई बाई चौधरी के पति कि घर की माली हालत बहुत खराब थी। घर में भयंकर गरीबी और भुखमरी थी। घर का खर्च चलाने के लिए छोटी उम्र में ही जाई बाई चौधरी को कुली का काम करना पड़ा। वे यात्रियों का भारी-भरकम सामान अपने नन्हें से सिर पर लादकर नागपुर स्टेशन से कामटी स्टेशन तक आती थीं। इन दोनों स्टेशन की बीच की दूरी लगभग दस किलोमीटर है। जो अवस्था बच्चों के खेलने-खाने की, बेफिक्री का जीवन जीवन जीने की, माँ बाप का लाड़ प्यार पाने की होती है उस उम्र में जाई बाई चौधरी को कमर तोड़ मेहनत करनी पड़ी। संयोग वश ऐसे ही सामान ढोते हुए एक दिन एक मिशनरी महिला मिस ग्रेगरी ने उनसे बातचीत की। पढ़ा-लिखा व्यक्ति अपने हाव भाव, बातचीत और व्यवहार से अलग ही पहचाना जाता है, फिर वह चाहे कोई भी हो और किसी भी तरह का काम करता हो। पढ़ी-लिखी जाई बाई चौधरी को कुलीगिरी करते, सिर पर भारी भरकम सामान ढोते हुए देखकर मिस ग्रेगरी बहुत हैरान परेशान और दुखी हुईं। मिस ग्रेगरी जाई बाई चौधरी को कुलीगिरी से पूर्ण मुक्ति दिलाने की सोची, क्योंकि जाई बाई चौधरी की पास इतनी शिक्षा थी कि वह छोटे बच्चों को पढ़ा सकती थी। मिस ग्रेगरी ने उनकी पढ़ाई-लिखाई को देखकर, उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर, नागपुर के पास टिमकी में एक मिशनरी स्कूल में चार रुपये महावार की तनख्वाह पर अध्यापिका की नौकरी पर रखवा दिया। परंतु यह नौकरी ज्यादा नही चल पाई क्योंकि जाई बाई चौधरी अछूत कहे जाने वाले महार समुदाय से थीं। इसलिए उस मिशनरी विद्यालय के विद्यार्थियों ने यह कहकर कक्षाओं का बायकाट कर दिया कि एक हम एक अछूत से नहीं पढ़ेंगे और उन विद्यार्थियों के माता-पिता ने अपने बच्चों को स्कूल भेजने से मना कर दिया। इन परिस्थियों में जाई बाई चौधरी ने मिशनरी स्कूल की नौकरी स्वयं छोड़ दी।

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जाई बाई चौधरी मिशनरी स्कूल के विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों द्वारा की गई बेइज्जती से बेहद आहत और क्षुब्ध हुईं। इस जातिवाद के कारण न जाने कितने दलित समाज के लोग अपनी योग्यता, क्षमता दिखाने और अवसर पाने से वंचित रह जाते हैं, यह सोचकर जाई बाई चौधरी को बहुत गुस्सा आया। उस वक्त उन्हें जातिप्रथा एकदम उस जहरीले नाग की तरह लगी जिसने उन्हें अभी-अभी डंस लिया हो और वह सांस भी न ले पा रही हों। लेकिन इस जाति भेद के जहरीले नाग को क्या पता था कि जाई बाई चौधरी कितने मजबूत इरादों वाली महिला थीं। वह बेहद बैखोफ, निडर, हिम्मती और परिश्रमी थीं। जो महिला सिर पर दस किलोमीटर दूर सामान ढोकर ले जाती हो, वह इन मुसीबतों से क्या घबराएगी? जाई बाई चौधरी ने अब सीधे-सीधे जातिवाद व उसकी जहरीली  जड़ें, जातिवादी ताकतों को टक्कर देने की सोची। टक्कर देने का यह बल और आत्मविश्वास शिक्षा से ही आता है। उन्होंने उसी वक्त प्रण कर लिया कि वह अपना तमाम जीवन अपने अछूत समाज के बच्चों को पढ़ाने लिखाने के लिए समर्पित कर देंगी। जाई बाई चौधरी जानती थी कि बिना शिक्षा के किसी समाज की तरक्की नहीं हो सकती और न ही वह अपनी दुख पीड़ा, प्रताड़ना और अत्याचार से मुक्ति पा सकता है। जातिवाद के चंगुल से छूटने के लिए जरुरी है शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना। इसलिए उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में ही काम करना शुरू किया। उन्होंने घर-घर जाकर दलित बच्चों को स्कूल लाने की मुहिम शुरु की। इसके लिए उन्होंने 1922 में मंगलवारी की न्यू कालोनी में संत चोखामेला कन्या पाठशाला खोली।

मिस ग्रेगरी ने उनकी पढ़ाई-लिखाई को देखकर, उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर, नागपुर के पास टिमकी में एक मिशनरी स्कूल में चार रुपये महावार की तनख्वाह पर अध्यापिका की नौकरी पर रखवा दिया। परंतु यह नौकरी ज्यादा नही चल पाई क्योंकि जाई बाई चौधरी अछूत कहे जाने वाले महार समुदाय से थीं। इसलिए उस मिशनरी विद्यालय के विद्यार्थियों ने यह कहकर कक्षाओं का बायकाट कर दिया कि एक हम एक अछूत से नहीं पढ़ेंगे और उन विद्यार्थियों के माता-पिता ने अपने बच्चों को स्कूल भेजने से मना कर दिया।

जाई बाई चौधरी के द्वारा चलाए गए शिक्षा अभियान और उसके प्रति उनकी अप्रतिम अद्भुत समर्पण भावना का पता प्रसिद्ध दलित साहित्यकार कौशल्या बैसन्त्री की विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा दोहरा अभिशाप के कई पन्नों में लिखा हुआ मिलता है। कौशल्या बैसन्त्री अपनी आत्मकथा में एक जगह लिखती हैं – जाई बाई चौधरी नाम की अछूत महिला ने नई बस्ती नामक जगह पर लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला था। यह स्कूल उनके घर के पास ही एक पक्के मकान के दो कमरों में लगता था। यह घर एक दलित ईसाई का था। इस घर के आधे में वे रहते थे और आधा घर स्कूल के लिए दे दिया था। जाई बाई स्कूल चलाने के लिए चंदा एकत्र करने बहुत दूर तक अपना रजिस्टर साथ में लिए घूमती रहती थीं। वे अस्पृश्यों की बस्तियों में भी जाकर उन्हें अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए कहती थीं। उन्हें शिक्षा के महत्व के बारे में बताती थीं। वे हमारे घर भी आई थीं और हमें स्कूल भेजने के लिए कहा। माँ ने मुझे और मेरी बड़ी बहन को उनके स्कूल भेजना शुरू किया।

कौशल्या बैसन्त्री जाई बाई चौधरी के स्कूल का वर्णन करते हुए कहती हैं कि –’यह स्कूल उस वक्त प्राइमरी स्कूल ही था (अब हाईस्कूल हो गया है) हम दोनों बहनें नियमित रूप से स्कूल जाती थीं। जाई बाई की लड़की भागन बस्ती में लड़कियों को लेने आती थीं। कभी लड़कियाँ जाती, कभी नहीं जाती थी। भागन को देखते छिप जाती थी। परन्तु हम दोनों बहनों का जाना जारी रहा। अगर हम स्कूल जानें में आनाकानी करती तो माँ डांटती थीं। हमारी बस्ती में से सिर्फ हम दो-चार लड़कियाँ ही जाती थी। बाद में दो लड़कियों की शादी हो गई और वह स्कूल नहीं आईं।’

जाई बाई ने कौशल्या बैसन्त्री के परिवार में शिक्षा की ज्योति जला दी, जिससे कौशल्या बैसन्त्री के परिवार की सारी बहनें  पढ़-लिख गई। कौशल्या बैसन्त्री जो बाद मे चलकर एक समाज सेविका और प्रसिद्ध साहित्यकार बनीं, उनके अंदर पढ़ लिखकर समाज सेविका बनने का जज्बा पैदा करने और उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व को संवारने का काम निसंदेह जाई बाई चौधरी का ही था। इसका बात का पता स्वयं कोशल्या बैसन्त्री के आत्मकथन से भी चलता है –

‘माँ की जाई बाई के साथ अच्छी-खासी दोस्ती हो गई थी। माँ जाई बाई को मौसी कहती थी। जाई बाई कभी-कभी हमारे घर भी आया करती थीं। माँ उनका आदर करती थीं। उन्हें कभी-कभी खाना वगैरह खिलाकर ही जाने देती थी। माँ ने अब हम सब बहनों को पढ़ाने का निश्चय कर लिया था। बाकी बहनें अभी छोटी थीं, अभी स्कूल नहीं जाती थीं। फिर माँ ने बाद में उन्हें पढ़ाने का निश्चय कर रखा था। मैं और मेरी बहन जाई बाई के स्कूल में जाती थी। हमें शनिवार के दिन दो पारसी महिलाएं गर्ल्स गाइड सिखाने आती थीं। पानी में डूबने पर या आग लगने पर क्या करना चाहिए, एक्सीडेंट वगैरह होने पर रोगी की देखभाल कैसे करनी चाहिए, आदि बातें बताती थीं। रस्सी की मजबूत गाँठे बाँधना भी वे बताती थीं। इसके अलावा खाने की कुछ चीजें पकाना, कुछ सिलाई-कटाई भी सिखाती थीं। नाटक वगैरह के कार्यक्रम भी करती थीं। एक बार पृथ्वीराज-संयोगिता नाटक मंचित किया गया और मैंने उसमें राजा जयचंद की भूमिका की थी। गर्ल्स गाइड में दो ग्रुप थे। एक बड़ी लड़कियों का और दूसरा छोटी लड़कियों का। छोटी लड़कियों के दल को बुलबुल कहते थे। उन्हें गर्ल्स गाइड के दिन सफेद ब्लाउज और नीले रंग का पेटीकोट पहनना पड़ता था। बड़ी लड़कियाँ नेवी ब्लू साड़ी जिसमें सफेद रंग का बार्डर होता था और जिस पर जार्ज पंचम के ताज बने रहते थे, पहनती थीं। दोनों दलों को जार्ज पंचम के ताज के ब्रोच लगाने पड़ते थे, अपने ब्लाउजों पर। ये पारसी महिलाएं हमें कभी-कभी गवर्नर की कोठी पर ले जाती थीं। वहाँ नागपुर के कई स्कूलों की लड़कियाँ आकर अपने कार्यक्रम पेश करती थी। सारी लड़कियाँ गोल घेरा डालकर बैठतीं। सामने लकड़ियां जलाई जाती थीँ। गवर्नर एक गद्दीदार चेयर पर बैठकर कार्यक्रम देखते थे। मेरी बड़ी बहन ने गवर्नर के सामने एक छोटा-सा नाटक खेला था। वह नाटक में एक बच्चे की माँ बनी थीं जिसका एक्सीडेंट हो गया था। उन्होंने रोने का अभिनय किया था। सबने उनके अभिनय को सराहा और उनको इसके लिए गवर्नर के हाथों से एक पीतल की ट्रे इनाम में मिली थी। कार्यक्रम के बाद सबको चाय या कॉफी या कोको, केक, पेस्ट्री बन, वगैरह खाने को मिलता थी। जब कभी वायसराय दिल्ली से नागपुर आते तो वे जिस रास्ते से गुजरने वाले होते थे, वहाँ जाई बाई हमें हाथ में झंड़ियां पकड़ाकर खड़ा रखतीं। जब वायसराय गुजरते थे तब हम झंड़ियाँ हिला-हिलाकर उनका स्वागत करते थे।’

अधिवेशन में अखिल भारतीय महिला परिषद की हिन्दू सवर्ण जाति की महिलाओं ने जाईबाई चौधरी को भोजन की जगह से दूर बिठा कर उनकी बेइज्जती की और भारतीय महिला आंदोलन में अपनी हिस्सेदारी नेतृत्व और हैसियत को अपनी जातीय श्रेष्ठता से साबित किया। जाई बाई चौधरी के सवर्ण महिला परिषद को ललकारने, उनके इस ओछे, घृणित, निंदनीय छूआछात भरे अपमानजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर अपनी बात रखने के लिए 1 जनवरी 1938 को नागपुर के धरमपेठ में दलित महिलाओं ने बड़ी भारी सभा की।

जाई बाई अपने पूरे परिवार के साथ शिक्षा के लिए तन-मन-धन से समर्पित थीं। कौशल्या बैसन्त्री अपनी आत्मकथा में एक जगह कहती हैं -‘जाई बाई के स्कूल में पढ़ाई की कोई फीस नहीं ली जाती थी। कभी-कभी शिक्षक नहीं मिलते थे तो उनका लड़का, कभी-कभी बहू भी हमें पढ़ाती थीं। जाई बाई भी कभी-कभी पढ़ाती थीं। हमारे पास ही चोखामेला अस्पृश्य विद्यार्थी  हॉस्टेल था। वहाँ नागपुर से बाहर के लड़के रहते थे। कभी-कभी ये विद्यार्थी  भी हमें पढ़ाने आया करते थे।’

जाई बाई चौधरी ने अपने द्वारा 1922 में स्थापित संत चोखामेला कन्या पाठशाला में जिस समर्पण लगन और ऊर्जा ताकत से काम किया समाज में उस जैसी कोई मिसाल नहीं है। 1922 से लेकर 1954 तक विद्यालय  प्राइमरी 1954 से 1980 तक सेकेंडरी और 1980 के बाद से यह विद्यालय सीनियर सेकेंडरी हो गया है। अब इस विद्यालय को जाई बाई चौधरी के पोते सुधाकर श्रवण चौधरी चला रहे हैं। अब भी इसमें कई हजार बच्चे पढ़कर जाई बाई का शिक्षित समाज बनाने का सपना पूरा कर रहे हैं।

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जाई बाई चौधरी एक शिक्षिका, एक विद्यालय की प्रिंसिपल होने के साथ-साथ, दलित महिला आंदोलन की झंडाबरदार तथा उसको नेतृत्व प्रदान करने वाली, एक जागरूक लेखिका एव अच्छी बहुत प्रखर और तेजस्वी वक्ता भी थीं। जाईबाई चौधरी बाबा साहब के कार्यों, उनके विचार और शिक्षाओं से प्रभावित उनकी पक्की अनुयायी थीं। शोषित वंचित समाज के प्रेरणा स्रोत बाबा साहेब दलित समाज में जितना पुरुषों की उपस्थिति को महत्व देते थे, उतना ही दलित समाज की महिलाओं को भी। यही कारण था कि बाबा साहेब द्वारा चलाया गया दलित आंदोलन कभी भी एकांगी नहीं रहा। ऐसा कभी नहीं हुआ कि जब मीटिंग में केवल और केवल दलित पुरुषों की ही भागीदारी हो और दलित महिलाओं की न हो। बाबा साहेब पूरे वंचित शोषित समाज के प्रेरक थे इसलिए आज भी दलित आंदोलन के साथ-साथ दलित महिला आंदोलन और दलित महिला लेखन अपने आप से बिना किसी बाहरी सहायता या अनुदान के बखूबी चल रहा है।

बाबा साहेब और उनके साथ जुड़ा दलित महिला वर्ग अपने समाज की तरक्की के लिए किस कदर चिंतित था। इसका उदाहरण यही है कि प्रत्येक सभा के उपरांत स्त्रियों की सभा जरुर रखी जाती थी और जब सन् 1930 में आठ-नौ अगस्त को, नागपुर में अखिल भारतीय दलित कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन हुआ और इस अधिवेशन के साथ दलित महिलाओं को प्रथम अखिल भारतीय दलित महिला अधिवेशन भी हुआ था। जिसकी अध्यक्षता सगुणाबाई गावेकर ने की। जाई बाई चौधरी इस परिषद की रिसेप्शन कमेटी की सेकेट्री थीं। अखिल भारतीय दलित कांग्रेस के प्रथम अधिवेशन में उन्होंने दलित महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए जाईबाई चौधरी ने कहा था – ‘लड़कियों को भी लड़कों के समान पढ़ने के पूरे-पूरे अवसर उपलब्ध कराने चाहिए। एक लड़की की शिक्षा से से पूरा परिवार शिक्षित हो जाता है।’

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1930 में आयोजित परिषद में दलित महिलाओं की भयंकर भागीदारी बताती है कि उस समय दलित महिला आंदोलन बहुत मजबूत था। उसमें अनेकानेक दलित महिलाएं अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रही थीं। जाई बाई चौधरी दलित महिलाओं का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। हलांकि सवर्ण महिला आंदोलन के मुद्दे दलित महिला आंदोलन से एक दम अलग है। हमारे जातिगत शोषण, अत्याचार और उत्पीड़न पर उनका चुप्पी साधना और उसको महिला आंदोलन की प्रमुख मुद्दों में शामिल न करना यह सवर्ण स्त्री आंदोलन का पुराना इतिहास है। इस बात का पुख्ता आधार और सबूत हमारे पास है। दलित महिला आन्दोलन गैर दलित महिला आन्दोलन से जुड़ने व उनके साथ मिलकर काम करने में विश्वास रखता है और रखता रहेगा। दलित महिला आंदोलन की अगुआ नेता जाई बाई के साथ एक बार ऐसी घटना घटी जो पूरे भारत की दलित महिलाओं के लिए बहुत ही अपमान जनक था।

1937 दिसंबर में अखिल भारतीय महिला परिषद के अधिवेशन में जाई बाई चौधरी को कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए आमंत्रित किया गया। इस अधिवेशन में अखिल भारतीय महिला परिषद की हिन्दू सवर्ण जाति की महिलाओं ने जाईबाई चौधरी को भोजन की जगह से दूर बिठा कर उनकी बेइज्जती की और भारतीय महिला आंदोलन में अपनी हिस्सेदारी नेतृत्व और हैसियत को अपनी जातीय श्रेष्ठता से साबित किया। जाई बाई चौधरी के सवर्ण महिला परिषद को ललकारने, उनके इस ओछे, घृणित, निंदनीय छूआछात भरे अपमानजनक व्यवहार से क्षुब्ध होकर अपनी बात रखने के लिए 1 जनवरी 1938 को नागपुर के धरमपेठ में दलित महिलाओं ने बड़ी भारी सभा की। जिसमें हजारों-हजार दलित महिलाओं ने भाग लिया। सवर्ण महिलाओं द्वारा बरती गई दलित महिलाओं के प्रति दुर्भावनापूर्ण बर्ताव व छुआछूत और भेदभाव का जमकर विरोध किया। जाई बाई चौधरी की साथी दलित नेता नेत्री अंजनी बाई भ्रतार और सखूबाई ने इन हिन्दू महिलाओं को ‘बेशरम’ और ‘नीच किस्म का आचरण करने वाली’ कहकर कड़े शब्दों में उनकी भर्त्सना कर अपना रोष प्रकट किया। और दलित महिलाओं को स्वाभिमानपूर्ण और स्वाबलम्बी होकर जीने की शिक्षा दी। इसी परिषद में रमाबाई अम्बेडकर महिला संघ स्थापित किया गया। इस महिला मंडल ने दलित महिलाओं के लिए रात्रि स्कूल शुरू करने का फैसला लिया।

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अंत में जाई बाई चौधरी ने अपने सम्पूर्ण जीवन में जितना काम किया दलित समाज और दलित महिला आंदोलन उनके कर्ज को कभी नहीं उतार सकता। आज महाराष्ट्र में दलित महिलाओं का जितना सुंदर आंदोलन और समझ है, समाज में काम करने का जज्बा है, शिक्षा के प्रति जो लगाव है, अन्याय के प्रति विद्रोह करने की भावना है, यह सब हमारी पुराधाओं के समाज में किए गए समाजिक कार्यों का परिणाम है। जाई बाई चौधरी हमारी प्रमुख पुरोधा हैं। उनके द्वारा शिक्षा के लिए जलाई गई मशाल और दलित आंदोलन में फूंकी गई हर सांस कभी न बुझने वाली ज्वाला है। जब तक इस धरती पर अन्याय है, छुआछात है, जुल्म है, अशिक्षा है तब तक जाई बाई चौधरी सरीखी जिंदा मशाल हमारे लिए रोशनी स्तम्भ का काम करती रहेगी।

अनिता भारती दलित लेखक संघ की अध्यक्ष हैं और दिल्ली में अध्यापन करती हैं।

1 Comment
  1. प्रकाश चन्द्र says

    प्रेरक आलेख

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