मुक्तिबोध को एक ग़ज़लकार की चिट्ठी-1

सुल्तान अहमद

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मोहतरम मुक्तिबोध जी !

कुल मिलाकर आपने जादू तो मुझपर यही कर रक्खा है कि आप कभी कोई कमज़ोर चीज़ रच ही नहीं सकते । इसीलिए आपकी पहली कहानी ख़लील काका को लेकर किसी फ़ैसले पर पहुँचने में बहुत ज़्यादा वक़्त लगा । अब पहुँच ही गया हूँ , तो बता दूँ कि इस कहानी से यही साबित होता है कि आपने कभी कोई करिश्मा नहीं किया । आपकी तमाम चीज़ें धीरे-धीरे ही तरक़्क़ी कर पायी हैं । कभी-कभी आनेवाले उतार-चढ़ावों से ज़रूर इंकार नहीं किया जा सकता । जैसे आपकी शुरूआती कविताएँ क़तई शुरूआती  हैं, वैसे ही आपकी शुरूआती कहानियाँ भी क़तई शुरूआती हैं ।

एक बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आपने ख़लील को ‘गंगा-जमनी’ तहज़ीब का नुमाइंदा ज़रूर बना दिया है । मगर इसपर भी सवाल तो उठाया ही जा सकता है। ख़लील केसू से कहता है, ‘आज सूरज पच्छम से निकलेगा !’ ( वही, पे. 15 ) रसूल से पूछता है, ‘आज आफ़ताब पच्छम से निकलेगा ?’ ( वही, पे. 15 )

‘वह’ कुछ ऐसी इंक़लाबी बातें करता है, जो उसके कामों से निकलती हुई नहीं दिखलायी देती हैं। उसके सारे ख़याल सिर्फ़ ख़याल भर हैं। अगर पूछा जाता कि क्या उसने अपने ‘मालदार बाप को छोड़’ कहीं ‘दस रुपये की नौकरी’ शुरू कर दी है, तो जवाब में सिवाय सिफ़र के कुछ नहीं आता।

इन दोनों सवालों की ओट में छुपी निशानियाँ तो बहुत ही ख़राब उभर रही हैं । यहाँ ‘सूरज’ के साथ ‘हिंदू’ के तौर पर और ‘आफ़ताब’ के साथ ‘मुसलमान’ के तौर पर सुलूक किया गया लग रहा है । ये तो वही ‘सर्व धर्म समभाव’ है, जो ‘हिंदू’ से अलग और ‘मुसलमान’ से अलग बर्ताव करने में ही अपनी ख़ैरियत समझता है । इस ‘अँधेरे में’ ख़लील काका ही गये थे कि आप भी चले गये थे ? अगर ‘ख़लील काका ही’ गये थे, तो भी ज़िम्मेदारी आपकी बनती ही है । आपकी हिमायत में सिर्फ़ यही कहा जा सकता है कि यहाँ मसला आपकी नाकामी भर का है, नीयत का नहीं । नीयत तो आपकी तअस्सुब दूर करने की ही थी और वो कोई छोटी बात नहीं थी ।

आपकी ‘वह’ कहानी का ‘संभावित रचनाकाल 1936-37’ ( वही, पे. 27 ) है । इसमें शांता का भाई नैरेटर अपने दोस्त की कहानी सुनाता है, जिसकी वजह से कहानी का नाम ‘वह’ रखा गया है ।

 ‘वह’ कुछ ऐसी इंक़लाबी बातें करता है, जो उसके कामों से निकलती हुई नहीं दिखलायी देती  हैं। उसके सारे ख़याल सिर्फ़ ख़याल भर हैं। अगर पूछा जाता कि क्या उसने अपने ‘मालदार बाप को छोड़’ कहीं ‘दस रुपये की नौकरी’ शुरू कर दी है, तो जवाब में सिवाय सिफ़र के कुछ नहीं आता।

उसकी ज़िंदगी का सबसे ठोस वाक़या वो है, जिसमें वो शांता के साथ इस तरह पाया जाता है, ‘दोनों बाहुपाश में बद्ध हैं और आँखें बंद, जैसे मुझे ये देखना नहीं चाहते । शांता निर्वस्त्र, उसके वक्ष पर सिर रखे हुए ।’ ( वही, पे. 26 )

इसमें ‘वह’ और शांता ने जो कुछ किया, उसे तो ‘बाह्य घटना’ ही कह सकते हैं । ज़्यादा बुरी बात ये है कि ‘वह’ और शांता के बीच में जो ‘भाव-घटना’ वजूद में आनी चाहिए थी, वो इस कहानी में नदारद ही रह गयी । ये कमज़ोरी नैरेटर से ज़्यादा आपकी ही गिनी जायेगी ।

कहानी में वाक़यों का ताना-बाना इतना कमज़ोर है कि इसे करिश्मा ही कहा जायेगा कि नैरेटर को पता चल जाता है कि उसकी बहन शांता उसके दोस्त ‘वह’ के साथ घर में जिस्मानी रिश्ता बनानेवाली   है ।

प्रेमचंद, सुदर्शन, विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ वग़ैरह के ‘हृदय-परिवर्तन’वाले ढर्रे की कहानी है आखेट, जो 1938 में ‘मानवी पशुता’ के नाम से छपी थी। अगर इतने से ही समझ लिया जाय कि मैंने इस कहानी की कितनी आलोचना कर दी, तो इसपर कुछ भी कहने को बाक़ी नहीं रह जाता ।

इसका ‘हीरो’ मुहब्बत सिंह एक ‘भिखारिन’ की ‘भूख’ का लिहाज़ न करके उसके साथ ज़िनाँ करता है। आख़िर में होता ये है, ‘मनुष्य में स्थित जिस पशु ने उस स्त्री को चौकी के अंदर पैर रखते हुए अपना आखेट बना लिया था, उसी मनुष्य के भीतर बैठे हुए देवता ने मानो अपने आचरण से अनाथिनी को सनाथिनी बना दिया था।’ ( वही, पे. 32 ) इतना लिखना आप भूल गये कि जैसे उसके दिन फिरे, वैसे ही सबके फिरें।

1939 में शाया मैं फ़िलॉसफ़र नहीं हूँ के नैरेटर का ऐलान है कि वो एक साथ प्रोफ़ेसर, फ़िलॉसफ़र, क्रांतिकारी, साम्यवादी, कवि, मेटीरियलिस्ट, ऐथीस्ट, प्रैग्मेटिस्ट यानी ‘सब-कुछिस्ट’ ( वही, पे. 33 ) है ।

चेख़व की कहानी गिरगिट के किरदार की तरह इतने रंग बदलनेवाला ये शख़्स तंज़ के ही क़ाबिल कहा जा सकता है । मगर आपने तामझाम ऐसा खड़ा किया है जैसे ये आदमी अपने गिरेबान में झाँकनेवाला एक संजीदा आदमी हो । और ये आपकी ‘भूल-ग़लती’ भर थी । उसका अस्ल किरदार तो बस इतना ही है कि जब उसे पता चलता है कि उसको ‘…हेड ऑफ़ दी डिपार्टमेंट फ़िलॉसफ़ी नियुक्त किया गया है ।’ ( वही, पे. 34 ) तो वो ‘….उछल पड़ा, उदासी भाग गयी, क्रोध हट गया ।’ (वही,    पे. 34 ) यानी कि इस कहानी में तंज़ आपके नैरेटर पर न होकर आपके अफ़साने पर ही हो गया।

आपकी कविता ‘अँधेरे में’ जो कुछ कहा गया है, वो उतना क़ीमती नहीं हैं, जितना उसके पीछे छुपा हुआ ‘अनकहा’ क़ीमती है । आपकी कहानी ‘अँधेरे में’ इतनी कहानियाँ हैं, मगर आपने उनके पीछे ‘अनकहा’ उतना छुपाया नहीं है, जितना आपसे छूट गया है । और ये तो फ़न की कमज़ोरी है ।

मोह और मरण नाम की आपकी कहानी ‘जनवरी 1940 में प्रकाशित’ ( वही, पे. 41 ) हुई थी । ये आपके शुरुआती दौर की न लगकर आख़िरी दौर की लगती है । हाँ ! इसकी चंद तकनीकी कमज़ोरियाँ ज़रूर गिनायी जा सकती हैं ।

इसके पहले पैरे में एक मंज़र है, ‘एक मिट्टी के टीले पर के आँगन में टालवाला चिंतामग्न होकर शहर से आनेवाले रास्ते की ओर मुँह किये उकड़ूँ बैठा है, और पास ही उसका नाती – दो बरस का  बच्चा – लकड़ी के घोड़े पर उछल रहा है ।’ (वही, पे. 35 )

इसे देखकर आपके नॉवेल विपात्र का ये मंज़र सामने आ गया, ‘एक मैली-कुचैली खाट पर एक बूढ़े की ज़िंदा ठठरी पड़ी हुई थी और उस ठठरी के दुबले चेहरे की आँखों में एक ज्योति थी। ऐसी ज्योति, जो ममतापूर्वक एक और ठठरी को देख रही थी, जिसके सारे बदन पर सलवटें पड़ी हुई थीं, और उसके सलवट-भरे बाल-मुख पर वेदना की चीख़ निःशब्द होकर जड़ हो रही थी। वह बूढ़ी ठठरी अपने हड़ियल हाथों से शिशु-ठठरी को खिला रही थी। और वह शिशु इस अनजानी दुनिया को अपनी त्रस्त आँखों से देख रहा था । इस शिशु का चेहरा बिल्कुल मैला था ; यद्यपि मूलतः उसकी त्वचा गोरी रही होगी।’ ( वही, पे. 212 )

मोह और मरण का बूढ़े और बच्चे से जुड़ा ये मंज़र आपका पीछा 1940 से लेकर 1964 तक भी नहीं छोड़ता, जिस साल आपका नॉवेल ‘विपात्र’ मुकम्मल हुआ था। विपात्र का ये मंज़र बहुत हद तक उसके नैरेटर की ज़िंदगी से अलग-थलग उसके माहौल का हिस्सा है — ‘आलंबन’ की जगह ‘उद्दीपन’ भर। अगर ये हिस्सा ‘मोह और मरण’ में होता, तो टालवाले की ज़िंदगी के अलमिये को और पुरसोज़ बना देता । जो मंज़र मोह और मरण में है, वो सिर्फ़ ‘जानकारी’ भर दे रहा है। अगर ‘ विपात्र वाला मंज़र उसमें होता, तो बूढ़े के लकड़ी की क़ीमत बढ़ा देने को और भी मानीख़ेज़ बना देता।

अरथी के लिए ‘आठ मन’ लकड़ी के ‘आठ रुपये’ और कंडे ‘आठ आने’ लगाकर टालवाले बूढ़े ने ‘…उन्हें बुरी तरह से ठग लिया था।’ ( वही, पे. 36 ) ये बूढ़ा बेईमानी करके भी हमारी हमदर्दी नहीं खोता । वो हमारी हमदर्दी कैसे खो सकता था, जबकि उसकी हालत ये थी, ..

‘अरथी के ऊपर से पैसे लुटाये जा रहै थे। भंगी उसको बीन रहे थे।

बूढ़ा देखता रहा जुलूस को – लोलुप आँखों से उन लुटाये हुए पैसों, इकन्नियों-दुअन्नियों की ओर। उसके प्राण अदृश्य रूप से भाग रहे थे।’ ( वही, पे. 35 )

जब उसने अपनी बेईमानी का कारनामा अपनी बहू से बताया तो उसने कहा, ‘तुम्हें बुढ़ापे में भी लालच न छूटा ।’ ( वही, पे. 38 ) बाद में वो जब इस जुमले को याद करता है, तो उसका रूप बदलकर ये हो जाता है, ‘तुम बुढ़ापे में भी पैसों के लिए झूठ बोले।’ ( वही, पे. 40 ) सोचने के सिलसिले में जुमले ज़रूर बदल जाते हैं, मगर तब उन्हें इन्वर्टेड कॉमा में नहीं रखा जाता। आप जैसे चौकसी बरतनेवाले आदमी से भी तकनीकी चूक तो हो ही सकती है। फिर भी बहू का ‘यह वाक्य उसे सच मालूम हुआ, अत्यंत सत्य !’ ( वही, पे. 40 )

तब वो ‘लंपट सर्वहारा’ होने से बचकर ‘सच्चे सर्वहारा’ में ढलने लगता है, जब ‘उसको लगा मानो उसके पुराने सारे पाप एक-एक करके जल रहे हों। और उसके अंदर का सात्विक हृदय सोने के समान शुद्ध होकर निखर रहा हो।’ ( वही, पे. 40 )

इसके बाद होता ये है, ‘बूढ़े का हृदय एकदम विस्तृत हो गया। वह मानो अपने बच्चे को लेकर सोयी हुई पुत्रवधू में मिला जा रहा हो – उसके द्वारा संसार में लीन हो रहा हो।’ ( वही, पे. 40 )

ये ‘जन-संग-ऊष्मा’ का वैसा ही मंज़र है, जिसका ज़िक्र आपने ‘चकमक की चिनगारियाँ’ में इस पुरअसर ढंग से किया था, ‘अरे ! जन-संग-ऊष्मा के / बिना, व्यक्तित्व के स्तर जुड़ नहीं सकते । / – – – कि अपनी मुक्ति के रास्ते / अकेले में नहीं मिलते।’ ( मुक्तिबोध रचनावली : दो – सं. नेमिचंद्र जैन,  पे. 235 )

‘मैत्री की माँग’ के सिलसिले में एक बार मैंने कहा था, ‘‘मेरा तो ख़याल है कि औरत और मर्द के मसले में मुक्तिबोध का मन ही नहीं रमता था । इसीलिए ‘वह’, ‘मैत्री की माँग’ और ‘उपसंहार’ भी ज़ोर नहीं पकड़ पातीं ।’’ ( सापेक्ष – 55 — अप्रैल, 2015 – मार्च 2016, मुक्तिबोध विशेषांक – सं महावीर अग्रवाल, पे. 669 ) यहाँ इस नतीजे की पड़ताल कर लेना ज़रूरी है ।

‘मैत्री की माँग’ का मसला है, ‘आजकल सुशीला को अपना जीवन अलोना-अलोना-सा लग रहा है।’ ( मुक्तिबोध रचनावली : – सं. नेमिचंद्र जैन, पे. 42 )

इसकी तीन वजहें हो सकती हैं। इन तीनों पर आपका फ़ोक़स इतने बेहंगम ढंग से बदलता है कि एक पर भी मन को टिकने नहीं देता।

पहली वजह है बदहाली, कि ‘उन्नीस साल की इकहरी साँवली सुशीला उड़े हुए फीके पड़े रंग की साड़ी पहनती है।’ ( वही, पे. 41 ) दूसरी वजह हो सकती है उसका ये ख़्वाब कि ‘उसका पति रामराव इंटर पास होता, तो अच्छा होता।’ ( वही, पे. 42) तीसरी वजह माधवराव से ‘मैत्री की माँग’ तो है ही, जिसको लेकर माधवराव को सुशीला के चेहरे से ‘‘- – – ऐसा लगा वह पूछ रही हो, ‘तुम मेरे मित्र हो सकते हो !’ ’’ ( वही, पे. 51 )

इसके बाद ‘रामराव ने सिर्फ़ इतना कहा कि माधवराव से इतना अधिक बोलना जन-लज्जा के कुछ प्रतिकूल है कि सुशीला का मुँह एकदम फूल गया।’ ( वही, पे. 51 ) और ‘सुशीला ने उस समय पर कुएँ पर जाना छोड़ दिया, जबकि माधवराव आता था ।’ ( वही, पे. 52 )

अगर सुशीला की ‘मैत्री की माँग’ पूरी भी हो जाती, तो क्या उसकी ज़िंदगी को रूँधनेवाली और वजहें, जो मुँह बाये खड़ी थीं, बेअसर हो जातीं ?

अरे हाँ, इस कहानी में इस्तेमाल किये गये ‘कादंबरी’ लफ़्ज़ से जो बात दिमाग़ में आयी थी, उसे न बताना एक तरह की नाइंसाफ़ी ही होगी। जब सुशीला माधवराव से कहती है, ‘दी हुई कादंबरी पढ़  ली ।’ ( वही, पे. 50 ) तब उसकी बोली में ‘मराठीपन की मिठास’ आ जाती है, लेकिन जब आप ख़ुद ‘पोलका’ ( वही, पे. 43 ), ‘बापरने’ ( वही, पे. 46 ), ‘पंधरा’ ( वही, पे. 47 ) जैसे मराठी धज के लफ़्ज़ों का इस्तेमाल करते हैं, तब लगता है कि आप भी उसी ‘आंचलिकता’ के शिकार हो गये हैं, जिसके तहत लोग-बाग जान-बूझकर मुहावरे की मुहर लगी ज़बान को अजायबघर की चीज़ बनाने की कोशिश करते रहते हैं ।

आपकी कहानी ‘एक दाख़िल-दफ़्तर साँझ’ कचहरी की क़बाहतों पर 1948-1958 के बीच लिखी गयी, जिसमें ब्यौरे बहुत ज़्यादा और तहदारी कुछ कम ही है ।

इसमें पहले आपने ये नतीजा सुनाया कि कचहरी में ‘एक-दूसरे की पीठ पीछे बुराई करना तथा येन-केन-प्रकारेण षड्यंत्र करते रहना – यह एक नियमित व्यापार था।’ ( वही, पे. 57 ) फिर आपने ऐसे कई वाक़िये सुनाये, जिनसे वो नतीजा साबित हो सके।

यहाँ पर हुआ ये कि नतीजे को साबित करने के लिए कहानी के वाक़िये पैदा हुए, जबकि होना ये चाहिए था कि कहानी के वाक़ियों से नतीजा पैदा होता । ऊपर से आपने ये नतीजा पहले ही सुनाकर पढ़नेवालों को उसे निकालने की आज़ादी न देकर कहानी के फ़न को भी नुक़सान पहुँचा दिया ।

एक बात कहूँ कि जिन हालात में नैरेटर और उसके दोस्त ने ख़ुदकुशी के बारे में सोचा या शंकर तिवारी और निर्मला ने ख़ुदकुशी कर ली, उनसे भी कहीं ज़्यादा बदतर हालात में लोग ज़िंदा रहते हैं, उनका जीना चाहे जितना ‘एब्सर्ड’ गिना जाय। ख़ुदकुशी करनेवालों के लिए हमारे मन में हमदर्दी चाहे जितनी हो, लेकिन ज़िंदगी का रुख़ तो वही बदलेंगे,जो बदतर हालात में भी ज़िंदा हैं।

 वर्मा रामेश्वर के दुमुँहेपन का मज़ाक़ उड़ाते हुए कहता है, ‘पर आप तो प्रगतिवादी हैं ।’ ( वही,  पे. 61 ) अपने तंज़ को आगे बढ़ाते हुए वो कहता है, ‘‘ ‘प्रगतिवादी’, इस शब्द से क्यों डरते हैं ? मैं स्वयं एक प्रगतिवादी हूँ । एक नामहीन प्रगतिवादी।’’ (वही, पे. 61 )

जवाब में रामेश्वर कहता है, ‘‘ ‘प्रगतिवादी’, इस शब्द से मैं डरता नहीं, किंतु दुर्भाग्य से मैं अब सरकारी नौकर हूँ। सरकारी नौकर की विचारधारा नहीं होती, होती भी है, तो उसके अनुसार कार्य करना मना है । पेट की ग़ुलामी कर रहा हूँ आत्मा बेचकर । मात्र वेश्यावृत्ति पर हम लोग जीवित हैं । किसी वेश्या को सुहागन कहने से उसका अपमान ही होता है। वैसा अपमान तुम कर रहे हो मेरा …. और वह भी आज इस मौक़े पर….’’ ( वही, पे. 61 )

मरे को मारें शाह मदार के अंदाज़ में मारे शर्म के मरे जा रहे रामेश्वर की वर्मा तीखी तंक़ीद करते हुए कहता है, ‘ए. डी. से लड़ना टालने के लिए आपने मुझे काम में पीसा..’ ( वही, पे. 62 ) अगर वर्मा से पूछा जाता कि जब रामेश्वर ने उसे ‘काम में पीसा’ तो उसने कौन-सी लड़ाई लड़ी  थी, जो रामेश्वर के आगे वो उम्मीदों की इतनी लंबी फ़ेहरिस्त रख रहा है, तो उसकी सारी ‘प्रगतिवादी’ शेख़ी झड़ जाती। इसीलिए उसकी बातों से बहादुरी नहीं, बल्कि मौक़ापरस्ती ही झलकती है । उसकी बहादुरी से भरी बातों में ईमान की धार उतनी नहीं दिखायी देती, जितनी हारे हुए रामेश्वर की बातों में। वर्मा की इस बात में हमले की जगह ढाढस बँधाने की नीयत शायद ही कोई देख सकेगा, ‘आप भी लगातार पिसते रहे बुरी तरह। क्या हासिल हुआ आपको इससे ? …’ ( वही, पे. 62 )

आपकी कहानी ज़िं दगी की कतरन ख़ुदकुशी के इर्दगिर्द घूमती है। नैरेटर ने उसके बारे में क्यों सोचा, उसका दोस्त क्यों उसकी ‘… हिम्मत भी कर चुका था, … ’ ( वही पे. 69 ) या उस दोस्त के चाचा ने क्यों ख़ुदकुशी कर ली थी, इनकी वजहें नहीं बतायी गयी हैं। शंकर, तिवारी और निर्मला की ख़ुदकुशी की वजह आपने बतायी है, ‘आज तक इस सियाह तालाब में सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न से ग्रस्त लोगों ने ही जानें दी हैं।’ ( वही, पे. 68 ) ज़्यादा फ़ोक़स आपने तिवारी और निर्मला की ख़ुदकुशी पर ही डाला है।

‘पाराशर की बहू’ यानी निर्मला, जिसके बारे में नैरेटर के दोस्त ने बताया, ‘तिवारी की आत्महत्या के दो या तीन दिन बाद तालाब के उसी उत्तर-पश्चिमी कोने में पीपल के पेड़ के नीचे उस टूटे घाट पर से उसने परम धाम प्राप्त किया-….’( वही, पे. 72 )

नैरेटर निर्मला को जानता था । उसने बताया, ‘ग़रीब बड़े भाई ने उसकी शादी उससे कुछ अच्छी स्थितिवाले घर में कर दी।’ (वही. पे. 73 ) थोड़े ही दिनों में उसके शौहर की मौत हो गयी। ‘उसकी बीमारी में निर्मला के जो भी गहने थे व्यय हो गये। विधवा जीवन के चार वर्ष उसने भौजाहयों के क़ैदख़ाने में काटे।’ ( वही. पे. 74 ) उस ‘ – – – अँधेरे में उसने उस संयुक्त परिवार के लँगड़े होमियोपैथ सदस्य से अपना संबंध स्थापित कर अपने पतित होने का प्रमाण-पत्र हासिल कर लिया । अर्थात एक मृत पुत्र प्राप्त किया।’ ( वही. पे. 75 )

एक बात कहूँ कि जिन हालात में नैरेटर और उसके दोस्त ने ख़ुदकुशी के बारे में सोचा या शंकर तिवारी और निर्मला ने ख़ुदकुशी कर ली, उनसे भी कहीं ज़्यादा बदतर हालात में लोग ज़िंदा रहते हैं, उनका जीना चाहे जितना ‘एब्सर्ड’ गिना जाय। ख़ुदकुशी करनेवालों के लिए हमारे मन में हमदर्दी चाहे जितनी हो, लेकिन ज़िंदगी का रुख़ तो वही बदलेंगे,जो बदतर हालात में भी ज़िंदा हैं।

क्या ही अच्छा होता कि ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के हिस्से ‘अपूर्ण कहानियाँ’ के तहत ‘चाबुक’ को रखा गया होता ! ‘उपसंहार’ के बारे में भी तो इसी तरह की इत्तिला दी गयी है, ‘संभवतः अपूर्ण कहानी का अंश ।’ ( वही, पे. 101 ) यानी कि उसका भी ‘अपूर्ण कहानियाँ’ में होना ही बेहतर होता ।

आपकी कविता ‘अँधेरे में’ जो कुछ कहा गया है, वो उतना क़ीमती नहीं हैं, जितना उसके पीछे छुपा हुआ ‘अनकहा’ क़ीमती है । आपकी कहानी ‘अँधेरे में’ इतनी कहानियाँ हैं, मगर आपने उनके पीछे ‘अनकहा’ उतना छुपाया नहीं है,  जितना आपसे छूट गया है । और ये तो फ़न की कमज़ोरी है ।

आपकी कहानी का पचीस साल का युवक अपने ‘पूर्वप्रिय नगर’ में लौटता है, तो ‘युवक के मन में प्यार उमड़ आया । ये घर उसे अत्यंत आत्मीय जैसे लगे, मानो वे उसके अंग हों,’ ( वही. पे. 78 ) इतना ही नहीं, ‘उसे समझ में आ गया कि क्यों उन क्वार्टरों को देखकर आत्मीयता उमड़ आयी । मज़दूर चालों में, जहाँ वह नित्य जाता है, या उसके अमीर दोस्तों के स्वच्छ सुंदर मकानों में , जहाँ से वह चंदा इकट्ठा करता, चाय पीता, वाद-विवाद करता और मन-ही-मन अपने महत्व को अनुभव करता है — वहाँ से तो उसे कोई आत्मीयता की फसफसाहट नहीं हुई ।’ ( वही. पे. 78 )

आपने उसके de-class न हो पाने की हक़ीक़त को अच्छी तरह पकड़ा कि उसे ‘मज़दूर चालों में’ भी ‘आत्मीयता की फसफसाहट नहीं हुई ।’

उसके उस ‘पूर्वप्रिय नगर’ में ऐसा कोई नहीं था, जिसके यहाँ वो ठहर सकता । ‘कुछ सोच-विचारकर उसने स्टेशन का रास्ता लिया ।’ ( वही, पे. 85 )

‘अँधेरे में’ हुआ ये, ‘युवक के पैरों में कुछ तो भी नरम-नरम लगा – अजीब, सामान्यतः अप्राप्य, मनुष्य के उष्ण शरीर-सा कोमल । – – – उसकी बुद्धि, उसका विवेक काँप गया । – – –  वह क्या करे ? वह भागने लगा एक किनारे की ओर ।’ ( वही, पे. 86 ) ऐसे ही आपकी कविता ‘अँधेरे में’ का नैरेटर भागता है, ‘भागता मैं दम छोड़ / घूम गया कई मोड़ !!’ ( मुक्तिबोध रचनावली : दो – सं. नेमिचंद्र जैन, पे. 335 ) उसके भागने के पीछे बहुत सारे डरावने हवाले हैं, मगर यहाँ सिर्फ़ जज़्बातियत ही दिखाई दे रही है । इंक़लाबी फ़िक्र के हवाले से जोड़ने के लिए आपने युवक को ये सोचते हुए ज़रूर दिखा दिया, ‘क्यों नहीं इतने सब भूखे भिखारी जगकर, जाग्रत होकर, उसको डंडे मारकर चूर कर देते हैं – क्यों उसे अब तक ज़िंदा रहने दिया गया ?’ ( मुक्तिबोध रचनावली : तीन – सं. नेमिचंद्र जैन, पे. 86 )

युवक की इस कहानी में ताँगेवाले, पुलिसवाले, मौलवी साहब, होटलवाले की कहानियों से कोई इज़ाफ़ा नहीं होता । यहाँ तक कि हज़रत अली की हिदायत से भरी रिवायत से भी कुछ ख़ास नहीं जुड़ता । युवक के बारे में आपने जो ऊँचे इंक़लाबी विचार पेश किये हैं, वो भी उसके किरदार की किसी कार्रवाई में से पैदा न होकर उसके लिए आपकी हमदर्दी में से पैदा हुए महसूस होते हैं, ‘दुनिया की कोई ऐसी कलुषता नहीं थी, जिसपर उसे उलटी हो जाये – सिवाय विस्तृत सामाजिक शोषणों और उनसे उत्पन्न दंगों और आदर्शवाद के नाम पर किये गये अंध अत्याचारों, यांत्रिक नैतिकताओं और आध्यात्मिक अहंताओं की तानाशाहियों को छोड़कर ! दुनिया के मध्यवर्गीय जनों के अनेकों विषों को चुपचाप वह पी गया था, और राह देख रहा था सिर्फ़ क्रांति-शक्ति की ।’ ( वही, पे. 85 )

‘सतह से उठता आदमी’ में ‘चाबुक’ नाम की जो कहानी छपी है, उसमें दो कहानियाँ घुल गयी  हैं । ‘चाबुक’ के बारे में इत्तिला दी गयी है, ‘‘इस कहानी का परवर्ती अंश इससे तनिक भी संबद्ध नहीं है और इसलिए यहाँ ‘उपसंहार’ शीर्षक अलग से कहानी के रूप में प्रकाशित है ।’’ ( वही, पे. 88 ) दूसरी इत्तिला है, ‘‘यह कहानी ‘सतह से उठता आदमी’ संकलन में छपी ‘चाबुक’ कहानी का अंश है, पर यह अपनेआप में अलग से संपूर्ण है और इसका ‘चाबुक’वाले अंश से कोई संबंध नहीं है । इसलिए इसे इस नये शीर्षक के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से रखा जा रहा है । ‘चाबुक’ कहानीवाला अंश उसी शीर्षक से अलग से प्रकाशित है । ऐसा जान पड़ता है कि एक-से काग़ज़ों पर लिखे होने के कारण ये दोनों अंश एक साथ जुड़ गये और प्रकाशित हुए ।’’( वही, 88 ) क्या ही अच्छा होता कि ‘मुक्तिबोध रचनावली’ के हिस्से ‘अपूर्ण कहानियाँ’ के तहत ‘चाबुक’ को रखा गया होता ! ‘उपसंहार’ के बारे में भी तो इसी तरह की इत्तिला दी गयी है, ‘संभवतः अपूर्ण कहानी का अंश ।’ ( वही, पे. 101 ) यानी कि उसका भी ‘अपूर्ण कहानियाँ’ में होना ही बेहतर होता ।

‘उपसंहार’ महरूमियों के मारे रामलाल की कहानी है, जिसकी बीवी सावित्री उससे इस क़दर नाराज़ है कि उसे पूरा यक़ीन है, ‘घर के सारे संकट की जड़ इनकी बेफ़िक्री और आलस ही है ।’ (वही, पे. 89 )

एक बार जब रामलाल अपने ‘चिड़चिड़ेपन का इजहार’ उसके सामने करता है, तो वो उसपर मारे तंज़ के बच्चों से कहती है, ‘हुँ ऊँ ! तुम्हारे बाबू जी अब बहुत बड़े अफ़सर होंगे, अब जंडेल होंगे, अपनी कंपनी खोलेंगे, अपना अख़बार निकालेंगे । (वही. पे. 91 ) बच्चे ख़ुश होकर अपने ख़्वाबों का इज़हार करते हैं, ‘फिर हमें पैरों में जूता ला देंगे ।’(वही. पे. 91) ‘हमें कमीज़ ला देगें । हमें कोट ला देगें ।’ (वही, पे. 91)

इस तरह की रोज़मर्रा की उबाऊ हक़ीक़तों के बीच दिल को छू लेनेवाले कोने ढूँढ सकने में ये कहानी कामयाब नहीं हो पायी, फिर भी अपना अवामी सरोकार ज़ाहिर कर सकने में कामयाब रही। ऐसी ‘कमज़ोर कहानियाँ’ आपकी दूसरी ‘मज़बूत कहानियों’ को मज़बूती अता करती हैं।

इस कहानी में दिल को छू लेनेवाला एक वाक़िया ज़रूर है, जो उसे आगे बढ़ा सकने में शायद ही कोई मदद करता है । सिर्फ़ महरूमियों के मारे रामलाल के मन का पता देता है। हाँ ! वो ‘अफ़साने’ के हिस्से की जगह एक ‘अफ़सानचे’ के तौर पर पेश किया जाता, तो ज़रूर पुरअसर बन सकता था ..

‘साइकिल से वह तुरंत उतर पड़ा, किसी आंतरिक प्रवृति से । और उसको लगा, जैसे उसका कुछ खो गया हो, मानो उसके पास दस रुपये का एक नोट था, जो अब नहीं रहा । किसी ने उसको उड़ा लिया । किसी ने शायद उसकी जेब कतर ली । और वह सचमुच अपनी जेबों को टटोलने लगा कि शायद उसमें उसे दस रुपये का नोट प्राप्त हो जाये ।’( वही. पे. 93 )

‘तमाशा यह है कि यह सब करते हुए भी उसका सचेत मन कह रहा था कि क्या तमाशा कर रहे हो ! तुम्हारा कुछ खोया नहीं है । दस रुपये तुम्हारी जेब में हो ही कैसे सकतें हैं ! एक आना भी तुम्हारी जेब में है?’ ( वही. पे. 93 )

जब रामलाल क़ाफ़े में गया, तो उसकी मुलाक़ात एक ऐसी लड़की से हुई, जिसके ‘चेहरे पर परिचय की मुस्कराहट थी।’( वही. पे. 96 ) साथ में लड़की के पिता आत्माराम दबीर और एक आदमी और मौजूद थे, जिसके बारे में उसने बताया, ‘ … मेरे मामा होते हैं।’ ( वही. पे. 96 ) कुछ ही देर में इनसे आकर माधवप्रसाद भी जुड़ गये, जिनसे रामलाल वाक़िफ़ था । इनके बीच सियासी और समाजी बहसें होने लगीं।

‘अब तो आ रहा है कम्युनिस्ट, कम्युनिस्ट !!’ ( वही, पे. 98 ) , ‘पर वह कम्युनिस्ट नहीं है, कॉमिनफ़ॉर्म कम्युनिस्ट ! वे लोग और भी ख़तरनाक होते हैं !’ ( वही, पे. 100 ) जैसे जुमले कहानी में से पैदा हुए न लगकर सिर्फ़ अख़बारी जानकारियाँ भर लगते हैं।

जब रामलाल चला गया, तो आत्माराम दबीर ने कहा, ‘बहुत ग़रीब और नेक मालूम होता है।’  ( वही, पे. 101) ‘‘माधवप्रसाद ने एक गहरी उसाँस छोड़ते हुए कहा, ‘नेक तो ख़ैर है ही,’ फिर कुछ रुककर आगे कहा, ‘लेकिन ग़रीब वह जान-बूझकर बना हुआ है।’ ’’ ( वही, पे. 101 ) लड़की ने जब पूछा, ‘सो कैसे?’ ( वही, पे. 101 ) तो उसने जवाब दिया, ‘जो आदमी ग़रीब बना रहना चाहता है, उसका कोई इलाज है? कितनी ही तो नौकरियाँ छोड़ीं उसने। मात्र भावुकतावश! मैंने उसकी कई बार मदद की । पर उसने कभी अपनी हालत नहीं सुधारी । दिमाग़ी फ़ितूर उसपर आज भी सवार है।’ ( वही,    पे. 101 ) उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘भाई, अगर रोटी कमाना हो, तो उसका तरीक़ा सीखो। दुनिया की फ़िक्र छोड़कर अपनी बढ़ती की चिंता करो। मैंने उसे इतने अच्छे-अच्छे काम दिलाये, पर उसने एक भी मन लगाकर नहीं किया – ..’ ( वही,    पे. 101 )

अभी वो सारे वाक़िये आने बाक़ी रह गये, जिनसे माधवप्रसाद और आत्माराम दबीर के बयान उनके किरदार के मुताबिक़ साबित हो पाते। फिर इन सबके रिश्तों में organic unity का आना भी बाक़ी ही रह गया ; इसलिए कि कहानी अधूरी रह गयी।

‘नयी ज़िंदगी’ में रमेश की बदली हुई शख़्सियत पर तंज़ किया गया है । उसकी हालत इतनी ख़राब थी कि उसे लगता था, ‘उसकी स्त्री ..मानो एक बीमार छाया ! उसके बच्चे – प्रूफ़ कापी में टूटे हुए  अक्षर !’ ( वही, पे. 102 )

एक तरफ़ आप बताते हैं ‘‘ …उसकी आज इतनी ताक़त हो गयी थी कि वह ‘नेतृत्व की द्वितीय पंक्ति’ में आकर बैठ गया था।’’ (वही, पे. 103 ) दूसरी तरफ़ बताते है, वो ‘ …अपने को निकम्मा समझकर भयानक हीन-भावना से शिथिल हो जाता ।’ (वही, पे. 103 )

नैरेटर उसे समझाते हुए कहता है, ‘तुम एक लीडर हो, विचारक समझे जाते हो। फिर ऐसी बात क्यों?’ ( वही, पे. 103 ) रमेश तंज़ से जवाब देता है, ‘लेकिन मैंने अपनी आलोचना करना छोड़ दिया  है।’ (वही, पे. 103 ) नैरेटर ने भी कहा था, ‘.. दोस्तों ने तुम्हारी आलोचना करना छोड़ दिया है।’( वही, पे. 106 )

क्या यहाँ  पर ‘आलोचना करना छोड़ दिया है।’ की जगह ‘आलोचना करनी छोड़ दी है।’ नहीं होना चाहिए था?

जब दो दिन तक रमेश नैरेटर के घर नहीं आया, तो उसे फ़िक्र हुई और वो उसके घर गया। घर पहुँचते ही वो देखता है कि रमेश का ‘ … कमरा सजा हुआ है और रमेश अपनी बीवी को अख़बार पढ़कर सुना रहा है।’ ( वही, पे. 106 )

 क्रमशः ….

सुल्तान अहमद जाने-माने ग़ज़लकार हैं ।

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