योजनाओं और सपनों से भरा एक कवि जिसे अपने जैसे लोग कम मिले

ऋतंभरा कुमारी, विशेष संवाददाता

0 764

युवा कवि और दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत सत्यवती कॉलेज में असोशिएट प्रोफेसर डॉ मुकेश मानस का निधन हो गया है। वे पिछले काफी दिनों से बीमार थे। दिल्ली के कथाकार टेकचंद द्वारा व्हाट्सएप पर दी गई सूचना के अनुसार ‘मुकेश मानस’ को लिवर संबंधी समस्या थी और पीलिया बहुत ज्यादा बढ़ गया था। लगभग 10 दिन सरोज मधुबन चौक पर एडमिट रहे, 4 दिन से महरौली के लीवर एंड बायनरी में थे जहां लिवर फेल कर गया।’

मुकेश के गहरे मित्र और शुभचिंतक ईश कुमार गंगानियाँ उनकी बीमारी से बहुत व्यथित थे और लगातार उनकी खोजख़बर ले रहे थे।  उनके निधन पर गंगानियाँ ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा – ‘कई दिन से जिनका नाम लिखने का साहस नहीं हो रहा था आखिर आज कंपकपाते हाथों से लिखना पड़ रहा है कि बहुमुखी साहित्यिक व इंसानी प्रतिभा के धनी भाई प्रो.मुकेश मानस, सत्यवती कालेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी हमारे बीच नहीं रहे। उन्हें भयंकर ज्वाइंडिस हुआ था। शायद हम सबकी दुआएं और प्रयास कम पड़ गए। अश्रुपूर्ण विदाई।’

मुकेश मानस के कुछ नजदीकी मित्रों के हवाले से मिली सूचनाओं के अनुसार वे लंबे समय से अवसाद में थे और दिल्ली से दूर सोनीपत में मकान लेकर रह रहे थे। साहित्यकार कंवल भारती की फेसबुक पोस्ट के अनुसार ‘उनसे जब भी बात होती थी, लम्बी बात होती थी। कई बार वह फोन पर ही रोने लगते थे। इधर एकाध साल से वह नितांत अकेले रहते थे, और अवसाद में भी थे। अक्सर जीवन से विरक्ति की बातें करते थे। उनका विवाह सफ़ल नहीं हुआ, और बताते थे कि उनके बच्चे भी उनके साथ नहीं रहते थे।’

कथाकार और गाँव के लोग के संपादक रामजी यादव ने कहा कि यह खबर एकदम स्तब्ध कर देने वाली है। दो ढाई महीने पहले मुकेश से मेरी बात हुई। कई साल के अंतराल पर बात हो रही थी इसलिए कई सूचनाएँ एकदम नई थीं। मसलन मुकेश ने बताया कि अब वह दिल्ली छोड़कर सोनीपत रहने लगे हैं। लोगों से मिलना-जुलना कम हो गया है।’

युवा कवि और दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत सत्यवती कॉलेज में असोशिएट प्रोफेसर डॉ मुकेश मानस का निधन हो गया है। वे पिछले काफी दिनों से बीमार थे। दिल्ली के कथाकार टेकचंद द्वारा व्हाट्सएप पर दी गई सूचना के अनुसार ‘मुकेश मानस' को लिवर संबंधी समस्या थी और पीलिया बहुत ज्यादा बढ़ गया था।

रामजी यादव ने आगे बताया कि ‘हमारी मुलाक़ात 2003 में हुई और जल्दी ही घनिष्ठता में बदल गई। वजह यह थी कि मैं वहाँ मजदूर संगठन और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ा था और मुकेश का भी जुड़ाव वही था। मुकेश बहुत पढ़ाकू व्यक्ति थे। हमारी सर्किल एक थी। कर्ण सिंह चौहान और शिवमंगल सिद्धांतकर हमारे कॉमन मित्र थे। हालांकि उस समय तक मुकेश में कई ऐसी प्रवृत्तियाँ दिखने लगी थीं जो उसे ज्यादा से ज्यादा औपचारिक बना रही थीं। घनिष्ठ मित्रों की संख्या कम होती जा रही थी और आंदोलन आदि को लेकर एक असहमति और आलोचनात्मक रुख अधिक रूढ़ होता जा रहा था। कह सकता हूँ कि उसमें कतिपय लोगों को लेकर एक चिढ़ थी जिसे वह कई बार स्पष्ट रूप से प्रकट कर देता। इसके बावजूद मुकेश में नया करने का एक जज़्बा था। अंतिम बातचीत में मुकेश ने पुराने किसी मित्र के ज़िक्र से अधिक किसान आंदोलन को लेकर बात की और अपने घर से नजदीक सिंघु बार्डर पर जाकर आंदोलन में शामिल होने की बात की। थोड़ा कुरेदने पर उसने पारिवारिक विघटन का भी ज़िक्र किया और अपने भीतर के अकेलेपन पर भी बात की। इतनी जल्दी वह चला जाएगा इसकी जरा भी आशंका नहीं थी।’

साधारण पृष्ठभूमि से निकले थे मुकेश

उत्तर प्रदेश के एक गाँव में जन्मे मुकेश को बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण जीने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा था। माँ और दो छोटे भाई-बहनों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाते हुये मुकेश ने कड़ी मेहनत के साथ अपनी पढ़ाई पूरी की। स्नातक करने बाद वे दिल्ली चले आए और पढ़ाई के साथ अंकुर नामक एनजीओ में काम करना शुरू किया। यहाँ काम करते हुये मुकेश ने अपना शोध पूरा किया और सत्यवती कॉलेज में व्याख्याता बने। अंकुर के दिनों के उनके एक मित्र ने बताया कि मुकेश ने अंकुर में बहुत अच्छा काम किया और समाज के निचले तबकों तक उसके कार्यक्रमों को ले गए।

सत्यवती कॉलेज के पूर्व असोसिएट प्रोफेसर शिवमंगल सिद्धान्तकर बताते हैं कि मुकेश बहुत ज़हीन, उत्साही और आदर्शवादी युवा था जो लोगों को प्रभावित कर सकता था। वह एक मंजा हुआ कवि और कहानीकार था और उसकी रचनाओं में जनता के संघर्ष की आवाज थी। मेरे साथ उसका बहुत सम्मानित संबंध था। वह हमारे संगठन के कार्यक्रमों में शामिल होता था।

मुकेश हिन्दी के जाने-माने कवि, कहानीकार और आलोचक के अलावा सिद्धहस्त अनुवादक, संपादक और प्रकाशक भी थे। उनकी कई किताबें प्रकाशित हैं। दो कविता संग्रह पतंग और चरखड़ी(2001), कागज़ एक पेड़ है (2010), दो कहानी संग्रह- उन्नीस सौ चौरासी (2005), पंडित जी का मंदिर और अन्य कहानियाँ, आलोचना पुस्तकें – हिंदी कविता की तीसरी धारा, पत्रकारिता मीडिया लेखन सिद्धांत और प्रयोग, सावित्री बाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षिका, अम्बेडकर का सपना, भगत सिंह और दलित समस्या  और हिंदी कविता की तीसरी धारा आदि मुकेश की महत्वपूर्ण किताबें हैं।

उन्होंने सुप्रसिद्ध विचारक काँचा इलैय्या की प्रसिद्ध पुस्तक व्हाई आई एम नॉट ए हिंदू  और एम एन रॉय की पुस्तक इंडिया इन ट्रांजिशन का अनुवाद अनुवाद और प्रकाशन किया। वे मगहर नामक पत्रिका के प्रकाशक, संस्थापक व संपादक थे। पिछले दिनों दलित कवियत्री और सामाजिक कार्यकर्ता रजनी तिलक के ऊपर एक विशेषांक निकाला था। मुकेश ने आरोही जन नाम से एक प्रकाशन की स्थापना भी की।

रामजी यादव कहते हैं कि मुकेश के साथ उन दिनों ज्यादा मिलना-जुलना था जब मैं रोहिणी में रहता था। मुकेश को मैंने लगातार उस बड़बोलेपन से दूर होते पाया जिसके भरोसे लोग दूसरों पर प्रभाव छोड़ते हैं। वह अपनी भूमिका को लेकर बहुत गंभीर था। उसमें बहुत कुछ ऐसा था जो अव्यक्त रह गया लेकिन जो भी प्रकाशित हुआ वह उसकी प्रगतिशील चेतना और गहरी मानवीय संवेदना का परिचय देता है। उसकी कवितायें बहुत अलग किस्म की हैं।’

 

उन्होंने सुप्रसिद्ध विचारक काँचा इलैय्या की प्रसिद्ध पुस्तक व्हाई आई एम नॉट ए हिंदू और एम एन रॉय की पुस्तक इंडिया इन ट्रांजिशन का अनुवाद अनुवाद और प्रकाशन किया। वे 'मगहर' नामक पत्रिका के प्रकाशक, संस्थापक व संपादक थे। पिछले दिनों दलित कवियत्री और सामाजिक कार्यकर्ता रजनी तिलक के ऊपर एक विशेषांक निकाला था।

 

देश के अनेक हिस्सों में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी

अनेक समकालीन लेखकों ने उनको भावभीनी श्रद्धांजलि दी। जाने-माने कवि डॉ कुसुम वियोगी लिखते हैं – ‘15,अगस्त 2021 दलित लेखक संघ के कार्यक्रम में अंतिम मुलाकात हुई थी उस समय अक्षर पब्लिकेशन एंड डिस्ट्रिब्यूटर से मेरी लिखी तीन पुस्तकें कांउटर से खरीद रहे थे और कहने लगे आपकी कहानियों पर लिखूंगा तब शरीर से काफी कमजोर लग रहे थे! मैंने पूछा तबियत ठीक है तो कहने लगे हां ठीक हूं परन्तु,आज मुकेश मानस के निधन की दुखद खबर सुनकर दिल धक्क से रह गया! गंभीर स्वभाव और मृदुल भाषी, प्रगतिशील दलित साहित्यकार,जनसंघर्षों से सरोकार रखने वाले मन मानस के धनी मुकेश मानस  सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर थे। उनके दो कविता संग्रह, दो कहानी संग्रह, कई आलोचना पुस्तकें और अनुवाद – हिंदी अकादमिक जगत में चर्चित थे। दलितों की प्रगतिशील धारा के लिए उनका जाना एक बड़ी क्षति है। उन्हें श्रमण साहित्य संस्कृति मंच एवं भारतीय दलित साहित्य मंच की ओर से भावपूर्ण श्रद्धांजलि!

अपने फेसबुक वाल पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ जय प्रकाश कर्दम ने लिखा – ‘डॉ मुकेश मानस सत्यवती कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के एसोशिएट प्रोफेसर होने के साथ साथ एक प्रतिभाशाली कवि और आलोचक थे। बहुत रचनात्मकता थी उनके अंदर और कुछ नया करने का उत्साह भी। आरोही नाम से प्रकाशन स्थापित किया और कई महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित कीं। मगहर पत्रिका का संपादन किया और कई यादगार अंक निकाले। रचनाकारों का एक समूह तैयार किया और अनेक गोष्ठियाँ आयोजित कीं। व्हाट्स एप्प पर भी ‘आरोही जन’ नाम से एक समूह का संचालन करते थे। रचनात्मक ऊर्जा से संपन्न ऐसे युवा साथी का असमय निधन बहुत दुःखद है। भावपूर्ण विदाई मुकेश भाई।’

युवा कहानीकार और आलोचक सुनील कुमार सुमन ने अपनी फेसबुक वाल पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुये लिखा कई बार ‘श्रद्धांजलि’ और ‘अलविदा’ लिखना कितना भयानक होता है…!! इस समय दिल-दिमाग की ऐसी ही दर्दनाक स्थिति हो रही है…

12 सितंबर को मुकेशजी से मेरी फोन पर बात हुई थी। वे हमारे जर्नल के लिए एक लेख भेजना चाहते थे। थोड़ी सी तबीयत ख़राब होने की बात की थी उन्होंने, लेकिन सेहत की ऐसी किसी गंभीर परेशानी से वे जूझ रहे थे, ऐसी कोई आशंका तक नहीं हुई थी। दिल्ली से थोड़ा दूर एकांत क्षेत्र में वे जरूर रहने लगे थे। कोरोना का संकट भी झेला उन्होंने। इस बार दिल्ली आने पर उनके यहाँ एक दिन आने का वादा किया था मैंने… लेकिन अब मुकेश कभी नहीं मिल पाएंगे हमें…

सुमन आगे लिखते हैं – ‘मुकेश मानस से अपने जेएनयू के छात्र जीवन से ही मेरा परिचय रहा। जल्दी ही वे आत्मीय मित्र बन गए थे। यह आत्मीय ऊष्मा अभी तक बनी हुई थी। देश-दुनिया, समाज-साहित्य को लेकर अपनी लंबी बातें होती थीं। लिखने-पढ़ने से लेकर एक्टिविज़्म तक में वे हमेशा सक्रिय रहे। बहुत सारी प्यारी यादें उनसे जुड़ी हुई हैं। लेकिन वह सब याद करके लगातार रोना ही आ रहा है। हाथ बार-बार काँप रहे हैं। ऐसा आत्मीय मित्र, लेखक-कवि-विचारक, संपादक, एक्टिविस्ट और एकेडेमिशियन मुकेश मानस अब हमें छोड़कर जा चुका है। यह सब बहुत ही पीड़ादायी और असहनीय है। समाज-साहित्य-संस्कृति की भी यह बड़ी क्षति है। आप बहुत याद आओगे मुकेश…. अंतिम जोहार साथी…! प्रकृति आपको अपनी गोद में जगह दे।’

रामपुर उत्तर प्रदेश स्थित प्रखर चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती ने बहुत व्यथित होकर अपनी वाल पर लिखा ‘डॉ मुकेश मानस के अचानक चले जाने का अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है। अभी उन्होंने रजनी तिलक पर बेहतरीन अंक निकाला था। उनसे जब भी बात होती थी, लम्बी बात होती थी।

रामपुर उत्तर प्रदेश स्थित प्रखर चिंतक और साहित्यकार कंवल भारती ने बहुत व्यथित होकर अपनी वाल पर लिखा ‘डॉ मुकेश मानस के अचानक चले जाने का अभी भी विश्वास नहीं हो रहा है। अभी उन्होंने रजनी तिलक पर बेहतरीन अंक निकाला था। उनसे जब भी बात होती थी, लम्बी बात होती थी। कई बार वह फोन पर ही रोने लगते थे। इधर एकाध साल से वह नितांत अकेले रहते थे, और अवसाद में भी थे। अक्सर जीवन से विरक्ति की बातें करते थे। उनका विवाह सफ़ल नहीं हुआ, और बताते थे कि उनके बच्चे भी उनके साथ नहीं रहते थे। मुझे उनके जाने का बहुत ही दुःख है। यह आयु उनके जाने की हरगिज़ नहीं थी। उफ! मानस तुम बहुत याद आओगे। तुम्हें मेरी भावभीनी विनम्र श्रद्धांजलि।’

दलित लेखक संघ की अध्यक्ष और कवियत्री-लेखिका अनीता भारती ने अपनी पीड़ा को इन शब्दों में व्यक्त किया ‘मेरे प्यारे भाई मुकेश मानस तुम्हे जाने की इतनी जल्दी क्यों थी?’

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने श्रद्धांजलि देते हुये अपने फेसबुक पेज पर लिखा ‘दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती महाविद्यालय के शिक्षक और हिंदी लेखक डा मुकेश मानस का असमय निधन बहुत दुखद है। कुछ देर पहले ही यह बुरी सूचना मिली। बहुत तकलीफ़ हो रही है सुनकर. उनका असमय जाना बहुत स्तब्धकारी. उनके परिवार के प्रति हमारी शोक संवेदना. नमन।

रंगकर्मी राजेश चंद्र ने मुकेश को याद करते हुये लिखा ‘साथी… ऐसी दहलाने वाली ख़बर के लिये हम तैयार नहीं थे। आपने हाल में भी भविष्य की कितनी ही योजनाओं पर चर्चा की थीं। सब अधूरी रह गयीं…! नमन भी कैसे लिखूं?’

झारखंड के कवि अजय यतीश ने कहा ‘दलित साहित्य का एक और चिराग बुझ गया। बेहद खामोशी के साथ साहित्य सृजन में रमा हुआ व्यक्ति का असमय हम सबों के बीच से  चले जाना धक्का लगा।भावभीनी श्रद्धांजलि।’

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राध्यापक हंसराज सुमन ने कहा कि ‘दलित साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार, कवि, लेखक, आलोचक डॉ.मुकेश मानस के आकस्मिक निधन से दलित साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है। अंतर्राष्ट्रीय अम्बेडकरवादी पत्रकार एवं लेखक संघ की ओर से उन्हें भावभीनी  आदरांजलि अर्पित।’

डा.अंबेडकर जन साहित्य मंच, रायबरेली, उत्तर प्रदेश के राम सनेही विनय ने लिखा दलित चेतना के अग्रणी चिंतक और विद्वान साहित्यकार डॉ मुकेश  मानव के आकस्मिक निधन पर भावभीनी  श्रद्धांजलि।’

कवि मुकेश मानस

मुकेश मानस के दो कविता संकलन प्रकाशित हुये। उनकी कविताओं में एक ओर आदर्शवाद था तो दूसरी ओर सामाजिक विडंबनाएं और तल्खी थी। कई बार तो कविता और जीवन का विरोधाभास बहुत गहराई से उनमें व्यक्त होता था। वे अपने समय की घटनाओं और चुनौतियों के साथ ही मानवीय प्रवृत्तियों को अपनी कविताओं का विषय बनाते थे। श्रद्धांजलि स्वरूप यहाँ उनकी कुछ कवितायें दी जा रही हैं –

स्त्री से प्रेम

प्रकृति से उसे मिला

एक चीज के रूप में

और उसने मुझे दिया

एत भरे पूरे वृक्ष की तरह

 

समंदर

ठहरे हुए पानी में

पत्थर मार कर किसी ने

पूरे समंदर को हिला दिया

या समंदर

खुद ही बहुत बेचैन था

 

हत्यारे

हत्यारे घूम रहे है

खुल्लम-खुल्ला, बड़ी शान से

 

अमूर्त हो रहे है अपराध

और हत्यारे बरी

दुनिया का कोई कानून

उन्हें हत्यारा नहीं मानता

 

हत्यारों को पहनाई जा रही है

रंग-बिरंगी पगड़ियां

उनकी मनुहार हो रही है

जय-जयकार गुंज रही है

समूचे ब्रहमांड में

 

मैं हैरान हूं

दूनिया में अरबों बच्चे

गूंगे क्यों हो रहे हैं?

 

मनुवादी

उसने मेरा नाम नहीं पूछा

मेरा काम नहीं पूछा

पूछी एक बात

क्या है मेरी जात

 

मैंने कहा- इंसान

उसके चेहरे पर उभर आई

एक कुटिल मुस्कान

 

उसने तेजी से किया अट्टहास

उस अट्टहास में था

मेरे उपहास का

एक लम्बा इतिहास

 

तुम्हारे पास

उनके पास लाठी हैं, बन्दूक हैं

तोपों के जाल हैं

तुम्हारे शब्द, तुम्हारे गीत

तुम्हारे हाथ ही ढाल है

 

उनके पास रेडियो हैं, अखबार हैं

छापेखाने हैं

तुम्हारे पास सपने हैं

उम्मीद के तराने हैं

 

उनके पास रोटी है, छत है

शांति है

तुम्हारे पास दर्द है, भूख है

क्रांति है

1997, पुरानी नोटबुक से

 

फिर

फिर कोई निराशा

पनप रही है मेरे भीतर

 

फिर कोई धुंआं

भर रहा है मेरे सीने में

 

फिर कोई धूल

मेरी आंखें दुखा रही है

 

फिर कोई हताशा

मुझको रुला रही है

 

चमको-चमको

खूब तेज चमको

मेरी प्रेरणा के सितारो

मुझको इस निराशा से उबारो

 

मगर

मारा गया बच्चा

सड़क पार करता हुआ

 

तेजी से आते ट्रक ने

कुचल दिया बच्चा

 

अपनी बीबी

और अपने बच्चे की ख़ातिर

भाग गया ट्रक वाला

 

मगर यह बच्चा तो मारा गया

सड़क पार करता हुआ

 

खोज

मैं खोज रहा हूं

वो फूल

जो मुझे मेरी ही खुशबू से महका दे

 

मैं खोज रहा हूं

वो गीत

जो मुझे मेरी ही लय में गुनगुना दे

 

मैं खोज रहा हूं

वो चिराग

जो मुझे मरी ही रौशनी से जगमग दे

 

मैं खोज रहा हूं

वो आंख

जो मुझे मुझको ही दिखा दे

 

मैं खोज रहा हूं

वो कविता

जो मुझे मेरे ही अर्थ में अभिव्यक्त कर दे

 

दोस्त

तुम हो फूल

तुम हो खुशबू

तुम्हीं बहार

 

तुम हो ममता

तुम हो करूणा

तुम हो प्यार

 

तुम हो राग

तुम हो रंग

तुम संसार

तुम ही जीवन का सार

2005, रेणु दीदी और राजेश भाई के लिए

 

गली के दो छोर

एक छोर पर

किसी की शादी है

लड़कियां सज रही हैं

शहनाईयां बज रही हैं

 

दूसर छोर पर

कोई मर गया है

लोग रो रह हैं

यादें बो रहे हैं

 

गली के बीचों-बीच खड़ा हूं मैं

मुझे क्यों यकिन नहीं होता

ये हकीकत है

या कोई भयानक स्वप्न

 

मैं जो देख रहा हूं

इसे देखना कोई खेल नहीं

गली के दोनों छोरों में

कोई मेल नहीं

 

सफ़दर

लोग कहते हैं

नाटक करता था सफ़दर

नाटक न करने वालों ने

उसकी हत्या कर दी

 

लोग कहते हैं

नाटक नहीं करता था सफदर

नाटक करने वालों ने

उसकी हत्या की दी

 

नाटक करने वालों

या नाटक न करने वालों में

सफ़दर था ही नहीं

एक दर्द भरी आवाज़ था

वह तो एक ज्वाल था

शोषक के लिए

सफ़दर एक कठिन सवाल था।

 आभार : कुछ सूचनाएँ और श्रद्धांजलियाँ फेसबुक और व्हाट्सेप्प से ली गईं। पुस्तकें और कवितायें ईश कुमार गंगानिया के सौजन्य से । 

Leave A Reply

Your email address will not be published.