मृदुला सिन्हा ने ‘काला पहाड़’ की अनौपचारिक मुंह दिखाई भर की थी 

सुप्रसिद्ध कथाकार भगवानदास मोरवाल से अटल तिवारी की बातचीत

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बातचीत का तीसरा हिस्सा

बियाबानकहानी के पात्र जावेद और विसनाथ के जरिए आपने मूल्यों के पतन और बाजार के प्रभाव में गांवों की बदलती संरचना को बखूबी पेश किया है। क्या आज की कहानियों में गांव के इस रूप को देख सकते हैं?

यह कहानी केवल मूल्यों के पतन और बाज़ार के प्रभाव की ही कहानी नहीं है बल्कि सामाजिक स्तर पर जिस तेज़ी से सांप्रदायिक असहिष्णुता बढ़ी है उसको भी दर्शाती है। दरअसल इस कहानी का जन्म दो ऐसे पात्रों से हुआ जो पार्टीशन की विभीषिका के गवाह रहे हैं।  विसनाथ जो पार्टीशन में हिन्दुस्तान आता है और अपनी जंगल की ज़मीन के साथ उसे जावेद के दादा रहने का आसरा प्रदान करते हैं लेकिन समय का फेर देखिए कि विसनाथ का परिवार शहर में आकर कहाँ से कहाँ पहुँच गया और जावेद के दादा की ज़मीन टुकड़ों में बँट गई। जावेद अपने दादा के कहने पर विसनाथ के बेटों के पास रोज़गार के लिए आता है। विसनाथ उसके दादा के एहसान को भूलता नहीं है मगर बेटे बहू जावेद को एक मुसलमान के रूप में देखते हैं। मेरा मानना है कि यह स्थिति या सांप्रदायिक असहिष्णुता हमारे समाज में तेज़ी से बढ़ी है। पहले यह गांवों में नहीं था, लेकिन आज यह गाँवों में सबसे अधिक नज़र आता है।

कथा साहित्य में आप अंधेरे कोनों को रोशन करने का प्रयास करते हुए दिखाई पड़ते हैं। मसलन सीढि़यां, मां और उसका देवताकहानी के नायक के जरिए वर्ण व्यवस्था की दीवार ढहाने के लिए आपने जहां डॉक्टरी पेशे को सीढ़ी बनाया है वहीं रंग अबीरमें लाला डालचंद का वहीद भाई के लिए दहाड़े मारकर रोना मानवीय रिश्तों की गरमाहट को व्यक्त करता है। कहानी में ऐसा यथार्थ रचने के पीछे कोई खास कारण है या रचनाकार की प्रतिबद्धता ही है?

1985 दिल्ली में

एक लेखक की समाज में सबसे बड़ी भूमिका ही यही होती है।  सच तो यह है कि लेखक वास्तव में कोई आम इंसान नहीं होता। वह समाज के आम आदमी से कहीं आगे जाकर सोचता है, इतना आगे जाकर कि हमें समाज में जो आज नज़र आता है उसकी कल्पना लेखक बहुत पहले कर चुका होता है। इसीलिए हम कहते हैं कि यह बात फलां लेखक बहुत पहले कह चुका था.‘सीढि़यां, मां और उसका देवता’ का नायक जो कि दलित है, कहानी की एक सवर्ण स्त्री पात्र के प्रति जो आसक्ति है उसमें स्नेह का वह परस है जो उसके डॉक्टर बनाने में सहायक होता है। यानी अगर वह डॉक्टर है तो उसी की प्रेरणा और साहस की बदौलत है। कहानी के आखिर में डॉक्टर उस लड़की की मां से कहता भी है कि अगले जन्म में अगर उसकी मां हो तो उसके जैसी हो। इसी तरह ‘रंग-अबीर’ दरअसल 1992 में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद वहीद के बहाने इस देश के लाखों अल्पसंख्यकों के उस दर्द को व्यक्त करती है, जो उन्हें इस देश के नागरिक होने पर संदेह पैदा करता है।  जैसाकि मैंने पहले भी कहा है कि मेरी रचनाओं में चाहे वे कहानियाँ हों या उपन्यास बार-बार मुस्लिम परिवेश और पात्र क्यों आते हैं? मैंने इसके जवाब में कहा था कि मेरे पात्र अपने परिवेश की माटी की गंध और यहीं के नागरिकों के सुख-दुःख से सराबोर होंगे, तो चाहे वह वहीद भाई हों या लाला डालचंद, आखिर हैं तो सभी इस देश के. यह कोई यथार्थ रचने वाली बात नहीं है बल्कि यथार्थ ही है। कोई भी लेखक अपनी कहानी-उपन्यासों के लिए विषय और पात्र कहाँ से लाएगा, ज़ाहिर-सी बात है अपने आसपास या उसने जो देखा या भोगा है वहीं से लाएगा. दुर्भाग्य से पिछले कुछ सालों से शिल्प के रूप में कहानी के नाम पर जो आ रहा है उसे आप देख ही रहे हैं। कहानी सिर्फ शिल्प की चकाचौंध ही तो नहीं होती उसमें जीवन-जगत, उसकी विडम्बनायें बहुत कुछ होता है। एक बात मैं यहाँ कहना चाहूंगा कि जिस संख्या में आज कहानी लिखी जा रही हैं, यानी जिसके मन में जो आ रहा है लिख रहा है उससे ‘कहानी’ की पहचान करना मुश्किल हो गया है।  यथार्थ और रचनाकार की प्रतिबद्धता ये दोनों तत्व जितनी तेज़ी से विलुप्त होते जा रहे हैं, उससे एक खतरा कहानी के लिए यह हो गया है कि उससे किस्सागोई को भारी नुक्सान हुआ है।

राजेन्द्र यादव के निधन पर लिखे अपने संस्मरण में आपने लिखा है कि एक गांठ राजेन्द्र यादव के अंदर मुझे लेकर अंत तक बनी रही। यह कौन सी गांठ थी?

राजेन्द्रजी की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह थी कि जिसके प्रति वे कोई आग्रह पाल लेते थे उससे वे आसानी से मुक्त नहीं होते थे। एक कमज़ोरी उनमें यह भी थी कि चूंकि वे हंस के कार्यालय से सिवाय उन सभा-गोष्ठियों के जिनमें उन्हें अध्यक्ष या मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाता था, वे कहीं नहीं जाते थे। बावजूद इसके उन्हें हिंदी जगत की एक-एक घटना की जानकारी होती थी।  ये जानकारी उन्हें उनके कुछ तथाकथित ‘खास’ दरबारी जिनमें ‘लेखक’-‘लेखिकाएं दोनों होती थीं, बराबर देते थे और जो जानकारी उन्हें दी जाती थी, उसे वे सच मान बैठते थे। उनकी इस कमज़ोरी का ये दरबारी भरपूर फायदा उठाते थे।  कुछ ऐसा ही किसी दरबारी ने उन्हें कहा था कि मैं उनके बारे में कॉफ़ी हाउस में टिप्पणी करता हूँ। मुझे लेकर उनके मन में कभी भी एक लेखक जैसा भाव नहीं रहा. वह गाँठ उनके मन में अंत तक बनी रही।  मैंने भी बाद में तय कर लिया था कि मैं ‘हंस’ के लिए कुछ नहीं भेजूंगा, जिस पर मैं आज भी कायम हूँ।  हालांकि इस बीच उन्होंने समय-समय पर अपने संपादकीय से लेकर इधर-उधर काला पहाड़ से लेकर रेत पर जिस तरह की टिप्पणी की उसने मेरा बहुत हौसला बढ़ाया।  सच तो यह है कि आप उनको भले ही पसंद-नापसंद करते हों, बावजूद इसके जो चीज़ उन्हें अच्छी लगती उस पर ज़रूर अपनी बात कहते। उनका जाना वास्तव में साहित्य की उस परंपरा का जाना है जो अपनी बात पूरी ईमानदारी से कहते थे।

मेरा तो मानना है कि जो विकार हमारी राजनीति में थे वही साहित्य में भी आ गए हैं वर्चस्व का विकार। रही बात इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है, इसका जवाब हम सब जानते हैं लेकिन कहता कोई नहीं है. लेखक का यही दुचित्तापन इसके लिए ज़िम्मेदार है।

हालांकि पहले आपने हंसमें प्रकाशित होने के लिए दो कहानियां भेजी थीं, लेकिन दोनों कहानियां नहीं छपीं। आप इसकी क्या वजह मानते हैं और शायद इसी के बाद आपने हंसमें कुछ भी न भेजने का फैसला ले लिया।

मुझे लगता है कि हंस का वह शुरुआती दौर था. राजेन्द्रजी रचनाओं का चयन बेहद निर्ममता के साथ करते थे जिसका परिणाम यह हुआ कि हंस ने पाठकों को एक से एक बेहतर कहानियाँ और प्रतिभाशाली लेखक दिए। हालांकि उनमें से बहुत से प्रतिभाशालियों को आज हम जानते भी नहीं हैं। एकाध कहानी लिखकर वे कहाँ बिला गए, कोई नहीं जानता। हिंदी साहित्य को दिए जाने वाले आज के सर्वाधिक चर्चित, लोकप्रिय और उद्वेलित करने वाले दलित और स्त्री-विमर्श दिए। अगर ये दोनों विमर्श नहीं होते तो आज जगह-जगह नुक्कड़ों पर हमें अपनी कांख में दबाये विमर्शों के नाम पर तख्तियां लटकाए लेखकों की जो भीड़ दिखाई देती है, वह नज़र नहीं आती। इन विमर्शों ने ऐसे अनेक प्रतिभाहीनों को भी लेखक बना दिया जिनकी सामाजिक और वैचारिक परिपक्वता, चिंतन व समझ हमेशा से बेहद सतही तथा संदेहास्पद रही है। मगर राजेन्द्रजी के पूर्वाग्रहों को भी हम अच्छी तरह जानते हैं।  जिस लेखक या व्यक्ति को वे पसंद नहीं करते थे ‘हंस’ में न छापने के उनके पास एक से एक तर्क होते थे। यहाँ तक कि जिन्हें वे पसंद करते थे उन्हें हंस के कार्यालय में बिठा कर हाथों-हाथ कहानी लिखवाते थे। उदाहरण के लिए मैंने उनको दो  कहानियाँ  भूकंप और रंगअबीर भेजी, जो 1990 में रथ यात्रा के दौरान मेवात में उपजे सांप्रदायिक भय को आधार बनाकर लिखी गई थी।  लेकिन दोनों कहानियाँ पूरे सम्मान के साथ लौटा दी गईं। ऐसी ही स्थितियां एक बार फिर से मेवात में बनती नज़र आ रही हैं।  इसका ताज़ा उदाहरण हैं हाल में बल्लबगढ़ के अटाली गाँव में हुए दंगे।  इनमें से पहली कहानी भूकंप बाद में साप्ताहिक हिन्दुस्तान में प्रकाशित हुई।  तत्पश्चात ये दोनों कहानियाँ 1993 में प्रकाशित मेरे कहानी संग्रह अस्सी मॉडल उर्फ़ सूबेदार में संकलित हैं। इस संग्रह की भूमिका में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. नित्यानन्द तिवारी ने लिखा है-‘स्थानीयता’ की बड़ी दारुण अनुभूति भूकंप कहानी में व्यक्त हुई है। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे से निकले दुःख की अनेक कहानियाँ हिंदी, पंजाबी, उर्दू, बांग्ला में क्लासिक महत्त्व पा चुकी हैं।  भूकंप में 1947 की स्मृति है लेकिन यह स्मृति 30 तारीख (राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के संदर्भ में) के संभावित दंगों के संदर्भ में है।  इतनी निकटवर्ती घटना को लेखक ने एक जीवंत वास्तविक कलानुभूति में व्यक्त कर दिया है। इस कहानी की पारो की सृष्टि हिंदी कहानी के महत्त्वपूर्ण पात्रों की जमात में शामिल होने लायक है’।

जबकि इस कहानी को न छापने का राजेन्द्रजी ने जो तर्क दिया वह यह है-‘मेरी जानकारी में यह शायद पहली कहानी है जो मेवों के जीवन पर लिखी गई है।  हो सकता है एकाध रांगेय राघव ने भी लिखी हो। मगर यह हिंदी पाठकों के लिए नई ही है क्योंकि नामों से लेकर रीति-रिवाज़ और धार्मिक विश्वासों में वहां हिन्दू-मुसलमान इतने ज्यादा घुले-मिले हैं कि बाहर वालों के लिए उस स्थिति को समझना मुश्किल है।  संबंधों की यह जटिलता और उलझन कहानी में कहीं दिखाई नहीं देती, इसलिए मुझे लगता है कि इस कहानी को चलते-चलते न लिखकर इस पर मेहनत करो और सामाजिक स्थितियों, संबंधों की जटिलताओं और द्वंद्वात्मकता को ज्यादा गहराई से उभारें’। लगभग ऐसी ही संक्षिप्त-सी टिप्पणी के बाद रंगअबीर भी लौटा दी गई। इसके बाद मेरी समझ में आ गया कि हंस में अब कुछ भी भेजना व्यर्थ है और मैंने तय कर लिया कि हंस में अब मैं कुछ नहीं भेजूंगा. अपने इस कौल पर मैं आज तक कायम हूँ।

आपने लिखा है कि राजेन्द्र यादव पिछले दस सालों से कुछ प्रतिभाहीन चिलमचियों से घिरते चले गए, जो किसी तरह से न कभी लेखक थे और न ही राजेन्द्रजी की कोशिशों के बाद वे लेखक बन पाए। इन चिलमचियों के कारण ही उन्हें असमय अवसान का शिकार होना पड़ा। क्या अब इन चिलमचियों का खुलासा करेंगे?

ये प्रतिभाहीन चिलमची वही थे जिन्हें मैंने उनका ख़ास दरबारी कहा है। राजेन्द्रजी ने उन्हें इस कदर लेखक बना दिया कि उनमें से ज़्यादातर का लेखक संघों पर लगभग क़ब्ज़ा-सा है। निर्मला जैन के शब्दों में कहूं तो राजेन्द्रजी ने खोटे सिक्कों को भी लेखक बना दिया।  मेरे इस इशारे से आप समझ सकते हैं कि एक तरफ़ इनमें कुछ अपने आपको कम्युनिस्ट होने का दिखावा करते हैं, तो दूसरी तरफ़ तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी सरकारों के आयोजनों  में सीना तानकर शिरकत करते हैं।  इनमें से एकाध तो वर्णवाद के खिलाफ भोंथरी तलवार भांज रहे ‘दलित’ लेखक जलेस, प्रलेस और जसम जैसे सवर्णवादी लेखक संघों के समांतर बनाए गए दलित लेखक संघों पर कब्ज़े के लिए खून-खराबे पर आमादा हैं। इसका दृश्य पिछले दिनों हम देख चुके हैं।

आपने कहा है कि वामपंथी लेखक संगठनों की भूमिका वृद्धाश्रम से अधिक नहीं रह गई है। वह महज कुछ लेखकों के हस्ताक्षर अभियान के मंच बनकर रह गए हैं। इसके लिए आखिर कौन दोषी है?

जहां तक वामपंथी लेखक संगठनों की भूमिका का सवाल है इन पर एक वर्ग और जाति विशेष का क़ब्ज़ा हो चुका है। मैं तो यह कहूँगा कि इन कारणों का एक समाजशास्त्रीय अध्ययन होना चाहिए कि  हमारे सभी वामपंथी लेखक संगठनों पर ब्राह्मणों और राजपूतों का ही वर्चस्व क्यों है। क्या कारण हैं कि इन लेखक संगठनों में लेखकों से ज्यादा अध्यापकों की भरमार है? कहीं इसके पीछे वही मनुवादी मानसिकता तो काम नहीं कर रही है, जो आज भी भारतीय समाज में कर रही है? मेरा मानना है कि लेखक संघों में पदाधिकारियों के चुनावों में पारदर्शिता होनी चाहिए. ऐसी पारदर्शिता नहीं जैसी पिछले दिनों एक दलित लेखक संघ के चुनावों में देखने को मिली थी। हम लाख कहें कि आज का लेखक मूल्यों के लिए लड़ता है, मुझे नहीं लगता। मेरा तो मानना है कि जो विकार हमारी राजनीति में थे वही साहित्य में भी आ गए हैं वर्चस्व का विकार।  रही बात इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है, इसका जवाब हम सब जानते हैं लेकिन कहता कोई नहीं है. लेखक का यही दुचित्तापन इसके लिए ज़िम्मेदार है।

इन दलित लेखक संघों की एक बड़ी भूमिका मेरी नज़र में यह रही है कि कल तक ब्राह्मणवादी मानसिकता के चलते जिन दलितों-अति पिछड़ों को लेखक के रूप में मान्यता नहीं मिलती थी, उन्हें लेखकों की जमात में शामिल नहीं किया जाता था, अवसर मिलते ही आज इन समाजों के लेखकों की ब्राह्मणवादी-सवर्ण लेखकों के समांतर अपनी एक साहित्यिक सत्ता है जो किसी के प्रमाण-पत्र से लेखक नहीं बने हैं बल्कि अपने लेखकीय ताप और ऊर्जा से अपनी ज़मीन पुख्ता कर पाए हैं।

वामपंथी लेखक संगठनों पर आपने दलित और अति पिछड़ी जाति के लेखकों की उपेक्षा का आरोप लगाया है। आपका मानना है कि इसी उपेक्षा के चलते कई दलित लेखक संघों का उदय हुआ, इन संगठनों ने साहित्य में ऐसी कौन-सी भूमिका निभाई, जिसे आप रेखांकित करना चाहेंगे?

1995 में मद्रास में पूर्व राष्ट्रपति के साथ

थोड़ी देर के लिए मान लें कि मैंने वामपंथी लेखक संगठनों पर दलित और पिछड़ी जाति के लेखकों की उपेक्षा का जो आरोप लगाया है वह सही नहीं है, तो मैं एक बात जानना चाहता हूँ कि हमारे इन वामपंथी लेखक संगठनों में आज दलित और पिछड़ी जाति (यादवों को छोड़ कर) के कितने लेखक हैं? वामपंथी लेखक संगठनों की इसी उपेक्षा से आजिज़ आकर इनसे ज़्यादातर दलित और एक हद तक पिछड़ी जाति के लेखक दूर होते चले गए। मुझे तो लगता है दलित लेखक संघ की अवधारणा ही अदूरदर्शी अवधारणा थी। इसकी जगह अगर इसका नाम ‘बहुजन लेखक संघ’ होता तो इसकी भूमिका और बड़ी होती। मगर इसके भी कुछ खतरे थे और वे ये कि जो शक्तियां वामपंथी लेखक संगठनों पर काबिज़ हैं, शायद ‘बहुजन लेखक संघ’ पर भी उन्हीं का क़ब्ज़ा होता और दलित लेखक फिर अपने आपको वामपंथी लेखक संगठनों की तरह उपेक्षित रह जाते. जैसा कि ‘दलित लेखक संघ’, ‘दलित राइटर्स फ़ोरम’, ‘भारतीय दलित-साहित्य अकादमी’ या फिर दलित-साहित्य लेखांक मंच’ जैसे संगठनों के गठन के उद्देश्य और निहितार्थ कुछ और थे लेकिन कुछ ही वर्षों में इनका जो चरित्र उभर कर आया है वह बहुत ही निराश करने वाला है।  निराश करने वाला इसलिए कि आज लेखक संघों को हम लेखक बनाने का कारखाना मान चुके हैं। इसलिए लेखक संघों में लेखक कम पदाधिकारियों के नाम पर कर्मचारी यूनियन के नेता और लेखकों के नाम पर भीड़ ज्यादा बढ़ गई है बल्कि मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि हमारे तमाम लेखक संघ एनजीओ की तरह काम कर रहे हैं। इसलिए इन्हें साहित्यिक एनजीओ कहना ज्यादा मुनासिब होगा। रही बात दलित लेखक संघ की भूमिका की, तो मेरी नज़र में इस संघ की सबसे बड़ी भूमिका यही है कि लेखक संघों के नाम पर प्रगतिशील लेखक संघ से टूटकर आज जिस तरह तीन-तीन वामपंथी लेखक संघ बन गए हैं, उसी तरह आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि दलित लेखक संघों पर कब्ज़े के चलते टूट कर ज़ल्द ही और दलित लेखक संघ अस्तित्व में आ जाएं. कहने का तात्पर्य मेरा यह है कि चरित्र और चाल-चलन के लिहाज़ से ये दलित लेखक संघ भी वामपंथी लेखक संगठनों से अलग नहीं हैं। अलग इसलिए नहीं कि एक दलित लेखक संघ पर अछूत दलित (जाटव, वाल्मीकि आदि ) तथा सवर्ण दलितों की वर्चस्व और अहम् का ज़बरदस्त टकराव चल रहा है।  वास्तव में यह दलितों के भीतर का वर्गीय और जातीय संघर्ष है। अगर चाहते तो ये दलित लेखक संघ बहुत बेहतर काम कर सकते हैं मगर करें तो तब जब इससे जुड़े दलित लेखकों को एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने से फुरसत मिले। बावजूद इसके इन दलित लेखक संघों की एक बड़ी भूमिका मेरी नज़र में यह रही है कि कल तक ब्राह्मणवादी मानसिकता के चलते जिन दलितों-अति पिछड़ों को लेखक के रूप में मान्यता नहीं मिलती थी, उन्हें लेखकों की जमात में शामिल नहीं किया जाता था, अवसर मिलते ही आज इन समाजों के लेखकों की ब्राह्मणवादी-सवर्ण लेखकों के समांतर अपनी एक साहित्यिक सत्ता है जो किसी के प्रमाण-पत्र से लेखक नहीं बने हैं बल्कि अपने लेखकीय ताप और ऊर्जा से अपनी ज़मीन पुख्ता कर पाए हैं।

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केन्द्रीय सत्ता में विशाल बहुमत वाली मोदी सरकार के आते ही हिंदी के लेखकों की निष्ठा डांवाडोल हो रही है। छत्तीसगढ़ से लेकर बनारस तक तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी सरकारों के आयोजन में लेखक शामिल हो रहे हैं। सवाल उठाने पर वह हास्यास्पद जुमले गढ़ रहे हैं। सवाल करने वालों की ही नीयत पर संदेह जताते हुए एक लेख के बदले पांच लेख (जनसत्ता में वीरेन्द्र यादव के लेख के जवाब में पांच लेख) लिखवाए जा रहे हैं। पाखीमें सवाल उठाने वाला लेख छपते ही अगले अंक में पत्रिका के मालिकान द्वारा संपादक की भूमिका को गौण करते हुए स्पष्टीकरण दिया जा रहा है। क्या लेखकों की रीढ़ इतनी कमजोर हो गयी है कि उनके लिए विचारधारा और साम्प्रदायिकता किसी तरह का मुद्दा नहीं रहा? इसे आप किस रूप में देख रहे हैं?

मैं बार-बार एक बात कहता हूँ कि विचारधारा एक तरह से बाहरी आवरण हैं। हम चाहे अपने आप को लाख कम्युनिस्ट कह लें, कितना ही प्रगतिशील मान लें मगर मानसिकता और आचरण से हम वही हैं जो होना चाहिए।  यह तो अभी शुरुआत है और नई सरकार को आये हुए एक ही साल हुआ है।  आगे-आगे देखिए क्या होता है। वैसे ऐसे लेखक अचानक अपनी-अपनी मांदों से बाहर निकल आये हैं जो कल तक अपने आप को वामपंथी कहते थे, रातों-रात राष्ट्रवादी बन गए हैं। जिनके हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का अन्दर ही अन्दर अभी तक दम घुट रहा था और जो बाहर आने के लिए छटपटा रहा था, वह धीरे-धीरे बाहर आना शुरू हो गया है। सबसे बड़ा सवाल तो हमारे हिंदी के उन वामपंथी लेखक संगठनों को लेकर खड़ा होता है, जिन्हें मैं हिंदी नहीं ‘हिन्दू’ लेखक संघ कहता हूँ।  सबसे मजेदार तो यह है कि दिल्ली इकाई के एक लेखक संघ की मुखिया जो कि जन्मना ब्राह्मण है, हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के आयोजन में अपने शामिल होने को न केवल जस्टिफाई करती हैं बल्कि लगता है वे आगे भी ऐसे आयोजनों में जाती  रहेंगी।  प्रखर समालोचक वीरेन्द्र यादव की हिम्मत की हमें सराहना करनी होगी जिन्होंने इन हिंदूवादी कम्युनिस्टों की तथाकथित प्रगतिशीलता को बेपर्दा कर दिया। मैं तो इस पूरे प्रकरण को लेकर यह सोच रहा हूँ कि अगर आज राजेन्द्र यादव जी होते तो अपने इन दो लेखकों यानी वीरेन्द्र यादव और दिल्ली इकाई के एक लेखक संघ की मुखिया के इस आचरण-लीला के बारे में क्या कहते? दरअसल, हिंदी के लेखक की आकांक्षाएं, महत्वाकांक्षाएं और उसकी दौड़ इतनी छोटी होती है कि वह कहाँ और कब फिसल जाए कुछ नहीं कह सकते।  छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए वह कुछ भी समझौता कर सकता है। यह व्याधि आर्थिक रूप से संपन्न उन लेखकों में कहीं ज्यादा नज़र आती है जो प्रवृत्ति से कभी लेखक नहीं थे । बस संयोग से उन्हें एक गॉड फादर मिल गया और बन गए मसीहा। ये अपने संसाधनों के बल पर लेखक तो बन जाते हैं लेकिन लेखक बनने पर सबसे ज्यादा नुकसान भी इन्हीं के कारण होता है क्योंकि  विचारधारा को ये बपौती के रूप में इस्तेमाल करते हैं। विचारधारा का ढिंढोरा भी सबसे ज्यादा वही पीटते हैं जो संस्कारगत और मानसिक रूप से सांप्रदायिक हैं।  लेखक या लेखक संगठन तो समाज में अपने आपको प्रगतिशील दिखने का माध्यम और मंच हैं।  यहाँ एक बात और हमारे ज़्यादातर लेखक संघों की कार्यशैली हूबहू कुछ वर्चस्ववादी राजनीतिक पार्टियों की तरह है कि जो सालों से इनसे जुड़े हुए हैं वे मामूली कार्यकर्ता की तरह काम करते हैं और मोटा चंदा देने वाला इनका पदाधिकारी बन जाता  है।  आज तो इनसे जुड़े बहुत से लेखकों को आप ‘मुँह में वाम, बगल में राम’ वाली मुद्राओं में देख सकते हैं.

एक समय में आपने भी काला पहाड़उपन्यास का विमोचन एक भाजपा नेत्री से कराया था, जिस पर हिंदी जगत में हंगामा मचा था. ऐसा कराने के पीछे आपकी क्या मजबूरी थी?

दरअसल यह विमोचन लेखक या प्रकाशक द्वारा कराया गया कोई सार्वजनिक लोकार्पण या विमोचन नहीं था। काला पहाड़ के प्रकाशन पर यह मेरे विभाग (जहाँ मैं आज भी कार्यरत हूँ) द्वारा इस मंशा और नीयत से दी गई एक छोटी सी चाय पार्टी थी कि इस कार्यालय में भी एक लेखक नाम का जीव है। यह एक संयोग था कि भाजपा से जुड़ी, गोवा की वर्तमान राज्यपाल और हिंदी की लेखिका मृदुला सिन्हा उन दिनों हमारे बोर्ड (विभाग) की अध्यक्षा थीं। चाय पार्टी के दौरान उनके कर कमलों से पूरी की गई यह एक अनौपचारिक सी काला पहाड़ की मुहँ दिखाई रस्म भर थी। हाँ, मुझसे एक नादानी यह हो गई कि इस चाय पार्टी की छोटी-सी खबर, जिन्होंने चाय पानी पर खर्चा किया था उनके एहसान को उतारने की गरज़ से छपवा दी। इसके छपते ही तीखी प्रतिक्रियाएं शुरू हो गईं। सबसे तीखी प्रतिक्रिया राजेन्द्र यादव की थी। उन्होंने तो एक तरह से मुझ पर आरआरएस का तमगा ही लगा दिया था। मगर राजेन्द्रजी भूल गए थे काला पहाड़ का लेखक उनके द्वारा बनाए गए उन लेखकों की तरह नहीं हैं, जो ‘मुहं में राम, बगल में वाम’ की पोथी दबाए तथाकथित हिंदू राष्ट्रवादी सरकारों के आयोजनों में चले जाते हैं !

अटल तिवारी पत्रकारिता के प्राध्यापक हैं और दिल्ली में रहते हैं

बातचीत क्रमशः

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