मकई के दाने

अनूप मणि त्रिपाठी

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मकई के दानों को बालू में डाला गया। बालू पहले से गर्म थी। अंगीठी पहले से जल रही थी। यानी जीने की स्थिति इतनी भी माकूल नहीं थी।
उस में पड़ते ही एक लाल दाना उछला, ‘हाय दइया! मार डाला!’
उसकी इस प्रतिक्रिया पर दूसरे दाने हँस पड़े। उनमें से एक पीला दाना बोला,’थोड़ा सहने की आदत डालो मित्र! यह तुम्हारा पूर्वग्रह है, तभी तुमने यह प्रतिक्रिया दी!!!’
‘अरे भाई मेरे…अभी से ही हलक सूखी जा रही है, अभी न बोले तो हमारे लिये जीना और दूभर हो जाएगा!’ लाल दाना और लाल होते हुए बोला।
‘पता नहीं तुमने क्या देखा-सुना है! मेरे विचार से इस बार स्थिति भिन्न होगी!’ एक बड़े दाने ने कहा।
‘और क्या! हम बहुत दब चुके हैं, अब हमारे उछलने के दिन आएँ हैं!’ एक छोटे दाने ने यह बात कही।
‘तुम तब कहाँ थे, जब हमारे दूसरे भाइयों के साथ गलत हुआ था!’ एक काले दाने इस बात को बहुत गुस्से से कहा।
‘भाई माफ करो! तब मैं पैदा नहीं हुआ था! अभी तो बोल रहा हूँ न!’ लाल दाने ने जवाब दिया।
इस बीच अंगीठी की आग और तेज कर दी गयी। बालू और गर्म हो गयी।
‘और भी तो हैं! बस तुम्हीं को तकलीफ हो रही!’ काले दाने ने तमतमाते हुए कहा।
‘लेकिन तुम तमतमा क्यों रहे हो!’ लाल दाने ने पूछा।
‘मैं गुस्से से तमतमा रहा हूँ!’ काले दाने ने नजरें चुराते हुए कहा।
‘सच कहो, क्या तुम्हें कोई तकलीफ नहीं हो रही है!’ लाल दाने ने बहुत प्यार से पूछा।
‘जब सबका यही हाल है, तो हमें भी क्या फर्क पड़ता है!’ काले दाने ने इधर-उधर देखते हुए कहा।
इसी बीच अंगीठी की आग और बालू दोनों बहुत गर्म हो चुके थे।
‘इंकलाब!’ बोल लाल दाना इतनी जोर से फूटा कि वह कढ़ाई के बाहर जा गिरा।
‘जो ज्यादा उछलता है, उसका यही हश्र होता है बन्धु!’ काला जो कि और काला हो चुका था, वह बोला।
‘हमारा यही प्रारब्ध है, तो क्या किया जाये! हमारे दादा के साथ भी ऐसा हुआ, हमारे बाप भी वही हुआ और अब हमारे साथ भी कुछ नया नहीं हो रहा!’ पीला दाना जो कि अब भूरा दीख रहा था, वह बोला।
सारे दानों ने उसकी हाँ में हाँ मिलायी।
‘ओ भाई! हमारे बाप-दादाओं के साथ ऐसा इसलिए हुआ कि उन्होंने आवाज नहीं उठायी!’ लाल दाना अकेले ही जमीन पर पड़े-पड़े बोला।
‘कोई आवाज लगा रहा है शायद!’ पीले दाने ने कढ़ाई से बाहर झाँका। ‘देखो! वह आवाज लगा रहा!’  उसने साथी दानों से कहा।
‘उठाने के लिए कह रहा होगा!’ काला दाना हँसते हुए बोला।
‘आवाज को!’ पीले दाने ने चौंक कर पूछा।
‘नहीं खुद को!’ काला दाना फिर जोर से  हँसा। उसके साथ सारे दाने भी हँस पड़े।
‘भुनभुनाने दो… अकेले पड़े-पड़े स्याले को!’ हँसी के बीच किसी दाने ने यह बात बोली।
इस बात पर हँसी और बढ़ गयी। उन्हें देख कर कौन कह सकता था कि वे जहाँ हैं, वहाँ आग लगी हुयी है।
सारे दाने भूने जा रहे थे। कमाल है, उनमें से कई दाने जोर-जोर से फूट कर भूनने वाले के लिये नारे लगा रहे थे और कुछ लाल दाने को गलिया रहे थे।
शायद, मौजूदा स्थिति को नकारने का इससे बेहतर उपाय उनके पास नहीं था!!!

अनूप मणि त्रिपाठी स्वतंत्र लेखक हैं और लखनऊ में रहते हैं।

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