‘ढाई आखर प्रेम’ की यात्रा ने झारखंड में अलख जगाया

मृगेन्द्र सिंह, अर्पिता श्रीवास्तव और शेखर मलिक की रिपोर्ट

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आज़ादी के पचहत्तरवें वर्ष में प्रवेश के साथ ही समूचे देश में नफरत की आँधी तेज़ की जा रही है। सामान्य जन अपने प्रजातांत्रिक मूल्यों को क्षति पहुँचने के डर से सिमटा हुआ है। ऐसे समय में इप्टा की राष्ट्रीय समिति द्वारा हस्तक्षेप के रूप में जन-जागरण के लिए 09 अप्रैल से 22 मई 2022 तक ढाई आखर प्रेम शीर्षक के अंतर्गत सांस्कृतिक यात्रा शुरु की गई है। प्रथम चरण में यह यात्रा छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश – इन पाँच हिंदीभाषी राज्यों में सम्पन्न की जा रही है। इस सांस्कृतिक यात्रा में प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, दलित लेखक संघ, जन नाट्य मंच के अलावा दसियों समानविचारी स्थानीय व प्रादेशिक संगठनों का साथ मिला है।

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छत्तीसगढ़ में चार दिन की यात्रा का प्रथम चरण पूरा कर ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा पाँचवें दिन अंबिकापुर से झारखण्ड के गढ़वा जिले में पहुँची। गढ़वा जिले के रंका कस्बे में क्षेत्रीय इप्टा के साथियों द्वारा सांस्कृतिक यात्रा की अगवानी की गई तथा बस स्टैंड पर सड़क के किनारे इप्टा के बैनर तले जनगीत प्रस्तुत किया गया। कम समय होने के बावजूद पोस्टर प्रदर्शनी भी लगाई गई। इस यात्रा में इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश, राष्ट्रीय सचिवद्वय शैलेन्द्र कुमार तथा राजेश श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ इप्टा के अध्यक्ष मणिमय मुखर्जी तथा निसार अली, दिल्ली इप्टा से वर्षा एवं विनोद कोष्ठी, मध्यप्रदेश इप्टा से मृगेन्द्र सिंह तथा कुश झारखंड पहुँचे हैं। भीषण गर्मी के चलते इनका स्वागत सत्तू पिलाकर किया गया। इसके बाद काफिले के रूप में यात्रा गढ़वा शहर में पहुँची। आंबेडकर चैक पर पहुँचकर महासचिव साथी राकेश के साथ अन्य साथियों ने डाॅ. आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर जनता के पक्ष में नारा लगाकर आवाज़ बुलंद की। यहाँ जलियाँवाला बाग के शहीदों की याद में समर्पित कार्यक्रम स्थल पर सांस्कृतिक यात्रा में चल रहे साथियों का स्वागत-सम्मान किया गया। झारखंड इप्टा के साथी प्रेमशंकर, रवि एवं साथियों ने यात्रा का संदेश-गीत ढाई आखर प्रेम के पढ़ने और पढ़ाने आये हैं प्रस्तुत किया। साथी राकेश ने उपस्थित जनसमुदाय के सामने सावित्रीबाई फुले, ज्योतिबा फुले, आंबेडकर, गांधी, कबीर, फातिमा शेख, भगतसिंह आदि को क्यों याद किया जाना चाहिए, बताते हुए कहा कि इन्होंने देश की स्वतंत्रता के साथ-साथ मनुष्य की स्वतंत्रता के लिए भी काम किया।

उन्होंने जालियाँवाला बाग कांड के शहीदों को नमन करते हुए कहा कि ‘‘यह यात्रा तमाम देशभक्त शहीदों, लेखकों, कला और संस्कृति में योगदान देने वाले हमारे पुरखों को खोजने की, उन्हें याद करने की यात्रा है। यह प्रेम और सद्भाव की यात्रा है।’’ कबीर और तुलसी के जीवन से जुड़ी घटनाओं का ज़िक्र करते हुए साम्प्रदायिक ताकतों को आड़े हाथों लेते हुए राकेश ने कहा कि ‘‘राम के नाम पर नफरत फैलाने वाले यह नहीं जानते कि इस देश ने उस राम को जाना है, जो शबरी के झूठे बेर खाता है। आज प्रतीकों का इस्तेमाल नफरत और घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है। हम कबीर के प्रेम के संदेश को लेकर यात्रा में निकले हैं। हम प्रेमचंद के गाँव जाएंगे, जिसने ईदगाह लिखा, हम राहुल सांकृत्यायन के गाँव जाएंगे, हम राही मासूम रज़ा के गाँव जाएंगे, जिन्होंने कहा था कि गंगा मेरी माँ है, मेरी मृत देह को जलाकर मेरी अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित की जाएँ!’’ साथी शैलेन्द्र कुमार ने अपने उद्बोधन में कहा कि मनुष्य का जन्म प्रेम और करूणा से बना है मगर इसके विपरीत आज मनुष्यों में साम्प्रदायिकता और नफरत फैलाने का काम किया जा रहा है। उन्होंने रामनवमी के अवसर पर फैलाई गई हिंसा का विरोध करते हुए कहा कि ‘‘अभी रामनवमी थी और राम की क्रोधित मुद्रा में प्रत्यंचा खींचे हुए फोटो हर जगह पोस्टर में प्रदर्शित किये जा रहे हैं। लेकिन हमें उस राम की तलाश है, जो अपने नन्हें नन्हें पाँवों से दशरथ के आँगन में ठुमककर चलता है। हम प्रेम की तलाश करने वाले लोग हैं। हमें अपने बच्चों को बचाना होगा कि वे दंगाइयों की भीड़ में शामिल न हों जाएँ। हम प्रेम और मोहब्बत का गीत गाने निकले हैं।’’ इन संबोधनों के बाद झारखंड इप्टा के साथियों ने ‘मुसलमाँ और हिंदू की जान, कहाँ है मेरा हिंदुस्तान, उसे मैं ढूँढ़ रहा हूँ’ तथा ‘हक की लड़ाई है ये हक की लड़ाई है’ जनगीत ढोलक, हारमोनियम और खंजड़ी के साथ सुनाए। यहाँ धूप और गर्मीभरी दोपहरी में भी जमा हुए जनसमुदाय को दाद देनी होगी कि जिसमें कई लोग बैठने की जगह न मिलने पर खड़े खड़े पूरा कार्यक्रम देखते-सुनते रहे। उन सबको इप्टा का सलाम!

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जो भी कन्ना-खुद्दी है उसे दे दो और नाक ऊंची रखो। लइकी हर न जोती !  

13 अप्रैल, 2022 को यात्रा के पाँचवें दिन गढ़वा से होते हुए काफिला पलामू जिले के डाल्टनगंज में पहुँचा। डाल्टनगंज में सांस्कृतिक यात्रा का आगाज़ गाजे-बाजे और जनगीतों के साथ हुआ। साहित्य समाज चैक से सांस्कृतिक रैली ने भगतसिंह चैक पहुँचकर उनको पुष्पांजलि अर्पित कर क्रांतिकारी नारों के साथ शोषित-पीड़ित समाज के हक में आवाज़ बुलंद की। शाम को सांस्कृतिक संध्या के अवसर पर इप्टा के महासचिव तथा सचिव ने यात्रा के उद्देश्य तथा महत्व पर प्रकाश डाला। इप्टा झारखंड के साथियों तथा जेएनयू दिल्ली इप्टा की साथी वर्षा ने स्त्री-मुक्ति पर केन्द्रित जनगीत प्रस्तुत किया। साथी पंकज ने कबीर भजनों की मनमोहक प्रस्तुति दी। साथी प्रेमप्रकाश के लिखे नाटक ‘गुहार’ की प्रस्तुति घनश्याम और प्रेमप्रकाश ने दी। इस दौरान डाॅ. शोएब राही लिखी एवं साथी प्रेमप्रकाश द्वारा संपादित किताब ‘उजालों का हिसार’ का विमोचन किया गया।

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इसी दिन गढ़वा से डाल्टनगंज की यात्रा के बीच रेहला बिमुड़ चैक और पड़वा मोड़ पर नुक्कड़ सभा की गई, जिसमें झारखंड इप्टा के साथियों तथा छत्तीसगढ़ के साथी निसार अली ने जनगीत प्रस्तुत किये। हरेक कार्यक्रम स्थल पर पोस्टर प्रदर्शनी आकर्षण का केन्द्र रही। विपरीत मौसम के बावजूद इप्टा के साथियों का उत्साह और उनको सुनने वाला जनसमुदाय एक उम्मीद की मशाल जलाते हैं कि देश में साम्प्रदायिकता का प्रचार भले ही चरम पर हो पर अमन और भाईचारा कायम करने वाले लोग जब तक हैं, इस देश के सौहार्द्र को कोई भी सिरफिरे लोग नष्ट नहीं कर सकते।

डाल्टनगंज में रात्रि-विश्राम के बाद छठवें दिन 14 अप्रैल, 2022 को यात्रा की शुरुआत आंबेडकर पार्क में डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुई। शहर में ही स्थापित बिरसा मुंडा, सुभाषचंद्र बोस की भी प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। झारखंड इप्टा के साथियों की योजना के अनुसार, आज़ादी के 75वें वर्ष के मौके पर जहाँ भी किसी शहीद या महापुरुष, जिनका देश या समाज में कोई योगदान रहा हो, उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण कर उनको याद किया जा रहा था। इसी कड़ी में मतनाग पहुँचने पर अमर शहीद नीलाम्बर और पीताम्बर की आदमकद प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। उल्लेखनीय है कि, पलामू को नीलाम्बर-पीताम्बर की धरती कहा जाता है। खैरवार जनजाति से संबंध रखने वाले दोनों सगे भाई क्रांतिकारी थे। 1857 के विद्रोह में दोनों भाइयों को फाँसी की सज़ा दी गई थी। उनका शहादत-स्थल लेसलीगंज में है। रास्ते में ग्राम स्वराज मजदूर संघ के साथियों के बीच नुक्कड़ सभा में साथियों ने जनगीत प्रस्तुत किया। इप्टा के महासचिव साथी राकेश ने डाॅ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों पर प्रकाश डालते हुए यात्रा के उद्देश्य से भी उपस्थित जनसमूह को बताया कि ‘‘देश में दो विचारधाराएँ चल रही हैं – एक प्रेम और एकता की विचारधारा है और दूसरी पाखंड और नफरत की विचारधारा है। हम पाखंड पर गहरी चोट करने वाले कबीर के प्रेम के संदेश को लेकर निकले हैं।’’

राँची से पहले घुमावदार रास्तों से होते हुए हरे-भरे जंगल, पहाड़, गाँव-देहात ओर छोटे कस्बों से गुज़रते हुए चंदवा में पड़ाव डाला गया। पहुँचने पर पता चला कि यहाँ धारा 144 लगी है, वरना बड़ा कार्यक्रम तय हुआ था। लोहरदगा में रामनवमी के दिन जुलूस के दौरान बोदा से चले आ रहे दाढ़ी और टोपी पहने हुए एक चाचा-भतीजा को मार दिया गया, जिसकी परिणति दंगे में हुई और पुलिस का पहरा लगा दिया गया। इसके बावजूद बहुजन चेतना मंच के साथियों ने छोटे स्तर पर कार्यक्रम किया। ऐसे माहौल में प्रेम की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। इसलिए झारखंड इप्टा के साथियों ने ‘ढाई आखर प्रेम के पढ़ने और पढ़ाने आए हैं, हम भारत से नफरत का हर दाग मिटाने आए हैं’ व अन्य दो जनगीत प्रस्तुत किये। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के साथी निसार अली ने नाचा थियेटर विधा में किसतरह भेदभाव और छुआछूत का विरोध किया गया है, इससे संबंधित जनगीत प्रस्तुत किया। संयोजकों द्वारा आंबेडकर जयंती के उपलक्ष्य में केक काटकर उपस्थित जनसमूह को खिलाया गया। साथी शैलेन्द्र कुमार ने अपने उद्बोधन में कहा कि ‘‘हमारे देश की असली संस्कृति साझी विरासत की है। मौजूदा दौर में विकृत और घृणा पैदा करनेवाली संस्कृति का विरोध कर प्रेम और भाईचारे का संदेश देना ही इप्टा की इस सांस्कृतिक यात्रा का उद्देश्य है। हमें ब्राह्मणवादी विचारों का मुकाबला करते हुए बराबरी, समता, बंधुत्व के लिए काम करना होगा। हम बहुत खतरनाक समय में जी रहे हैं और ऐसे समय में इसतरह जनसमुदाय की उपस्थिति उम्मीद जगाती है।’’ साथी राकेश ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आज बाबासाहेब के साथ ही एक और विभूति पी सी जोशी का भी जन्मदिन है। वे भी आज़ादी के आंदोलन में शामिल होने वाले स्वतंत्रता सेनानी और बाबासाहेब आंबेडकर की तरह ही महान चिंतक थे। उन्होंने न सिर्फ आज़ादी के लिए काम किया, बल्कि सांस्कृतिक आंदोलन को एकजुट करने का भी काम किया।’’ इप्टा के बारे में उपस्थित जनसमूह को जानकारी देते हुए महासचिव महोदय ने कहा, ‘‘इप्टा का नामकरण प्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया था। 1943 में बंगाल के अकाल में इप्टा का अविस्मरणीय योगदान है। इप्टा जैसे सांस्कृतिक मंचों ने आज़ादी के आंदोलन से लेकर समाज सुधारक के रूप में भी काम किया। बाबासाहेब ने जो 22 प्रतिज्ञाएँ की थीं, हमें उन प्रतिज्ञाओं का स्मरण करते रहना चाहिए। बहुजन-चेतना और दलित-चेतना का निर्माण इसी तरह किया जा सकता है कि हम कबीर के साथ-साथ आंबेडकर के विचारों को भी जानें-समझें ताकि यह समझा जा सके कि एक परम्परा बुद्धि और विवेक को खारिज करती है और दूसरी परम्परा ज्ञान-विज्ञान को मानती है। हमें मूर्तियों के चक्कर में न पड़कर उनके विचारों को समझते हुए काम करने की ज़रूरत है। मूर्ति और पूजा का चक्कर हमें ब्राह्मणवाद के चंगुल में फँसा देता है। हमारी यात्रा का उद्देश्य है कि हम कबीर के रास्ते पर चलें, जिन्होंने उस समय हिंदू-मुस्लिम दोनों को ललकारा, स्वर्ग-नरक की अवधारणा को चुनौती देते हुए मगहर में मरना स्वीकारा।’’ यहाँ भी इप्टा के साथी अरूण काठोटे, अनिल करमेले और पंकज दीक्षित के बनाए हुए पोस्टर प्रदर्शित किये गये।

पलामू से राँची जाते हुए अगला गाँव आया निन्द्रा, जिसके लिए साथी निसार अली ने कहा, ‘‘गाँव का नाम है निन्द्रा, पर लोग जागे हुए हैं।’’ आधुनिक दुनिया में आदिवासी समाज को अपढ़ और निरीह माना जाता है। आज आदिवासियों से उनका हक और अधिकार छीना जा रहा है, जल-जंगल-ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है। ऐसे आदिवासी समाज को, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया। अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूँका। बिरसा मुण्डा और नीलाम्बर-पीताम्बर की तरह लाखों आदिवासी आज़ादी की लड़ाई में शहीद हो गए। ऐसा ही एक गाँव है निन्द्रा। मेन रोड के किनारे गाँव के मोड़ पर टाना भगत और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियाँ लगी हुई हैं। ये मूर्तियाँ गाँव के उज्ज्वल इतिहास और आदिवासी समाज की जागरूकता और वीरता को प्रदर्शित करती हैं। यहाँ इप्टा की सांस्कृतिक यात्रा का काफिला रूका और सभी स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि दी गई। इप्टा के साथियों ने जनगीत भी प्रस्तुत किया। इस दौरान गाँव के बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएँ, नौजवान वहाँ इकट्ठा हो गए। पता चला कि स्वतंत्रता सेनानी टाना भगत के पुत्र ऐतवा वहाँ उपस्थित हैं। इप्टा के महासचिव साथी राकेश के हाथों स्मृति चिह्न और गमछा भेंट कर उनका सम्मान किया गया। आगे राँची जिले के मांडर ब्लाॅक में जनगीत प्रस्तुत कर सांस्कृतिक यात्रा के बारे में जानकारी दी गई तथा पर्चे बाँटे गए। पोस्टर प्रदर्शनी भी आयोजित की गई। इसके बाद इप्टा का कारवाँ राँची पहुँचा। सबसे पहले संथाल विद्रोह के प्रतीक अमर शहीद क्रांतिकारी सिदो-कान्हू के नाम पर बने सिदो-कान्हू उद्यान पहुँचकर शहीद भाइयों की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया गया। उद्यान के बाहर इप्टा के साथियों द्वारा ‘ढाई आखर प्रेम के पढ़ने और पढ़ाने आए हैं, हम भारत से नफरत का हर दाग मिटाने आए हैं’ यात्रा-गीत प्रस्तुत किया।

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सांस्कृतिक यात्रा के छठवें दिन की शाम को डाॅ. रामदयाल मुण्डा जनजातीय शोध संस्थान राँची के आडिटोरियम में आयोजित सांस्कृतिक संध्या के दौरान महासचिव महोदय ने सांस्कृतिक यात्रा के उद्देश्य और महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया। आदिवासी प्रतिरोध की बुलंद आवाज़ पद्मश्री मधु मंसूरी हँसमुख ने अपना लिखा प्रसिद्ध गीत ‘गाँव छोड़ब नाहीं, जंगल छोड़ब नाहीं, माय माटी छोड़ब नाहीं, लड़ाई छोड़ब नाहीं’ तथा अन्य गीत ‘जंगल काटे धरती को हमने खेत बनाया, …हो गए हम भूखे कि मेरे घर में मेरे लिए काम नहीं है… जब तक कोई काम न मिले साथी इन्कलाब लाओ रेे’ सुनाए। इनमें विकास की मुख्य धारा की अन्यायपूर्ण नीतियों के कारण आदिवासी समूहों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था से किये गये मार्मिक और तीखे सवाल दिल को भेदने वाली आवाज़ में प्रस्तुत किये गये। उपस्थित दर्शक भी उनके साथ सुर मिलाकर गाने लगे ‘जब तक कोई काम न मिले साथी इन्कलाब लाओ रेे’! उनके गीतों ने लोगों को आदिवासी अस्मिता और गरीब मेहनतकश जनता के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर दिया। उसके बाद कफ़ील ज़ाफरी की किस्सागोई ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। स्कूली बच्चों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ दीं और इप्टा के साथियों ने जनगीत प्रस्तुत किये।

सांस्कृतिक यात्रा के सातवें दिन झारखंड की राजधानी से निकलकर काफिला चांडिल होते हुए जमशेदपुर की ओर रवाना हुआ। सुबह साढ़े आठ बजे पेटभर नाश्ता करने के बाद लोकनायक बिरसा मुंडा को नमन करते हुए यात्रा के प्रारम्भ से चलने वाले नौ साथी तथा झारखंड इप्टा के नौ-दस साथियों के साथ दास्तानगो कफ़ील ज़ाफरी भी जत्थे में शामिल हो गए। चांडिल बाँध के शांत और खूबसूरत नज़ारे जैसी जगह का पड़ाव सुकून दे रहा था। चांडिल विस्थापन वाहिनी के सचिव श्यामल मार्डी, कलाधारा के अंकुर, मशाल न्यूज़ के शशांक शेखर और अन्य साथियों ने झारखंड के पारम्परिक तरीके के साथ सांस्कृतिक जत्थे की अगवानी की। यहाँ चाईबासा इप्टा के साथी भी यात्रा के स्वागत के लिए उपस्थित थे। ‘ढाई आखर प्रेम’ का यात्रा-गीत गाया गया। चाईबासा के साथियों ने भी अपनी प्रस्तुति दी। यात्रा के संदेश में इप्टा के राष्ट्रीय सचिव साथी शैलेन्द्र कुमार ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘‘एक ओर वे अमृत महोत्सव मना रहे हैं और दूसरी ओर हम अपने शहीदों के लहू की उस गर्मी की हरारत मांग रहे हैं कि वो हमारे शरीर में थोड़ी आ जाए ताकि अंग्रेज़ों से लड़ते हुए उन शहीदों ने अपने अंदर जो हिम्मत, ताकत और साहस पाया था, वैसा ही थोड़ा सा साहस, थोड़ी सी हिम्मत हमको भी मिले कि हम अपने दौर के इस निज़ाम के खिलाफ संघर्ष कर सकें। इतिहास के संघर्ष से उपजी संविधान की किताब मूल्यहीन और इतिहास बोध से वंचित सत्ता में काबिज लोगों को डरा रही है इसलिए किताबें जलाने का, मिटाने का वे प्रयास करते हैं। इस क्रम में अगर सिद्धो-कान्हू, बिरसा, चांद-भैरव और तमाम संघर्षशील लोगों की मूर्तियाँ तोड़ भी दी जाएँ तो वे आदिवासियों और संघर्षशील जन के गीतों में धरती पर मौजूद रहेंगे और जब जब ज़रूरत पड़ेगी, हम उन्हें जीकर न्याय, बंधुत्व और सामाजिक सौहार्द्र की स्थापना करेंगे। उन जननायकों को याद करने के लिए, जीवन में प्रेम की खुशबू फैलाने हम इस यात्रा में निकले हैं।’’ चांडिल विस्थापन वाहिनी के अध्यक्ष नारायण गोप द्वारा विस्थापितों की समस्याओं से जत्थे को अवगत करते हुए बताया कि पूर्ण पुनर्वास के लिए अभी संघर्ष जारी है। ‘ढाई आखर प्रेम’ की सांस्कृतिक यात्रा को चांडिल विस्थापितों से मिलाने के लिए अरविंद अंजुम का योगदान रहा।

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चांडिल से निकलकर यात्रा ने दोपहर 01 बजे जमशेदपुर में प्रवेश किया। जमशेदपुर यात्रा के सभी बहुआयामी कार्यक्रम अर्पिता श्रीवास्तव के नेतृत्व में काॅमरेड शशिकुमार और अन्य संगठनों के वरिष्ठ साथियों के सहयोग से हुआ। अशफ़ाक़ उल्ला खाँ द्वार पर गमछा ओढ़ाकर जत्थे की अगवानी की गई। उल्लेखनीय है कि जमशेदपुर की यात्रा ज़की अनवर की स्मृति को समर्पित थी। ज़की अनवर साहब की हत्या 1979 के दंगे के दौरान हुई थी। वे समाज में प्रेम और सौहार्द्र बढ़ाने के लिए निरंतर काम कर रहे थे। ज़की अनवर उर्दू के जानेमाने अफ़सानानिगार थे। सांस्कृतिक जत्थे के साथियों का स्वागत ज़की साहब के दामाद मो. ज़कारिया साहब और उनके बेटे अनवर नाज़िश अहसान ने किया। इनके साथ शशिकुमार, अहमद बद्र, सैयद शमीम अहमद मदनी, मुख़्तार अहमद मक्की, माहिया बद्र, हीरा अरकने, अमिताव घोष, बलदेव सिंह, विनय, अख़्तर आज़ाद, धनंजय, शेखर, ज्योति तथा तमाम मानगोवासी उपस्थित रहे।

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इस पड़ाव के व्यवस्था की समूची ज़िम्मेदारी जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता मुख़्तार ख़ान ने ली थी। झारखंड इप्टा द्वारा यात्रा गीत की प्रस्तुति के बाद साथी शैलेन्द्र कुमार ने उपस्थित लोगों को यात्रा की जानकारी दी। यात्रा मानगो के गांधी मैदान पहुँची। कार्यक्रम स्थल पर संजय सोलोमन, पुष्पा एवं विकास ने पोस्टर प्रदर्शनी लगाई थी। साथी कृपाशंकर के संचालन में मानगो मैदान मंच से अनेक प्रस्तुतियाँ दी गईं। लिटिल इप्टा जमशेदपुर के बच्चों ने इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा वरिष्ठ संगीतकार सीताराम सिंह द्वारा तैयार किये गये म्युज़िक ट्रैक पर ‘सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तां हमारा’ गीत गाया। युवा साथियों सत्यम, आयुष, रमन और विकास द्वारा ‘जयकार उठे’ गीत के बाद रमन ने ‘बावरा मन’ गीत प्रस्तुत किया। इसके बाद इप्टा के महासचिव साथी राकेश तथा झारखंड इप्टा के महासचिव उपेन्द्र कुमार ने यात्रा के उद्देश्य पर प्रकाश डाला। स्थानीय नाट्य समूह ‘पथ’ के कलाकारों ने नाटक ‘दोस्त प्रस्तुत किया। स्त्री मुक्ति संगठन की सक्रिय साथी इप्टा की पहल पर आयोजित ‘ढाई आखर प्रेम’ सांस्कृतिक यात्रा के उद्देश्य से एकजुटता प्रदर्शित करने जमशेदपुर आई थीं, उन्होंने ‘भागो मत, दुनिया को बदलो’ जनगीत तथा नाज़िम हिकमत की कविताओं पर केन्द्रित कविता कोलाज प्रस्तुत किया। संजय सोलोमन ने स्वरचित नज़्म ‘यलगार’ सुनाई। लिटिल इप्टा के बाल कलाकारों ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की किताब ‘भारत एक खोज’ का एक अंश ‘भारतमाता’ प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंत में इप्टा के महासचिव साथी राकेश ने महात्मा गांधी, खुदीराम बोस और आंबेडकर की मूर्तियों पर माल्यार्पण कर प्रेम और सद्भाव के संदेश के साथ उपस्थित लोगों को धन्यवाद दिया। सांस्कृतिक यात्रा के साथियों द्वारा ज़की अनवर के शहादत-स्थल पर जाकर वहाँ की मिट्टी ‘साझी शहादत साझी विरासत’ प्रतीक पात्र में सम्मिलित की गई।

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अल्प विश्राम के बाद यात्रा शाम 5 बजे धतकीडीह में अवस्थित ठक्कर बापा मुखी बस्ती की ओर बढ़ी, जहाँ ठक्कर बापा क्लब के साथियों ने ढोल-ताशे बजाकर दिल खोलकर यात्रियों का स्वागत किया। ढोल-ताशे के साथ उत्साह के साथ नाचते-गाते हुए साथी कार्यक्रम-स्थल पर पहुँचे। यहाँ झारखंड सांस्कृतिक मंच ने शिवलाल सागर के निर्देशन में सफदर हाशमी के नाटक ‘हत्यारे’ का मंचन किया। इप्टा झारखंड के अध्यक्ष साथी शैलेन्द्र ने यात्रा के उद्देश्य को लोगों के बीच पहुँचाया। हरिजन बस्ती के मुखिया सुरेश मुखी, सुनीता मुखी, रमेश मुखी का इस पड़ाव में सहयोग रहा।

सांस्कृतिक यात्रा यहाँ से माइकल जाॅन आडिटोरियम पहुँची। शाम सात बजे उर्दू के जाने-माने शायर अहमद बद्र साहब ने यात्रा के संदर्भों, शहर के इतिहास और प्रेम के विस्तार को केन्द्र में रख कार्यक्रम का बेहतरीन संचालन किया। उल्लेखनीय है कि जमशेदपुर में यात्रा-कार्यक्रम समिति के अहमद बद्र साहब सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुने गए थे। कार्यक्रम की शुरुआत में जेएनयू इप्टा, डाल्टनगंज इप्टा और जमशेदपुर इप्टा के साथियों ने यात्रा गीत ‘ढाई आखर प्रेम का’ गाकर आगाज़ किया। स्वागत वक्तव्य अपने सुपरिचित अंदाज़ में शशिकुमार ने दिया। आज के समय की चुनौतियों और यात्रा के संदर्भों को उल्लिखित करते हुए साथी शैलेन्द्र तथा साथी राकेश ने अपना सारगर्भित वक्तव्य रखा। यहाँ प्रसिद्ध दास्तानगो कफ़ील ज़ाफरी ने अनेकता में एकता पर ‘दास्ताँ-ए-अमीर हमज़ा’ के एक अंश की प्रभावशाली प्रस्तुति दी। युवा साथी रमन, सत्यम और आयुष ने कबीर की रचना ‘मत कर माया को अभिमान’ गाई। साथी ऐश्वर्या के निर्देशन और अंजला के सहयोग से लिटिल इप्टा के साथियों वर्षा, सुजल, रौशनी, ऋषि और स्तुति ने ‘प्यार बाँटते चलो’ पर मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया। युवा साथी आयुष ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर शहर की जानी-मानी सामाजिक-सांस्कृतिक हस्तियाँ इप्टा की वरिष्ठतम साथी शांति घोष, अंजलि बोस, कथाकार जयनंदन, सीमा जबीं, नादिरा, सुलोचना बर्नाली, सैयद शमीम अहमद मदनी, अमिताव घोष, बलदेव सिंह आदि की गरिमामयी उपस्थिति रही।

स्त्री मुक्ति संगठन की साथी श्वेता और अंजना ने ‘स्त्री हूँ मैं’ नाटक की प्रस्तुति दी। बच्चों और स्त्रियों को संबोधित वक्तव्य में साथी शैलेन्द्र ने समाज में प्रचलित अनेक सवालों को उठाया। इस पड़ाव की बखूबी ज़िम्मेदारी निभाई असंगठित महिलाओं के बीच काम करने वाली सुलोचना और बैंक यूनियन की अनुभवी साथी हीरा अरकने ने। जमशेदपुर पड़ाव का समूचा संयोजन रायगढ़ और जमशेदपुर इप्टा की साथी अर्पिता ने किया था।

15 अप्रैल के इस आयोजन में स्थानीय संगठनों – प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, कला मंदिर, पथ, झारखंड सांस्कृतिक मंच, सैल्यूलाइड चैप्टर, गांधी शांति प्रतिष्ठान, स्पार्क, एलआईसी यूनियन, बैंक यूनियन, स्त्री मुक्ति संगठन, दलित लेखक संघ, संविधान बचाओ, देश बचाओ समिति, वरिष्ठ नागरिक परिषद, हरिजन बस्ती, ह्यूमन रिलीफ, चांडिल विस्थापन वाहिनी, कलाधारा, कलाधाम, अम्ब्रेला क्रिएशन्स, मशाल न्यूज़ के साथ-साथ अनेक व्यक्तियों और अखबारों का सहयोग रहा।

16 अप्रेल को जमशेदपुर पड़ाव के दूसरे दिन यात्रा सोनारी पोस्ट आफिस के पास स्थित मैदान में पहुँची। यहाँ बस्ती के बच्चों की बड़ी संख्या के अलावा स्थानीय निवासी भी उपस्थित थे। डाल्टनगंज इप्टा तथा जमशेदपुर इप्टा के साथियों द्वारा यात्रा-गीत की प्रस्तुति के बाद स्त्री मुक्ति संगठन तथा लिटिल इप्टा द्वारा ‘वो हमारे गीत क्यों रोकना चाहते हैं’, स्थानीय हाउस हेल्पर्स समिति की महिला साथियों द्वारा ‘तोड़-तोड़कर बंधनों को’ गीत की जोशीली प्रस्तुति दी गई। स्त्री मुक्ति संगठन की साथी श्वेता और अंजना ने ‘स्त्री हूँ मैं’ नाटक की प्रस्तुति दी। बच्चों और स्त्रियों को संबोधित वक्तव्य में साथी शैलेन्द्र ने समाज में प्रचलित अनेक सवालों को उठाया। इस पड़ाव की बखूबी ज़िम्मेदारी निभाई असंगठित महिलाओं के बीच काम करने वाली सुलोचना और बैंक यूनियन की अनुभवी साथी हीरा अरकने ने। जमशेदपुर पड़ाव का समूचा संयोजन रायगढ़ और जमशेदपुर इप्टा की साथी अर्पिता ने किया था।

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जमशेदपुर से प्रस्थान कर यात्रा घाटशिला इकाई के साथियों ज्योति एवं शेखर के साथ लगभग एक बजे फूलडूंगरी मोड़ पर घाटशिला में प्रविष्ट हुई। 09 अप्रैल से यात्रा के साथ चल रहे वरिष्ठ साथी राकेश, मणिमय मुखर्जी, राजेश श्रीवास्तव, वर्षा तथा विनोद कोष्टी ने जमशेदपुर पड़ाव से अपने-अपने शहरों की ओर वापसी की। यहाँ सिर्फ रायपुर के साथी निसार अली और मध्यप्रदेश के साथी मृगेन्द्र सिंह तथा कुश साथ रहे। घाटशिला का पड़ाव प्रसिद्ध बंगला साहित्यकार विभूतिभूषण बंदोपाध्याय को समर्पित किया गया था, जिनकी ‘फकीर’ जैसी कहानियाँ इस देश में साम्प्रदायिक समरसता को रेखांकित करती हैं। घाटशिला आने पर यात्रा के साथियों ने छोटे से जुलूस की शक्ल अख्तियार कर ली। पलामू-डाल्टनगंज-घाटशिला इकाई के साथी ‘हम सोये वतन को जगाने चले हैं’ गाते हुए ‘ढाई आखर प्रेम’ बैनर के साथ आगे बढ़ने लगे। इनके साथ घाटशिला इप्टा के वयस्क साथियों के साथ बाल साथी भी सम्मिलित थे। घाटशिला इकाई के अध्यक्ष गणेश मुर्मू ‘धमसा’ बजाते हुए तथा निसार अली डफली बजाते चल रहे थे। वरिष्ठ रंगकर्मी ‘तुम्दा’ पर थाप दे रहे थे। रैली काॅलेज मार्ग स्थित ‘विभूति स्मृति संसद लाइब्रेरी के पास पहुँची। यहाँ से युवा साथी पारम्परिक मूलनिवासी स्वागत नृत्य ‘दारम दा’ के साथ जनगीत ‘गर हो सके तो अब कोई शम्मा जलाइये’ गाते हुए आगे बढ़े। विभूतिभूषण बंदोपाध्याय की प्रतिमा के चारों ओर घूमकर यह स्वागत नृत्य समाप्त हुआ। प्रतिमा पर साथी शैलेन्द्र के साथ प्रलेस डाल्टनगंज के साथी पंकज श्रीवास्तव और घाटशिला इप्टा के अध्यक्ष गणेश मुर्मू ने भी माल्यार्पण किया। यात्रा के साथियों ने ‘ढाई आखर प्रेम के पढ़ने और पढ़ाने आए है, हम भारत से नफरत का हर दाग मिटाने आए हैं’ गाया। झारखंड इप्टा के अध्यक्ष साथी शैलेन्द्र ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में बताया कि वर्तमान में देश के अंदर युवाओं को बरगलाने और बर्बादी की तरफ धकेलने की साजिश की जा रही है। इसके खिलाफ प्रेम और भाईचारे के साथ देश के असली नायकों को याद करने की बात भी कही। इस आयोजन में विभूति स्मृति संसद ट्रस्ट के महासचिव मिठू विश्वास तथा कोषाध्यक्ष व संयुक्त नाट्य कला केन्द्र के महासचिव सुशांत सीट का अमूल्य योगदान रहा। इसके बाद कारवाँ दाहिगोड़ा में विभूतिभूषण बंदोपाध्याय के घर ऐतिहासिक गौरीकुंज जहाँ लेखक के जीवन के अंतिम दिन बीते थे पहुँचा। रास्ते में घाटशिला के शहीद दिलीप बेसरा, जो भारतीय फौज के जवान थे और कश्मीर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे, की प्रतिमा पर भी माल्यार्पण कर सम्मान प्रकट किया गया। गौरीकुंज में विभूतिबाबू की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर सभी साथियों द्वारा समूचे आवास का भ्रमण किया गया। गौरीकुंज उन्नयन समिति के अध्यक्ष तापस चटर्जी द्वारा ‘साझी शहादत-साझी विरासत’ के प्रतीक-पात्र में विभूति भूषण बंदोपाध्याय के घर की मिट्टी डाली गई। साथी प्रेमप्रकाश ने बताया कि इस प्रतीक-पात्र में देश के इतिहास के महत्वपूर्ण नायकों, व्यक्तियों के जन्मभूमि-कर्मभूमि की साझा मिट्टी इकट्ठी की जा रही है, उससे शहीदे आज़म भगत सिंह के गाँव में ‘प्रेम का पौधा’ लगाया जाएगा। इप्टा घाटशिला और पलामू के साथियों ने यहाँ ‘वक्त की आवाज़ है मिल के चलो’ जनगीत गाया।

इप्टा के राष्ट्रीय सचिव तथा झारखंड इप्टा के अध्यक्ष साथी शैलेन्द्र ने ढाई आखर प्रेम सांस्कृतिक यात्रा की ज़रूरत, उद्देश्य और समकालीन हालातों पर प्रकाश डालते हुए युवाओं से संबंधित दुश्वारियों, हम कैसा देश, कैसी पीढ़ी और कैसा समाज बनाना चाहते हैं आदि बातों पर आकर्षक तरीके से बात करते हुए कहा कि हमें नफरत को मिटाकर अमन कायम करना है और एक सुंदर समाज का निर्माण करना है, जिसमें प्रेम, निर्भयता, स्वतंत्रता और बराबरी जैसे मानव मूल्य समाहित हों।

गौरीकुंज से लौटकर मुख्य मार्ग पर भगत सिंह की वह प्रतिमा दिखाई दी, जिसकी स्थापना दक्षिणपंथी युवा दलों ने की थी, जिसे भगवा पगड़ी पहना दी थी और भगत सिंह जयंती के दिन उसके सामने डीजे बजाकर ‘सेलिब्रेट’ किया जाता था, उस पर माल्यार्पण कर ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के नारे लगाए गए तथा ऐ भगतसिंह तू ज़िंदा है गाते हुए मऊभंडार स्थित आई.सी.सी. मज़दूर यूनियन के दफ्तर पहुँचे। भोजन तथा कुछ विश्राम के बाद शाम पाँच बजे यात्रा के साथी एच.सी.एल/आई.सी.सी. कम्पनी गेट पर पहुँचे। साथी शैलेन्द्र ने गेट परिसर में स्थित जवाहरलाल नेहरू की प्रतिमा तथा बिरसा मुंडा की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। सायरन बजने पर मुख्य द्वार से कर्मचारी पाली समाप्त कर निकलने लगे। साथी प्रेमप्रकाश के नेतृत्व में साथियों ने जनगीत गाकर मज़दूरों का ध्यान आकर्षित किया। जनगीतों के बाद साथी शैलेन्द्र ने संवाद शुरु किया। एक मज़दूर, जो सोशल मीडिया के ज्ञान के असर में था, उसने कहा कि ‘‘आप लोग इकतरफा बात करते हैं। दूसरे पक्ष की बात भी कीजिए।’’ साथी शैलेन्द्र ने उसे समझाते हुए कहा कि ‘‘हम सबकी बात करते हैं। एकदूसरे को हिंसा का जवाब हिंसा से देने से हम कहाँ पहुँचेंगे?’’ बातचीत के बाद यात्रा मुख्य कार्यक्रम स्थल पर पहुँची।

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प्रेम, दया, करुणा, बंधुत्व और समता की झलक दिखा रही ‘ढाई आखर प्रेम की सांस्कृतिक यात्रा’

नीली पृष्ठभूमि वाला मंच और छतनार आम के विशाल पेड़ की हरियाली प्रकाश में झिलमिला रही थी। ‘ढाई आखर प्रेम के पढ़ने और पढ़ाने आए हैं’ यात्रा-गीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। घाटशिला इकाई के शेखर, ज्योति, गणेश, संजय के साथ सोलह बच्चों ने ‘वो सुबह कभी तो आएगी’ गीत बहुत उत्साह के साथ प्रस्तुत किया। इसमें तीन वरिष्ठ रंगकर्मियों दिलीप सरकार हारमोनियम, सुजन सरकार मादल और इंद्रकुमार राय नाल ने संगत की थी। इप्टा के राष्ट्रीय सचिव तथा झारखंड इप्टा के अध्यक्ष साथी शैलेन्द्र ने ढाई आखर प्रेम सांस्कृतिक यात्रा की ज़रूरत, उद्देश्य और समकालीन हालातों पर प्रकाश डालते हुए युवाओं से संबंधित दुश्वारियों, हम कैसा देश, कैसी पीढ़ी और कैसा समाज बनाना चाहते हैं आदि बातों पर आकर्षक तरीके से बात करते हुए कहा कि हमें नफरत को मिटाकर अमन कायम करना है और एक सुंदर समाज का निर्माण करना है, जिसमें प्रेम, निर्भयता, स्वतंत्रता और बराबरी जैसे मानव मूल्य समाहित हों।

इसके बाद घाटशिला के नज़दीकी प्रखंड चाकुलिया से आये लोक कलाकारों दुर्गाप्रसाद हांसदा तथा अन्य साथियों ने पारम्परिक वाद्य-यंत्र केंद्री या बानाम के साथ लोकगीत और लोकनृत्य प्रस्तुत किये। उनके वाद्य-यंत्र खरीदने की पेशकश को नाचा थियेटर के साथी निसार अली ने स्वीकार किया। इप्टा के बाल कलाकारों ने प्रेम धवन के गीत ‘झूम झूम के नाचो आज, गाओ खुशी के गीत’ पर उत्साह के साथ नृत्य किया। चन्द्रिमा चटर्जी ने इस नृत्य का निर्देशन किया था, साथ ही साथ वे समूचे कार्यक्रम में मंच-संचालन भी कर रही थीं। बंगला लोकगीत पर इप्टा घाटशिला के युवा साथियों ने नृत्य प्रस्तुत किया। छत्तीसगढ़ के साथी निसार ने भी छत्तीसगढ़ी लोकगीत सुनाया। पलामू-डाल्टनगंज के साथियों ने प्रेमप्रकाश की अगुआई में नाटक ‘थाली खाली है’ खेला। देश में गरीबी, भुखमरी, बेरोज़गारी की कचोटनेवाली भयानक समस्या और सत्ता की भयानक उदासीनता पर यह नाटक सवाल उठाता है और पूछता है कि हमारी यह थाली किनकी वजह से खाली है! क्या थे शहीदों के अरमान? यहाँ किसको चिंता है शहीदों के अरमान की? नाटक दर्शकों से सवाल करता है कि क्या भगतसिंह, बिरसा मुंडा, नीलाम्बर-पीताम्बर ने कुर्बानी इसलिए दी थी कि एक किसान अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए बेबस मज़दूर बनकर दर-दर भटके? नाटक देखकर धूमिल की कविता याद आती है – ‘‘एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी पकाता है। एक तीसरा आदमी है, जो न रोटी बेलता है, न पकाता है, वह सिर्फ रोटी से खेलता है। मैं पूछता हूँ, वह व्यक्ति कौन है? देश की संसद मौन है।’’

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अपने पे हंसके जग को हंसाया, बन के तमाशा मेले में आया..

लोक कलाकार मनोरंजन महतो के प्रसिद्ध झूमर दल ने आकर्षक झुमुर गायन-नृत्य प्रस्तुत किया। खास बात यह थी कि इप्टा के युवा ओर वरिष्ठ साथी भी झुमुर नाच में शामिल हो गए। बाँहो में बाँहे डाले नाचते हुए सामूहिकता का प्रदर्शन अद्भुत था। अंत में इप्टा घाटशिला के साथियों ने जसम पटना हिरावल का गीत ‘उठो मेरे देश, नए भारत के वास्ते’ गाकर यात्रा के इस पड़ाव का समापन किया। रात को भोजन के बाद यात्रा के साथी जमशेदपुर होते हुए हजारीबाग, कोडरमा के लिए रवाना हो गए।

घाटशिला में कार्यक्रम सम्पन्न करने में गौरीकुंज उन्नयन समिति, संयुक्त नाट्य कला केन्द्र, विभूति स्मृति संसद, झारखंड उदय न्यूज़ की इकाई क्रिएशन्स के अलावा अनेक व्यक्तियों का सहयोग रहा।

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17 अप्रैल, 2022 को सुबह जमशेदपुर से हजारीबाग के रास्ते का काव्यात्मक मगर मार्मिक वर्णन करते हुए समूची सांस्कृतिक यात्रा के ‘संजय’ मृगेन्द्र सिंह ने लिखा, ‘‘अभी हम जमशेदपुर से हजारीबाग के रास्ते पर हैं। स्वर्णरेखा नदी के किनारे से गुज़रते हुए, सड़क से कभी थोड़ी दूर, तो कहीं नज़दीक से जंगल-पहाड़ का खूबसूरत नज़ारा मन को आह्लादित कर देता है। प्रकृति का मिज़ाज देखते ही बनता है… जैसे जंगल से वाष्पीकरण हो रहा हो! हम इसी रास्ते राँची से आए थे तब ऐसा खूबसूरत नज़ारा नज़र नहीं आया था। साथी शैलेन्द्र कुमार कहते हैं कि धूप के चलते ऐसा नज़ारा नहीं दिखाई देता। अलग-अलग समय पर प्रकृति की खूबसूरती अलग-अलग रंग बिखेरती है। सुबह और शाम को प्रकृति में काव्यात्मक रहस्यात्मकता दिखती है। इसतरह की खूबसूरती हमें छत्तीसगढ़ से लेकर अभी तक की यात्रा में जगह-जगह देखने को मिली। हम नदियों के किनारे और उन पर बने पुलों से गुज़रते हुए कभी खुश हुए तो कभी दुखी। हालाँकि दुखी ही ज़्यादा होना पड़ा। स्वर्णरेखा नदी की बात करें तो नदी को देखते ही मधु मंसूरी हँसमुख का गीत ‘गाँव छोड़ब नाहि…’ बरबस ही याद आ जाता है, जिसमें सूखी स्वर्णरेखा का ज़िक्र आता है। अमूमन हर सूखी नदी को देखते ही उनका गीत याद आता है। रास्ते में कई सूखी नदियों से हम अवगत होते हैं। कहीं-कहीं तो लंबे पुलों के नीचे सिर्फ रेत दिखाई देती है, जबकि नदी की चैड़ाई सूखने के बाद भी स्पष्ट होती है कि यह एक बड़ी नदी है या छोटी! सूखी नदियों को देखकर ऐसा लगता है कि ये सिर्फ बरसात का पानी बहाने के लिए रास्ता बनकर रह गई हैं। शहर से होकर या शहर के किनारे से गुज़रने वाली नदियों का दुख पानी होने के बावजूद सूखी नदियों से भी कई गुना ज़्यादा है। नदी से वो गंदे नाले में तब्दील हो चुकी हैं। सूखी नदी की पहचान नदी के रूप में ही होती है लेकिन प्रदूषित नदी की पहचान पर ही संकट खड़ा हो गया है क्योंकि वह स्वच्छ नदी के स्वरूप से बदलकर गंदे पानी के परनाले में तब्दील होती जा रही है। मानवीयता और करुणा को हज़म कर जाने वाले शहर प्रकृति के प्रति कितने निष्ठुर और क्रूर हैं! यह शहर के भीतर उतना स्पष्ट नहीं होता लेकिन शहर के बाहरी इलाके में पूरीतरह स्पष्ट हो जाता है।’’

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17 अप्रैल, 2022 को सुबह 11.30 बजे काफिला रामगढ़ पहुँचा। यहाँ पर स्वागत देखकर ऐसा अनुभव हो रहा है, जैसे जनमास जनवासा में बारात पहुँचने पर उनका स्वागत होता है। ऐसा अनुभव जमशेदपुर में ठहरने के स्थान पर भी हुआ था। पहुँचते ही नींबू-पानी शर्बत को देखकर राकेश जी सहित सभी ने बारात जैसे माहौल का ज़िक्र किया था। खैर, रामगढ़ में गर्मी का क्या कहना! कुर्सियाँ तपी हुई हैं। मंच के ऊपर तनी कनात से घाम रिस रहा है। लू बह रही है। लस्सी पी जा चुकी है। स्वागत किया जा रहा है। शैलेन्द्र जी कह रहे हैं कि जो करना है, जल्दी करिये। पर आयोजकों का आत्मीय प्रेम है कि इतनी जल्दी छुटकारा नहीं मिलेगा। पलामू इप्टा के साथियों को सलाम है कि हर जगह जहाँ भी चाहे जैसी परिस्थितियाँ हों, यात्रा का संदेश खुशी व प्रेम के साथ जाहिर करते हैं – जनगीतों व अभियान गीत के साथ।

अगला पड़ाव हजारीबाग का था। शहीद बिरसा मुंडा और बाबासाहेब की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण और जनगीत के बाद, हमेशा मुस्तैदी के साथ हर पड़ाव पर जिजीविषा के साथ सक्रिय रहने वाले पलामू इप्टा के साथी शशि पांडे की तबियत अचानक बिगड़ गई… सुबह से उनकी साँस फूलने लगी और उन्हें साँस लेने में तकलीफ होने लगी। हजारीबाग के एक निजी अस्पताल में उन्हें भर्ती कराया गया, जहाँ नेबुलेशन के बाद उन्हें आराम मिला। उसके बाद उनके सहित यात्रा के सभी साथी झारखंड के अंतिम पड़ाव कोडरमा लगभग 4 बजे पहुँचे। बिहार इप्टा का कंेद्रीय जत्था भी कोडरमा पहुँच गया था।

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मीनाक्षी सुन्दरेश्वर अर्थात धोती खोलकर पगड़ी बांधना

यात्रा के नौंवे दिन दूसरे चरण के आखिरी पड़ाव में कोडरमा के झुमरीतलैया में शाम को सांस्कृतिक संध्या का आगाज़ हुआ। यहाँ बिहार इप्टा के साथियों ने अभियान गीत ‘ढाई आखर प्रेम के…’ गाकर कार्यक्रम की शुरुआत की। उसके बाद संजय कुंदन की कविता ‘प्रश्न’, बाबा नागार्जुन की कविता ‘प्रेत का बयान’ का नाट्य रूपान्तरण प्रस्तुत किया गया। तीन साथियों के चुस्त अभिनय में प्रस्तुत इस लघु नाटिका से दर्शकों के मन में कई सवाल पैदा हुए। साथी किसलय ने बाबा नागार्जुन की कविता ‘किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है’ रैप अंदाज़ में प्रस्तुत किया। प्रस्तुति बढ़िया रही। साथी अमन ने नेहरू के पात्र के रूप में ‘भारतमाता कौन’ के सवाल वाले प्रसंग को उठाते हुए मंच पर नेहरू और उनके विचारों की जीवंत प्रस्तुति दी। पलामू इप्टा के साथियों ने अपनी चिरपरिचित शैली में जनगीत प्रस्तुत किये। बिहार इप्टा के साथियों ने मौजूदा निजाम और चाटुकारों पर प्रहार करते हुए नाटक हँसमुख नवाब प्रस्तुत किया। पीयूष सिंह द्वारा निर्देशित और संजय कुंदन लिखित यह नाटक हँसी-हँसी में जुमलेबाज, आत्ममुग्ध, कायर निजाम के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। नाटक परत-दर-परत राजा के दंभ, झूठ, खोखलेपन, गलत नीतियों को उधेड़ता चलता है। नाटक राजा के भक्तों और चाटुकारों पर भी तगड़ी चोट करता है। प्रजा को हर परिस्थिति में हँसते रहने का फरमान, सही सवाल उठाने वालों को सज़ा, दो किलो सोना का लालच और आखिर में झोला उठाकर राजा का गायब होना; नाटक स्पष्ट कर देता है कि वह क्या कहना चाहता है। नाटक में सभी साथियों का अभिनय काबिले तारीफ रहा। बादशाह से लेकर किसान-मज़दूरों की वेशभूषा ही उनका परिचय करा रही थी। घोर साम्प्रदायिकता और अंधभक्ति के दौर में इस तरह की प्रस्तुति काफी चुनौतीपूर्ण है, वो भी खुले मंच पर, जिसे बिहार इप्टा ने संभव किया।

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फैज़ की रचनाओं से तानाशाह का डरना लाज़िम है (डायरी 24 अप्रैल, 2022)

झारखंड इप्टा के साथियों ने सांस्कृतिक यात्रा ‘ढाई आखर प्रेम’ का झंडा तथा ‘साझी शहादत-साझी विरासत’ का प्रतीक पात्र बिहार इप्टा के केन्द्रीय जत्थे को सौंपा। रात को कोडरमा के कार्यक्रम तथा भोजन के उपरांत झारखंड इप्टा के साथियों ने विदा ली। इप्टा के राष्ट्रीय सचिव साथी शैलेन्द्र के नेतृत्व में मेदिनीनगर पलामू के सभी साथी झारखंड की समूची यात्रा में साथ रहे। 18 अप्रैल, 2022 को सुबह 7.15 बजे बिहार इप्टा के साथियों के साथ यात्रा के रिपोर्टर साथी मृगेन्द्र और चित्रकार साथी कुश सामान्य बस से नवादा के फतेहपुर मोड़ के लिए रवाना हुए। यहाँ से तयशुदा बस में बिहार के अन्य साथियों के साथ सांस्कृतिक यात्रा राज्य की बीस दिवसीय यात्रा का आगाज़ करेगी।

सांस्कृतिक यात्रा के दौरान स्पष्ट दिखाई दिया कि हरेक राज्य की अपनी-अपनी संस्कृति और कार्यप्रणाली है। छत्तीसगढ़ से पृथक झारखंड की यात्रा में अनेक महापुरुषों, आदिवासी शहीदों और समूहों से रूबरू होते, अनेक प्रकार के स्थानीय संगठनों के साथ मिलजुलकर कार्यक्रम सम्पन्न हुए। यहाँ के साथियों के ज़मीनी संपर्कों के कारण महिलाओं, बच्चों और समाज के सभी वर्गों के लोगों से सम्पर्क हुआ। इप्टा के साथ-साथ अन्य सांस्कृतिक संगठनों के भी नृत्य, गीत-संगीत, नाटक आदि कार्यक्रम सम्मिलित किये गये थे। जमशेदपुर और घाटशिला से लिटिल इप्टा के बच्चों ने यात्रा में बढ़चढ़कर भाग लिया। साथी मृगेन्द्र की टिप्पणी है कि झारखंड के साथियों के ढोलक, हारमोनियम और ढपली के साथ गाए गए जनगीतों से काफी अलग बिहार इप्टा के साथियों के म्युज़िक ट्रैक पर गाए जाने वाले जनगीत आर्केस्ट्रा की फीलिंग दे रहे थे। प्रस्तुति का मिज़ाज बदला हुआ था। झारखंड के साथियों के जनगीतों में कोई भी अपनी आवाज़ मिला सकता था मगर म्युज़िक ट्रैक के साथ गाए जाने वाले जनगीतों में यह गुंजाइश नहीं थी। बहरहाल, झारखंड में सांस्कृतिक यात्रा का दूसरा चरण पूरा हुआ। अब तीसरा चरण बिहार राज्य की यात्रा का शुरु हो गया है।

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  1. […] ‘ढाई आखर प्रेम’ की यात्रा ने झारखंड मे… […]

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