Tuesday, April 16, 2024
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वीर्य की पवित्रता का मसला  (डायरी 29 अप्रैल, 2022) 

अहंकार बेशक नकारात्मक शब्द है। यह एक बुराई है। लेकिन कोई ऐसा नहीं है जो इस बुराई से बचा हो। कम से कम मैंने अपने जीवन में ऐसा किसी को नहीं देखा है, जिसमें यह अवगुण ना हो। किसी में बहुत ज्यादा तो किसी में बहुत कम। अहंकार भी अलग-अलग कारणों से होते हैं। किसी […]

अहंकार बेशक नकारात्मक शब्द है। यह एक बुराई है। लेकिन कोई ऐसा नहीं है जो इस बुराई से बचा हो। कम से कम मैंने अपने जीवन में ऐसा किसी को नहीं देखा है, जिसमें यह अवगुण ना हो। किसी में बहुत ज्यादा तो किसी में बहुत कम। अहंकार भी अलग-अलग कारणों से होते हैं। किसी को अपनी जाति का अहंकार होता है तो किसी को अपने लिंग और किसी को अपनी धन-संपदा। ऐसे भी लोग होते हैं जिन्हें अपने शरीर सौष्ठव का अहंकार होता है तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें अपनी समझ का अहंकार होता है। मैं खुद भी अहंकारी हूं और कई बार मेरा अहंकार अनायास ही सामने आ जाता है। हालांकि मैं यह बात रियलाइज अवश्य करता हूं कि मैंने गलत किया है और प्रयास करता हूं कि उसका दुहराव ना हो। लेकिन इंसान हूं तो बाजदफा ऐसा करना भूल भी जाता हूं।
लेकिन क्या हम वाकई इसलिए करते हैं क्योंकि हम इंसान हैं? आखिर क्या वजह है कि हम अहंकार रखते हैं? यह भावना आती कहां से है?
मेरी अपनी समझ है कि इस अवगुण की बड़ी वजह धर्म है। धर्म का हमारे जीवन में महत्व केवल इतना ही नहीं है कि इसका व्यवहार करके हम अपना जीवन जीते हैं, बल्कि यह भी है कि हम क्यों और किस तरह से महत्वपूर्ण हैं। यह बिल्कुल आइंस्टीन के सापेक्षवाद के सिद्धांत के जैसा ही है। हम दूसरों के सापेक्ष खुद का आकलन करते हैं और कसौटी के रूप में हमारे पास धर्म होता है। भारत में तो धर्म का सार ही वर्चस्ववाद है। हालांकि वैश्विक स्तर पर भी धर्म का यही मतलब है। फिर चाहे वह कोई भी धर्म हो। मैं तो बौद्ध धर्म की बात करता हूं। इस धर्म में भी एक खास तरह का वर्चस्ववाद है। ब्राह्मण धर्म तो खैर है ही वर्चस्ववाद का पर्याय।
चूंकि मेरा जन्म ब्राह्मण धर्म माननेवाले परिवार में हुआ है और मैंने सबसे अधिक इसी धर्म को देखा है तो यह महसूस करता हूं कि ताकत इस धर्म के महत्वपूर्ण अवयवों में से एक है। यहां तो शक्ति को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। बचपन में एक श्लोक याद रहता था–’या देवी शक्ति रूपेण संस्थिता:।’ इसका मतलब जो समझ में आता था, वह यह कि नारी के पास भी शक्ति होती है और हमें उसकी वंदना करनी चाहिए।

[bs-quote quote=”हम दूसरों के सापेक्ष खुद का आकलन करते हैं और कसौटी के रूप में हमारे पास धर्म होता है। भारत में तो धर्म का सार ही वर्चस्ववाद है। हालांकि वैश्विक स्तर पर भी धर्म का यही मतलब है। फिर चाहे वह कोई भी धर्म हो। मैं तो बौद्ध धर्म की बात करता हूं। इस धर्म में भी एक खास तरह का वर्चस्ववाद है। ब्राह्मण धर्म तो खैर है ही वर्चस्ववाद का पर्याय।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

लेकिन तब यह कहां समझ में आता था कि यह केवल कहने की बात थी। कहने की बात का मतलब यह कि महिलाओं को भ्रम में रखने का मर्दवादी तरीका। ठीक वैसे ही जैसे हर प्रेमी अपनी प्रेमिका की खूबसूरती की तारीफ करता है या फिर पति अपनी पत्नी के रंग-रूप आदि की तारीफ करता है। मकसद तो रिझाना ही होता है ताकि वह सेक्स कर सके। हालांकि कुछ अपवाद भी जरूर होते होंगे और मैं अपवादों में नहीं हूं।
दरअसल, हम मर्दों का मर्दवादी चरित्र ही समाज में एक स्पष्ट लकीर खींच देता है। यह अहंकार के कारण ही है। अहंकार में हम यह मानते हैं कि महिलाएं हमारे अधीन हैं और हम उनके स्वामी हैं। एक बात और है। हम पुरुष अपने वीर्य को बहुत प्यार करते हैं। हम चाहते हैं कि हमारे वीर्य के कारण जो संतान की उत्पत्ति हो, वह सर्वश्रेष्ठ हो और उसका यह गुण हमेशा बना रहे। हम नहीं चाहते हैं कि किसी भी तरह से हमारे वीर्य की पवित्रता पर कोई आंच आए। इस वजह से समाज में जटिलताएं पैदा होती हैं। ब्राह्मण धर्म इन जटिलताओं को और जटिल बना देता है। नतीजा यह होता है कि एक ब्राह्मण अपने बच्चों की शादी ब्राह्मण से ही करना पसंद करता है। राजपूत को भी राजपूत और फिर ऐसा ही व्यवहार अन्य जातियों के लोग करते हैं। मर्दों को लगता है कि यदि जाति बदल जाएगी तो उनके वीर्य की मानहानि हो जाएगी। डॉ. आंबेडकर इसे जाति का महत्वपूर्ण कारण मानते थे और अंतरजातीय विवाहों को जाति के विनाश का अहम तरीका।
परंतु, कहां आंबेडकर और अब कैसा आंबेडकरवाद? जो आंबेडकरवादी होने के अहंकार में डूबे रहते हैं, उनके लिए भी अंतरजातीय विवाह वीर्य को अपवित्र कर देना है।
इतनी लंबी भूमिका के पीछे एक घटना है बिहार की। छपरा के पानापुर थाने के सेमरी गांव में एक रविदास जाति के 19 वर्षीय युवा को महतो जाति के लोगों ने इतना पीटा कि वह बेदम हो गया और परसों रात पटना के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। मृतक के पिता ने एक मामला थाने में दर्ज कराया है, जिसमें उसने अपने ही गांव के रामायण महतो और अमित महतो सहित 11 लोगों को अभियुक्त बनाया है। स्थानीय पुलिस ने इस मामले में अबतक कोई खास कार्रवाई को अंजाम नहीं दिया है। बताया जा रहा है कि मामला प्रेम प्रसंग का था। मृतक राजेंद्र राम रामायण महतो की बेटी के साथ प्रेम करता था। जानकारी मिली तो आरोपियों ने घर से खींचकर उसके साथ मारपीट की।

[bs-quote quote=”भागवत ने कहा है कि जो समाज हिंसक रहा है, वह अपने अंतिम दिन गिन रहा है। मैं यह सोच रहा हूं कि ब्राह्मण धर्म के लोगों से अधिक हिंसक कौन है? यह धर्म तो ऐसा है जिसके सभी देवी-देवता हरवे-हथियार से लैस हैं और वजह केवल यह कि वीर्य की पवित्रता बची रहे।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

अभी दो सप्ताह पहले ही एक और घटना बेतिया के एक गांव से मिली थी। वहां तो मामला ठीक उलटा था। पासी जाति जो कि बिहार में दलित वर्ग में शामिल है, के लोगों ने एक यादव जाति के लड़के के साथ क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए उसके हाथ-पांव तोड़ने के बाद उसके उपर गर्म पानी उड़ेल दिया था।
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इस घटना का उल्लेख इस वजह से कि वीर्य की पवित्रता बचाए रखने का अवगुण केवल सवर्ण जातियों में ही नहीं है। यह दलित और ओबीसी जातियों के लोगों में भी बढ़ता जा रहा है। यह जातिगत अहंकार भी है और अपने वीर्य की पवित्रता को बचाए रखने का हिंसक उपक्रम भी।

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बहरहाल, यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि इसके पीछे जो मूल में है, वह ब्राह्मणवाद है। यह एक अवगुण है, जिसका समूल नाश जरूरी है। मैं तो आरएसएस के भागवत का बयान देख रहा हूं। भागवत ने कहा है कि जो समाज हिंसक रहा है, वह अपने अंतिम दिन गिन रहा है। मैं यह सोच रहा हूं कि ब्राह्मण धर्म के लोगों से अधिक हिंसक कौन है? यह धर्म तो ऐसा है जिसके सभी देवी-देवता हरवे-हथियार से लैस हैं और वजह केवल यह कि वीर्य की पवित्रता बची रहे।
बहरहाल, मेरी प्रेमिका ने मुझसे अपनी हंसी के बारे पूछा। जवाब में मैंने कहा–
जादुई नहीं है तुम्हारी हंसी
और तुम भी काल्पनिक ख्वाब नहीं
मेरा यथार्थ हो
जो मुझमें शामिल रहता है 
जब सूरज उगता और डूबता है।
हां, तुम ख्वाब नहीं
मेरा यथार्थ हो
और तुम्हारी हंसी जादुई नहीं
तुम्हारी अपनी है
जैसे तुम्हारा अस्तित्व 
तुम्हारा अपना है
और मैं तुम्हारे अस्तित्व में
खुद को शामिल पाता हूं।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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