एक असाधारण व्यक्तित्व जिसने देश की सामुदायिक एकता के लिए अंग्रेजों से दुश्मनी मोल ले ली थी

विद्या भूषण रावत

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अक्टूबर 1 को पेशावर काण्ड के नायक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की पुण्यतिथि है। इस दिन 1979 को उनका निधन हो गया था। यह वह दौर था जब टेलीविज़न ने हमारे घरो में एंट्री की थी, लेकिन बहुत ही सीमित स्तर पर। उस समय न कोई इन्टरनेट था न ही सोशल मीडिया। खबरों के लिए रेडियो पर ही पूरी निर्भरता थी, दुर्भाग्यवश राजनैतिक कारणों से भी उनके विषय में ज्यादा जानकारी नहीं दी गयी क्योंकि वे हमारे सत्ताधारियों के लिए हमेशा एक चुनौती बनाते थे।

इस वर्ष राजनाथ सिंह उनकी स्मृति में आयोजित एक बड़े कार्यक्रम में पौड़ी गढ़वाल जिले में उनके गाँव जा रहे हैं। हालांकि अभी तक तो उन्हें सतही तौर पर ही याद किया जाता रहा है और आज की पीढ़ी को उनके ऐतिहासिक कार्य के विषय में कोई जानकारी भी नहीं दी जाती। उनके जीते जी उन्हें सत्ताधारी कभी भी वो  इज्जत नहीं दे पाए जिसके वह हकदार थे, क्योंकि वीर चन्द्र सिंह हमेंशा ही सत्ताधारियों से टकराए। वह आर्य समाजी थे और  गाँधी से भी बहुत प्रभावित थे लेकिन उनके विचार और एक्शन में वह इन दोनों ही विचारों से बहुत आगे थे।

कौन थे चन्द्र सिंह गढ़वाली 

चन्द्र सिंह का जन्म 1891 में गढ़वाल में हुआ था और 21 वर्ष के आयु में वह फौज में भर्ती हो गए। पहाड़ों में उन्होंने अथाह गरीबी देखी और इसी कारण अधिकांश युवा फौज में भर्ती होते थे। चन्द्र सिंह गढ़वाली ने द्वितीय विश्वविद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से भाग लिया। चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी आज के सांप्रदायिक दौर में एक मिशाल है। जिसे बार-बार पढ़ना और सुनाया जाना चाहिए। क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की खुशियों को संप्रदायिक सौहार्द की खातिर त्याग कर दिया।

आज जब हमारी सेनाओं और पुलिस प्रशासन का सम्प्रदायिकीकरण हो रहा है तब देश के सैनिक, प्रशासक और पत्रकार भी ये पढ़े की क्यों इस देश की एकता और मजबूती के लिए चन्द्र सिंह की कहानी पढ़ना जरुरी है। और ये भी की पेशावर का विद्रोह केवल एक झटके में किया गया सैन्य विद्रोह नहीं था अपितु इसके पीछे चन्द्र सिंह की राजनैतिक समझ थी, जो यह मानती थी कि अंग्रेजी राज भारत में हिन्दू-मुस्लिम विभाजन कर हमेंशा के लिए शासन करना चाहता था।

दुःख इस बात का है कि ब्राह्मणवादी इतिहासकारों और नेताओं ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के साथ अन्याय किया। उनके इतने बड़े विद्रोह को जिसके फल्वरूप गढ़वाल रायफल के जाबांज देशभक्त सिपाहियों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और अपने हथियार डाल दिए ताकि एक और जलियांवाला न हो। चन्द्र सिंह गढ़वाली की वीरता को न तो चारण इतिहासकारों ने स्थान दिया न ही सत्ताधारियों ने क्योंकि उनके विचार बहुत क्रन्तिकारी थे।

दुःख इस बात का है कि ब्राह्मणवादी इतिहासकारों और नेताओं ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के साथ अन्याय किया। उनके इतने बड़े विद्रोह को जिसके फल्वरूप गढ़वाल रायफल के जाबांज देशभक्त सिपाहियों ने निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया और अपने हथियार डाल दिए ताकि एक और जलियांवाला न हो। चन्द्र सिंह गढ़वाली की वीरता को न तो चारण इतिहासकारों ने स्थान दिया न ही सत्ताधारियों ने क्योंकि उनके विचार बहुत क्रन्तिकारी थे।

इस सन्दर्भ में हमें भारतीय साहित्य के पुरोधा राहुल संकृत्यायन का ऋणी होना पड़ेगा। जिन्होंने 1944 में चन्द्र सिंह गढ़वाली की जीवनी लिखी, जो किताब महल प्रकाशन ने छापी। महत्वपूर्ण बात यह कि इस पुस्तक में जिस बारीकी से राहुल जी ने चन्द्र सिंह गढ़वाली के जीवन के बारे में बात की है वो बहुत महत्वपूर्ण है। खासकर इस सन्दर्भ में जब तथाकथित इतिहासकारों की नज़र से इतिहास गायब हो तो हमें ओरल हिस्ट्री का सहारा लेना पड़ेगा।

ब्रिटिश राज के समय का गढ़वाल

इतिहास का एक उपेक्षित नायक 

मैंने बचपन में चन्द्र सिंह गढ़वाली के बारे में सुना था, उन्हें  हैट और टॉप लगाये हाफ पेंट में घूमते भी देखा था क्योंकि वे मेरे ननिहाल के पास के थे। लेकिन मुझे उनकी महत्ता या महानता का अंदाजा तब हुआ, जब मैंने राहुल जी द्वारा लिखित उनकी जीवनी पढ़ी और यहीं से मेरी सोच में परिवर्तन हुआ। मैं बहुत शिद्दत से मानता हूँ की घुम्म्क्कड़ लोग अगर चाहें तो न केवल बहुत बड़े साहित्य की रचना कर सकते हैं, अपितु इतिहास को भी खोज निकालेंगे, जिन्हें भारत के सन्दर्भ में ब्राह्मणवादी साहित्यकारों और नेताओं ने छुपाया है।

क्या यह शर्मनाक नहीं है कि गोविन्द बल्लभ पन्त जैसे नेताओं ने जीवन पर्यंत चन्द्र सिंह गढ़वाली को न तो सम्मान दिया और न ही उन्हें उनके योगदान के लिए कोई आधिकारिक मदद। आज़ादी के बाद भी कुछ सालों तक उनको अपराधी ही माना जाता रहा। चन्द्र सिंह आर्य समाज से प्रभावित थे और गाँधी जी की सभाओं में भी जाते थे लेकिन वो सेना में होने के बावजूद भी लोकतान्त्रिक थे।

चन्द्र सिंह गढ़वाली की ऐतिहासिक भूमिका के लिए हमें यह समझना पड़ेगा कि पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम में पठानों के इलाके में खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें बादशाह खान के नाम से भी जाना जाता है, कांग्रेस और गाँधी जी के साथ मिलकर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे। पठानों ने इस अवसर पर कांग्रेस का साथ दिया था और यह बात सब जगह पता चल चुकी थी कि अंग्रेज पठानों के इस विद्रोह को कुचल देना चाहते थे।

उसके लिए उन्हें ऐसी बहादुर सैन्य टुकड़ी चाहिए थी, जो बिलकुल उस इलाके से न हो ताकि  सैनिक बिना किसी चिंता के बेशर्मी से विद्रोह को कुचल सकें। यह नीति तो अंग्रेजों के बाद भी सभी सरकारें करती रही हैं। किसी भी स्थान पर जन विद्रोह को दबाने के लिए वहां से दूर के सैनिकों को बुलाया जाता है, ताकि उनका कोई सहानुभूति स्थानीय लोगों के साथ न हो और वे निर्दयता से अपना काम करें। गढ़वालियों को पहाड़ से पेशावर या एबटाबाद भेजने के पीछे अंग्रेजो की यही रणनीति थी, कि वे पठान विद्रोह को बेरहमी से कुचल देंगे, लेकिन चन्द्र सिंह ने उनके इस मंसूबे पर पानी फेर दिया। उनकी जाति धर्म से ऊपर उठकर जन असंतोष की राजनीतिक समझ आज के दौर में और भी प्रासंगिक है।

चन्द्र सिंह गढ़वाली की ऐतिहासिक भूमिका के लिए हमें ये समझना पड़ेगा कि पाकिस्तान के उत्तर पश्चिम में पठानों के इलाके में खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें बादशाह खान के नाम से भी जाना जाता है, कांग्रेस और गाँधी जी के साथ मिलकर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे थे। पठानों ने इस अवसर पर कांग्रेस का साथ दिया था और ये बात सब जगह पता चल चुकी थी कि अंग्रेज पठानों के इस विद्रोह को कुचल देना चाहते थे।

पेशावर की जालियावाला बाग जैसी घटना 

याद रखिए कि बैसाखी के दिन जलियांवाला में जघन्य नरसंहार के बाद अंग्रेजों ने वैसी ही योजना पेशावर में बनाई, जहां खान अब्दुल गफ्फार खान के बहादुर खुदाई खिदमतगार गांधी जी के अहिंसक आंदोलन से प्रभावित होकर उनके साथ सहयोग कर रहे थे। अंग्रेजों को हिंदुओं और मुसलमानों की यही एकता पसंद नहीं थी।

यह घटना पेशावर शहर, जो कि अब पाकिस्तान में है, के किस्सा ख्वानी बाजार में 23 अप्रैल, 1930 को घटी। अंग्रेजों ने इस स्थान पर निरपराध लाल कुर्ती आन्दोलन के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को, जो अपने नेता खान अब्दुल गफ्फार खान की गिरफ्तारी के खिलाफ विरोध कर रहे थे। गफ़्फ़ार खान गर्व से भारत में फ्रंटियर गांधी, सीमांत गांधी, बादशाह खान या बाशा खान के रूप में याद किया जाता है। उन पर भीड़ को चारों ओर से घेर कर फायरिंग करवाई, जिसमें 400 से अधिक निहत्थे प्रदर्शनकारियों का नरसंहार हुआ।

हम जलियांवाला बाग को याद करते हैं, लेकिन बहुत से लोग इसके बारे में नहीं जानते हैं। हम सभी के लिए इस क्रूर नरसंहार को याद रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह सत्ता द्वारा फैलाया गया जहर था। कैसे जनशक्ति ने इसका मुकाबला किया और सबसे महत्वपूर्ण ये कि कैसे भारत की सेना की पलटन ने जो कि रायल गढ़वाल राइफल्स की थी, ने निहत्थे देशभक्तो, पर गोली चलाने से इनकार कर अंग्रेज अधिकारियों के आदेशों के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। इस विद्रोह के नायक थे वीर चंद्र सिंह गढ़वाली (जो हवलदार के पद पर थे)

इस किस्सा ख़वानी बाजार में ब्रिटिश हुकुमत ने पहले से ही अहिंसक पठानों को सबक ‘सिखाने’ का फैसला किया था। क्योंकि वे गांधी के साथ थे और उन्होंने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का सहारा लिया था। अंग्रेजों ने बड़ी योजना से रॉयल गढ़वाल राइफल्स पलटन को पेशावर शहर में ला दिया था, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि पहाड़ों से आये ये फौज़ी बिना किसी सवाल के आसानी से आदेशों का पालन करेंगे, लेकिन उनकी रणनीति विफल रही।

चन्द्र सिंह का जन्म 1891 में गढ़वाल में हुआ था और 21 वर्ष के आयु में वह फौज में भर्ती हो गए। पहाड़ों में उन्होंने अथाह गरीबी देखी और इसी कारण अधिकांश युवा फौज में भर्ती होते थे। चन्द्र सिंह गढ़वाली ने द्वितीय विश्वविद्ध में ब्रिटिश सेना की ओर से भाग लिया। चन्द्र सिंह गढ़वाली की कहानी आज के सांप्रदायिक दौर में एक मिशाल है। जिसे बार-बार पढ़ना और सुनाया जाना चाहिए। क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की खुशियों को संप्रदायिक सौहार्द की खातिर त्याग कर दिया।

राहुल जी की पुस्तक में 1930 में पेशावर की उस घटना का चित्रण विस्तारपूर्वक है :

23 अप्रैल 1930 को कंपनी के ओहदेदारों और सिपाहियों को हुक्म हुआ : ‘पांच मिनट के अन्दर फालिन हो जाए’। राइफ़लें, दूसरे सामान, और फौजी मोटरों का सामने तैयार रखी गयी थीं रसोइयों को एक घंटे के अन्दर रोटी पका देने का हुकुम दिया गया था।  7  से 8  बजे तक ये काम होते रहे। ‘ सुबह कप्तान रिकेट ने आदेश दिया : गढ़वाली बटालियन एडवांस’  गढ़वाली बटालियन आगे बढ़ो।राष्ट्रीय झंडे के चारो ओर वीर पठान खड़े थे। मंच पर खड़े होकर एक सिख नेता ने कभी पश्तो में और कभी उर्दू में जोशीला व्याख्यान देना शुरू किया।  लोगों से आवाज आती..नारे तकबीर : अल्लाह हू अकबर, महात्मा गाँधी की जय।

कप्तान रिकेट ने कहा , तुम लोग यहां से भाग जाओ, नहीं तो गोली से मारे जाओगे, पठान जनता टस से मस नहीं हुई। गोली से खेलना वह नहीं भूली थी। अब कप्तान रिकेट ने हुक्म दिया : गढ़वाली तीन राउंड फायर, चन्द्र सिंह रिकेट के बाएं खड़े थे। उन्होंने जोर से बोला : गढ़वाली सीज फायर, गढ़वाली गोली मत चलाओ। हुकुम को सुनते ही गढ़वालियों ने अपनी- अपनी राइफ़ले जमीन पर खड़ी कर दी। इसे कहने की आवश्यकता नहीं है कि गढ़वालियों ने देश के प्रति अपनी वफ़ादारी दिखला दी। एक गढ़वाली सैनिक उदे सिंह ने अपनी बन्दूक को एक पठान के हाथ में देकर कहा : लो भाई, अब आप लोग हमको गोली मार दो।

जिस वक़्त पलटन 1 और 2 के सभी सिपाहियों ने अपने अपनी राइफ़ले जमीन पर रख दी, उसी समय नंबर 3 पलटन के कमांडर लुथी सिंह को यह सब नहीं देखा गया और उसने आगे बढ़कर फायर करने का हुकुम दिया और स्वयं से गोली भी चलाई। लेकिन पलटन 3 के लोग भी अपनी जगह से टस से मस नहीं हुए। कप्तान रिकेट ने लाल-लाल आंखे करके चन्द्र सिंह की ओर देख कर कहा : क्यों, यह क्या बात है ? चन्द्र सिंह ने कहा : ये सारे लोग निहत्थे हैं। निहत्थों पर गोली कैसे चलायें।

इसके बाद वहां अंग्रेजों ने अपनी पलटन को भेजा जिसने लोगों पर फायरिंग कर दी, जिसमें कई लोग मारे गए। सब जगह अफरा-तफरी हो गयी और कप्तान रिकेट की भी मौत हो गयी। चन्द्र सिंह और उनके साथियों ने भी खुद को किसी तरह से बचाया, क्योंकि उस अव्यवस्था में तो किसी को पता नहीं होता कि कौन दोस्त हैं और कौन दुश्मन।
( राहुल संकृत्यायन की पुस्तकचन्द्र सिंह गढ़वाली से )

पेशावर में अफरा-तफरी मच गयी। किसी तरह से सभी विद्रोही सिपाही बच कर अपनी बैरकों में आये और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। चन्द्र सिंह को एबटाबाद जेल में भेजा गया। वह लगभग 14 वर्षों तक जेल में रहे। पूरे विद्रोह की खास बात यह थी के ये देश के पुर्णतः विचारिक था, देशभक्ति से ओतप्रोत था और अपने ही देश के निहत्थे नागरिकों पर गोली चलाने को गलत मानता था।

पेशावर में अफरा-तफरी मच गयी। किसी तरह से सभी विद्रोही सिपाही बच कर अपनी बैरकों में आये और बाद में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। चन्द्र सिंह को एबटाबाद जेल में भेजा गया। वह लगभग 14 वर्षों तक जेल में रहे। पूरे विद्रोह की खास बात यह थी के ये देश के पूर्णतः वैचारिक और  देशभक्ति से ओतप्रोत था और अपने ही देश के निहत्थे नागरिकों पर गोली चलाने को गलत मानता था। चन्द्र सिंह और उनके साथियों के लिए पेशावर जैसी जगह बिलकुल नई थी। उनके पास भागने का कोई रास्ता भी नहीं था। चूँकि सभी पहाड़ों से आये थे इसलिए न तो भाषा और न ही खान-पान उनके पसंद के थे। वे सभी फौज के सिपाही थे और उस वक़्त अधिकांश लोग जो पढ़-लिख नहीं पाते थे, फौज में ही जाते थे।

ब्रिटिश हुकुमत

इन सबके बावजूद वे सांप्रदायिक सौहार्द के लिए इतनी बड़ी मिशाल पैदा करेंगे इसको समझना चाहिए। इससे भी अधिक ये चिंता कि हमें ‘निहत्थों’ पर गोली नहीं चलानी है। आज के फौज और पुलिस के अधिकारियों और नीति निर्माताओं के लिए ये बहुत बड़ा सबक है जो मुसलमानों को दुश्मन समझते हैं।

जब पहाड़ों से आये लोग जहाँ मुस्लिम उपस्थिति न के बराबर थी और जहाँ ब्रिटिश भी नहीं पहुँच पाए, वो लोग सेना में जाकर अपने देश के लोगों पे गोली चलाने से इनकार कर दे और वो भी उस स्थान पर जो कहीं से भी उनका नहीं था, न ही उनके समर्थन में प्रदर्शन करने वाले लोग वहां होते, ये बात इतिहास में बहुत कम मिलेगी, लेकिन चालाक इतिहासकारों ने इस बात को हाशिये पे डाला।

आज़ादी के बाद चन्द्र सिंह भटकते रहे। सभी साथी जिन्हें कालापानी की सजा हुई वे न्याय की आशा में रहे लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। चन्द्र सिंह रिहाई के बाद सामाजिक, राजनैतिक जीवन में सक्रिय हो गए लेकिन वह कभी चुनाव नहीं जीत पाए। कांग्रेस उनकी चाहत नहीं थी और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर वो चुनाव लड़े परन्तु जनता का भरोसा नहीं जीत पाए। आखिर जनता उन्हें चाहे क्यों ? उनके क्रन्तिकारी विचारों को अगर सुनेंगे तो पता चलेगा कि जातिवादी जनता क्यों उन्हें चाहेगी ? उत्तराखंड में दलितों के प्रश्न पर उन्होंने जो कहा वो समझने वाला है और शायद जातिवादी पार्टियों और नेताओं को वो रास नहीं आया।

आज़ादी के बाद चन्द्र सिंह भटकते रहे। सभी साथी जिन्हें कालापानी की सजा हुई वे न्याय की आश में रहे लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। चन्द्र सिंह रिहाई के बाद सामाजिक, राजनैतिक जीवन में सक्रिय हो गए लेकिन वह कभी चुनाव नहीं जीत पाए। कांग्रेस उनकी चाहत नहीं थी और कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर वो चुनाव लड़े परन्तु जनता का भरोसा नहीं जीत पाए।

वह कहते हैं- हजारों साल से जिस जाति व्यवस्था ने हमारे देश की चौथाई मानवता को इस हीन अवस्था में पहुँचाया, वह तब तक उन्हें उठने नहीं देगी जब तक उस व्यवस्था के भीतर आग नहीं लगा दी जाती और यह आग शिक्षा और बेहतर शिक्षा व्यवस्था से ही लगाईं जा सकती है।

उत्तराखंड के दलितों के अधिकारों को लेकर चन्द्र सिंह गढ़वाली के विचार

वह कहते हैं कि दलितों की स्थिति को सुधारने के लिए निम्नलिखित कार्यवाही होनी चाहिए :

जमींदारी प्रथा ख़त्म कर बंजर और जंगलों की जमीन उनको देनी चाहिए।
नौकरियों में अनुपात के मुताबिक उनको जगह मिले।
उनकी पढाई के लिए शिक्षा नि:शुल्क हो।
असेम्बलियों और काउंसिलों में उनके लिए अनुपात के मुताबिक सीटें दी जाएँ।
उद्योगों में उन्हें प्रथम स्थान मिले।
(राहुल जी की पुस्तक वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली) से साभार।

उत्तराखंड के दलितों का वर्तमान 

आज भी उत्तराखंड के बहुत से इलाकों में दलितों की हालत बेहद चिंताजनक है और उन्हें मंदिरों तक में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। बहुत से स्थानों पर दलितों के नाम का आरक्षण सवर्ण खा रहे हैं, जो शर्मनाक है। क्योंकि उत्तराखंड के राजनैतिक नेतृत्व के लिए दलितों का प्रश्न कभी भी एजेंडे में नहीं था। यही कारण है कि चन्द्र सिंह कभी भी राज्य की मुख्य धारा की राजनीति में सफल नहीं हो पाए। क्योंकि उनके विचार यथास्थितिवादियों की चूले हिला देती थी।

अब आप समझ सकते हैं कि इतने क्रन्तिकारी व्यक्ति  उत्तराखंड की ‘देवभूमि’ में दलितों के अधिकार की बात करेगा तो पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त या उनके बाद के सवर्ण नेता क्यों सम्मान करेंगे ? चन्द्र सिंह गढ़वाली जिन्दगी भर आर्थिक बदहाली में रहे। उनका ये दर्द हमेंशा था कि पेशावर काण्ड के क्रांतिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार और भारत सरकार ने कभी सम्मान नहीं दिया।

सरकार ने भी उनके साथ क्रूर मज़ाक किया 

20 सितम्बर 1954 को उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को एक पत्र भेजा, जिसमें उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति का विवरण दिया था।  उनकी झोंपड़ी वर्षा से टूट चुकी थी और आमदनी के नाम पर उन्हें 16 रुपए पेंशन मिलती थी। उनके ऊपर 14,000 रुपए का कर्ज था। खाने-पीने के बर्तन भी नहीं थे। उन्होंने सरकार से अपनी मदद की अपील की।  लगभग एक वर्ष बाद 25 जुलाई 1955 को प्रदेश सरकार ने एक पत्र भेजकर ‘ख़ुशी’ जाहिर की, कि उन्हें आजीवन 14 रुपए महीने पेंशन मिला करेगी।
( राहुल संकृत्यायन की पुस्तक से वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली से )

यह याद रखना भी जरुरी है कि कैसे एक आदमी जो एक गांव से आया था और उसके पास कोई कॉलेज की शिक्षा नहीं थी और कैसे उसने फौज़ में रहकर अपने अधिकारियों का आदेश मानने से इनकार कर दिया। क्योंकि उन्हें लगा कि ये अपनी जनता पर अत्याचार करना होगा।

शर्म की बात यह है कि 65 वर्ष की उम्र में देश के लिए इतनी कुर्बानियों के बाद भी और व्यक्तिगत तौर पर पत्र लिखने पर भी सरकार ने उन्हें 14 रुपए लायक ही समझा। यह दर्शाता है कि भारत में स्वाधीनता के बाद गैर गांधीवादी विद्रोह के नायकों के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया। 1 अक्टूबर 1979 में उनका निधन हो गया।

हमारा एक संवेदनशील पूर्वज

आज अस्मिताओं के इस युग में चन्द्र सिंह गढ़वाली का नाम लेकर उनको स्मारकों में सीमित करने का प्रयास है लेकिन उनके विचारों से तो सामंतवादी, जातिवादी और सांप्रदायिक नेताओं और पार्टियों को कोई लाभ नहीं होने वाला। क्योंकि उनके विचारों और पेशावर कांड में उनकी ऐतिहासिक भूमिका के लिए वो आज भी याद किये जाने चाहिए। सांप्रदायिक सौहार्द की मजबूती के लिए पेशावर के उनके विद्रोह को आज भी याद करना जरुरी है।

यह याद रखना भी जरूरी है कि कैसे एक आदमी जो एक गांव से आया था और उसके पास कोई ‘कॉलेज’ की शिक्षा नहीं थी और कैसे उसने फौज़ में रहकर अपने अधिकारियों का आदेश मानने से इनकार कर दिया। क्योंकि उन्हें लगा कि ये अपनी जनता पर अत्याचार करना होगा। उसे पता था कि सेना में अधिकारी के आदेश को न मानने या उसके विरुद्ध जाने के क्या नतीजे होंगे, लेकिन वह और उनके सभी बहादुर साथियों ने ऐसा किया और वह भी अपने मातृभूमि से दूर, जिन लोगों को उन्होनें कभी नहीं जाना होगा, यहां तक कि संस्कृति को भी नहीं जानता था, लेकिन वह केवल यह जानता था कि ये सभी ‘पठान’ भारतीय थे, देशभक्त हैं और हमें उनकी रक्षा करनी थी, न कि उन्हें मारना था।

कभी-कभी मैं सोच में पड़ जाता हूं, क्या हो गया है हमें, जब आजाद देश में पढ़े -लिखे कहने वाले लोगों की सोच को टीवी चैनलों में जहर उगलते देख रहा हूं। वीर चंद्र सिंह तो सेंट स्टीफेंस कालेज या ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ने नहीं गये थे, शायद एक स्थानीय इंटर कॉलेज से पास भी नहीं थे, लेकिन उनकी व्यापक दृष्टि ने सैन्य कमान को धता बता दिया और अपने साथी सैनिकों को उन खतरों के बारे में शिक्षित किया, जो अंग्रेज हमें विभाजित और घृणा पैदा करके हमारे साथ खेल रहे थे। कम से कम, अंग्रेजी बोलने वाले ‘शिक्षित’ लोग वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली नामक इस आदमी के जीवन से सच्ची देश भक्ति के कुछ सबक ले सकते हैं!

विद्याभूषण रावत प्रखर सामाजिक चिंतक और कार्यकर्ता हैं। उन्होंने भारत के सबसे वंचित और बहिष्कृत सामाजिक समूहों के मानवीय और संवैधानिक अधिकारों पर अनवरत काम किया है।

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