इफको कंपनी का दलित-बहुजन विरोधी चेहरा

सुशील मानव

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पिछले साल इफको कई वजहों से चर्चा में रहा। पहला कारण पिछले साल जनवरी में कथाकार रणेंद्र को साल 2020 का ‘इफको श्री लाल शुक्ल स्मृति साहित्य सम्मान’ दिया जाना। बतादें कि इफको के आजीवन सीइओ उदय शंकर अवस्थी के ससुर व कथाकार मरहूम श्री लाल शुक्ल की स्मृति में दिया जाने वाला ये पुरस्कार अपनी 11 लाख रुपये राशि के चलते चर्चा में रहता है। दूसरा कारण 22 दिसंबर, 2021 को इफको कंपनी (फूलपुर इकाई) में अमोनिया गैस के रिसाव से 2 अधिकारी ग्रेड के कर्मचारियों की मौत हो गई जिसकी गूंज मुख्यमंत्री तक पहुंची। तीसरा कारण 21 जनवरी को इफको को 300 कोऑपरेटिव में शीर्ष रैंक हासिल हुआ। और चौथा कारण 23 मार्च 2021 को बॉयलर फटने से तीन अस्थायी मजदूरों की मौत। पांचवा कारण 18 फरवरी, 2021 को इफको द्वारा विश्व हिंदू परिषद प्रमुख आलोक कुमार को 2.51 करोड़ रुपये अयोध्या राम मंदिर निर्माण चंदे के लिए दिया जाना रहा।

लेकिन इफको कोऑपरेटिव का जो असली बहुजन विरोधी चरित्र है वो इधर कहीं मीडिया में रिपोर्ट होते नहीं दिखा। 1967 में स्थापित इफको कंपनी अपनी 36 हजार सहकारी समितियों के जरिये इफको देश के 5.5 करोड़ किसानों को अपनी सेवाएं प्रदान करती है। इफको कृत्रिम उर्वरक यूरिया और डीएपी बनाती है। इफको एशिया की सबसे बड़ी कृत्रिम उर्वरक उत्पादक कंपनी है। कहने को तो ये सहकारी संस्थान की कंपनी है लेकिन इसका रवैया मजदूरों का शोषण करने वाली किसी निजी कंपनी से कमतर नहीं है।

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बहुजन किसानों को ठेकेदार बनाया

एक समय में फूलपुर स्थित इफको कंपनी में आसपास के गांव पाली, सरैंया, कनेहटी, झंझरी, गिरधरपुर, अंटवा, कनौजा, भुलईपुरा, फूलपुर, सरनामगंज, धोकरी, छिबैंया, तिसौरा, चनौकी, सिकंदरा, मनेथू, बेलवा, बीरकाजी, हैबतपुर, भरौटी, चनौहा, चकमाली आदि के हजारों मजदूर काम करते थे। प्रशासनिक और प्रबंधकीय काम छोड़कर बाकी के सारे काम अस्थायी मजदूरों के जिम्मे था। चूंकि तब कंपनी में ज़्यादा मैनपॉवर की ज़रूरत थी इसलिए कपनी ने 70 के दशक के आखिर में स्थानीय किसान मजदूरों का रजिस्ट्रेशन करवाकर उन्हें ठेकेदार बना दिया। मेंटिनेंस और सप्लाई के काम के लिए अकुशल मजदूर के नाम आसपास के गांवो के कृषि मजदूरों और लैंडलूजर किसानों को काम पर रख लिया गया। और इन 16-18 ठेकेदारों में सारे मजदूरों को बराबर-बराबर बाँट दिया गया। इसका फायदा कंपनी को ये हुआ कि मजदूरी का रुपया कंपनी के खाते में नहीं बल्कि ठेकेदार के खाते में आने लगा।

इफको के सेंटर शिप, यूरिया प्लांट, अमोनियां प्लांट, पॉवर प्लांट, कोयला प्लांट, ऑफ साइट, केटीआई आदि में मेंटिनेंस और सप्लाई का काम चलता था। हालांकि मेंटिनेंस और सप्लाई के अस्थायी मजदूरों को सरकारी दर पर दिहाड़ी तय थी। चूंकि ठेकेदार बनाये गये लोग सीधे सादे किसान और बहुजन मुस्लिम समाज से आते थे, विशुद्ध ठेकेदार नहीं थे। इसलिए इनका संबंध मजदूरों से बेहद अच्छा और सौहार्द्रपूर्ण था। ये मजदूरों का शोषण करके मुनाफा कमाने का ट्रिक नहीं जानते थे। लेकिन गांव समाज में ठेकेदार कहाने का एक लालच तो था ही। मेटिनेंस और सप्लाई के ठेकेदारों की कंपनी में क्या औकात थी उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ये ठेकेदार अपनी मर्जी से न तो एक मजदूर कंपनी में रख सकते हैं, न निकाल सकते हैं।

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अकुशल मजदूरों से कराया जाता ख़तरनाक काम

जुलाई 2003 में इफको कंपनी में सरकार का शेयर 70 प्रतिशत से घटाकर 41 प्रतिशत होते ही कंपनी सीएजी, सीबीआई, विजिलेंस की पहुंच से दूर हो गई। इसके बाद से ही इफको कंपनी में हादसों का दौर शुरु हो जाता है क्योंकि कंपनी का मेंटिनेंस लगातार डांवाडोल होने लगता है।

इफको में कार्यरत एक मजदूर बताता है कि पिछले 7-8 सालों में कारखाने में कोई बड़ा शटडाउन नहीं हुआ। जैसे पहले होता था डेढ़-दो महीने महीने का। कोई समस्या होने पर चार-छः दिन के ब्रेकडाउन में निपटा दिया जाता था। लेकिन पिछले 2 सालों में दो बड़े हादसे होने के बाद इस साल दो प्लाटों में दो शटडाउन हुये हैं, दोनों डेढ़-दो महीने की अवधि के।

कारखाने में साफ-सफाई का काम करने वाला एक अस्थायी मजदूर नाम न छापने की शर्त पर बताता है कि 22 दिसंबर, 2021 को हुये गैस रिसीव की भयावहता उसने अगले दिन साफ करते हुये देखी। हादसे वाली जगह पर इधर-उधर मरे पड़े बंदरों और पंक्षियों को उठाकर उन्होंने तीन बड़े ड्रमों में भरा था।

इफको से निष्कासित पूर्व अस्थायी मजदूर गयादीन पटेल बताते हैं कि सन तो नहीं याद है पर संभवतः ये 15 साल पहले की घटना है। उस समय टेक्नीशियन आरसी तिवारी ड्युटी पर थे। पॉवर प्लांट में ठेका-मजदूरों से चालू स्टीम पाइप खुलवा दिया गया था। जिससे हाईप्रेशर स्टीम निकलने से 6 मजदूर झुलस गये थे। तिसौरा गांव के भोला भारतीया और एक इंपलायी राजेंद्र मौर्या की मौके पर ही मौत हो गई थी। वो आगे बताते हैं कि मरहूम भोला भारतीया का नाम ठेकेदार राम बहादुर पटेल के ठेके में काम करता था। इतना बड़ा हादसा कंपनी के टेक्नीशियनों की ग़लती से हुआ था। जो खुद काम करने के बजाय सारा काम अकुशल मजदूरों से करवाते थे। जबकि मजदूर सिर्फ़ हेल्पर का काम करने के लिए हायर किये गये थे। बावजूद इसके इफको ने मुआवजा खुद न देकर रामबहादुर पटेल के खाते से पैसे काटकर मरहूम मजदूर भोला भारतीया के परिवार को हर्जाने के तौर पर दे दिया गया। जबकि राम बहादुर के खाते में जो पैसा था वो मजदूरों का पिछले महीने के काम का पेमेंट करने के लिए आया था। राम बहादुर पटेल छोटे किसान थे। उनके पास इतनी पूंजी न थी। जब मजदूरों के पेमेंट के लिए आया पैसा इफको ने काटकर मुआवजा दे दिया तो वो मजदूरों को पेमेंट नहीं कर पाये। और फिर इफको में उनका ठेका बंद हो गया।

गयादीन आगे बताते हैं कि इसी तरह गड़ौड़ गांव के गुरुदीन नामक मजदूर इफको में हादसे का शिकार होकर जब मरा तो वो एक दूसरे ठेकेदार के अधीन काम कर रहा था जबकि उसका गेटपास डीएन पांडेय ठेकेदार के नाम पर बना था। इसलिए उस मजदूर की मौत का पूरा हर्जाना ठेकेदार डीएन पांडेय को भरना पड़ना।

एक और पूर्व मज़दूर राम अधार यादव बताते हैं कि पाली गांव के एक मजदूर सुभाष भारतीया जोकि इफको कंपनी में बेल्डर का काम करता था। उसकी मौत तब हो गई जब वो अपना शिफ्ट खत्म करके घर के लिए साईकिल उठाया ही था। कंपनी के लोगों ने उसकी लाश गेट का बाहर रखकर कहा कि उसकी मौत कंपनी से बाहर हुई है जबकि उसके साथी जो उसके साथ काम कर रहे थे उन्होंने दबाव बनाया कि नहीं उसकी मौत कंपनी के अंदर हुई है। एसडीएम ने 50 हजार रुपये मुआवजा देकर मामले को दबा दिया। कंपनी ने उसे फूटी कौड़ी तक न दी।

वैगन प्लांट इफको का शोषणकारी चेहरा बेनकाब करता है

मेरे एक दूर के रिश्तेदार बताते हैं साल 1999 में मुझे पैसे की बहुत दिक्कत थी। तो मैं कंपनी में दो जगह काम करता था। एक शिफ्ट केटीआई प्लांट में और दूसरा शिफ्ट वैगन प्लांट में। केटीआई में उस समय मुझे 8 घंटे के 165 रुपये तो वैगन प्लांट में 50 रुपये 8 घंटे के मिलते थे। वहीं केटीआई में ओवर टाइम में डबल पैसे मिलते थे तो वैगन प्लांट में ओवरटाइम का पैसा भी हाजिरी के बराबर ही था यानि 8 घंटे के 50 रुपये।

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मेवा लाल पटेल बताते हैं कि दरअसल इफको में दो तरह के काम होते हैं। मेंटिनेंस औऱ सप्लाई के मजदूरों के जो ठेकेदार थे वो आर्थिक और समाजिक रूप से पिछड़े हुए लोग थे। जबकि वैगन प्लांट, और सिविल के जो ठेकेदार थे वो आर्थिक और समाजिक रूप से सक्षम लोग थे। कंपनी इन लोगों के काम में दख़ल नहीं देती थी। वो किस दाम पर मजदूरों से काम करवा रहे हैं, कितने घंटे करवा रहे हैं इन सबसे कंपनी को कोई लेना देना नहीं था। मेवा लाल आगे बताते हैं कि वैगन प्लांट का ठेका शुरु से ही एलपी मिश्रा को मिलता आया है। वहां न लेबर इंस्पेक्टर जाते थे न श्रम आयुक्त। वो दंबग किस्म का ठेकेदार था और मजदूरों को अपनी जूती के नोक पर रखता था। लेकिन हर दमन का एक दिन अंत होता है। 29 नवंबर, 2007 को वेतन बढ़ोत्तरी की मांग लेकर आंदोलन कर रहे मजदूरों ने एलपी मिश्रा और उसके बेटे पर हमला कर दिया था। एलपी मिश्रा की मौके पर ही मौत हो गई जबकि बेटा बच गया। वैगन प्लांट का ठेका अब एलपी मिश्रा के बेटा चला रहा है। मेवा लाल बताते हैं कि उस हादसे के बाद करीब 800 अस्थायी मजदूरों को कंपनी से बाहर कर दिया गया। 150 से अधिक मजदूर वर्षों जेल में सड़ते रहे। देवापुर गांव के दो मजदूर आज भी जेल में ही हैं। खुद मेवालाल उम्र की ढलान पर मुंबई, गुजरात जाकर काम करते हैं। लेकिन कोरोना ने वहां से भागने के लिए भी बाध्य कर दिया।

लैंडलूजर्स को नहीं मिला हक़

आज फूलपुर में जिस ज़मीन पर इफको कंपनी है दरअसल वो ज़मीन पहले आईटीआई कॉलेज के लिए अधिग्रहीत की गई थी बाद में उस ज़मीन को तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा इफको कोऑरेटिव को हैंडओवर कर दी गई थी। लेकिन जब कंपनी ने विस्तार किया तो उसे और ज़मीन की ज़रूरत हुई और उसने आसपास की ज़मीन मुआवजा और एक परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी की शर्त पर किसानों की ज़मीन अधिगृहीत कर लिया। जबकि परिवार के दूसरे सदस्यों को अस्थायी मजदूर की नौकरी देने की बात कही गई।

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भोला पटेल को लैंडलूजर होने के नाते कंपनी ने नौकरी दी। लेकिन उनकी भोला पटेल की असमय मौत हो गई। उस समय उनकी नौकरी 20 साल से ज़्यादा बची हुई थी। लेकिन कंपनी ने उनकी जगह पर किसी और को नौकरी नहीं दी। न ही उनकी बची हुई 20 साल की नौकरी के पैसे और पीएफ दिया। इसी तरह एक और लैंडलूजर जगदीश यादव की मौत उनकी सेवानिवृत्ति से करीब 7 साल पहले हो गई लेकिन कंपनी ने उनकी जगह किसी और को नौकरी नहीं दी।

पिछले डेढ़ दशक से कंपनी के मुनाफा बढ़ता गया और इसके साथ ही हादसे भी। कंपनी ने मेंटिनेंस पर फोकस कम करके मुनाफे पर फोकस ज़्यादा कर दिया। नतीजन अमौनिया गैस रिसाव के मामले और दूसरी दुर्घटनायें बढ़ने लगीं। मजदूरों के लिए हालात बदतर होते गये हैं। बमुश्किल महीने में 18 से 20 हाजिरी मिलती है। कहीं एक महीने काम के बाद एक महीने के लिए बैठा दिया जाता है तो कहीं 2 महीने के काम के बाद एक महीने के लिए बैठाया जाता है। कुल मिलाकर काम लगातार नहीं मिलता है। ओवरटाइम पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है। कहीं किसी प्लांट में काम फंस गया तो एक्स्ट्रा काम को हाजिरी में तब्दील कर दिया जाता है।

कई बहुजन ठेकेदार बर्बाद हो गये

राम बहादुर पटेल, भीखा राम पटेल का काम बंद हो गया। बुढ़ापे में शटरिंग का काम करके परिवार का पेट पाल रहे हैं। आशिक, मोहर्रम, एसआई ख़ान आदि की ठेकेदारी किसी तरह घिसट रही है।

कंपनी में सर्विस टैक्स का लोचा है। अप्रैल 2007 से सर्विस टैक्स शुरु हुआ। लेकिन कंपनी ने ठेकेदारों को सर्विस टैक्स का भुगतान नहीं किया। कंपनी ने मार्च 2012 से सर्विस टैक्स देना शुरु किया। ठेकेदारों ने वर्कऑर्डर में लिखा कि यदि इफको कंपनी सर्विस टैक्स देगी तो हम भुगतान करेंगे।

इस तरह कुल पांच साल का सर्विस टैक्स ठेकेदारों के नाम पर इकट्ठा होकर ब्याज समेत आ गया। उसके बाद से बहुजन ठेकेदारों को नोटिस पर नोटिस आ रहा है। किसी को 25 लाख सर्विस टैक्स बकाया है तो किसी का 30 लाख। संपत्ति के नाम पर किसी के पास एक बीघे खेत है तो किसी के पास डेढ़। अब सब सिर पकड़कर बैठे हैं कि कहां से चुकायें सर्विस टैक्स, जब कंपनी ने दिया ही नहीं तो।

पिछले कुछ वर्षों में इफको कंपनी ने नया नियम लागू किया है कि अब ठेकेदार मजदूरों को पेमेंट करके बिल बनाकर भेजेंगे तब उनके खाते में पैसा आयेगा। लेकिन बहुजन, अल्पसंख्यक ठेकेदारों के पास इतनी पूंजी नहीं है। तो मजबूरी में हर महीने मजदूरों का पेमेंट करने के लिए साहूकारों से मोटे ब्याज पर पैसा उठाना पड़ता है। हालांकि उनके पास 10-15 दिन में पैसा आ जाता है लेकिन साहूकार तो पूरे महीने का ब्याज लेता है। इस तरह पूंजी के स्तर पर संघर्ष करते बहुजन ठेकेदारों की जगह पूंजी सक्षम सवर्ण वर्ग के ठेकेदार आ गये हैं। वहीं सिविल का ठेका कंपनी स्थानीय सांसद और विधायक को देती है।

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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