महाराष्ट्र के दलित लेखकों से प्रेरणा लें बहुजन बुद्धिजीवी

एचएल दुसाध

2 290

ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग पर खास नजरिये से टिप्पणी करने के कारण 20 मई की रात गिरफ्तार हुए आंबेडकरनामा के एडिटर, इतिहास के प्रोफ़ेसर तथा भारत के अन्यतम श्रेष्ठ इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल के लेखन के शोधकर्ता प्रो. रतनलाल को अगले दिन मिली जमानत से बहुजन समाज सहित अभिव्यक्ति की आज़ादी के दीवानों ने डबल राहत की सांस ली है। प्रो. रतनलाल की जमानत के साथ कोर्ट ने जिस ग्राउंड पर उन्हें जमानत दी है, वह अभिव्यक्ति स्वाधीनता के लिए एक बेहतर दृष्टान्त साबित हो सकता है। यह सोचकर लोग डबल राहत की सांस लिए हैं।

मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक कोर्ट ने कहा है, ’अभियुक्त की पोस्ट एक विवादित विषय के सम्बन्ध में व्यंग का एक असफल प्रयास था, जिसका उल्टा असर हुआ है और ये एफ़आईआर हुई है… भारतीय सभ्यता दुनिया में सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है और सभी धर्मों के लिए सहिष्णु और सबको स्वीकार करने वाली मानी जाती है। शब्दों से नफ़रत फैलाने का इरादा था या नहीं, ये व्यक्तिगत दृष्टिकोण है क्योंकि ये पढ़ने वाले की व्यक्तिगत धारणा पर निर्भर करता है।’ इस प्रसंग में कोर्ट ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही है वह यह कि भारत 130 करोड़ से ज्यादा लोगों का देश है और किसी विषय पर 130 करोड़ अलग-अलग नजरिये और धारणाएं हो सकती हैं। किसी एक का आहत होना पूरे समूह या समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता और आहत होने सम्बन्धी शिकायतों को पूरे तथ्यों/ परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इनके सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए।’ बहरहाल, कोर्ट की उत्साहवर्द्धक टिप्पणी के साथ विभिन्न विचारधारा के बुद्धिजीवियों, छात्र- छात्राओं और संगठन से जुड़े लोगों ने एकजुट होकर जो लड़ाई लड़ी, उससे सरकार की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध संघर्षरत लोगों में एक बड़ा सकारात्मक सन्देश गया है। इस लिहाज से बहुजनवादी दलों को लेकर भारी निराशा हुई है। कारण, सभी इस पर चुप्पी साधे रहे, जिसे लेकर लोगों में भारी क्षोभ और निराशा पैदा हुई। शिवलिंग प्रकरण में प्रो. रतनलाल के परिवार को अपशब्द कहे गए और उन्हें जान से मरने की धमकी दी गयी। उन्हीं की तरह लखनऊ विश्विद्यालय के रविकांत चंदन को प्रताड़ित करने के मुकदमे में फंसाने का प्रयास हुआ, पर बहुजन नेता चुप्पी साधे रहे। इसे लेकर लोगों में भरी निराशा हुई, जिसका प्रतिबिम्बन प्रख्यात शिक्षाविद प्रो. कालीचरण स्नेही के इन शब्दों में हुआ है।

यह भी पढ़ें…

राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए क्यों बाध्य हुआ बहुजन डाइवर्सिटी मिशन!

प्रो. रतनलाल की जमानत के अगले दिन प्रो. स्नेही ने बहुत ही आहत मन से फेसबुक यह पोस्ट डालकर बहुजनों की निराशा को स्वर दिया। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा, ’हमारे बहुजन नेताओं ने बहुत निराश किया है। अन्याय जोर- जुल्म के खिलाफ उनकी कोई आवाज ही नहीं सुनाई दे रही है। क्या यह सबके सब वाकई अस्तित्वहीन हो चुके हैं! ऐसा तो किसी ने नहीं सोचा था। सत्ताधीशों ने भी नहीं। घोर आश्चर्य!’ उनके उस पोस्ट पर लोगों की राय चौंकाने वाली रही। लखनऊ के तुकाराम वर्मा का कमेन्ट रहा, ’वो लोग सिर्फ विद्वानों का उपयोग करना जानते हैं, विद्वानों ने अथक और असह्य परिश्रम से एक वातावरण तैयार किया था, जिसका राजनैतिक लाभ उन्होंने भरपूर उठाया और उन्होंने अपने उस दौर में विद्वानों को दरकिनार कर दिया जब हमारे विद्वान मुसीबत में हैं।’ चर्चित एक्टिविस्ट एसआर दारापुरी का कमेन्ट था, ’उन्हें केवल नोट और वोट चाहिए। जनता के दुःख-दर्द से उन्हें कुछ नहीं लेना है।’ एसएन सिंह ने कमेन्ट किया है, ’मनुवादी सरकारों ने सत्ता और कुर्सी की लालच देकर बहुजन समाज के स्वार्थी लोगों को अपना सारथी बना लिया है। बहुजनों के ऐसे स्वार्थी लोग पद व पैसे के लालच में अंधे हो गए हैं, जो बहुजनों पर होने वाले अन्याय, अत्याचार, शोषण के खिलाफ आवाज नहीं उठाते। सही मायने में बहुजनों के असली दुश्मन यही लोग हैं। जो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं कर रहे हैं और मनुवादियों के तलवे चाटने में मस्त हैं।’ प्रो. स्नेही के पोस्ट पर बाकी लोगों की राय भी इससे बहुत भिन्न नहीं रही। प्रो. स्नेही ही भांति दलित लेखक संघ के संरक्षक हीरालाल राजस्थानी ने फेसबुक नेताओं पर आक्रोश व्यक्त करते 21 मई को अपने एक पोस्ट में यह लिखा था।’ हम यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आज किस तरह दलित नेता अपने निजी स्वार्थों के चलते बलात्कारियों के पक्ष और दंगाइयों के पक्ष में रैलियां निकालती सत्ता की ताल में ताल मिला कर चुप्पी साधे हुए हैं और हमें इस संघर्ष में जूझने के लिए अकेला छोड़ दिया है। कहां है वे पूनापेक्ट समझौते के आरक्षण से संसद में पहुंचे हुए 131 सांसद? ऐसे में सत्ता और प्रशासन अपने मनमाने ढंग से दलितों को हांक रही है।’

प्रो. कालीचरण स्नेही को नेताओं को लेकर जो बात 22 तारीख को अखरी थी, उसका उत्तर मशहूर लेखक डॉ. सिद्धार्थ रामू ने 21 मई को दे दिया था, जब प्रोफ़ेसर रतनलाल की रिहाई के लिए बहुजनों के साथ वाम बुद्धिजीवी और संगठन भी आवाज़ बुलंद कर रहे थे। उन्होंने यह सवाल उठाते हुए चार  कारण बताये थे, ’दलित-बहुजन बुद्धिजीवियों को निशाना बनाने की हिम्मत कहां से आरएसएस-भाजपा के हाथ में आई?’ उन्होंने लिखा था, ’कुछ वर्ष पहले यह कल्पना करना मुश्किल था कि हिंदू धर्म की आलोचना करने या उसे खारिज करने वाले दलितों-बहुजनों पर आरएसएस-भाजपा हाथ डाल सकते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसके निम्न कारण हैं- 1- हिंदू पट्टी की दलित-बहुजन पार्टियों ने वर्ण-जाति व्यवस्था के पोषक हिंदू धर्म की आलोचना करना और उसे खारिज करना छोड़ दिया है, विशेषकर बसपा ने। सपा और राजद ने हिंदू धर्म को खारिज करने की बहुजन वैचारिकी को कभी अपनाया ही नहीं। दलित-बहुजन वैचारिकी हिंदू धर्म (ब्राह्मणवाद) को खारिज करने की वैचारिकी रही है, क्योंकि वर्ण-जाति व्यवस्था विरोधी संघर्ष हिंदू धर्म को खारिज किए बिना चलाया ही नहीं जा सकता। फुले से कांशीराम तक यह परंपरा कायम रही है; 2- दलित-बहुजनों का प्रतिनिधित्व करने वाली कई सारी पार्टियां भाजपा के साथ हैं, जैसे जनता दल (यूनाइटेड), जीतनराम मांझी की पार्टी, अपना दल (अनुप्रिया पटेल) और निषाद पार्टी आदि। ये आरएसएस को ताकतवर बनाते हैं; 3- पिछड़े-दलित नेताओं को ही मोहरा बनाकर आरएसएस हिंदू धर्म विरोधी बहुजन वैचारिकी की विरासत पर हमला बोल रहा है।’

अगोरा प्रकाशन की किताबें किन्डल पर भी..

डॉ. सिद्धार्थ रामू के पोस्ट पर सुप्रसिद्ध विचारक नरेंद्र तोमर का कमेन्ट रहा, ’अगर दलित बहुजन आन्दोलन में ताकत होती और अपनी निहित स्वार्थ की खातिर ब्राह्मणवादी राजनीति के हाथों बिक न चुके होते तो यह नौबत नहीं आती।’ अलखदेव प्रसाद अचल की राय थी, जब सत्ता स्वार्थ में बहुजन नेता उनके हाथ मजबूत करने में लगे रहेंगे, तो उन्हें ताकत मिलेगी ही।’ महेश जायसवाल का कमेन्ट रहा, ’दलित-बहुजन राजनीति में ईमानदार-समझदार-साहसी नेताओं का बहुत आभाव है। भ्रष्ट और कैरियरिस्ट नेतृत्व भरोसे के काबिल ही नहीं है।’ प्रो. स्नेही, डॉ. सिद्धार्थ रामू की तरह ही प्रो. रतनलाल की गिरफ्तारी प्रसंग में नेताओं की भूमिका को लेकर सवाल खड़े किये हैं और इन पर शताधिक कमेन्ट आये हैं, किन्तु किसी भी कमेन्ट में नेताओं के पक्ष में सकारात्मक बात नहीं कही गयी है। बहुजन नेता समाज को पूरी तरह निराश कर चुके हैं, इसमें कोई शक नहीं कि बहुजनवादी दलों के छोटे से बड़े नेता सामाजिक न्याय की राजनीति से दूर हो चुके हैं। सामाजिक न्याय से पूरी तरह दूरी बनाकर उन्होंने एक तरह से भाजपा को वॉक ओवर दे दिया है, जिसका फायदा उठाकर भाजपा शक्ति के स्रोतों पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग का एकाधिकार कायम करने और बहुजनों को पूरी ताराग गुलामों की स्थिति में पहुँचाने में समर्थ हो गयी है। उसने बहुजन नेताओं को राजनीति का निज हित में सदुपयोग करने की तो पूरी छुट दे दी हैं, किन्तु बहुजनों के हित में कहने-सुनने लायक नहीं छोड़ा है। इसलिए बहुजन नेता अपनी जुबान पर ताला जड़कर निज-हित में पॉवर का इस्तेमाल करने में व्यस्त हैं। बहरहाल, बहुजन नेताओं के विषय में आम से लेकर खास बुद्धिजीवियों की राय बताती है कि वे समाज के लिए अपनी उपयोगिता खो चुके हैं। ऐसे में इसे बहुजनों की एक बड़ी समस्या मानते हुए, इसके समाधान का उपाय सोचना जरुरी हो जाता है।

अगोरा प्रकाशन की किताबें किन्डल पर भी..

जहाँ तक समाधान का सवाल है हर बात बहुजन आन्दोलन को राह दिखने वाले फुले-आंबेडकर की धरती महाराष्ट्र ने इस मामले में भी उज्जवल दृष्टांत स्थापित किया है। 1970 के दशक में डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित आरपीआई के नेता साठ के दशक में प्रत्याशा में जगाकर सत्तर के दशक में दलितों के प्रति अपने कर्तव्य से पूरी तरह विमुख हो गए थे। वे दलितों पर होने वाले शोषण-जुल्म पर चुप्पी साधने के साथ निज हित में सौदेबाजी पर उतारू हो गए थे। ऐसे में समाज पर शासक जातियों के बढ़ते शोषण- अत्याचार ने वहां के दलित लेखकों: नामदेव ढसाल, राजा ढाले, जेवी पंवार, अर्जुन डांगले इत्यादि को गहराई से उद्वेलित किया और वे आरपीआई नेतृत्व के विकल्प के तौर पर दलित पैंथर बनाने के लिए आगे बढ़े। यह सही है कि दलित पैंथर संगठन अपने उत्कर्ष पर नहीं पहुँच सका, तथापि इसकी उपलब्धियां गर्व करने लायक रहीं। बकौल चर्चित मराठी दलित चिन्तक डॉ. आनंद तेलतुम्बडे, इसने देश में स्थापित व्यवस्था की बुनियादों को हिलाकर रख दिया और संक्षेप में यह दर्शाया कि सताए हुए आदमी का आक्रोश क्या हो सकता है। इसने दलित राजनीति को एक मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान की जोकि पहले बुरी तरह छूटी हुई थी। अपने घोषणापत्र पर अमल करते हुए दलित पैंथरों ने दलित आन्दोलन के लिए राजनैतिक मुकाम की खातिर परिवर्तनकामी अर्थों में नई जमीन तोड़ी। उन्होंने दलितों को सर्वहारा के परिवर्तनकामी वेग की पहचान प्रदान की और उनके संघर्षों को पूरी दुनिया के अन्य दमित लोगों के संघर्षों से जोड़ दिया।’

जानकर लोगों का मानना है कि दलित पैंथर की स्थापना आरपीआई के नेताओं के सौदेबाज़ी के खिलाफ एक विद्रोह के रूप में सामने आई। नामदेव ढसाल-राजा ढाले-जेवी पंवार ने जिन हालातों में दलित पैंथर की स्थापना की आज हालात उससे बहुत ही बदतर हैं। तह देश अपनी आज़ादी की महज सिल्वर जुबली मनाया था। देश के कर्णधारों से काफी उम्मीदें बची थीं। लेकिन आज का शासक वर्ग दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित लोगों को लगभग विशुद्ध गुलामों की स्थिति में पहुँच दिया है और इन समाजों के नाता आरपीआई वालों से भी कही ज्यादा सौदेबाज़ी पर उतर आये हैं। ऐसे में वर्तमान बहुजन लेखक-एक्टिविस्टों का अत्याज्य कर्तव्य बनता है कि वे ढसाल-ढाले-पंवार इत्यादि से प्रेरणा गुलाम में तब्दील होने जा रहे बहुजन समाज के हित में दलित पैंथर जैसा कोई विकल्प देने के लिए सामने आयें। शासक दलों की स्वार्थपरक नीतियों के कारण वर्तमान भारत में सापेक्षिक वंचना (रिलेटिव डिप्राईवेशन) की जो स्थिति पैदा हुई है, बहुजनों में फुले-आंबेडकर-पेरियार के विचारों से जो  जागरूकता आई है, उसमें बेहतर विकल्प देना खूब कठिन नहीं होगा।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

 

Leave A Reply

Your email address will not be published.