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सियासत के खूबसूरत नजारे डायरी (7 अगस्त, 2021)

साइंस का अध्ययन मनुष्य को आडंबरों से दूर करता है। दरअसल, मनुष्य मनुष्य ही इस कारण है क्योंकि उसके अंदर वैज्ञानिकता होती है। यदि यह वैज्ञानिकता नहीं होती तो मनुष्य आज भी आदिम मानवों के जैसे रह रहा होता। शिकार कर खाता और जैसे-तैसे अपना जीवन व्यतीत करता। लेकिन मनुष्य ने जीवन को आसान बनाने […]

साइंस का अध्ययन मनुष्य को आडंबरों से दूर करता है। दरअसल, मनुष्य मनुष्य ही इस कारण है क्योंकि उसके अंदर वैज्ञानिकता होती है। यदि यह वैज्ञानिकता नहीं होती तो मनुष्य आज भी आदिम मानवों के जैसे रह रहा होता। शिकार कर खाता और जैसे-तैसे अपना जीवन व्यतीत करता। लेकिन मनुष्य ने जीवन को आसान बनाने के रास्ते ईजाद किये। फिर चाहे वह पत्थरों के औजार हों या फिर कृषि व चक्के का आविष्कार। मनुष्यों ने हमेशा वैज्ञानिक प्रयास किया है। मानव सभ्यता के इतिहास को पढ़ें तो यह बात एकदम साफ हो जाती है। किसी ईश्वर ने मनुष्यों की मदद नहीं की। अलबत्ता हुआ यह है कि मनुष्यों ने ईश्वर को गढ़ा और सर्वशक्तिमान माना। निस्संदेह इसके पीछे वर्चस्ववादी सियासत रही, लेकिन वर्चस्व बनाने या फिर बनाए रखने का तरीका मनुष्यों ने वैज्ञानिक चेतना के कारण ही खोजा।

मानव सभ्यता के विकास में ऊर्जा का खास महत्व रहा है। विज्ञान में ऊर्जा को लेकर एक सिद्धांत भी है, जिसे ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत कहते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि ऊर्जा का क्षय नहीं होता। उसका स्वरूप बदलता रहता है। मनुष्यों के जीवन में भी यह बात शत-प्रतिशत लागू होती है। यहां तक कि राजनीति में भी। एक उदाहरण है त्रिवेणी संघ का। वह 1930 का दशक था जब बिहार के शाहाबाद और मगध के इलाके में एक आंदोलन की शुरूआत हुई। इसके संस्थापक रहे सरदार जगदेव सिंह यादव, शिवपूजन सिंह और जदुनंदन प्रसाद मेहता। वंचित समाज की ओर से अपने हक-हुकूक के लिए आवाज उठाने वाला त्रिवेणी संघ बिहार का पहला संगठन था। हालांकि कहानी इसके बहुत पहले शुरू होती है। आजीवकों के दौर को पढ़ें तो यह साफ होता है कि सत्ता और संसाधनों में हिस्सेदारी से लेकर बौद्धिक हस्तक्षेप तक श्रमजीवी समाज के द्वारा तभी शुरू हो गया था। बुद्ध और महावीर ने इस चेतना को ब्राह्मणों व आर्यों की चेतना के समानांतर खड़ा कर दिया। ईश्सर का जो ढांचा आर्यों ने खड़ा किया था, उसे ढाह दिया गया था।

मानव सभ्यता के विकास में उठापटक की भी अहम भूमिका रही है। फिर यह भी कि यह सब इतना आसान नहीं होता। मैं तो सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में सोचता हूं कि वह इतनी अल्पायु कैसे रह गयी? सिंधु सभ्यता (3300-1750 ईसा पूर्व) अपने समय की सबसे उन्नत और विकासमान सभ्यता थी। उसकी अपनी लिपि थी, जो अभी तक अपठनीय बनी हुई है। पुरातत्वेत्ताओं के अनुसार सिंधुवासी ज्योतिष, सामान्य गणित, समय-गणना और औषधियों की जानकारी रखते थे। इस ज्ञान का पीढ़ी-दर-पीढ़ी अंतरण, बिना शिक्षा-प्रणाली के संभव नहीं था। लिपि का होना भी उस सभ्यता में शिक्षा तंत्र की मौजूदगी की उम्मीद जगाता है। मेसिमो विडाले, जोनाथन मार्क किनोयर, आस्को परपोला, अर्नेस्ट मैके जैसे अनेक विद्वानों का मानना है कि हड़प्पावासी शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ चुके थे।

मैं इस सवाल को फिलहाल यही छोड़ता हूं कि सिंधु घाटी सभ्यता का अंत अचानक कैसे हुआ। मैं तो उन बातों को दर्ज करना चाहता हूं, जिसके कारण आज भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग सत्ता के केंद्र में है।

[bs-quote quote=”मनुष्यों ने हमेशा वैज्ञानिक प्रयास किया है। मानव सभ्यता के इतिहास को पढ़ें तो यह बात एकदम साफ हो जाती है। किसी ईश्वर ने मनुष्यों की मदद नहीं की। अलबत्ता हुआ यह है कि मनुष्यों ने ईश्वर को गढ़ा और सर्वशक्तिमान माना। निस्संदेह इसके पीछे वर्चस्ववादी सियासत रही, लेकिन वर्चस्व बनाने या फिर बनाए रखने का तरीका मनुष्यों ने वैज्ञानिक चेतना के कारण ही खोजा।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

तो सिंधु घाटी सभ्यता के खात्मे के बाद हुआ यह होगा कि बाहर से आए आर्यों ने हर तरह का तिकड़म कर भारत में अपना वर्चस्व बनाया। वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अपने धर्म की स्थापना की। धर्म को स्थापित करने के लिए ग्रंथों की रचना की। जाति और वर्ण व्यवस्था को समाज में स्थापित किया और खुद परजीवी बनकर सत्ता के शीर्ष पर रहे आर्यों ने एकछत्र राज कायम किया। आजीवकों ने उनके एकछत्र राज को चुनौती दी और सबसे पहला वार धर्म संबंधी अवधारणा पर किया।

बाद के समय में वर्चस्व को लेकर टकराहटों का दौर चलता रहा। मध्यकालीन भारत में कबीर एक अहम चुनौती देते दिखायी देते हैं। मैं तो उन्हें बुद्ध और महावीर के बाद आजीवक ही मानता हूं। फिर जैसे ऊर्जा कभी क्षय नहीं होती, अपना स्वरूप बदलती रहती है, समतामूलक समाज संबंधी वैज्ञानिक चेतना अलग-अलग तरीके से हस्तांतरित होती रही है। इस क्रम में जोतीराव फुले (11 अप्रैल, 1827 – 28 नवंबर, 1890) के आंदोलन को भी याद किया जाना चाहिए। उनके बाद छत्रपति शाहूजी महाराज और डॉ. आंबेडकर बदलाव के सारथी बने।

त्रिवेणी संघ भी उसी ऊर्जा का एक स्वरूप था, जिसका स्रोत आजीवक थे। हालांकि यह आंदोलन बहुत ही कम दिनों तक चला ओर 1940 तक आते-आते अदृश्य हो गया। परंतु, इसके कारण जो आग उत्तर भारत में जलने लगी थी, वह उत्तरोत्तर विस्तृत होती गयी। फिर बाद के इतिहास से हम सभी वाकिफ हैं कि कैसे लोहिया ने कांग्रेस के आर्यवाद को चुनौती दी और पिछड़ों के आंदोलन को आगे बढ़ाया। फिर जैसे ओलंपिक में रिले दौर होता है, जिसमें एक खिलाड़ी एक निश्चित दूरी तय करने के बाद बेटन अगले खिलाड़ी को दे देता है, वैसे ही यह सब चलता रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो ऊर्जा कायम रहती है और उसके स्वरूप बदलते रहते हैं। आज हालत यह है कि इस देश के ब्राह्मण खामोश कर दिए गए हैं। उन्हें नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर का झुनझुना थमा दिया है। जैसे बच्चे झुनझुना बजाते हैं और उसे चाटते भी हैं, वैसे ही इस देश के ब्राह्मण राम मंदिर का झुनझुना बजा रहे हैं और उसे चाट भी रहे हैं।

असल में सियासत के दायरे में कोई एक समाज नहीं होता। अलबत्ता कई समाजों को साथ लेकर ही सियासत की जा सकती है। कम से कम भारत जैसे विविधता वाले देश में तो यही फार्मूला काम करता है।

बात कल की है। कल दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटी हैं। एक तो यह कि भारतीय महिला हॉकी टीम तोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने में नाकाम रही और दूसरी घटना यह कि नरेंद्र मोदी ने राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड का नाम बदलकर मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवार्ड कर दिया। जाति के हिसाब से देखें तो एक ब्राह्मण के नाम के बदले पिछड़ा वर्ग के एक व्यक्ति के नाम। दिलचस्प यह कि ब्राह्मण ताली बजाने को मजबूर हैं। यह बात बहुत छोटी नहीं है। हालाकि मेजर ध्यानचंद का मान-सम्मान पहले भी बहुत हुआ है। मसलन, 1956 में ध्यानचंद 51 वर्ष की आयु में मेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए। उसी वर्ष उन्हें प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से नवाज़ा गया। प्रत्येक वर्ष उनके जन्मदिवस को राष्ट्रीय खेल दिवस के रुप में मनाया जाता है और इसी दिन राष्ट्रपति द्वारा खेलों के क्षेत्र में विशिष्ट उपलब्धि के लिए दिए जाने वाले पुरस्कार दिए जाते हैं। इन पुरस्कारों में अर्जुन अवार्ड और द्रोणाचार्य अवार्ड भी शामिल है। वहीं भारत में खेलों के क्षेत्र में दिया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण ‘लाइफ़ टाइम अचीवमेंट’ पुरस्कार का नाम ‘ध्यानचंद पुरस्कार’ है जिसकी शुरुआत 2002 में हुई थी। इसी वर्ष उनके सम्मान में दिल्ली स्थित नेशनल स्टेडियम का नाम मेजर ध्यानचंद नेशनल स्टेडियम रखा गया। यहां तक कि भारतीय जिमखाना क्लब, लंदन के एस्ट्रो-टर्फ हॉकी पिच का नाम भी ध्यानचंद के नाम पर ही रखा गया है।

[bs-quote quote=”डीएमके पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कमाल ही कर दिया है। वे ब्राह्मणों से उनकी पहचान छीन रहे हैं। सोचकर देखिए तो कितना खूबसूरत नजारा है। दरअसल, स्टालिन ने अपने पाठ्य पुस्तकों में विभिन्न महापुरुषों के नामों से उनकी जाति हटाने का निर्देश दिया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर अमल करते हुए तमिलनाडु टेक्स्ट बुक कारपोरेशन ने यू वी स्वामीनाथ अय्यर जैसे अनेक विद्वानों के नाम से जाति सूचक सरनेम को हटा दिया है” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

तो ऐसे में यह बात मुझ जैसे व्यक्ति के लिए बहुत मामूली है कि राजीव गांधी के बदले अब मेजर ध्यानचंद के नाम पर खिलाड़ियों को सम्मानित किया जाएगा। वजह यह कि जिस दिन यह सम्मान दिया जाता है और जिसे पूरा देश खेल दिवस के रूप में याद करता है, वह मेजर ध्यानचंद का जन्मदिवस (29 अगस्त, 1905) है।

मैं तो यह देखकर खुश हो रहा हूं कि भारतीय महिला हॉकी टीम में दलित-बहुजन खिलाड़ियों की हिस्सेदारी साठ फीसदी के करीब है। जरा सोचिए कि क्या ऐसा पहले संभव था? आज भी भारतीय क्रिकेट टीम (पुरुष) में 80 फीसदी सवर्ण हैं।

खेलों की बात छोड़ते हैं, राजनीति की बात करते हैं। बिहार में सवर्ण सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की फिलहाल कल्पना तक नहीं कर सकते। यहां तक कि ब्राह्मणों की पार्टी में भी ब्राहमण दोयम दर्जे के रह गए हैं। नरेंद्र मोदी और अमित शाह का वर्चस्व इतना है कि किसी भी सवर्ण को लात मारकर अंदर-बाहर कर रहे हैं। यह सब पहले संभव ही नहीं था।

इसका एक उदाहरण दक्षिण के राज्य तमिलनाडु में भी देखिए। वहां तो डीएमके पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कमाल ही कर दिया है। वे ब्राह्मणों से उनकी पहचान छीन रहे हैं। सोचकर देखिए तो कितना खूबसूरत नजारा है। दरअसल, स्टालिन ने अपने पाठ्य पुस्तकों में विभिन्न महापुरुषों के नामों से उनकी जाति हटाने का निर्देश दिया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर अमल करते हुए तमिलनाडु टेक्स्ट बुक कारपोरेशन ने यू वी स्वामीनाथ अय्यर जैसे अनेक विद्वानों के नाम से जाति सूचक सरनेम को हटा दिया है। बताते चलें कि यू वी स्वामीनाथ अय्यर को तमिल थाथा भी कहा जाता है जिसका मतलब तमिल का सबसे महान पुरखा है। बारहवीं कक्षा के पाठ्य पुस्तक में स्वामीनाथ अय्यर पर केंद्रित एक अध्याय है, जिसमें उनके नाम के साथ अय्यर शब्द जुड़ा था। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद अब उनके नाम से अय्यर शब्द हटा दिया गया है। हालांकि नामों से जाति सूचक शब्द हटाने का फैसला हालांकि बहुत पहले ही किया गया था। वर्ष 1978 में द्रविड़ कषगम की वर्षगांठ के मौके पर इसके संस्थापक पेरियार ई.वी. रामासामी की मौजूदगी में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम जी रामचंद्रन ने घोषणा की थी कि उनकी सरकार सड़कों के नामों में जाति सूचक शब्दों को हटाएगी। इस संबंध में उसी वर्ष एक आदेश राज्य सरकार द्वारा जारी किया गया था।

तो मैं तो यह मानता हूं कि सियासत होती ही इसलिए है कि सियासत की जाय। दलित और पिछड़ा वर्ग अपनी सियासत को और तेज करे। ये वर्ग और खूबसूरत नजारे हमारे सामने लाएं, जिसके केंद्र में समतामूलक समाज है।

कल भारतीय महिला हॉकी टीम में शामिल दलित-बहुजन खिलाड़ियों को ध्यान में रख कुछ सोच रहा था। एक कविता जेहन में आयी –

दलित-बहुजन बेटियों
मैं तुम्हें बेटियां ही कहूंगा
बेटा कहना
तुम्हारी तौहीन करना होगा
बस तुम डटी रहना
अपनी हॉकी स्टिक के साथ
और करना प्रहार जब
राम के नाम पर
मनु की बेलगाम औलादें
तुमसे तुम्हारी
आजादी छीनने का प्रयास करें
याद रखो
यह हॉकी स्टिक तुम्हारी है
तुम्हारी आंखों में जो हौसला है
वह तुम्हारा अपना है
हर हार तुम्हारी है
हर जीत तुम्हारी है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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