कबीर की तरह बेलाग थे भिखारी ठाकुर

दीपक शर्मा

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लोककलाकार भिखारी ठाकुर की जयंती पर
जजमनिका के नाउ नाव
नव मास के त्रास, छोड़ावत नाई, नहरनी से काट महावर लावत।
तादिन के सूधि याद करs, मड़वा बीच सादी में सिख बनावत।
पित्र परेत दुनों जन के जब होत सराध त, बत्ती जलावत।
कहे नाई भिखारी दया करs, भाई सो, नाई कके बा काहे अजमावत।
नाई भाई यह पत्र पढ़s,  अति प्रेम होत उपजावत है।
ई जाति के उन्नति सुसान्ती से होई, धरम धीरज जनावत है।
सूची, वेद, पुरान, कथा, इतिहास के साइनबोट लखावत है।
घर तीरथ माही पताका लिए कर, विश्व बिमोद बढ़ावत है।
भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले आमजन के चितेरे कवि भिखारी ठाकुर का जन्म नाई परिवार में हुआ था। उनके पिता दलसिंगार ठाकुर हजाम का काम करते थे इसलिए जजमानी उनकी पैतृक पेशा थी। पिता के बाद भिखारी ठाकुर को भी काफी दिनों तक जजमानी करनी पड़ी थी। वे भी अपने पिता की भाँति लोगों का हजामत करते, शादी- विवाह, मरनी-करनी एवं अन्य कार-परोजन में चिट्ठी नेवतते  तथा जजमान की सेवा करते थे। नाई जाति भारतीय वर्ण व्यवस्था के अनुसार शूद्र समाज में आता है। इसलिए शुद्र होने के कारण कोई उन्हें अपने दुआर पर पानी तक नहीं पूछता था। भिखारी ठाकुर के जीवन की अपनी विडंबना थी, समाज के व्यवहारिक एवं सैद्धांतिक पक्ष को वे अच्छी तरह जानते थे इसलिए उनकी कविताओं में उनके समाज और जीवन का यथार्थ चित्रण दिखाई देता है। अपने जीवन के इन्हीं अनुभवों से वे नाई बहार जैसा कालजयी रचना करने में समर्थ हुए। इस तरह की कविता समाज की पीड़ा झेले बिना नहीं लिखी जा सकती थी। नाई बहार में वे लिखते हैं –
                                                   भाई नाई कइसे कहीं, आवत नईखे बात ।
                                            जजमानिका हित सहली बहुत, शीत, धूप, बरसात।।
 जजमनिका में नाई को एक पैर पर खड़े होकर वर्ष भर जजमान की सेवा करनी पड़ती है लेकिन उनके परिश्रम के एवज में उन्हें पारिश्रमिक कभी नहीं मिल पाता। गेहूं तिलहन रेड़ी तोरी जैसे महंगे अन्न नाई के लिए नहीं होता था। मटर ,चना, खेसारी जैसा सबसे सस्ता, सबसे हल्का और सबसे  खराब वाला अन्न ही उनके हिस्से में आता था-
                                       लेजा जवन होत सहता अन्न। एही में बंगला काट फैशन।।
जजमनिका में नाई के लिए मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक के कर्मकांड में अनेक कार्य निर्धारित किये गये हैं। बच्चे के जन्म लेने के बाद रूढ़िवादी समाज के लोग जच्चा बच्चा को अछूत और अपवित्र मानते हैं। नाइन को नहरनी से नाखून काट कर, महावर लगाकर, सउर लिप कर,  तथा नाई को छौर कर्म के द्वारा सारे छुत और पाप को अपने सिर लेना पड़ता है। इस कार्य हेतु पुत्र जन्म लेता है तो चार आना और पुत्री जन्म लेती है तो दो आना मिलता है। भिखारी ठाकुर लिखते हैं-
                                               जमाते सउरी में सुध कइलन। नव मास के पातक खइलन
                                                 चारे आना में भागल छुत। खेदलन खुद नाऊ के पुत।
                                                    दू आना बबुई का भइले। तुरते छूत लुप्त हो गइले।
जब बच्चे की जन्म कुंडली बनवाने हो तो लोग भागकर ब्राह्मण के पास जाते हैं जहां नाई को दो आना चार आना देने में लोग आनाकानी करते हैं वही ब्राह्मण के लिए बाइस रुपया खुशी-खुशी निकाल के दे देते हैं-
                                               जन्मकुंडली के बनवाई। बाइस रुपया भईल मोलाई।
हर शुभ अशुभ कार्य जैसे शादी ब्याह, गृह प्रवेश, कथा, हवन, मरनी करनी आदि में नाई और ब्राह्मण दोनों लोग शामिल होते हैं। नाई ब्राह्मण की अपेक्षा कई गुना अधिक कार्य करता है और हर कार्य का वह अगुआ होता है किंतु नाई के परिश्रम का कोई मोल नहीं देता है, न ही उन्हें जजमान के द्वारा अपेक्षित सम्मान मिलता है। वही ब्राह्मण के क्षणिक कार्य के लिए इज्जत, मान-सम्मान और मोटा दाम मिलता है। जब नाई बच्चे और जननी का छुतिका अपने सिर लेकर उन्हें अछूत बनाता है तब ब्राह्मण उसकी जन्म कुंडली बनाता है। जब नाई मुंडन करता है तो ब्राह्मण जनेऊ धारण कराता है, नाई पूजा यज्ञ हवन के लिए चौक पूरकर, आम का टल्लो, लकड़ी, कलश, दूध दही के साथ गौरी गणेश की स्थापना करता है तब ब्राह्मण वेदी पर बैठकर हवन करता है। रही बात पैसे की तो नाई को इतना परिश्रम करने के बावजूद खाली हाथ जाना पड़ता है जबकि ब्राम्हण कुछ ही समय में मंत्र पढ़कर अपनी जेब आसानी से भर लेता है भिखारी ठाकुर लिखते हैं-
                                  नइखीं बिप्र क निन्दा करत। हक बिनु नाऊ बाड़न मरत।।
                              लिपल पर केहू हवन हवन करावल। दाम लेत केहू असहीं धावल।।
                                    छौर कर्म के घर बनवाव। भीतरे बइठल माथ कमावs।।
शादी विवाह, तिलक, बरच्छा में जजमान की इज्जत संभालने में नाई का सबसे अधिक योगदान रहता है। कोहवर से लेकर जनवासे तक की सारी जिम्मेदारी नाई और नाइन के सिर होती है। जरा-सी चूक हो जाने पर जजमान नाई को ही कोसता है और गालियाँ देता हैं। किंतु ब्राह्मण मंत्र गलत पढ़े तो भी लोग उसे पवित्र मन से स्वीकार करते हैं। दौड़ते-धूपते नाई के पाँव में छाले तक पड़ जाते हैं किंतु काम है कि खत्म ही नहीं होते। छोटे-छोटे कार परोजन के लिए गाँव, पूरा, टोला, मोहल्ला को बुलावा देने एवं दूर-दूर तक चिट्टियां और न्योता बांटने का काम नाई के जिम्मे होता है। अगर इनमें कोई छूट जाता है या कोई चूक हो जाता है तो जजमान उसे मारने पीटने की धमकी दे डालता है। भिखारी ठाकुर अपने जीवन में इस तरह कै यथार्थ को भोगा था। वे कार परोजन में खुद चिट्ठी नेवतते थे, जजमान के घर हजामत करते थे। रेल की यात्रा होने पर भी उन्हें टिकट का पैसा या भाड़ा नहीं दिया जाता था। केवल सेर भर कच्चा सतुआ और नुन से उन्हें कोसों पैदल ही जाना पड़ता था। छः महीने में एक बार मजूरी मिलती थी। उतने में वे अपने लिए छाता-जूता तक नहीं खरीद सकते थे, घर बनवाने की तो बात ही दूर। सब काम समय से निबटाना पड़ता था। फिर अगले दिन जल्दी चले आने की हिदायत दे दी जाती थी।

ई जाति भारतीय वर्ण व्यवस्था के अनुसार शूद्र समाज में आता है। इसलिए शुद्र होने के कारण कोई उन्हें अपने दुआर पर पानी तक नहीं पूछता था। भिखारी ठाकुर के जीवन की अपनी विडंबना थी, समाज के व्यवहारिक एवं सैद्धांतिक पक्ष को वे अच्छी तरह जानते थे इसलिए उनकी कविताओं में उनके समाज और जीवन का यथार्थ चित्रण दिखाई देता है। अपने जीवन के इन्हीं अनुभवों से वे नाई बहार जैसा कालजयी रचना करने में समर्थ हुए।

                                               जूरत नइखे छाता जूता। कइसे चिठी नेवतिहन पूता।।
                                               कच्चा सेर भर सतुआ नून। बेसी ना पइबsएको जून।।
                                               एतने पइवा जइबा जरूर। ना करबs त मार के चूर।।
 जिस दिन तिलक या दुआरे बारात आती है नाई नाइन के सिर सबसे अधिक आफत रहता है। मिट्टी का बर्तन और कलश नहीं आया तो नाई लेकर आये, पत्तल घट जाए तो नाई को दौड़ाओ,  बरई नहीं आया तो उसको लेने के लिए नाई को भेजो, माली समय से फूल नहीं पहुंचाया तो इसमें भी नाई की ही चूक कहीं जाती है, नाई दही, अच्छत, रोली, रक्षा, कपूर, अगरबत्ती पान, मीठा, दीया, सलाई, लकड़ी, कुश, धूप, दशांग  यानि पूजा की सारी सामग्री सजाकर पंडित जी के सामने समय से रख दिया तथा चौक लिप-पूर के गौरी, गणेश की स्थापना कर दिया इसके बाद भी नाई को फुरसत नहीं।
                             कटिया खातिर गइलन धावल। तेकर हक कोहार लोग पावल।।
                            पत्तल घटलs धावल जइहा। बारी ना होखस त लेले अइहा।।
                   माली ना लेके अइलन फूल। एह में बा नाऊ के भूल।।
                         देरी भईल ना आईल ढोल। ठाकुर तू हउआ बकलोल।।
                                    दही, अच्छत, मीठा धइलs। गउरी, गणेश के स्थापना कइलs।।
                     दिहs बोलाहट नगर भर। छुटे ना पावे एको घर।।
                             देखिहा विहने रोकिहs मत। नेवता के लिखात बा खत।।
कम आयु में मृत्यु हो जाने पर ब्राम्हण जजमान के घर अपनी भागीदारी से इंकार कर देता है यह कहते हुए कि इसमें ब्राह्मण का क्या काम है? वह सलाह देता है कि नाई से नाखून कटा लो, महावर लगवा लो, छौर कर्म करवा लो, इनार झाँकों, तारा देखके भात खाओ! इससे सारी छुतिका दूर हो जाएगी। यहाँ वह दूर से ही सारी विधि -विधान बताता है। क्योंकि वह जानता है कि इसमें अधिक पैसा नहीं मिलने वाला इसलिए यह काम नाई के सर मढ़ देता है-
                                                       आधा छुतिका नाई पइहन। एही में पूरा मगन होई जइहन।।
वहीं जब जजमान के हाथों गौ हत्या हो जाता है तो उसे पाप बताकर ब्राह्मण हवन करा के जजमान से खूब पैसा ऐठ लेता है।
                                                 जवना दिन गऊ हत्या लागल। ऊ जजमान हो गइलन पागल।। 
                                                     धन के दाही गोत्र कहावस। से ना ओह घरी देह छुआवस।।
                                                     पुरोहित पातक लाके गइलन। गंगा सेवला पर ना खइलन।।
                                                       फरके से देखवलन भाव। पहिले जाके माथ कमाव।।
नोंह कटा लs करs स्नान। धर गौरी-गणेश के ध्यान।। हवन कराइव लागी दाम। सहज ना ह हत्या के काम।।
कहीं भी नाई के बिना काम नहीं होता। नाई जब तक मुंडन नहीं करता ब्राह्मण का कार्य आगे नहीं बढ़ पाता। फिर भी नाई को कोई महत्व नहीं दिया जाता-
                                                     नाऊ पहिले सफा काइलन। पागल बिप्र का लायक भइलन।।
माना यह जाता है कि सदा से ब्राह्मणों का काम ज्ञान देना रहा है पैसे से उन्हें विशेष मतलब नहीं रहता लेकिन ठीक उसके विपरित अब वे दाम फरमाने का काम अधिक करने लगे हैं लेकिन नाई दौड़ते -दौड़ते मर क्यों न जाये, उनकी चिंता किसी को नहीं होती, जजमान ब्राह्मण को दान-दक्षिणा दिए बिना द्वार से वह दा नहीं करते, नाई भले ही खाली हाथ क्यों न चला जाये।
                                                                जेकर सदा ज्ञान के काम। से केहूँ फुरमावत दाम।।
                                                            कबहूँ केहूँ ना तनिको पूछे। काहे नाउ जइहन छुछे।।
भिखारी ठाकुर ने नाई को जजमनिका का नाव और रेल कहा हैं। इनके बिना कर्मकांड का कोई अध्याय पूरा नहीं होता है। यह कार्य दूसरी जाति के लोग नहीं कर पाते हैं। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्हें अपने पेट के लिए ये सब करना पड़ता है। मरनी-करनी में उसके लिए हर दिन का कार्य निर्धारित  रहता है। जजमान का मुंडन किए बिना मुर्दा घाट तक नहीं जाता है,  हर दिन सतनहना का स्नान नाई ही कराता है, शाम को दीया जलाना का कार्य नाई के हाथों होता है, पिणडदान के दिन नाई के लिएहजामत सहित ढेरों काम होता है। तब जाकर जजमान का उद्धार होता है-
                                                       बाजत चमरूआ बाज चमउटी। एही विधि उतरल भार भखौटी।।
 जब किसी सेयान (उम्रदराज) की मृत्यु होती है तब ब्राह्मण जजमान को  पितर के सुख-शांति और उन्हें खुश करने  के लिए अनेक उपाय बताते हैं। गरुण पुराण का पाठ कराओ!  पुष्प, दीप, पंचमेवा चढ़ाओ! ब्राह्मण को वस्त्र, सोना, चाँदी आदि दान करो। जो भी चीज दान करोगे सीधे आपके पितर के यहाँ चला जायेगा और उन्हें कोई दुःख नहीं होगा। इस छलावे में आकर जजमान अपनी आर्थिक स्थिति का परवाह न करके समर्पित भाव से ब्राह्मण को सबकुछ दान करता है। भिखारी इस प्रपंच को समझ चुके थें-
                                                          पुरोहित का सौदा के ज्ञान। से खरीदत बाड़न जजमान।। 
पिण्डा पारने वाला ये सब नियम वेदों में तो नहीं है, ये नियम ब्राह्मणों ने अपने लाभ के लिए बनाकर उसमें पाप-पुण्य, थरम-करम, स्वर्ग- नर्क, छूत-अछूत सब विधि-विधान जोड़ दिया है ताकि उनका पेट भरता रहे, जजमान भले कंगाल हो जाये-
                                                             केहूँ कहत बा खोलs वेद। पिण्डा के देखलावs भेद।।
जो कुछ होता है ब्राम्हण को मिलता है नाई के लिए बहुत करते हैं तो पौने चार गज मरदानी, पनही, नाइन को पाँच गज जनानी और दो पैसा देकर अपना उपकार जता देते हैं।
                                                      जो कुछ होई सो ब्राह्मण पइहन। काहे न नाऊ असहीं धइहन।।
व्यक्ति के मृत्यु के दसवें दिन स्नान घाट पर नाई, महापात्र और ब्राह्मण तीनों होते हैं। नाई सुबह से लेकर गाँव, पूरा, टोला, मोहल्ला और उनके रिश्तेदारों का हजामत करता है, दान दक्षिणा देने के लिए महापात्र को बुलाया जाता है तथा पिणडदान एवं शुद्धिकरण के लिए ब्राह्मण को बुलाया जाता है। कुत्ते, कौए और गाय का हिस्सा तो बराबर लगाया जाता है किंतु नाई, महापात्र और ब्राह्मण के साथ तीन आँख किया जाता है। भिखारी ठाकुर इस चालबाजी को अच्छी तरह समझते थे, इसलिए बड़े बेबाक ढंग से लिखते हैं-
    कुत्ता, काग साथ में गाई। पावत भाग बरोबर भाई।।
ब्राह्मण, महापातर और नाई। जावत, पावत करत सफाई।।
महापातर के मिलल दस। एक रुपया में नाई बस।।
बारह रुपया पुरोहित लिहलन।  खुशी सहित दीनबंधु दीहलन।।
तात्पर्य कि जो दस दिन से लगातार जजमान के घर काम कर रहा है, उसे सिर्फ एक रुपया ही दिया जाता है। वही बिना कुछ करे धरे महापात्र को दस रुपया, मंत्र पढ़कर पिण्डदान कराने वाले पुरोहित को खुशी-खुशी बारह रचपये दे दिए जाते हैं। ऐसे में नाई के परिवार का भरण पोषण कैसे हो सकता है?
 इस प्रकार जजमानी में नाई के लिए बारहो महीने काम निर्धारित रहता है। जिसके चक्कर में वह अपने घर का काम तक नहीं कर पाता है। जजमनिका के पैसे से वह अपने घर के द्वार पर टाटी तक नहीं लगा पाता है तथा अपने घर के मरम्मत के लिए भी समय नहीं निकाल पाता है-
सावन भादो पानी बरषी, कब छवाई घर।
जजमनिका के कारण, छुट्टी नइखे घड़ी पहर।।
  इसलिए भिखारी ठाकुर जजमनिका से खिन्न हो जाते हैं, हम दिन-रात एक करके जिनके लिए एक पैर पर खड़े रहते है,  हर सुख-दुःख में जिनके सहभागी बनते हैं, हजामत करते हैं, चिट्ठी-पत्री नेवतते हैं, नाखुन काटते हैं, महावर लगाते हैं, देह की मालिश करते है, दुल्हा-दुल्हन संभालते हैं, पाहुर बाँटते हैं, यहाँ तक कि उनके कार-परोजन में जूठे पत्तल तक उठा लेते है, वह न हमारी इज्ज़त करता है न हमें सम्मान देता है और उसके दिये पैसे से न हम अपना खर्चा चला सकते हैं न ही परिवार को भरपेट भोजन खिला सकते हैं।  तब लिखते हैं-
जजमानिका में कुछ ना बाटे। लगबा सिलवट लोढ़ा चाटे।।
 भिखारी ठाकुर बहुत गरीब परिवार से थे। लोग भिखारी को भिखरिया कहते थे, सीधे मुँह कोई उनसे बात नहीं करता था और उनसे अपनी सेवा कराते थे। इस तरह नाई जाति से सब लोग रेरिया के ही बात करते हैं या नउआ-नउनिया कहते है। इसलिए उन्हें कहना पड़ता हैं-
सबका छवि के जे श्रृंगार करे। तेकरा के रेकार बेकार जनावत।।
सामान्यतः इस परिस्थिति में समाज के व्यवस्था से लड़ने का साहस लोग नहीं जुटा पाते हैं। वही भिखारी ठाकुर अपने भीतर की प्रतिभा को जगाते हैं। नकारात्मक और गुलामी वाले समाजिक व्यवस्था को नकारते हैं, दर्शकों, श्रोताओं, पाठकों और जनमानस के बीच बड़ा सम्मान हासिल करते है। उन्होंने अपने परिश्रम के बल पर न केवल अपने जजमानों को अपितु पूरे देश को अपने आगे नतमस्तक कर दिया। भिखरिया से भिखारी बन गयें। मिरचइया बाबा का भिखारी ठाकुर के माँ के चरणों में गिरना सामान्य बात न थी। उन्होंने बस इतना कहा – धन्य है वह माता जिन्होंने भिखारी ठाकुर को जन्म दिया। इससे बड़ा स्वर्ग और कहीं नहीं है। भिखारी ठाकुर ने अपने भीतर की कला और ज्ञान के द्वारा धन कमाने का फैसला ले लिया था। जजमनिका उनसे कोसो दूर जा चुकी थी। देश और समाज को भिखारी पर गर्व की अनुभूति होने लगा। भिखारी के दर्शन मात्र से लोग अपने को धन्य महसूस करने लगें। उन्हें सम्मानित करने वालों की लाइन लग गयी। उनका नाटक देखने के लिए लोग दूर-दूर से आने लगे, वे मंच पर जब खड़े होते तो पचासों हजार दर्शक उन्हें देखने के लिए आँखें बिछा लेतें। धन्य हो भिखारी ठाकुर आप हमेशा आमजन के सूत्रधार बने रहेंगे।
 अंततः नाई बहार में भिखारी ठाकुर नाई जाति के लोगों के लिए एक अच्छा संदेश दे जाते हैं। वे कहते हैं कि जजमानी से अच्छा है कि आप परदेश में कमाने के लिए चले जाइए, इससे अच्छा कमा लोगे या कोई परचून, किराना वगैरह का दुकान डलिया खोल लीजिए लेकिन जजमनिका वाला काम मत करिए –
    एह से नीमन बाड़न बनिहारा।।

दीपक शर्मा युवा कवि और कथाकार हैं।

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