जातिगत जनगणना एक ऐसी चाभी है जो एक साथ कई तालों को खोलेगी

प्रेम प्रकाश सिंह यादव से पूजा की ख़ास बातचीत

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पूरे देश में जातिगत जनगणना की आवाज तेजी से उठने लगी है। बेशक केंद्र सरकार ने ओबीसी की जातिगत जनगणना न कराने की हठधर्मिता दिखाई हो लेकिन इसको लेकर आंदोलन लगातार तेज हुआ है। बनारस में इस मुद्दे को लेकर जाने-माने अधिवक्ता और सामाजिक चिंतक प्रेम प्रकाश सिंह यादव बहुत दिनों से सक्रिय हैं और पूर्वांचल भर लगातार बैठकें कर रहे हैं। उनसे गाँव के लोग डॉट कॉम की विशेष प्रतिनिधि पूजा ने इस विषय में विस्तृत बातचीत की। इस बातचीत में उन्होंने जातिगत जनगणना कों लेकर की गई ऐतिहासिक टालमटोल सहित इसके अन्य पहलुओं पर खुलकर बात की है।

 जातिगत जनगणना की क्यों जरूरी है?

प्रेम प्रकाश सिंह यादव

जनगणना की शुरुआत 1881 में हुई थी। जातिगत जनगणना की बात करें तो 1931 में अंतिम बार जातिगत जनगणना हुई थी और फिर उसके बाद से प्रत्येक 10 वर्ष पर जनगणना तो होती रही है लेकिन जातिगत जनगणना नहीं हुई। उसमें भी एससी-एसटी के लोगों की जातिगत जनगणना होती है। ओबीसी और सामान्य लोगों की जातिगत जनगणना नहीं होती है। अब सवाल यह है कि क्या जरूरत है जातिगत जनगणना की। तो उसके लिए मैं यही कहना चाहूंगा कि जनगणना से इस बात का अंदाजा लगता है कि किस समाज, किस समुदाय के लोग कितनी संख्या में हैं। जब जनगणना होगी तो पता लगेगा कि एससी के इतने हैं, एसटी के इतने हैं,  माइनॉरिटी के इतने हैं तो इसी हिसाब से आपका बजट बनता है। उसी हिसाब से रोजगार का योजना बनती है। उसी हिसाब से रोजगार का क्रियान्वयन होता है। तो जब आपके पास यह आंकड़ा नहीं होगा कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोग कितने हैं तो आप कैसे तय करेंगे कि इनके लिए कैसे योजना बनानी है। कौन व्यक्ति कितना पिछड़ा है, इसका आकलन तो जातिगत जनगणना से ही होगा न।

तो जो हर दस साल पर जनगणना होती है उसका कोई लाभ नहीं है?

भारत की जो भौगोलिक स्थिति है उसमें भौगोलिक रूप से लोगों की भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि है।  किसी एक की पृष्ठभूमि अन्य लोगों की भौगोलिक पृष्ठभूमि से अलग है। यहां पर एक शोषक वर्ग है और एक शोषित वर्ग है। तो जो शोषक वर्ग है उसका जल, जंगल, जमीन सहित तमाम संसाधनों पर, राजपाठ पर वर्चस्व और कब्जा है। यानी कि अघोषित रूप से उनका आरक्षण है। तो उन्होंने कितना आरक्षण का लाभ लिया है या उनका कितना कब्जा है और जो शोषित वर्ग है वह कितना सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक, राजनैतिक रूप से कितना पिछड़ा है इसका आंकलन तो जातिगत जनगणना से ही होगा। जातिगत जनगणना अगर नहीं करेंगे तो इस बात का अंदाजा बिलकुल नहीं लगेगा कि किस व्यक्ति की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, पृष्ठभूमि क्या है किसने क्या लाभ लिया, कौन इस व्यवस्था में कितना पीछे है। दूसरी बात जब संविधान इस देश में लागू हुआ, तब संविधान के अनुच्छेद 15/4 और 16/4 में एक प्रावधान किया गया कि जो कि आरक्षण का प्रावधान था। इसमें यह तय हुआ कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण का लाभ दिया जाएगा, उससे उनका प्रतिनिधित्व हो पाएगा और उस प्रतिनिधित्व के माध्यम से वो समाज की मुख्यधारा में जुड़ पाएंगे। तो हमारा प्रतिनिधित्व स्पष्ट रूप सामने लाने के लिए जातिगत जनगणना बहुत जरूरी है। जातिगत जनगणना व्यवस्था परिवर्तन के लिए सामाजिक परिवर्तन के लिए और इस देश में कौन कितना पिछड़ा है कौन कितना अगड़ा है इसका आकलन करने के लिए निहायत जरूरी है। बिना जातिगत जनगणना के आप ना तो कोई योजना बना सकते हैं ना तो कोई नीति बना सकते हैं, न तो आप बज़ट का प्रावधान कर सकते हैं। अगर जातिगत जनगणना नहीं होती है तो देश का विकास समग्र नहीं हो पाएगा कुछ चुनिंदा लोगों का ही विकास हो पाएगा।

जातिगत जनगणना की मांग के पीछे जो आप वजह दे रहे हैं कि सबका विकास होगा, ख़ासकर सवर्ण और ओबीसी के लोगों का, तो जिन लोगों की जातिगत जनगणना हो रही है आपकी नज़र में उनका उस स्तर पर विकास हो पाया है ?

जिन लोगों की जातिगत जनगणना हो रही है उनमें सिर्फ 15 प्रतिशत एससी और लगभग 8 प्रतिशत एसटी हैं। लगभग 77 प्रतिशत लोगों की जनगणना जातिगत नहीं हो रही है। जो अल्पसंख्यक समुदाय के लोग हैं, ओबीसी यानी अदर बैकवर्ड कास्ट, उनमें केवल बीसी नहीं हैं, उनमें जो धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हैं।  उनमें जो पिछड़ी जाति के लोग हैं,  जैसे मुस्लिम की 90 प्रतिशत आबादी है, वह ओबीसी में ही आती है। एक बात तो स्पष्ट है कि एससी-एसटी के लोगों की जातिगत जनगणना हो रही है। अब सवाल ये है कि जातिगत जनगणना हो रही है तो  क्या उनके लिए जो योजनाएं, जो नीतियां, जो रोजगार का प्रावधान, जो उनकी पालिसी है, उसका उनको लाभ मिल रहा है या नहीं, तो इसके जवाब में मैं यही कहना चाहूंगा कि उसका लाभ निश्चित तौर पर उन्हें मिला है। आपको बता दें कि एससी-एसटी के लोगों की जब जातिगत जनगणना हुई तो उनको आरक्षण का लाभ आज़ादी के बाद से ही, जब देश का संविधान लागू हुआ, हर जगह आरक्षण का लाभ मिला। यह बहुत बड़ा सवाल है और एसटी एससी के लोगों को उनकी आबादी के अनुपात में हर जगह आरक्षण का प्रावधान किया गया और लाभ भी मिला। दूसरी बात एससी-एसटी के लोगों को संविधान के कानूनी प्रावधान के तहत संसद और विधानसभाओं में निर्वाचन सहित हर जगह आरक्षण का लाभ मिला।

भारत की जो भौगोलिक स्थिति है उसमें भौगोलिक रूप से लोगों की भिन्न-भिन्न पृष्ठभूमि है। किसी एक की पृष्ठभूमि अन्य लोगों की भौगोलिक पृष्ठभूमि से अलग है। यहां पर एक शोषक वर्ग है और एक शोषित वर्ग है। तो जो शोषक वर्ग है उसका जल, जंगल, जमीन सहित तमाम संसाधनों पर, राजपाठ पर वर्चस्व और कब्जा है। यानी कि अघोषित रूप से उनका आरक्षण है।

 

नन्द कुमार बघेल का स्वागत करते हुए प्रेम प्रकाश सिंह यादव

तीसरी बात एससी-एसटी के लोगों को जो आरक्षण का लाभ मिला उसमें क्रिमीलेयर नहीं लगाया गया यानी कि वे करोड़पति-अरबपति भी होंगे तब भी उनको आरक्षण का लाभ मिलेगा क्योंकिउनको सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा मानकर आरक्षण दिया गया है। एससी-एसटी के लोगों के लिए एससी-एसटी एक्ट बना। उस एक्ट में यह प्रावधान किया गया कि अगर उनको कोई व्यक्ति जातिगत गाली देगा तो उस जातिगत गाली की वजह से उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई होगी। यह इसलिए हो पाया क्योंकि उनकी जातिगत जनगणना हुई। तो उनको अपनी समस्या और अपनी ताकत का एहसास हुआ। इसलिए उनकी संख्या के हिसाब से उनके अनुपात में उनके लिए बज़ट का प्रावधान है। उनके लिए आरक्षण का प्रावधान है, उनके लिए कोई क्रिमीलेयर नहीं है। उनके एडमिशन में छूट के प्रावधान है। उनको हर जगह उसका लाभ मिलता है। उसका क्रियान्वयन होना लिमिटेशन होना अलग चीज है, कि कानूनी  प्रावधान होने के बाद भी कहीं ज्यादे हो रहा है कहीं कम हो रहा है, लेकिन जातिगत जनगणना होने की वजह से उनको बहुत सारी सुविधाएं मिलीं। अब बात पिछड़ी जाति की करें तो जो अन्य पिछड़ा वर्ग है केवल पिछड़ी जाति की बात नहीं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग है, अब  ये समझ लीजिए कि इनको आरक्षण का लाभ आज़ादी के साथ नहीं मिला। इनको आरक्षण का लाभ, बीपी मंडल जी के नेतृत्व में 1989 में गठित मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पेश किया, तो सरकार ने 13 रिपोर्टों में से दो को ही माना। उन दो रिपोर्टों के आधार पर ओबीसी को भी आरक्षण का  लाभ दिया गया। लेकिन हकीक़त यह है कि ओबीसी को आरक्षण का लाभ 1992 में देने का कार्यक्रम शुरू होता है, और सरकार ने 1995 में उसमें भी क्रीमीलेयर लागू कर दिया। तर्क था कि जिनकी आय इतने से अधिक होगी उनको आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। इस क्रीमीलेयर के माध्यम से सरकार ने क्या किया कि जो व्यक्ति आरक्षण का लाभ लेकर नौकरियों में और अन्य क्षेत्रों में जहां-जहां वो प्रतिनिधित्व कर सकते थे उनमें सरकार ने क्रीमी लेयर के माध्यम से वंचित कर दिया। दूसरी बात कि उसे आरक्षण के उस रेस में लाया गया कि जिसमें वो दौड़ने के काबिल ही न हो, यानि जो एकदम गांव का घुरहू, निरहू, कतवारू है, जो मिड डे मील का कटोरा लेकर घूम रहा है।  उसके भूख का सवाल हल नहीं हो रहा है, उसको सरकार ने कहा आप आरक्षण का लाभ ले लीजिए।  जिसके सामने भूखमरी का संकट है, दो जून की रोटी का सवाल है, उसको कहा गया कि आप एमबीबीएस में, डॉक्टर में, इंजीनियर में, मेडिकल में आप आरक्षण ले लीजिए। तो क्रीमीलेयर के माध्यम से सरकार ने पिछड़ों को आरक्षण देते हुए भी उनसे छीन लिया। उनको वंचित करने की षड्यंत्र किया है, और जब पिछड़ों को आरक्षण देने का दबाव बना तो उसके बाद सरकार ने निजीकरण का कार्यक्रम शुरु कर दिया, कि जब सरकारी संस्थान रहेंगे ही नहीं तो ये आरक्षण कहां से लेंगे, क्योंकि निजी संस्थाओं में आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है। अगर जातिगत जनगणना होती है तो इससे इस बात का अंदाजा लगता है कि इनकी संख्या इतनी है।  देश में  पिछड़ों की संख्या 60% है  और ये सामाजिक और आर्थिक रूप से राजनैतिक-शैक्षिक रूप से पीछे हैं, इनके लिए ये योजनाएं बनायी जानी चाहिए। इनका कार्यपालिका, विधायिका जल, जगंल, जमीन में इतना इतना प्रतिनिधित्व है। इतना ये पीछे हैं, इसलिए इनके लिए भी ये योजनाएं बनायी जाती हैं। तो ये जातिगत जनगणना न करके इस देश में जो शोषक वर्ग है वो चाहता है कि पिछड़े समाज के लोगों की जातिगत जनगणना ना हो। अगर उनकी जातिगत जनगणना हो जाएगी तो ये अपने हक और हिस्से को पाने के सक्षम हो जाएंगे। ये हिन्दू कार्ड खेलते हैं, हिन्दू के नाम पर एक करके इनको मुस्लिम हिंदू से लड़ाकर के और ऐसे- ऐसे कपोल कल्पित मुद्दे जिनका कोई अस्तित्व नहीं है, जिनका कोई लोगों के विकास से, उनकी प्रगति से कोई लेना देना नहीं है लेकिन झूठ और पाखंड की बुनियाद पर मानसिक गुलाम बना करके रखने की ये लगातार साजिश कर रहे हैं। और चाहते हैं कि जातिगत जनगणना न हो। और जातिगत जनगणना न होने से हमको उन चीजों का लाभ नहीं मिलता है। एक और बात जो इस तरह से एसटी-एससी का एक्ट है  कि अगर आप चमार को जातिगत गाली देंगे चमार- सियार कहेंगे तो उस पर एसटी-एससी एक्ट लग जाएगा। इसी तरह से ओबीसी का भी एक्ट होना चाहिए, क्योंकि अगर धर्म हिंदू है तो वर्ण चार होंगे और वर्ण व्यवस्था में जो ओबीसी है वो शूद्र की कैटेगरी में आता है  और शूद्रों के साथ वर्णवादी व्यवस्था से ही भेदभाव शुरु होता है। कोई अहिर है तो उसके बारे में कहा जाता है ये अहिर है बड़ा होकर भैंस चराएगा और इसकी 12 बजे बुद्धि खुलेगी। कुनबी है तो उसके लिए अलग-अलग व्यंग्यात्मक शब्द हैं। उसके लिए तो भैंस चराना सामाजिक रूप से ठेस पहुंचाने की बात हो गयी।  तो जिस तरह से एसटी-एससी एक्ट है उस तरह से ओबीसी के लिए होना चाहिए। कोई सामाजिक रूप उसे कुछ कह देता है तो उसके लिए भी एक्ट होना चाहिए। उसके लिए भी कानून  होना चाहिए। जिससे कि जो सामान्य वर्ग के लोग हैं उनके खिलाफ कार्रवाई हो। अगर ओबीसी एक्ट भी होता तो एससी-एसटी एक्ट की तरह ही उसके प्रावधान होता, क्योंकि शूद्र हम भी हैं, शूद्र वो भी हैं। हम सछूत शूद्र हैं एसटी-एससी के लोग अछूत शूद्र हैं। तो अगर ओबीसी एक्ट होता और एसटी-एससी का एक्ट ओबीसी के लोगों के ऊपर नहीं लगता लेकिन संविधान की मंशा तो यह थी कि जो जनरल लोग हैं उनके खिलाफ इस एक्ट का क्रियान्वयन हो, लेकिन ये लोग उसमें घाल- मेल करके इसमें ओबीसी जो, खुद शूद्र है, उसके खिलाफ इस एक्ट का क्रियान्वयन करते हैं। इस देश में जितने भी एसटी-एससी एक्ट मुकदमे दर्ज होंते हैं उनमें 90 से 95% मुकदमें ओबीसी के खिलाफ दर्ज होते हैं। जो कि खुद शूद्र है। जातिगत जनगणना न होने से ओबीसी को न प्रतिनिधित्व मिल रहा है न योजनाओं का क्रियान्वयन हो रहा है। और न तो इस बात का आकलन हो रहा है कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से कितना पिछड़ा है। कहां-कहां प्रतिनिधित्व की जरूरत है। और न उसके लिए एक्ट बना। न तो उसको रोजगार, न तो आरक्षण में उस तरह से  क्रियान्वयन हुआ।  आरक्षण जब लागू हुआ तो कहीं 27%, कहीं14% और कहीं सिर्फ 10% ही। पूरे देश में ओबीसी की संख्या 60% के लगभग है। देश में कहीं पर भी आरक्षण का, प्रतिनिधित्व का क्रियान्वयन ओबीसी के लिए नहीं हुआ। तो जातिगत जनगणना होगी तो इन सारी चीजों का क्रियान्वयन सरकार को करना पड़ेगा। जो लोग कुंडली मार करके, ओबीसी का हक छीन करके उस पर कब्जा जमाए हुए हैं, उनको यह लगता है कि अगर आकलन हो जाएगा, जातिगत जनगणना हो जाएगी तो जो हमारी लूट की व्यवस्था है उसका सच देश के सामने आ जाएगा।  फिर तो लोग हिंदू की बजाय ओबीसी के नाम पर लामबंद होंगे। और मनुवादी ताकतें पूरी तरीके से इस बात को जानती हैं। और हमारा समाज पूरी तरीके इस मुद्दे पर सोया हुआ है।  वह हिंदू बने रहने पर अपने आप पर गुमान महसूस कर रहा है। इस सवाल पर उसका ध्यान नहीं है इसीलिए इस देश का इतना बड़ा नुकसान हो रहा है।

 आखिरी जातिगत जनगणना 1931 में हुई। इसके बाद उसकी मांग अब की जा रही है। बहुत अधिक अन्तराल के बाद इसकी मांग की जा रही है तो आपके हिसाब से किसी भी सरकार ने इस मुद्दे के बारे में अपना रुझान क्यों नहीं दिखाया?

आपको बता दें कि 1931 के जातिगत जनगणना के बाद 2011 में जातिगत जनगणना हुई थी।  इसके आंकड़े को लेकर पहले कांग्रेस की सरकार ने टाल-मटोल किया। बाद में जब बीजेपी आयी तो उसने यह कह दिया कि यह डाटा विश्वसनीय नहीं है। इसलिए सरकार ने उसको जारी नहीं किया जानबूझ करके, क्योंकि इससे लोगों को उनकी संख्या का और उनकी ताकत का एहसास होगा। जहां तक सरकारों का सवाल है। सवाल है कि सरकार अब इस पर पहल क्यों नहीं कर रही है? सरकार में बैठे लोग चाहे वो पक्ष हों या विपक्ष हों उनका जो न्यायिक वर्ग चरित्र है वो एक कैटेगरी का है। जब इसका आकलन करेंगे तो इस बात का अंदाजा होगा। कहने के लिए तो ये पक्ष-विपक्ष हैं लेकिन इनका जो चरित्र है वो एक है।

जब इसका आकलन करेंगे तो इस बात का अंदाजा होगा। कहने के लिए तो ये पक्ष-विपक्ष हैं लेकिन इनका जो चरित्र है वो एक है। उनकी योजनाएं, नीतियां, क्रियान्वयन उनकी लीडरशीप एक है , जितनी भी देश की राष्ट्रीय पार्टियां हैं सभी ब्राम्हणों के कब्जों में हैं। भाजपा, आरएसएस, कांग्रेस के नियंत्रण से लेकर जितनी लेफ्ट की भी पार्टियां हैं, सभी ब्राह्मणों के कब्जे में हैं।

 

उनकी योजनाएं, नीतियां, क्रियान्वयन उनकी लीडरशीप एक है , जितनी भी देश की राष्ट्रीय पार्टियां हैं सभी ब्राम्हणों के कब्जों में हैं।  भाजपा, आरएसएस, कांग्रेस के नियंत्रण से लेकर जितनी लेफ्ट की भी पार्टियां हैं, सभी ब्राह्मणों के कब्जे में हैं। और जो क्षेत्रीय पार्टियां आंदोलनों से उपज रहीं हैं वे इस देश की मनुवादी व्यवस्था को चुनौती देकर सामाजिक व्यवस्था, संवैधानिक व्यवस्था लागू कर सकें तो बहुत अच्छी बात हैं। लेकिन एक मुकाम तक पहुंचने के बाद उनमें भी वो घुस करके उसी प्रकार कब्जा कर लेते हैं जिस प्रकार से शेर जंगल पर शासन तो करता है लेकिन शेर के ऊपर किलनी सवार हो जाती है। फिर शेर उसके वशीभूत होकर इधर-उधर नाचता है और किलनी मज़े से उसका खून चूसती रहती है। तो शेर का खून चूसने वाले किलनी जैसे मनुवादी ताकतों के लोग हैं। वे क्षेत्रीय पार्टियों पर भी कब्जा जमा लेते हैं। तो कोई एससी,बीसी, मॉइनारटी का समाज जब उठ करके ताकत का निर्माण करता है तो ये उसके ऊपर सवार होकर के शोषण करते हैं। और हमारे समाज के लोग एक समय तक जाने के बाद भटक जा रहे हैं ।

अब सवाल यह है कि सरकारें इस पर प्रयास क्यों नहीं कर रही हैं? तो जातिगत जनगणना का वर्ष जब भी आता है तब-तब सरकारें इस पर प्रयास करने के बजाय इस बात की कोशिश करती रहीं हैं कि किस तरीके से यह मुद्दा पीछे छूट जाए। यह मुद्दा गुम हो जाए। यह सवाल लोगों के जेहन में आए ही नहीं। हर दस वर्ष पर उन्होंने इससे बड़ा और प्रायोजित मुद्दा, जो कभी मुद्दा बन नहीं सकता था, उससे बड़ा मुद्दा, मीडिया मैनेजमेंट के माध्यम से प्रोजेक्ट किया है। क्योंकि मिडिया में भी, प्रिंट और इलेक्ट्रनिक मीडिया, जो कि मेनस्ट्रीम की मीडिया है, उसमें भी मनुवादियों का पूरा कब्जा और वर्चस्व है, इसलिए उससे बड़ा काल्पनिक मुद्दा ये खड़ा कर देते हैं, जिससे कि जातिगत जनगणना का मुद्दा ही गायब हो जाता है लोगों के जेहन से। मैं आपको उदाहरण के तौर पर बताना चाहता हूं कि 1931 के बाद 1941 में जातिगत जनगणना की बात हुई। 1939 तक द्वितीय विश्वयुद्ध का दौर था उसमें यह गुम हो गया। 1951 में जनगणना की बात हुई तो देश में आजादी का दौर था। 1950 में गणतंत्र बना तो उस दौर में यह मुद्दा गुम करा दिया गया। 1961 में जातिगत जनगणना हो सकती थी। उस समय हमारे सामने इन्होंने भारत-पाकिस्तान का युद्ध थोपा। 1971 में जनगणना वर्ष आया तो 1971 में इन्होंने हमारे सामने बांग्लादेश विभाजन का प्रायोजित कार्यक्रम थोप दिया। 1981 में फिर जाकर के जनगणना होती है तो 1981 से पहले इन्होंने इमरजेंसी में सभी को भुलवाए रखा। 1991 में जातिगत जनगणना होती तो 1991 पहले एक दौर रहा था जब ओबीसी, एससी और माइनारटी की ताकतें एक मुहिम पे, एक मुकाम पर ले जा सकती थीं और मंडल कमीशन की रिपोर्टें भी लागू कराने में सफल रहीं। उसमें इन सबों को लगा कि अब तो ये जातिगत जनगणना करवा लेंगे तो इन्होंने 1989 में जब मंडल कमीशन की रिपोर्टें लागू करने दौर हुआ तो इन्होंने पिछड़ों को कमंडल पकड़ा दिया। मंडल के जगह पर कमंडल यात्रा शुरु करवा दिया। तो हमारे देश के जो मानसिक पिछड़े गुलाम थे, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार से लेकर जितने भी लोग रहे ये सभी उनकी हरवाही और चरवाही करने में लग गए जिससे यह मुद्दा भटक गया। 1991 में जातिगत जनगणना नहीं हो पायी। 1991 के बाद 2001 में जातिगत जनगणना हो सकती थी, इन्होंने हमारे ऊपर गोधरा कांड थोप दिया जबकि उससे पहले वादा किए थे कि अगर हम आएंगे सरकार में तो जातिगत जनगणना करवाएंगे। उसके बाद 2011 में जातिगत जनगणना हुई भी सरकार के वादे अनुसार, जिसमें जनता की गाढ़ी कमाई का लगभग 575 करोड़ खर्च भी हुआ। इसके बाद भी पहले मनुवादी कांग्रेसियों ने उसको नहीं घोषित किया। बाद में जब भाजपा की सरकार आयी तो उन्होंने शुरुआती दौर में टालमटोल किया।  इसके बाद इन्होंने कहा कि इसमें डाटा अथेंटिक न होने के कारण हम इसे जारी नहीं कर सकते। इसके बाद इस बार जब 2019 का लोकसभा का चुनाव होना था तो भाजपा ने अपने एजेंडे में घोषित किया कि अगर इस बार हम सरकार में आएंगे तो जातिगत जनगणना जरूर कराएंगे।  आजादी के बाद से पहली बार हुआ कि किसी सरकार ने खुले तौर पर कहा कि जातिगत जनगणना कराएंगे। लेकिन फिर उन्होंने कहा कि पिछड़ों की जातिगणना नहीं कराएंगे। इस बात से यह स्पष्ट है कि जो सत्ता पक्ष और विपक्ष है दोनों का कब्जा और नियंत्रण मनुवादियों के हाथ में है। सत्ता और विपक्ष मनुवादियों के नियंत्रण में है। दूसरी बात कि जो हमारे बहुजन समाज के लोग हैं वो दिखते दीये के साथ हैं लेकिन हैं वास्तव मेन वो हवा के साथ हैं। अपने वोटबैंक के लिए हरवाही-चरवाही करना है। कुछ लोग तो खुले तौर पर हरवाही कर रहें हैं।  बाबू जगदेव प्रसाद ने कहा कि हमारे समाज के कुछ लोग पूंजी और सामंती ताकतों की हरवाही करते हैं। कुछ लोग खेत- खलिहान में हरवाही करते हैं तो कुछ लोग मोटरगाड़ी-बंगला के लिए  सदन से लेकर संसद तक हरवाही करते हैं। तो हमारे कुछ लोग तो दिख रहें हैं जो भडुए-दलाल हैं। इस समाज के, आठवले, अनुप्रिया पटेल से लेकर नीतीश कुमार तक, वो तो दिख रहें हैं कि वो उनकी हरवाही कर रहें हैं। लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें देखकर लगता है कि वो बहुजन समाज की बात कर रहें हैं। लेकिन वो दिख रहे दीपक के साथ हैं जबकि वास्तव में हवा के साथ हैं। वो भी हमारे समाज की वास्तविक लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, इसलिए यह जातिगत जनगणना का सवाल अभी तक हल नहीं हो पाया और सरकारें निश्चित रूप से चाह रही हैं इसको एक बड़ा मुद्दा लाकर इस मुद्दे को पीछे कर दिया जाए। जब इस बार यह मुद्दा बना तो जो पिछड़ी सरकार है, बिहार से नीतीश कुमार और तेजस्वी गए नरेन्द्र मोदी से मिलने तो उन्होंने कहा उनको ओबीसी की जातिगत जनगणना से कोई लेना देना नहीं है। नहीं तो जब बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष एक है इस मसले पर तो सरकार को हैसियत नहीं है कि जातिगत जनगणना न हो पूरा बिहार जाम हो जाता। उन्होंने सरकार की स्ट्रैटजी के तौर पर मानसिक गुलाम ओबीसी के लोगों को भर्ती किया। इससे पहले नीट वाले सवाल पर सरकार बैकफुट पर गयी। तो इनको ये लगा कि 2022 में पांच राज्यों का चुनाव है तो ये पिछड़े के समाज के लोग भाजपा के साथ न चले जाएँ। हमारा वोटबैंक खिसक न जाए। इसलिए इन लोगों का जाकर के वहां पर तथाकथित दिखावा के लिए कोई कमेंट कर देना और कोई सोशल मीडिया पर पोस्ट डाल देना यह बताता है कि इनकी भी मंशा इस मुद्दे पर साफ नहीं है। इनकी अगर मंशा साफ होती तो निश्चित रूप से ये लोग आंदोलन में आते और ये कहते आप उसको वापस लिजिए। तो जो भी सरकारें हैं वो मनुवादियों के कब्जे में हैं। इस लिहाज से वे निश्चित रूप से नहीं चाहेंगे कि जातिगत जनगणना हो।

जब इस बार यह मुद्दा बना तो जो पिछड़ी सरकार है, बिहार से नीतीश कुमार और तेजस्वी गए नरेन्द्र मोदी से मिलने तो उन्होंने कहा उनको ओबीसी की जातिगत जनगणना से कोई लेना देना नहीं है। नहीं तो जब बिहार में सत्ता पक्ष और विपक्ष एक है इस मसले पर तो सरकार को हैसियत नहीं है कि जातिगत जनगणना न हो पूरा बिहार जाम हो जाता।

 

आपके अनुसार 2022 के चुनाव में कौन विपक्षी पार्टी उत्तर प्रदेश में जातिगत जनगणना को अहम मुद्दा बनाकर काम सकती है?

जातिगत जनगणना के सवाल पर कोई ऐसा नहीं है और न कोई पार्टी सचेत रूप से चाह रही है कि जातिगत जनगणना का सवाल हल हो।

आपने कहा कि बिहार में वोटबैंक के चक्कर में नीतीश और तेजस्वी इस पर बात कर रहें हैं लेकिन उत्तर प्रदेश की बात करें तो इस पर बात कोई नहीं कर रहा है जबकि पिछड़ों का प्रतिनिधित्व कर रहे कई नेता भी यहां सक्रीय हैं। ऐसा क्यों है?

अखिलेश यादव ने इस पर बयान दिया। अपने लोगों को कहा भी लेकिन जिस तरीके से संसद से लेकर सड़क पर उतरना चाहिए उस तरह से उस प्रक्रिया में नहीं आ रहे हैं। इनके अंदर यह मानसिक खौफ है कि जो अगड़े समाज के लोग हैं इनसे कहीं छिटक ना जाएँ, इसलिए अखिलेश यादव हों, चाहे मायावती हों, चाहे ओमप्रकाश राजभर हों, जो भी यहां पर पिछड़ों का नेतृत्व कर रहें हैं वे लोग इस लड़ाई को आगे नहीं ले जाएंगे। न तो बिहार में नीतीश कुमार इस लड़ाई को आगे ले जाएंगे। अगर जनान्दोलन की ताकत हुई, जिस तरीके से किसान आन्देलन ने ताकत का निर्माण किया तो ये सारे लोग यह कहना शुरू किए कि हमारा भी समर्थन है, हमारा भी समर्थन है। उसी तरीके से अगर जनांदोलन की ताकत का निर्माण होगा तो कोई यह नहीं कहेगा कि हमारा समर्थन नहीं होगा। कोई राजनीतिक पार्टी अभी इस स्थिति में नहीं दिख रही है कि इस मुद्दे को लेकर वह लीड करे। उत्तर प्रदेश में और बिहार में भी केवल हवा-हवाई बात हो रही है। सदन में बात हो रही। मीडिया में बात हो रही है। बयानबाजी हो रही। उनका वोटबैंक खिसक ना जाए इसलिए वे हमें संतुष्ट कर रहें हैं। उनका अगड़ा वर्ग शोषक वर्ग का भी वोटबैंक न खिसक जाए इसलिए बैलैंस बना करके कह रहें हैं।  इतना तो कहना ही पड़ेगा।

आपके अपने स्तर पर इस मुद्दे को लेकर क्या रणनिति होगी कि सरकार इस पर मजबूर हो जाए? साथ ही उन संगठनों की क्या रणनिति होनी चाहिए जो इस मुद्दे को महत्वपूर्ण बनाने के लिए लगातार प्रयास में हैं?

आपको जानकारी के लिए बता दें कि जब सरकार ने स्पष्ट तौर पर सदन में कहा कि हम इस बार एससी-एसटी के अलावा और किसी की, ख़ास करके अन्य पिछड़ा वर्ग की जातिगत जनगणना नहीं कराएंगे, तो उसके बाद हम लोंगों ने, हमारे नेतृत्व में यहां के बुद्धिजीवियों की एक छोटी बैठक बनारस में किया और उसके बाद हमलोगों ने बनारस में जिला स्तरीय बैठक किया। हमलोगों ने जातिगत जनगणना संयुक्त मोर्चा बनाया, जिसमें पूरे बनारस में जितने भी बुद्धिजीवी थे, वकील थे उन सबके नेतृत्व में हर सामाजिक, राजनीतिक, और भी तमाम बुद्धिजीवी लोग इकट्ठा होकर के, किसान आन्दोलन से जुड़े लोग तमाम लोग इसमें आए और बड़ी बैठक हुई। तहसील सभागार सदन में उस बैठक के बाद हमलोगों ने जिला स्तरीय बैठक की। इसके बाद तहसील बैठक का कार्यक्रम किया तहसील सदर में। फिर तहसील राजातालाब के पास। फिर तहसील पिंडरा के पास। फिर हमलोंगों ने ब्लाक स्तर पर उस कार्यक्रम को शुरू किया। ब्लाकों में कार्यक्रम किया। चन्दौली में कार्यक्रम किया। अगल-बगल के जिलों में कार्यक्रम किया। पूरे पूर्वांचल में हमलोगों ने कार्यक्रम शुरू किया। पूरे प्रदेश और देश की जिस प्रकार की ताकतें हमलोगों ने बात-चीत से के माध्यम से शुरु किया तो उस ताकत यह परिणाम रहा कि जब सोशल मीडिया और तमाम जगहों पर यह चीजें दिखने लगी इसके लिए लोग आंदोलन कर रहें हैं, हमलोगों के आन्दोलन के बाद तो पूरे देश में इस प्रकार के जनान्दोलनों की ताकत का निर्माण हुआ। उसी का यह परिणाम रहा कि नीतीश कुमार के नेतृत्व में पक्ष-विपक्ष के लोग मिले और अखिलेश यादव और तमाम लोगों के ट्वीट से लेकर के बयान तक आए। तो हमलोग इसमें पूरे पूर्वांचल स्तर का बनारस में कार्यक्रम करेंगे। इसके बाद एक पदयात्रा भी आ रही है। सितम्बर में ही बिहार से चल करके आ रही है। उसमें हमलोग समर्थन कर रहें हैं और हमलोंगों के सहयोग में वो पदयात्रा आ रही है तो इसको हमलोग बनारस में पूर्वाचंल स्तर का करने के बाद प्रदेश में करेंगे। फिर दिल्ली में करेंगे। और आनेवाले समय में किसान आन्दोलन और जातिगत जनगणना दोनों सवालों को जोड़ करके जो किसान कृषि कानूनों से परेशान है, जातिगत जनगणना में भी वही समुदाय परेशान है। जातिगत जनगणना न होने से पिछड़ा वर्ग ही परेशान है। उसका हक नहीं मिल रहा है और कृषि कानून लागू होने से भी सबसे ज्यादा नुकसान पिछड़े वर्ग को ही होगा। इन दोनों को जोड़ करके हम इसे आगे बढ़ाएंगे। और उस आन्दोलन का परिणाम यह होगा कि सरकार में बैठे लोग भी बैकफुट पर जाएंगे। और जो पिछड़े के लोग हैं जो तथाकथित पिछड़ों की रहनुमा बनने वाली पार्टियां हैं उनको भी आगे आना होगा।

कुछ सामान्य वर्ग के लोग भी इसका समर्थन नहीं कर रहें हैं। इसके पीछे की वजह क्या हो सकती है? आपकी क्या राय है?

हमलोग केवल पिछड़ों की जातिगत जनगणना की बात नहीं कर रहें हैं, हम सवर्णों की भी जातिगत जनगणना की बात कर रहें हैं। इससे सवर्णों को भी फायदा होगा क्योंकि सवर्णों में भी सामाजिकशैक्षणिक रूप से ,आर्थिक रूप से थोड़ा, सारे सवर्ण जो है बैकवर्ड और एसटी-एससी की तुलना में भले ठीक हों लेकिन उनका भी कैटेगराइजेशन करना पड़े तो उसमें भी मात्र एक से डेढ़ प्रतिशत लोग पूरी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे हुऐ हैं।जल-जंगल-जमीन से लेकर न्यायपालिका, कार्यपालिका, व्यवस्थापिका से लेकर के मंत्रालय और विश्वविद्यालय से लेकर के सचिवालय तक। तो अगर जातिगत जनगणना होगी तो जो 60 प्रतिशत पिछड़ों के बीच अन्य पिछड़ा वर्ग का जो फायदा होगा, अल्पसंख्यक लोगों को फायदा होगा, ठीक उसी तरह से जो 15 प्रतिशत सवर्ण हैं उनमें भी 2 प्रतिशत लोगों छोड़ करके, उसको एक ही प्रतिशत मानिए, तो भी 14 प्रतिशत लोगों को, अगर उनकी संख्या 10 प्रतिशत निकल कर आएगी तो 9 प्रतिशत लोगों को तो उसका सीधा फायदा होगा। क्योंकि आपको बता दें कि जो इस देश में न्यायपालिका, उच्च न्यायपालिका है उसमें देश के कुछ चुनिंदा ब्राह्मण परिवारों का अवैध रूप से कब्जा है। न्यायपालिका में जज इलेक्शन से नहीं नियुक्त होते हैं न तो किसी सेलेक्शन से नियुक्त होते हैं वो नॉमिनेशन से नियुक्त होते हैं। चाय पार्टी पर ब्राह्मण महासभा की बैठक होगी। चुनिंदा परिवारों के ब्राह्मण महासभा के जुटेंगे और वो यह कहेंगे कि ये तुम्हारा दामाद है इसको हो जाना चाहिए।  यह हमारा बेटा है इसको हो जाना चाहिए। तो इसी प्रक्रिया से लोग चुनकर के आते हैं। तो उसमें पूरे देश के ब्राह्मणों का प्रतिनिधित्व नहीं है।  लेकिन ब्राह्मण सिर्फ इसी गुमान मैं हैं कि यह हमारा बिरादरी का है। उसका थोड़ा छिड़काव मिल जाए अलग बात है। लेकिन वास्तव में देश के कुलीन वर्ग उसके कब्जे में पूरी व्यवस्था है। और अगर आकलन किया जाएगा और जातिगत जनगणना होगी तो एक प्रतिशत लोगों को छोड़ करके इससे 99 प्रतिशत लोगों को इसका फायदा मिलेगा।

क्या यह मुद्दा 2022 विधानसभा चुनाव के लिए भी एक बड़ा मुद्दा हो सकता है?

हमलोगों ने जगह-जगह बैठक करके इसको इस रूप में ला दिया है कि जातिगत जनगणना 2022 के चुनाव का मुख्य मुद्दा होगा। हमलोगों ने जातिगत जनगणना और किसान आन्दोलन की ताकत पर इसको मुख्य मुद्दा बना दिया है। आन्दोलन की ताकत और बढ़ेगी। आन्दोलन का लगातार निर्माण हो रहा है। तो निश्चित रूप से चुनाव का यह एक एजेंडा होगा। अखिलेश यादव ने भी कहा कि अगर हमारी सरकार आती है तो हम जातिगत जनगणना करवाएंगे। बिहार के लोगों ने भी कहा कि हम करवाएंगे, तो एक जनदबाव बन रहा है। निश्चित रूप से 2022 चुनाव का एक बड़ा मुद्दा होगा जातिगत जनगणना।

क्या इस जनगणना से समाज  में जातीय विभेद हो सकता है? इस पर आपकी क्या राय है ?

नहीं ऐसा नहीं है। ओबीसी का मतलब अन्य पिछड़ा वर्ग, इसमें भी मुस्लिम 90 अल्पसंख्यक जो उनकी अल्पसंख्यक में पिछड़े वर्ग में आते हैं, वो भी इसमें हैं। इस जातिगत जनगणना के नहीं होने से एसटी-एससी के लोगों का भी नुकसान होगा और सामान्य वर्ग के लोगों का भी नुकसान होगा। दो लोग इस व्यवस्था में पीछे हैं। सामान्य वर्ग में कौन कितना हक छीना है और कौन कितना  वंचित है यह जातिगत जनगणना से ही पता चलेगा। ओबीसी और सवर्ण के बीच कोई तकरार नहीं होगी। जातिगत जनगणना होने से जब सभी का आकलन होगा, तो उस हिसाब से उनके लिए योजनाए बनेंगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोग हैं उनको उसका लाभ मिलेगा। इससे जातियां टूटेंगी। जातियों में दरार पैदा होने की बजाय जातियां टूटेंगी और सामाजिक एकता मजबूत होगी।  सामाजिक न्याय कायम होगा और संविधान का शासन कायम होगा।

हमलोग केवल पिछड़ों की जातिगत जनगणना की बात नहीं कर रहें हैं, हम सवर्णों की भी जातिगत जनगणना की बात कर रहें हैं। इससे सवर्णों को भी फायदा होगा क्योंकि सवर्णों में भी सामाजिकशैक्षणिक रूप से ,आर्थिक रूप से थोड़ा, सारे सवर्ण जो है बैकवर्ड और एसटी-एससी की तुलना में भले ठीक हों लेकिन उनका भी कैटेगराइजेशन करना पड़े तो उसमें भी मात्र एक से डेढ़ प्रतिशत लोग पूरी व्यवस्था पर कुंडली मारकर बैठे हुऐ हैं।

 

जिस तरीके से राजनीतिक पार्टियों पर दबाव बनना शुरू हुआ है, राजनितिक पार्टियों के लोग हुआं-हुआं करना शुरू कर दिए हैं। ताल में ताल मिलाना शुरू कर दिया है। इससे संभव है कि जो सरकार कि नीतियां लग रहीं हैं, उनके सामने पांच राज्यों का चुनाव है, इसकी वजह से उन्हें मात खाना पड़ सकता है। तो हो सकता है कि 2022 के चुनाव के बाद इसे कराना चाहें, और अगर दबाव बना तो ऐसा भी कर सकते हैं कि एक मनगढ़ंत जातिगत जनगणना करवाएंगे, जैसे 2011 में जनगणना हुई थी, वैसे ही करवाएं। शायद तब तक 2024 तक चुनाव आ जाएगा। चुनाव जीत जाने के बाद फिर मनुस्मृति लागू करने की दिशा में बढ़ेंगे। फिर इनको तो किसी का डर रहेगा नहीं, न जनदबाव का असर पड़ेगा, तो ये जातिगत जनगणना  पहले तो कराने के पक्ष में नहीं होंगे और यदि हुआ तो मनगढ़ंत आंकड़े देंगे। इधर पांच राज्यों का चुनाव, फिर 2024 का चुनाव देखेंगे। इसमें एक बात यह कि जो जातिगत जनगणना पिछली बार हुई थी उसका यह डिजिटल मामला है, तो इससे ये आंकड़ों में हेरा-फेरी कर सकते हैं। जातिगत जनगणना हो भी तो वह मैनुअल होनी चाहिए। फिर ये जो 2011 की जातिगत जनगणना हुई थी उसके आंकड़े ये जारी करें।  क्या कमियाँ हैं उसको देखा जाएगा।  लेकिन पहले एक आकलन तो आ जाए। इसके साथ-साथ जो ओबीसी एक्ट आया है उसका पॉवर केन्द्र को है, लेकिन इन्होंने राज्यों को दे दिया इसका पॉवर। इससे ये कुछ सवर्ण जातियों को ओबीसी में लाएंगे। कुछ ओबीसी की जातियों को एसटी-एससी में लाएंगे और एससी को एसटी में लाएंगे। इससे उनको लगेगा कि हमको तो बहुत लाभ मिल गया लेकिन वास्तव में लाभ कुछ मिलेगा नहीं, क्योंकि हर जगह निजीकरण कर रहें हैं। योजनाएं तो बनाना नहीं, न ही उसका क्रियान्वयन करना है। रोजगार हर जगह छिन रहें है, पूँजिपतियों के हवाले पूरे देश को कर रहें हैं। लेकिन और लोग तात्कालिक रूप से खुश हो जाएंगे, लेकिन जातिगत जनगणना के साथ-साथ हमलोगों की मांग है कि ओबीसी एक्ट का क्रियान्वयन तब तक न हो जबतक जातिगत जनगणना न हो जाए। दूसरी बात ओबीसी में कौन जातियां कहां जाएंगी वो एक्ट ये वापस ले। राज्य सरकारों को इन्होंने जातियों को तो इधर-उधर करने का अधिकार तो दे दिया लेकिन आरक्षण कि जो सीमा है 50 प्रतिशत उसको राज्य अपने हिसाब कम-ज्यादा कर सकता है उसका प्रावधान नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सवर्ण आरक्षण गरीबी उन्मूलन का प्रोग्राम नहीं है। इन्होंने संविधान की भावना के खिलाफ जाकर सवर्ण आरक्षण भी पास कर दिया। तो इससे होगा यह कि आपस में लोग लड़ेंगे। आपस में लोगों को गलतफहमी रहेगी। वे खुश रहेंगे लेकिन उससे देश और समाज का नुकसान होगा। किसी को इसका फायदा नहीं होगा। साथ ही सरकार ने 2020 और 2021 में लॉकडाउन लागू करके उनसे काम-रोजगार-व्यवसाय सब छीन लिया। उनके हाथ में कटोरा थमा दिया। ऐसे में इस देश में जो अन्य पिछड़ा वर्ग है उसके अन्दर मानसिक गुलामी सबसे ज्यादा है। जैसे ही चुनाव नजदीक आएगा। आचार संहिता लागू होने से पहले जिस तरीके से राम मंदिर का उन्होंने शिलान्यास करा दिया, उसी तरीके से काशी विश्वनाथ कॉरिडोर जो बना रहें हैं। ये सब मनुवादियों के एटीएम हैं। राम मंदिर हो या काशी विश्वनाथ हो या जितने भी मंदिर हैं ये मनुवादियों का एटीएम है। यहां पर भी ये उसका शिलान्यास करेंगे। मंदिर के विस्तारीकरण के बहाने जिस तरीके से उन्होंने अयोध्या में किया, उसी तरह से कारसेवकों को इकट्ठा करने के लिए ये जगह बना रहें हैं, ताकि ये उसको हिंदू बनाम मुस्लिम कर सकें। उसके ट्रायल के रूप में उन्होनें जगह- जगह पर हिंदू-मुस्लिम को आपस में लड़ाने का काम शुरू किया है। 8-10 जगहों पर बनारस में हमलोगों की कोशिश से टल गया। उसमें लड़ने वाले भी हिंदू में पिछड़ी जाति के लोग हैं और मुस्लिम में भी पिछड़ी जाति के लोग हैं। ज्यादा संभावना है कि ये हिंदू बनाम मुस्लिम और मंदिर बनाम मस्जिद करने की मुहिम चलाएंगे। देश में जनता भूखमरी के कगार पर है। लोग सड़कों पर पैदल चल करके मौत के मुहाने चले गए। भूखमरी से आत्महत्या कर ली, ऑक्सिजन के अभाव में लोग मर गए। सारे लोगों से जब ये मंदिर का जयकारा लगवाएंगे तो सारे लोग अपने दर्द भूल जाएंगें क्योंकि हमारे लोग मानसिक गुलाम हैं। जो हमारे पिछड़े हैं, जिनकी कमर में झाड़ू, गले में थूकने के लिए जो हांडी लटकाई गई थी उनको इस बात का एहसास नहीं है कि हम आज जो बराबरी की बात कर रहें हैं संविधान की वजह से कर रहें हैं। संविधान में विश्वास रखने की बजाए हमारे समाज डॉक्टर इंजिनियर, प्रोफेसर जो होता है अपनी काबिलियत और योग्यता और संविधान की बदौलत होता है लेकिन होते ही अपने घर में सत्यनारायण की कथा कहवाता है।  घर में सुंदरकांड का पाठ करवाता है।  जिस पाठ से, सुंदरकांड से, सत्यनारायण कथा से, मनुवादी साहित्य से, मनुस्मृति से, हमको गुलाम बना करके पीढ़ीदर पीढ़ी रखा गया उसी में हमारे मानसिक गुलाम लोग इतने ज्यादा हैं हैं कि मंदिर में जाकर के धक्का-मुक्की खाने के लिए परेशान होते हैं। जब तक लोगों को मानसिक गुलामी का एहसास नहीं कराया जाएगा। तब तक हमें डर है कि मनुवादी सरकारें फिर हम लोगों को हिंदू-मुस्लिम के रूप में लड़ा करके,  यहां पर शिलान्यास करा करके  वोटबैंक बनाने की कोशिश करेंगी। ऐसे में हम पिछड़े लोगों को आपके माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि उनको मानसिक गुलामी त्याग करके संविधान और कानून पर विश्वास करते हुए आन्दोलनों की ताकत को बढ़ाते हुए अपनी एकता को कायम रखनी चाहिए। जिस तरीके से एसटी-एससी एक्ट के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश 2018 में हुई तो पूरे समाज के लोग सड़क पर आ गए और उनको एक्ट वापस लेना पड़ा। इसी मनुवादी, अडानी-अंबानी और आरएसएस की सरकार में 13 प्वाइंट रोस्टर पर उन्हें आन्दोलनों की ताकत पर पीछे हटना पड़ा। इसके बाद सीएए एनआरसी पर उन्होंने तमाम लोगों को जेल की सलाखों के पीछे भेजा। इसके बावजूद लोग जब पीछे नहीं हटे तो उनको बैकफुट पर जाना पड़ा। नीट के सवाल पर वो बैकफुट पर गए। तो मै इस देश के अवाम का आह्वान कर रहा हूं आपके माध्यम से कि वे लोग इसी तरह से बहुजन समाज की एकता को कायम करें। और इस एकता के माध्यम से आंदोलनों के ताकत से सरकार को जातिगत जनगणना के सवाल पर विवश करें कि सरकार इसे कराए। जातिगत जनगणना एक ऐसी चाभी है जो एक साथ कई तालों को खोलेगी। सामाजिक परिवर्तन की भी चाभी है।  वह सत्ता और व्यावस्था में हमारे भागीदारी की भी चाभी है। शैक्षिक रूप से आरक्षण में हमको कहां-कहां कितना प्रतिनिधित्व मिला निजीकरण कहां-कहां कितना हुआ। उन सारे सवालों का एक साथ समाधान करने वाली व्यवस्था का शुरुआत करने वाली चाभी है जातिगत जनगणना।

1 Comment
  1. Gulabchand Yadav says

    बहुत बढ़िया। तमाम जरूरी बातों, तथ्यों, कुचक्रों और आशंकाओं की गहन विवेचना करता हुआ और जातिगत जनगणना की अनिवार्यता और उपयोगिता को तार्किक रूप से विश्लेषित करता हुआ साक्षात्कार। पठनीय, संग्रहणीय और विचारणीय सामग्री। अधिवक्ता प्रेम प्रकाश सिंह जी ने बड़ी प्रखरता और प्रामाणिकता से अपनी बातें रखी हैं जिन पर गौर किया जाना चाहिए।

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