विकलांग नागरिकों के लिए डायरी (19 सितंबर, 2021)  

नवल किशोर कुमार

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सबसे अधिक कमजोर कौन है? क्या वह व्यक्ति सबसे अधिक कमजोर है जो विकलांग है? क्या वह व्यक्ति सबसे कमजोर है जो सबसे गरीब है? क्या वह व्यक्ति कमजोर है जो भूमिहीन है? क्या वह व्यक्ति कमजोर है जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था में जाति के हिसाब से सबसे अंतिम पायदान पर है? या फिर क्या महिलाएं सबसे अधिक कमजोर होती हैं? कमजोर कौन और क्यों? यह सवाल बार-बार मेरे जेहन में आता है। कोई एक राय अब तक नहीं बना पाया हूं। कभी लगता है कि जो गरीब है, भूमिहीन है वही सबसे अधिक कमजोर है। यदि उसकी जाति निम्न हुई तो निस्संदेह वह सबसे अधिक कमजोर। इतना कमजोर कि उससे कोई भी काम करवाया जा सकता है। फिर चाहे सिर पर मैला उठवाना हो या फिर गंदे नाले-नालियों की सफाई करवाना। कभी लगता है कि यह गलत है। सिर पर मैला उठाने वाले या गंदे नाले साफ करने वाले कमजोर नहीं हैं। गुलाम हैं चारवर्णी सामाजिक व्यवस्था में। फिर कमजोर कौन? औरतें?

मेरा अपनी बुद्धि कहती है कि महिलाएं कमजोर नहीं हैं। इच्छाशक्ति के मामले में वह पुरूषों से अधिक दृढ़ होती हैं। वह चाहें तो पहाड़ भी लांघ सकती हैं और जरूरत पड़ने पर पहाड़ को मोम की तरह पिघला भी सकती हैं। मेरे अपने ही घर के महिला सदस्यों में मैंने यह गुण देखा है। हालांकि किसी के मरने पर उन्हें दहाड़ें मारते भी देखा है। लेकिन इसके पीछे का कारण भी बेहद दिलचस्प है। बिहार विधान परिषद की एक पूर्व सदस्या रहीं किरण घई ने एक बार मुझसे यह बात कही थी। महिला दिवस को लेकर मैं कुछ विशेष लिखना चाह रहा था। किरण घई ने कहा कि मेरे घर आओ, कुछ दिखाना चाहती हूं।

हर विकलांग आदमी यही साबित करने को अपने जीवन का लक्ष्य मान लेता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमलोग जो स्वयं को स्वस्थ और मजबूत मानते हैं, विकलांग जनों के लिए चुनौतियां खड़ी कर देते हैं। उसके लिए घृणास्पद संबोधन तो बहुत सामान्य बात है। कई बार तो हम उन्हें इंसान ही नहीं मानते। हम उन्हें देखकर डर जाते हैं कि कहीं ऐसा कुछ मेरे परिवार में न हो।

पटना के हार्डिंग रोड में तब उनका सरकारी आवास था। पहुंचा तब उन्होंने एक पांडुलिपि दिखायी। उसमें गीत संकलित थे। भोजपुरी, मगही, मैथिली के गीत। वही गीत जो गांवों में शादी-विवाह आदि के मौके पर गाए जाते हैं। इन गीतों में स्त्री देह भी होता है और पुरूष देह भी। स्त्रियों की अपनी दुनिया है तो पुरूषों की दुनिया के नजारे भी। मैंने पूछा तो किरण घई ने कहा कि ये गीत नहीं, रोशनदान हैं। रोशनदान! उन्होंने कहा कि हां, ये गीत रोशनदान ही हैं। भारतीय पितृसत्तावादी समाज में महिलाएं कालकोठरी में रहती हैं। इसमें एक मर्द के प्रति पूर्ण समर्पण जरूरी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि महिलाएं कमजोर होती हैं। यह इसके बावजूद कि गुलामी आपके आधे से अधिक गुणों को छीन लेती हैं। महिलाओं ने आगे बढ़कर खुद को साबित किया है।

लेकिन यदि महिलाएं कमजोर नहीं, गरीब और निम्न जातियों के लोग कमजोर नहीं तो फिर सबसे कमजोर कौन हैं?

मेरा अपनी बुद्धि कहती है कि महिलाएं कमजोर नहीं हैं। इच्छाशक्ति के मामले में वह पुरूषों से अधिक दृढ़ होती हैं। वह चाहें तो पहाड़ भी लांघ सकती हैं और जरूरत पड़ने पर पहाड़ को मोम की तरह पिघला भी सकती हैं। मेरे अपने ही घर के महिला सदस्यों में मैंने यह गुण देखा है। हालांकि किसी के मरने पर उन्हें दहाड़ें मारते भी देखा है।

विकलांग जनों के बारे में विचार किया जाना चाहिए। हालांकि यह बात कइयों को नागवार लगेगी यदि मैं विकलांगों को सबसे अधिक कमजोर मानूं। लेकिन मुझे लगता है कि मुझे आलोचनाओं को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए और पूरी प्रतिबद्धता के साथ यह कहना चाहिए कि हां, सबसे अधिक कमजोर विकलांग ही होते हैं। आपके पास पैसे नहीं हों तब भी आप किसी न किसी तरह अपना जीवन जी सकते हैं। महिलाएं भी अपने घर की चाहरदीवारी के भीतर गुलामों सी जिंदगी अपनी मर्जी से जीती हैं। वे चाहें तो विद्रोह कर सकती हैं। कई महिलाएं करती भी हैं। मेरी ही जानकारी में एक गृहिणी ने अपने दो बच्चों और पति को छोड़कर प्रेम किया और अब अपना जीवन जी रही है। गांव समाज के लोग उसे बदचलन कहते हैं। लेकिन मेरी नजर में वह सबसे बहादुर महिला है।

लेकिन विकलांग जन फिर चाहे वे किसी गरीब घर में जन्मे हों या फिर किसी अमीर के यहां, वे कमजोर होते ही हैं। उन्हें जीवन की ऐसी चुनौती से हर समय जूझना पड़ता है जिसकी वेदना की कल्पना भी हम स्वस्थ शरीर वाले नहीं कर सकते। मेरे ही गांव में मेरे गोतिया में एक चाचा थे। नाम था – शिव राय। सामान्य रूप से चल नहीं पाते थे। दोनों पैर एक साथ जमीन पर रखने में सक्षम नहीं थे। लेकिन उन्होंने कभी यह साबित नहीं होने दिया कि वे कमजोर हैं। वे खेतों में हल चलाते। नहर से करिंग के जरिए पानी पटाते। धान बोते,प्याज बोते, बूंट बोते। कितना कुछ करते थे शिव चाचा। फिर उनके बथान पर दो-तीन भैंसें तो रहती ही थीं। उनके उद्यम में उनका साथ निभाती थीं उनकी पत्नी जो खड़ी भी नहीं हो पाती थीं। मुझे लगता कि ये दोनों इंसान इतना मेहनत इसलिए करते हैं ताकि ये दुनिया को बता सकें कि शारीरिक अक्षमता के बावजूद ये दोनों सबसे बेहतर हैं। लेकिन दोनों कमजोर थे। ऐसा मैं मानता हूं। मुझे लगता है कि यदि वे विकलांग नहीं होते तो उनकी जोड़ी गांव की सबसे खूबसूरत जोड़ी होती। गांव की महिलाएं चाची का अनादर नहीं करतीं। कोई शिव चाचा को लंगड़ा नहीं कहता। दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं। दोनों ने अपना पूरा जीवन यह साबित करने में लगा दिया कि वे अक्षम हैं और किसी से कम नहीं।

क्या यह मुमकिन नहीं कि संसद एक विधेयक पारित करे। विधेयक में प्रावधान हो कि कम से कम पांच फीसदी सीटें विकलांग जनों के लिए आरक्षित हो। देश में विकलांगों की आबादी का सटीक आंकड़ा फिलहाल मेरे पास नहीं है। लेकिन यह दावे के साथ कह सकता हूं कि उनकी आबादी 5 फीसदी से कम नहीं होगी। संसद में उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है।

दरअसल, हर विकलांग आदमी यही साबित करने को अपने जीवन का लक्ष्य मान लेता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमलोग जो स्वयं को स्वस्थ और मजबूत मानते हैं, विकलांग जनों के लिए चुनौतियां खड़ी कर देते हैं। उसके लिए घृणास्पद संबोधन तो बहुत सामान्य बात है। कई बार तो हम उन्हें इंसान ही नहीं मानते। हम उन्हें देखकर डर जाते हैं कि कहीं ऐसा कुछ मेरे परिवार में न हो। हमारे साथ कुछ ऐसा न हो जाय। हम अपने डर को दूर रखने के लिए विकलांग जनों से घृणा करते हैं। यही सच है।

अच्छा हम घृणा क्यों करते हैं विकलांगों से? इसके पीछे मैं फिल्म जगत को कटघरे में रखता हूं। फिल्मों में विकलांगों को इसी रूप में दिखाया गया है। मैंने दोस्ती फिल्म को नहीं देखा। शायद यह विकलांगों पर बनाई गई फिल्म है। सच कहूं तो मैं आजतक इस फिल्म को देखने का साहस नहीं जुटा पाया हूं। लाचारी और बेबसी देखना मुझे पसंद नहीं है। मुझे तो वैसी फिल्में पसंद हैं जो प्रेरणा देती हैं। संभव है कि यह मेरी मानसिक कमजोरी हो। अब है तो है। यह तबसे है जब मैंने 1999 में आदमी फिल्म को टीवी पर देखा था। दिलीप कुमार द्वारा अभिनीत इस फिल्म को देखने के बाद मैं डर गया था। फिल्म में एक गाना भी है जो विकलांग होने के बाद दिलीप कुमार के द्वारा निभाए गए कैरेक्टर पर फिल्माया गया है। शायद वह गाना है – आज पुरानी राहों से, कोई मुझे आवाज न दे। दर्द में डूबे गीत न दे, सिसकता हुआ साज न दे।

शायद नब्बे के दशक में एक फिल्म आयी थी – चांदनी। फिल्म में एक सुंदर प्रेमी युगल है। गीत बहुत खूबसूरत हैं। यश चोपड़ा का निर्देशन भी कमाल का है। श्रीदेवी की खूबसूरती तो खैर है ही फिल्म में। लेकिन इस फिल्म में विकलांग पक्ष भी है। प्रेमी एक हादसे का शिकार हो जाता है। उसके मन में यह भाव आता है कि अब वह अपनी पत्नी के साथ सेक्स नहीं कर सकता। चूंकि वह सेक्स नहीं कर सकता और उसकी पत्नी सुंदर है, चंचल है तो उसकी अपनी इच्छाएं भी होती होंगी। यह सोच वह अपनी पत्नी को घर से बाहर निकाल देता है। उसकी पत्नी जब अपने तरीके से जीने लगती है तो उसका बॉस उसके साथ प्रेम के सपने देखने लगता है।

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इस तरह के बेमतलब की फिल्मों ने भारतीय जनमानस में यह बात बैठा दी है कि विकलांग सेक्स नहीं कर सकते। प्यार नहीं कर सकते। प्यार नहीं करने का मतलब सेक्स नहीं कर सकते।

खैर, मैं सोच रहा हूं कि क्या यह मुमकिन नहीं कि संसद एक विधेयक पारित करे। विधेयक में प्रावधान हो कि कम से कम पांच फीसदी सीटें विकलांग जनों के लिए आरक्षित हो। देश में विकलांगों की आबादी का सटीक आंकड़ा फिलहाल मेरे पास नहीं है। लेकिन यह दावे के साथ कह सकता हूं कि उनकी आबादी 5 फीसदी से कम नहीं होगी। संसद में उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था की जा सकती है। ठीक वैसे ही जैसे सरकारी नौकरियों में विकलांग जनों के लिए आरक्षण का प्रावधान है।

मैं यह सोचता हूं कि कभी इस देश का प्रधानमंत्री कोई विकलांग भी बने ताकि विकलांग प्रेरणा ले सकें कि वह भी इस देश और समाज के हिस्सेदार हैं, नेतृत्व कर सकते हैं। विकलांगता कोई कमजोरी नहीं है। इससे मुझ जैसे लोगों को सोचने और समझने का नजरिया मिलेगा कि विकलांग सामान्य लोगों की तुलना में भले ही कमजोर हों, लेकिन उनमें क्षमताओं की कोई कमी नहीं। याद रखिए विकलांग जनों को सहानुभूति की नहीं, बराबरी के सम्मान की जरूरत है। सहानुभूति रखना मतलब खुद को श्रेष्ठ समझने का अहंकार है।

कल, देर शाम ख्वाहिश हुई कि इस बार सर्दी में पहाड़ों पर जाया जाय। कुछ और बातें जेहन में आयीं। फिर सोचा कि इन्हें कहीं दर्ज कर लूं तो एक कविता बन गई। मैं सोच रहा हूं कि कविताएं भी सनहा के जैसी हैं।

 इस बार सर्दी में 

इस बाद सर्दी में

जब पहाड़ के उपर बिछी होगी

बर्फ की सफेद चादर

मैं वह देवदार खोज निकालूंगा

जो दरमियान था हमारे।

देखूंगा कि वह अब भी वैसा ही है

या फिर वह और ऊंचा हो गया है

जानता हूं कि उसके ठीक बगल से 

बहने वाला छोटा झरना नजर नहीं आएगा

जिसका पानी हमने साथ छुआ था

और पानी हमारे अंदर समा गया था।

और भी बहुत कुछ है करने को

इस बार की सर्दी में

पलटने हैं पुराने पन्ने

जलते अलाव के बीच

बर्फीली स्पर्शों को

फिर से सहेजने हैं

वह भी तुम्हारे बिन।

इस बार की सर्दी, सुनो

मैं डरा, भयभीत नहीं हूं

और तुम आश्वस्त रहो

मेरे शब्द तुम्हें निराश नहीं करेंगे

फिर लिखूंगा कविताएं और कहानियां।

बर्फ से शब्द नहीं कंपकंपाते

बर्फ से अहसास नहीं जम जाते

बर्फ से नहीं मिटते अतीत के निशान।

हां, बर्फ से नहीं मिटते अतीत के निशान।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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