एंतोनियो गुतारेस की टिप्पणी (डायरी 5 मई, 2022)

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एंतोनियो गुतारेस संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव हैं। इनकी टिप्पणी से पहले बात यह कि गांवों में जीवन अलहदा ही होता है। यह बात अब भी है। दरअसल, होता यह है कि जब आप गांवों में रहते हैं तो आपके ऊपर अनेक निगाहें लगी होती हैं। मैं अपनी ही बात करता हूं। उन दिनों मैं दारोगा प्रसाद राय हाई स्कूल, चितकोहरा, पटना में आठवीं का छात्र था। घर से स्कूल की दूरी करीब 4 किलोमीटर थी। प्रारंभ में पापा ने साइकिल खरीदकर मुझे नहीं दी थी। दो वजहें थीं। एक तो यह कि मुझे साइकिल चलानी नहीं आती थी और दूसरी यह कि स्कूल जाने के दरमियान बाईपास पड़ता था, जहां आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती थीं। लेकिन जब सातवीं कक्षा में था तब साइकिल पर हाथ और पांव दोनों चलने लगे थे। फिर भैया के कहने पर कि अब यह बाईपास आसानी से पार कर सकता है, पापा ने साइकिल खरीदी।
तो एक बार ऐसा हुआ कि स्कूल से निकलकर अनिसाबाद मोड़ होते हुए घर जा रहा था। रास्ते में साइकिल पंक्चर हो गई। पैसे नहीं थे उस वक्त। जबकि मां ने मुझे पांच रुपए दिये थे स्कूल जाते समय। लेकिन वे पांच रुपए मैं तो दोपहर में ही चाट और लटठो खाने में खर्च कर चुका था। फिर क्या करता, साइकिल खींचते हुए घर पहुंचा। मां से डांट न खाऊं, इसलिए चुपके से बथानी में साइकिल पार्क कर दी। सोचा था कि सुबह में स्कूल जाते समय कहूंगा कि साइकिल पंक्चर लग रही है। डर यह था कि यदि मां और पापा को यह पता लगा कि मैं पैदल ही स्कूल से आया तो वे नाराज होंगे।

संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव एंतोनियो गुतारेस की ओर से जारी एक बयान है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र ने भारत में सांप्रदायिक दंगाें को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। साथ ही कहा गया है कि भारत सरकार अल्पसंख्यकों के ऊपर हो रहे इन घटनाओं को रोकने का प्रयास करेगी तथा सभी भारत में मिलजुलकर रह सकेंगे।

 

लेकिन आंख बंद कर लेने से डर का खात्मा नहीं होता। ठीक ऐसे ही मेरे साथ हुआ। पापा देर रात करीब साढ़े ग्यारह बजे आए। आते ही मां को बोलनेे लगे– ‘आज नवल पैदल क्यों आया? उसकी साइकिल पंक्चर थी। क्या तुमने उसे पैसे नहीं दिए थे?’ मां ने कहा– ‘पैसे तो दिए थे और वह तो साइकिल पर चढ़कर आया था।’
अगली सुबह मुझे डांट मिली और यह सलाह भी कि साइकिल खराब होने की स्थिति में बलम्मीचक मोड़ पर राजू मिस्त्री की दुकान पर बनवा लेना है और पैसे की चिंता नहीं करनी है।
तो मैं यही कह रहा था कि गांवों में अनेक निगाहें होती हैं जो हमें देखती रहती हैं कि हम अच्छा कर रहे हैं या बुरा कर रहे हैं। शहरों में कुछ लोगों के लिए यह सोशल पुलिसिंग है। आजकल की पीढ़ी को लगता है कि उनके ऊपर निगाह रखने का अधिकार किसी को नहीं है। यह आज की पीढ़ी की सोच है। मैं जिस पीढ़ी का हूं, मुझे तो यह अच्छा लगता था। इसके अनेक फायदे भी मुझे हुए। एक तो यह कि बोर्ड करने के बाद एक दोस्त ने तिरंगा नामक गुटखा खिला दिया। नशा हो गया था और मैं घर जाने के रास्ते में ही कुछ देर के लिए सो गया था। गुटखा खाने की बात मेरे घर पहुंचने से पहले ही मां तक पहुंच चुकी थी।

मैं नहीं जानता कि अहंकारवश भारतीय हुक्मरान एंतोनियो गुतारेस की टिप्पणी के संबंध में कुछ कहेंगे या नहीं कहेंगे। वजह यह भी है कि यह गांवों का मसला नहीं है। गांवों में तो होता यह है कि यदि कोई एक व्यक्ति आलोचना कर दे तो आदमी खुद में सुधार लाने की कोशिशें करता है। अलबत्ता कुछ बदमाश जरूर होते हैं, जिनके ऊपर किसी भी आलोचना का असर नहीं होता।

 

खैर, मैं भारत की बात करना चाहता हूं। भारत में इन दिनों सांप्रदायिक दंगे किये जा रहे हैं। दंगे करनेवाले कौन हैं, यह बात किसी से छिपी नहीं है और वजह यह कि इनके पीछे केंद्रीय सत्ता की प्रत्यक्ष भूमिका है। लेकिन शेष विश्व की आंखें फूटी हुई नहीं हैं। सारा विश्व यह देख रहा है कि किस तरह भारत में अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के उपर जुल्म किये जा रहे हैं।
एक उदाहरण संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव एंतोनियो गुतारेस की ओर से जारी एक बयान है, जिसमें संयुक्त राष्ट्र ने भारत में सांप्रदायिक दंगाें को लेकर चिंता व्यक्त की गई है। साथ ही कहा गया है कि भारत सरकार अल्पसंख्यकों के ऊपर हो रहे इन घटनाओं को रोकने का प्रयास करेगी तथा सभी भारत में मिलजुलकर रह सकेंगे।
सनद रहे कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव का बयान ऐसे समय में आया है जब भारत के प्रधानमंत्री यूरोप के टूर पर हैं। उनके विदेश भ्रमण की तस्वीरें और तमाम दावे भारतीय अखबारों के मुख्य पृष्ठों पर प्रमुखता से छापे गए हैं।
मैं नहीं जानता कि अहंकारवश भारतीय हुक्मरान एंतोनियो गुतारेस की टिप्पणी के संबंध में कुछ कहेंगे या नहीं कहेंगे। वजह यह भी है कि यह गांवों का मसला नहीं है। गांवों में तो होता यह है कि यदि कोई एक व्यक्ति आलोचना कर दे तो आदमी खुद में सुधार लाने की कोशिशें करता है। अलबत्ता कुछ बदमाश जरूर होते हैं, जिनके ऊपर किसी भी आलोचना का असर नहीं होता। उनके माता-पिता भी उन्हें छोड़ देते हैं कि यह सुधरनेवाला नहीं है।
लेकिन यह तो एक देश का मसला है और इस देश के निवासियों का मसला है। यदि संयुक्त राष्ट्र ने कोई टिप्पणी की है तो यह बेमतलब की टिप्पणी नहीं है।
संयोग रहा कि कल मेरी प्रेमिका ने मुझे एक शब्द दिया ताकि मैं कविता जैसा कुछ लिख सकूं। शब्द था– आवाज़। कुछ सोचा तो दो बातें सूझीं।
कविता – तुम लगाओ आवाज़
बंद मत रखो अपनी जुबान
जब उनके कोड़े तुम्हारी पीठ पर पड़ते हैं
तुम बोलो और जाहिर करो प्रतिकार
संविधान में निहित है
सम्मान के साथ जीने का अधिकार।
बंद मत रखो अपनी जुबान
जब वे तुम्हें जातिसूचक गालियां देते हैं
तुम बोलो और दो जवाब कि
यह धरती किसी राम की नहीं
तुम्हारे पुरखों की है।
बंद मत रखो अपनी जुबान
हर बार जब कोई छीने तुम्हारा अधिकार
तुम बोलो और लगाओ
बुद्ध, फुले और आंबेडकर की आवाज़ ताकि
सब शिक्षित बनें
सब संगठित बनें
सब संघर्ष करें।
कविता – आवाज़
कबूल करता हूं कि
इश्क है तुमसे
और पसंद है 
तुम्हारी बेखौफ हंसी,
बेखौफ आवाज।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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