दिल्ली विश्वविद्यालय में गाय (डायरी 1 फरवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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ब्राह्मण धर्म सचमुच नायाब धर्म है। इतना नायाब कि यह इंसान-इंसान में भेद तो करता ही है, जानवरों में भी भेद करता है। अब तो इसका प्रदर्शन खुलेआम अकादमिक जगत में होने लगा है और मजेदार यह कि ब्राह्मणों का (कु)तर्क है कि वे ऐसा कर विज्ञान को बढ़ावा दे रहे हैं।

खैर, इस मामले में आगे चर्चा करता हूं। फिलहाल यह कि 1949 में एक फिल्म आयी थी। नाम था– विद्या। इस फिल्म की चर्चा इसलिए ताकि यह दर्ज कर सकूं कि हिंदी फिल्मों के इतिहास में एक इतना शानदार दौर भी रहा है। इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे– सुरैया और देवानंद। यह फिल्म पहली बार कब देखी मैंने, यह याद नहीं है। हां, आखिरी बार कब देखी, यह जरूर याद है। मैं अपनी डायरी के पन्ने पलट रहा हूं तो इसके मुताबिक, आखिरी बार इसे 14 अगस्त, 2021 को देखी थी।

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सुरैया और देवानंद, फिल्म ‘विद्या’ के एक दृश्य में

इस फिल्म की कहानी आजाद हुए भारत की कहानी है। गांधी की हत्या हो चुकी है और इसकी तस्दीक फिल्म के एक दृश्य में दीवार पर लगी गांधी की तस्वीर कर देती है। राम सिंह नामक एक जमींदार जो कि पोशाक से कांग्रेसी मालूम होता है, उसकी भतीजी है विद्या। इस भूमिका का निर्वहन सुरैया ने किया है। और नायक है चंदू उर्फ चंद्रशेखर राम। उसका पिता भोलाराम चमार है और जूते गांठता है।

फिल्म की कहानी के प्रारंभिक दृश्य में ओमप्रकाश वाल्मीकि नजर आते हैं। बालक चंदू जब स्कूल जाता है तो उसके साथ जातिगत भेदभाव किया जाता है। एक दिन एक ब्राह्मण शिक्षक उसे खूब पीटता है। वह पढ़ने की इच्छा त्यागने लगता है लेकिन फिर राम सिंह नायक के रूप में सामने आता है और वह मास्टर को समझाता है कि शिक्षक की तंदुरूस्ती का मतलब यह नहीं है कि वह बच्चों के ऊपर अपनी ताकत आजमाये।

एक समय फिल्में ऐसी बनती थीं कि एक चमार का बेटा नायक बनता था और रियल लाइफ में भी देवानंद-सुरैया जैसे महान इंसान हुआ करते थे, जिनके लिए मजहब कोई दीवार नहीं थी। वैसे आज भी कुछ जोड़ियां हैं, जो इन दीवारों को नहीं मानतीं। मसलन, सैफ अली खान और करीना कपूर की जोड़ी। लेकिन इन दोनों को विरोध बहुत झेलना पड़ा है। सुरैया-देवानंद के मामले में विरोध नहीं था।

जाहिर तौर पर फिल्म में प्रेम कहानी है। विद्या और चंदू दोनों प्यार करते हैं। प्यार से एक बात याद आयी। यह सुरैया की कहानी है। सुरैया पंजाब प्रांत के गुजरावाला जिले के मुसलमान परिवार में जन्मीं थीं। अब यह पाकिस्तान का हिस्सा है। जब देश के विभाजन होने तक नूरजहां सहित अनेक मुस्लिम फिल्मी कलाकार पाकिस्तान चले गए। यहां तक कि सआदत हसन मंटो और नूरजहां भी। लेकिन सुरैया पाकिस्तान नहीं गयीं। हालांकि यह बात कहीं लिखित नहीं है। सुरैया का निधन भी 2004 में हो गया और उनके बारे में जो कुछ पढ़ने को उपलब्ध है, उसमें भी यह बात दर्ज नहीं है कि सुरैया पाकिस्तान क्यों नहीं गयीं।

मेरा अपना मानना है कि सुरैया को देवानंद के प्यार ने रोक लिया। दोनों एक-दूसरे को बहुत प्यार करते थे। अपनी किताब रोमांस विथ लाइफ में देवानंद ने अपनी मुहब्बत का जिक्र किया है। वे लिखते हैं कि सुरैया से उन्हें मुहब्बत थी। उसकी आंखें बहुत सुंदर थीं। एकदम हीरे की माफिक। देवानंद आगे लिखते हैं कि एक फिल्म की शुटिंग के दौरान उन्होंने हीरे की अंगुठी के जरिए अपने प्रेम का इजहार किया था।

यह बात उस समय की है जब देश आजाद हुआ था और पूरे देश में हिंदू-मुसलमान दंगे हो रहे थे। बंबई में एक हसीन जोड़ा धर्म की दीवारें गिरा देना चाहता था। हालांकि एक और दिलचस्प दास्तान है इस हसीन जोड़े के बारे में।

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सुरैया को हॉलीवुड कलाकार ग्रेगरी पेक बहुत अच्छे लगते थे। देवानंद ने सुरैया को रिझाने के लिए ग्रेगरी पेक के अभिनय को आत्मसात कर लिया। कितना अद्भूत था यह प्रेम। ग्रेगरी पेक को जब सुरैया के बारे में जानकारी मिली तो वे 1954 में सुरैया के घर गए और उनसे मुलाकात की।

लेकिन हर प्रेम कहानी में ट्विस्ट होते हैं। सुरैया और देवानंद की कहानी में भी एक मोड़ आया। सुरैया की नानी देवानंद को पसंद नहीं करती थीं। उन्होंने सुरैया को मना कर दिया तो सुरैया ने भी कह दिया कि वह आजीवन अकेले रहेंगीं। हालांकि बाद में देवानंद ने विवाह कर लिया। लेकिन सुरैया अपने वचन पर कायम रहीं और उनका बुढ़ापा नितांत तन्हाई में बीता।

खैर, उपरोक्त फिल्मी दास्तान केवल यह बताने के लिए दर्ज किया है कि एक समय फिल्में ऐसी बनती थीं कि एक चमार का बेटा नायक बनता था और रियल लाइफ में भी देवानंद-सुरैया जैसे महान इंसान हुआ करते थे, जिनके लिए मजहब कोई दीवार नहीं थी। वैसे आज भी कुछ जोड़ियां हैं, जो इन दीवारों को नहीं मानतीं। मसलन, सैफ अली खान और करीना कपूर की जोड़ी। लेकिन इन दोनों को विरोध बहुत झेलना पड़ा है। सुरैया-देवानंद के मामले में विरोध नहीं था।

परंतु फिल्म जगत को छोड़ दें तो असलियत में क्या हो रहा है, इसका नजारा कल दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध हंसराज कॉलेज में देखने को मिला। बड़ी संख्या में छात्र कल विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी मांग थी कि कॉलेज परिसर में बनाए गए गौशाला को हटाया जाय।

आप कहेंगे कि हंसराज कॉलेज में गौशाला का क्या काम? बिलकुल यही सवाल छात्रों ने उठाया है। इसका जवाब हंसराज कॉलेज की प्राचार्या रमा शर्मा ने दिया है। उनके मुताबिक कॉलेज परिसर में स्वामी दयानंद गौ संरक्षण व अनुसंधान केंद्र खोला गया है ताकि गायों पर शोध किया जा सके। छात्रों के आरोपों के बरक्स रमा शर्मा का कहना है कि कॉलेज को तबेले में नहीं बदला जाएगा। केवल एक गाय को रखा गया है ताकि छात्र शोध कर सकें। वहीं छात्रों का कहना है कि गायों के बहाने विश्वविद्यालय में सांप्रदायिक राजनीति की जा रही है।

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जाहिर तौर पर छात्र अपनी जगह सही हैं। यह सवाल तो रमा शर्मा से पूछा ही जाना चाहिए कि गायों को लेकर कौन सा शोध छात्र करेंगे? क्या वे उसके दूध की जांच करेंगे या फिर उसके मूत्र और गोबर की? यदि वे यही सब करेंगे तो फिर भैंस ने उनका क्या बिगाड़ा है? गाय की तरह भैंस भी दूध देती है, मूतती है और गोबर परित्याग करती है। मुझे तो लगता है कि रमा शर्मा और उनके आकाओं को भैंस का दूध, भैंस का मूत और भैंस का गोबर भी जरूर चखना चाहिए। उन्हें स्वयं शोध करना चाहिए कि गाय और भैंस में कितना अंतर होता है? क्या तथाकथित जो तत्व गाय के दूध, मूत्र और गोबर में पाए जाते हैं, वे तत्व भैंस के मामले में नहीं होते?

बहरहाल, मैं तो यह बात व्यंग्यात्मक तरीके से कह रहा हूं, लेकिन यह व्यंग्य नहीं है। शोध के नाम पर आज एक हंसराज कॉलेज में गौशाला स्थापित किया जा रहा है, कल हमारे देश के हुक्मरान संसद के एक कक्ष को गौशाला बना देंगे। वैसे यह आइडिया इतना बुरा नहीं है। लेकिन मैं चाहता हूं कि केवल गाय न रहे, भैंस और सूअर आदि जानवर भी रखे जाएं और उनके तमाम उत्पाद भी हमारे देश के हुक्मरान चखें और देश को एक नया शोध प्रदान करें।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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