लाल रत्नाकर की कलाकृतियों में सामाजिक न्याय की अक्काशी

बी आर विप्लवी

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कला के पारखी विद्वानों ने ललित कला को परिभाषित करते हुए कहा है कि सौन्दर्य या लालित्य के आश्रय से व्यक्त होने वाली कला, ललित कला है। इसे प्रकारांतर से समझा जाए तो यह आशय ध्वनित होता है कि, जो कला या कलाएं सौंदर्य या लालित्य के आश्रय से व्यक्त नहीं होतीं वह ललित कला नहीं हैं, अर्थात वे कोई अन्य कलाएं हो सकती हैं। तो फिर वह कौन सी कला है जो सौंदर्य या लालित्य का सहारा नहीं लेती या उसका प्राप्य अभीष्ट सौन्दर्य नहीं है? इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में जीवन-जगत से जुड़े हुए तमाम तरह के प्राकृतिक एवं बनावटी उपज/उत्पाद और निर्मितियों को सामने रखने पर एक अलग तरह का भाव बोध एवं अवधारणा बनती है।

लोक में एक बहु कथित एवं बहुप्रचलित उक्ति, कि जीवन जीना भी एक कला है- कला के विविध अवयवों, रूपों, अवस्थितियों एवं आयामों को परत-दर-परत खोलती जाती है। यहीं से एक गहरी समझ अपने उद्बोधन  से मन-मस्तिष्क को कदाचित तेज़ रोशनी से उद्भासित कर देती है जहां साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि कला जीवन-जगत के कण-कण में, सांस-उच्छवांस में, हवा-पानी में इस तरह समाहित है कि जैसे कला ही जीवन हो और जीवन ही कला हो।

एक उदाहरण द्वारा यह बात समझी जा सकती है। लोकोपयोगी मिट्टी के बर्तनों की आवश्यक मांग के अनुसार कुम्हार को बर्तन बनाने का काम करना होता है। कुम्हार ने कला के लिए बर्तन नहीं बनाए हैं बल्कि बर्तन के लिए कला की तलाश की है। उपयोगी मिट्टी यानी काली, पीली, चिकनी, दोमट, बलुई इत्यादि की पहचान भी एक हुनर ही है, एक कला ही है। इसके बाद शुरू होती है उस विशेष तरह की मिट्टी को तलाश करके एकत्र करना तथा उसे अपनी कार्यशाला तक ले जाना। फिर मिट्टी में यथोचित अनुपात में पानी मिलाने की अनुभवजन्य कला। मिट्टी को रौंदकर, मथकर, छानकर, गूंथकर ख़ास तरह की लस्सीदार मिट्टी (बर्तन गढ़ने/बनाने लायक)तैयार करने की कला। तत्पश्चात उस मिट्टी से बर्तन गढ़ने/बनाने की कला, बर्तनों को छाया और धूप में बारी-बारी, अनुभव एवं प्रेक्षण के मुताबिक, सही तापमान पर सुखाने की कला। कच्चे बर्तनों को सही तापमान पर पकाने और सुरक्षित बाहर निकालने की कला। अंततोगत्वा बर्तन को सौंदर्य प्रतीकों की रंगों-रेखाओं से सजाने की कला। यहां केवल सौन्दर्य का आश्रय ही नहीं बल्कि एक परिपक्व सम्यक अनुभव की परिपूर्णता का आश्रय लिए बिना अभीष्ट गुणवत्ता का बर्तन नहीं बनाया जा सकता। मिट्टी की गुणवत्ता में कमी के कारण, मिट्टी-पानी मिलाने के अनुपात में असंतुलन के कारण, मिट्टी को छानकर कंकड़ अलग करने की कला में कच्चेपन के कारण, मिट्टी को रौंदकर एक खास तरह का गिलावा(paste) न बना पाने के कारण, चाक पर चढ़ाकर समुचित आकृति न दे पाने के कारण, समुचित ताप मान पर बर्तनों को नहीं सुखाने एवं पकाने के कारण, इन सब में कहीं भी ज़रा सी चूक हो जाने से कुम्हार आवश्यक गुणवत्ता वाले बर्तन नहीं बना सकता है।

जहां निर्माण है वहां कला है। निश्चित रूप से दुनिया के उत्तरोत्तर विकास-क्रम में श्रम-शील निर्माता-समुदाय की कला के अनगिनत जीते-जागते उदाहरण मिल जाएंगे। यह सच्चाई है कि दुनिया में क़दम-क़दम पर, सांस-सांस में कला का अनिवार्य तत्व मौज़ूद है। ऐसी ही कला के उदाहरण नित्य प्रति के जीवन में बिखरे पड़े हैं, जैसे कि मानव सभ्यता के आदिकाल से चली आ रही चर्म-कला एवं प्रस्तर-कला। कालक्रम के अनुसार मनुष्य की उत्तरोत्तर बढ़ती ज़रूरत एवं खोज के फलस्वरूप काष्ठ-कला, धातु-कला, मूर्ति-कला, पाक कला, नृत्य, वाद्य, संगीत-कला, चित्रकला आदि अस्तित्व में आते गये।

इस बर्तन बनाने की कला में बर्तन के उपयोगिता की कसौटी प्राथमिक है, और उसे देखने में सुंदरता होना द्वितीयक है- सौंदर्य आवश्यकता नहीं बल्कि वांछित विकल्प है। इस बर्तन बनाने की कला में सौंदर्य का आश्रय नहीं लिया गया है किंतु वैज्ञानिक संतुलन, समन्वय एवं परिपक्वता के जरिए अभीष्ट निर्मिति को अंजाम दिया गया है जो कि किसी भी मानक सामग्री के सौंदर्य पूर्ण निर्मिति के महत्वपूर्ण अवयव हैं। यह कला जीवन उपयोगी है इसलिए भौतिक जगत की खुराक के रूप में लोकोपयोगी है। कला बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय है इसलिए लौकिक सुख एवं प्रसन्नता का औजार है। यह ललित कला नहीं है फिर भी इसका लालित्य यह है कि इसे हर तरह परिपूर्ण बना हुआ देखकर, अपने उपयोग के लिए समुचित समझकर, अपने साथ ले जाने वाले के मन में एक आनन्ददायक सौंदर्य की संतुष्टि होती है। यह सौंदर्यानुभूति मात्र देखने भर की नहीं बल्कि इसके पूरे वज़ूद में इसकी उपयोगिता के प्रांतर में प्रच्छन्न सौन्दर्य के रूप में भी है। यह ललित कला नहीं बल्कि फलित कला है। इस तरह की कलाओं के अनगिनत उदाहरण हैं।

जहां निर्माण है वहां कला है। निश्चित रूप से दुनिया के उत्तरोत्तर विकास-क्रम में श्रम-शील निर्माता-समुदाय की कला के अनगिनत जीते-जागते उदाहरण मिल जाएंगे। यह सच्चाई है कि दुनिया में क़दम-क़दम पर, सांस-सांस में कला का अनिवार्य तत्व मौज़ूद है। ऐसी ही कला के उदाहरण नित्य प्रति के जीवन में बिखरे पड़े हैं, जैसे कि मानव सभ्यता के आदिकाल से चली आ रही चर्म-कला एवं प्रस्तर-कला। कालक्रम के अनुसार मनुष्य की उत्तरोत्तर बढ़ती ज़रूरत एवं खोज के फलस्वरूप काष्ठ-कला, धातु-कला, मूर्ति-कला, पाक कला, नृत्य, वाद्य, संगीत-कला, चित्रकला आदि अस्तित्व में आते गये। यह बात बहुत बेबाक़ है कि शुरुआती दौर में चरवाहा और गड़रिया के रूप में लोगों ने पत्थर की शिलाओं के ऊपर मनुष्यों और पशुओं की जो आकृतियां बनाईं वे एक दूसरे को रास्ता बताने तथा भटकाव से बचाने के लिए थीं। कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थानों पर ऐसे चित्र संरक्षित हैं जिनके प्राकृतिक रंग इस तरह प्रयुक्त हुए हैं कि वे हज़ारों वर्षों की धूप बारिश और अन्य प्राकृतिक परिवर्तनों के बावज़ूद भी ज्यों के त्यों दिखाई पड़ते हैं। यहां चित्रात्मक कलाकृति के अलावा उन रंगों को बनाने की कला भी विस्मित करने वाली हैं जिनकी मद्द से ये चित्र बनाए गए। निश्चित ही जीवनोपयोगी कलाओं की उम्र लम्बी होती है।

डाक्टर लाल रत्नाकर ने ही इन चित्रों की गहरी खोजबीन की है। यही नहीं उन्होंने विभिन्न कोल्हुओं पर बने चित्रों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया है। ज़्यादातर कलाकृतियों में ग्रामीण-जीवन से जुड़ी हुई परिपाटियों, पक्षियों, वृक्षों आदि चित्रणों को देखा जा सकता है। रुचिकर विषय यह भी है कि हथौड़ी-छेनी के ज़रिए, बिना किसी ट्रेनिंग के, ये शिल्पी और मज़दूर कितनी बारीकी से चित्रों को उकेरे हैं। इन्हें देख कर पुराने अजंता-एलोरा के चित्र याद आने लगते हैं। कुल मिलाकर डॉ लाल रत्नाकर ने चित्र कला और शिल्प कला के इस अनोखे युग्म को खोज निकाला है तथा इसमें छिपी हुई लोक संस्कृति को भी परिभाषित किया है ।

अब हम ललित कलाओं पर बात करते हैं। नाम से ही प्रकट है कि ललित कलाएं सौंदर्य की अनुभूति कराने वाली होती हैं ।अत: यह कहा जा सकता है कि वे भौतिक जगत के लिए आध्यात्मिक ख़ुराक हैं और इसी रूप में उनकी उपादेयता का मूल्यांकन किया जा सकता है। ललित या सौंदर्य क्या है? निश्चित रूप से इसका संबंध मानसिक प्रसन्नता या सुख-शांति से है। इस सौन्दर्य का व्यक्ति की मानसिक प्रसन्नता के रूप में आरोहण किस माध्यम से होता है? बौद्ध दर्शन में छ: संज्ञाओं की बात की गई है। वे हैं- आंख, कान, नाक, जिह्वा, त्वचा एवं मन। इन्हीं के ज़रिए व्यक्ति बाहरी दुनिया की चीज़ों की सुन्दरता या असुंदरता को महसूस करता है। मूर्तिकला, वास्तुकला, नृत्यकला एवं चित्रकला को देखकर, संगीत में काव्य, गायन-वादन को सुनकर तथा नाट्य कला में देख-सुन कर, हर्ष, विषाद, प्रसन्नता या अप्रसन्नता का बोध होता है। अतः पारंपरिक परिभाषा कि ललित कलाएं सौंदर्य का आश्रय ही लेती हैं, पूर्णतया सत्य नहीं है। यहां दुख-सुख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता, हर्ष- विषाद, दया-क्रोध, जुगुप्सा आदि भाव भी पैदा होते हैं। किंतु इन सब का अभीष्टित/इच्छित फल जीवन को दुखों से छुड़ाकर सुख की ओर ले जाने के सौंदर्य-सृजन में निहित है। इसके अलावा लेखन कला भी है जो दृश्य माध्यम होते हुए भी केवल दृश्यकला ही नहीं है। इसीलिए काव्य केवल श्रव्य कला भी नहीं है। लेखन कला द्वारा लिखे हुए साहित्य की भाषा के माध्यम से मन पर सीधा असर पड़ता है तथा शब्दों के स्वीकृत अर्थों, परिभाषाओं एवं अवधारणाओं के अनुसार मन-मस्तिष्क पर उसी तरह का असर पैदा होता है। सभी ललित कलाओं के बारे में एक बात समान है कि इन कलाओं के माध्यम चाहे जो भी हों इनका प्रभाव मन-मस्तिष्क तक पहुंच कर उसमें उसी तरह का भाव पैदा करता है। इन सभी तथा कथित ललित कलाओं का अंतिम गंतव्य मन मस्तिष्क ही होता है। क्योंकि मन-मस्तिष्क ही दुनिया में सभी कार्य व व्यापारों का कारण होता है इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि ये ललित कलाएं जो चित्रों, मूर्तियों, उत्कीर्णन, स्थापत्य, नृत्य, काव्य या नाट्य कलाओं के माध्यम से प्रेषित होते हैं, वे लोकोपयोगी नहीं हैं। निश्चित रूप से वे मन-मस्तिष्क पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं जिसके अनुसार ही व्यक्ति कार्य संपादन का मन बनाता है।

  हम चित्रकला के बारे में विशेष रूप से चर्चा कर रहे हैं जो निश्चित रूप से केवल दृश्य कला ही है और इसे व्यक्त करने की माध्यम रेखाएं, प्रतीक एवं रंग हैं। इन्हीं रंगों और रेखाओं के माध्यम से चित्रकार अपने समय की सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक, राजनैतिक एवं आर्थिक स्थितियों को व्यक्त करता है। चित्रकला में रंगों, रेखाओं और प्रतीकों के संकेतों को समझे बिना चित्रकला के तथ्य और कथ्य को पूरी तरह अप्रिशिएट्स नहीं किया जा सकता है। इसलिए ज़रूरी है कि उन परिभाषाओं के दायरे में रहकर कलाकार की अभिव्यक्ति के संदर्भों एवं उद्देश्यों को अच्छी तरह समझ कर ही उन्हें ग्रहण किया जाए। रंग- रेखाएं चित्र से उठकर देखने वाले के मन मस्तिष्क में जा बैठती हैं। यदि इन रंगों एवं रेखाओं की तर्ज़ुनमानी को सही परिप्रेक्ष्य में मन-मस्तिष्क तक नहीं पहुंचाया गया तो कला का उद्देश्य विफल हो जाता है। इस कारण देखने और समझने के बीच में जो फ़ासला रह जाता है, वही फ़ासला चित्रकार और दर्शक की अवधारणाओं में अंतर पैदा करता है फलत: चित्रकार की मान्यताओं और ध्येय को पूरी तरह दर्शक तक पहुंचाने में विफल कर देता है। आज के वैज्ञानिक युग में जबकि ग्लोबलाइजेशन के बहाने प्राइवेटाइजेशन ने व्यक्तिगत आज़ादी पर भी डाका डालना शुरू कर दिया है, पारम्परिक चित्रकला के कथ्य और तथ्य में भी समय-काल के साथ समयानुकूल परिवर्तन हुआ है। चित्रों को देखते समय इन बातों को भी दिलो-दिमाग़ में रखना पड़ेगा।

इसी पृष्ठभूमि में हमारे समय के ख्यातिलब्ध चित्रकार, मूर्तिकार, कवि-चिन्तक एवं विमर्शकार डॉक्टर लाल रत्नाकर के चित्रों पर नज़र डालते हैं तो हमें पहले से चली आ रही रूढ़ियों और परंपराओं को तोड़कर सर्वथा नई वैचारिकी स्थापित करने वाले चित्रों से सामना होता है। डाक्टरलाल रत्नाकर के चित्र पर बात करते हुए यह भी जान लेना ज़रूरी है कि वह चित्रकार के साथ-साथ एक कुशल मूर्तिकार भी हैं।

उनके द्वारा गढ़ी गई मूर्ति जो गाजियाबाद जैसे महानगर के मुख्य चौराहे पर स्थापित है, उनकी मूर्ति- कला का अद्भुत नमूना है। वे साहित्य एवं सामाजिक विमर्श में भी अच्छी दख़ल रखते हैं। इस परिचय के माध्यम से, चित्रों में, उनके बौद्धिक धरातल के रूपांतरण की गहराई को महसूस करने में सुविधा होगी।

रत्नाकरजी ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं इसलिए यह लाज़मी है कि उनके चित्रों के किरदार, वातावरण तथा कथ्य भी उसी पृष्ठभूमि से लवरेज़ हों। उनके चित्रों में घसियारनें हैं, हलवाहे हैं, चरवाहे हैं, बकरिहारे हैं, दूधिए हैं, लकड़हारे हैं, मोची हैं, बहंगी-डोली ढोते कहार हैं, धुनकी चलाते धुनियां हैं, रहट-पुरवट से सिंचाई करता कृषक परिवार है, चाक चलाता कुम्हार है, घानी लगाकर तेल पेरता तेली है, पनवाड़ी है, भड़भूजा है, हजामत करता नाई है, धान की रोपनी करती रोपनहारिनें हैं, कथा बांचता-शंख बजाता ब्राह्मण है, झूला झूलती सखियां हैं, आलता-महावर-काजल-टिकुली-मेंहदी की सज-धज है, तेल-उबटन है, काजल पारती मांएं हैं, दही बिलोती ग्वारन है, आल्हा गाता नट समुदाय है, जानवर के सींग से बनी तुरही बजाता डोमराज है, जंगल से पत्ते तोड़कर लाता और उनसे पत्तल बनाता मुसहर समुदाय है, दंगल-कुश्ती है, होली-दीवाली है, पनघट की हंसी-ठिठोली है, घूंघटपट से पाहुन का कुशल-क्षेम पूछती स्त्री है, चूल्हा-चौका है, घर-चौबारे की गप-शप है, गाय, भैंस, भेड़ों, बकरियों के रेवड़ हैं, हुक्का-पानी है, जन्म-मरण, शादी-ब्याह, नाच-नौटंकी, मेला-सर्कस, जलसा-जुलूस आदि अनगिनत विषय हैं जो डॉक्टर लाल रत्नाकर की कला में ग्रामीण समाज को ज़िंदा रखे हुए हैं। विषय की विविधता के होते हुए भी चित्रों के केंद्र में नैसर्गिक मानवीय चेतना के साथ मनुष्य की स्वतंत्रता एवं मानवीय मूल्यों की सर्वोपरि स्वीकृति का दस्तावेज है।उनकी तूलिका रंगों और आकृतियों के माध्यम से गूढ़ एवं जटिल विषय वस्तु को भी सरल बनाकर व्याख्यायित करते हुए पेश करती है, किंतु, उस सरलता में भी एक विशिष्ट तरह का इशारा छुपा होता है जिसे बारीक़ी से समझने और विश्लेषण करने वाली नज़र चाहिए होती है। उनके चित्रों के माध्यम से एक बहुत बड़े सामाजिक-वैचारिक विमर्श को नया आयाम मिलता है।

तृष्णा : आयल ऑन कैनवास

उनके चित्रों में अक्सर ग्रामीण परिवेश अपनी पुरातन परिपाटी के साथ-साथ नवोन्मेषी भाव भंगिमा में नज़र आता है। उनकी यह कला अपने पुराने इतिहास की पृष्ठभूमि में वर्तमान परिस्थितियों को रूपायित करने के लिए एक सेतु का काम करती है। डॉ.लालरत्नाकर ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने भारतीय ग्रामीण जीवन की श्वांस-प्रश्वांस में जड़ीभूत वर्ण-व्यवस्था वाली घृणित जीवन शैली को शायद पहली बार चित्रों के ज़रिए जीवंत करते हुए देश और समाज से कुछ गहरे सवाल पूछे हैं–यथा मनुष्य मनुष्य में जन्मना भेद क्यों, तथा एक व्यक्ति जन्म के आधार पर किस प्रकार नीच तथा उच्च माना जाता है? आखिर सारी योग्यताओं की कसौटी तथा मापदंड भारत में जाति ही क्यों है? क्या किसी के श्रम, कला, ज्ञान-विज्ञान तथा उसकी निर्माणकारी सोच एवं निर्मिति  की इस देश के विकास में कोई अहमियत नहीं है? आदि आदि। मेरी जानकारी में शायद यह पहली बार है कि ऐसे ज्वलंत तथा  साश्वत प्रश्न पर किसी ने सवाल उठाया है। तथा कथित कुलीन मानसिकता वाले प्रच्छन्न जातीयदम्भ से परिपूर्ण मनीषियों- कलाकारों में अकेले पड़जाने का जोख़िम उठाकर, हिम्मत से -सामाजिक विसंगतियों के विरुद्ध खड़े होने का जो काम उन्होंने किया है वह बहुत ही विरल है। मैं उनकी अद्भुत कला तथा उसमें समाए हुए दलित-बहुजन जीवन से जुड़े तमाम पक्षों से अभिभूत हूं। उनकी नैतिक समझ और कुरीतियों से लोहा लेने की उनकी अदम्य क्षमता को यूंही उत्तरोत्तर बढ़ते जाना होगा।

रत्नाकर जी के ग्रामीण-जीवन से जुड़े चित्रों का अर्थ यह क़तई नहीं है कि वे आधुनिकता के विरोधी हैं। वे आधुनिकता के नाम पर मनुष्य के मानसिक विपणन एवं मानसिक गुलामी के विरुद्ध हैं। प्रकृति से जुड़े गांव की परम्पराओं से उनकी मुराद स्वच्छंद, निर्विकार एवं निष्कपट जीवन से है जो किसी भी व्यक्ति के सुखमय जीवन के लिए आवश्यक है, और यही सुखमय जीवन उसकी खुशियों का पर्याय है- जो कला का भी अभीष्ट है।

घसिहारिने : आयल ऑन कैनवास

उदाहरण के लिए ‘घसिहिरिनें’ चित्र में घसिहारिन स्त्रियों के घूंघट-पट अध खुले से हैं जिसमें रूप सौष्ठव की जगह सौन्दर्य-सौष्ठव(मॉडेस्टी) नज़र आता है। घास की टोकरियों को कांख में दबाए हुए भी वह बातचीत की तर्क पूर्ण मुद्रा में उंगलियों के इशारे करती नज़र आती हैं। घास खोदे जाने के रोज़ाना के एकान्तिक एवं उबाऊ कार्य में इन स्त्रियों ने अपनी सामूहिक सालिडैरिटी को अपना घोषित स्वातंत्र्य मानकर छोटा-मोटा क्लब सा बना लिया है जहां वे एक दूसरे से दुखम-सुखम, हंसी- ठिठोली, गिले-शिकवेकर लेती हैं। यही नहीं यहां वे पुरुष-सत्ता की धौंस और दादागिरी से मुक्त होकर कुछ पल आज़ादी की सांस लेती हैं। ऐसी आज़ादी को वे काम करते हुए भी इंजॉय करती हैं। चित्र में पीछे संकेतों में ग्रामीण माहौल का अनुकूल वातावरण तैयार किया गया।चित्र में स्त्रियों के चेहरे की भाव-भंगिमा दिखाई नहीं पड़ती है फिर भी रंगों और लकीरों के ज़रिए यह चित्र साफ़ व्यक्त करता हैं कि दो महिलाएं आपस में किसी विषय पर तीखा वाद-विवाद कर रही हैं। चित्रों के रंग रेखाओं से इसके भाव धीरे-धीरे पिघल-पिघल कर आंखों के रास्ते दिलो-दिमाग़ को तर्क करते जाते हैं। यह प्रस्तुति का विलक्षण तरीक़ा है तथा कला का अद्भुत नमूना भी है।

कलाकार जब लिंगभेद और मर्दवादी प्रभुत्व के बारे में अवलम्बन के सहारे अपने चित्रों से संदेश देता है, वह देखते बनता है।एक तरफ़ गाय है जो शांत बैठी है, दूसरी तरफ सांड पूरी ठसक के साथ रौब में गाय की तरफ़ मुखातिब है। ज़ाहिर तौर पर आप चित्र में गाय और सांड का बयोलॉजिकल लैंगिक भेद नहीं कर सकते किंतु दोनों ही जानवरों के भंगिमा और द्वारा यह साफ़ नज़र आ जाता है कि नर कौन है और मादा कौन? ऐसा डॉक्टर लाल रत्नाकर की कला के बूते की ही बात है कि एक ही शक्ल सूरत के दो जानवरों की भाव- भंगिमा से वे दोनों के बीच के लैंगिक भिन्नता को पहचान नायक बना देते हैं। एक जानवर जो सीधे मुंह से शांत, सौम्य,निर्विकार बैठा है- उसके चेहरे पर सदासयता है, करुणा है, माडेस्टी(रूप सौष्ठव) है, उसके बरअक्स जो दूसरा जानवर बैठा है, वह उसी तरह की शक्ल सूरत लिए हुए भी अपनी भाव-भंगिमा के कारण कुछ अलग प्रतीत होता है , यथा-उसकी गर्दन यूं मुड़ी हुई है जैसे वह मादा जानवर को गुस्से में कोई उपालंभ दे रहा हो, नथुने फुलाए है जैसा क्रोध में होता है। यह चित्र पारंपरिक मर्दवादी समाज को आईना दिखाता है ।

डाक्टरलाल रत्नाकर के चित्रों में नारी जगत के चित्र बहुतायत में अपनी पूरी जीवंतता लेकर उभरे हैं।यह कोई अप्रत्याशित नहीं है तथा बहुत ही साफ़ कहा जा सकता है कि ग्रामीण समाज की पूरी अर्थव्यवस्था, विशेषरूप से दलित-बहुजन समाज की,स्त्री के कंधों पर ही टिकी हुई है। वहां स्त्री भोग्या नहीं बल्कि जीवन के हर कार्य-व्यापार में बराबर की सहभागी एवं हिस्सेदार है। घर गृहस्थी के कार्यों में वह पुरुष के साथ हर कार्य-स्थल पर  देखी जा सकती है यथा खेतों की जुताई, बुआई, सिंचाई, कटाई, मड़ाई से लेकर पशु पालन, मिट्टी के बर्तन बनाना, रंगना, हर तरह के घरेलू कार्यों को अंजाम देना, हाट-बाज़ार आदि अनगिनत कार्यों में वह निर्णायक भूमिका में है। ऐसे परिदृश को कला में उपस्थित करना ही कृषिजीवी समाज के साथ न्याय पूर्ण ही नहीं होगा बल्कि अन्नदाता के प्रति सच्ची कृतज्ञता होगी ।

इन्हीं वैचारिक प्रभाव में इन्हीं प्रसंगों को कलाकार बार-बार अपने चित्रों में लाता है। चाहे वह खेत खलिहान का दृश्य हो, जुताई-बुवाई का दृश्य हो,पशुओं के साथ उनके तादात्म्य में तथा पालनकर्ता के रूप में लगाव का चित्र हो, या फिर घरों में ओखल-मूसल, आटा चक्की पर गीतात्मक श्रमशीलता, सिल बट्टा के साथ, घसियारनें, पनिहारिनें, या गांव या खेतों में महिलाओं की आपसी गोष्ठी और दुखम-सुखम के चित्र हों, वे अपने परिवेश के क्लाइमैक्स तथा माहौल को साथ लेकर उपस्थित होते हैं। चित्रों में उनकी भाव-भंगिमा, चितवन, हाथों के इशारे तथा उनके वेशभूषा ने चित्रों में जो कुछ अनकहा सा छुपा होता है-जो अपने आप बहुत सारी कथा-कहानियों को व्याख्यायित करता है।यही नहीं बल्कि इन चित्रों में स्त्री की देह की प्राचीन भोगवादी और मनुवादी यौनिकिता से अलग हटकर उसके श्रम तथा कार्यव्यापार को प्रमुखता से अंकन किया गया है। यहां स्त्री कोई बाज़ारूवस्तुया ‘उपयोग करो और फेंक दो’ वाली वस्तु बनकर नहीं आती बल्कि वह समाज में अपनी पूरी दावेदारी के साथ आती है।

डॉक्टर लाल रत्नाकर

उनके कई चित्रों में तोस्त्री-चरित्र अपनी पूरी मालिकाना ठसक के साथ चार पाई पर या मचिया पर बैठी हुक्म चलाती मालकिन के रूप में व्याख्यायित नज़र आते हैं जो हमारी पुरानी मातृप्रधान जीवन परंपरा की याद दिलाते हैं।इन चित्रों में स्त्री, आगे आने वाली पीढ़ी की बहू- बेटियों को किस प्रकार नैतिकता एवं आचरण का पाठ भी अपने कार्यव्यापार में शरीक़ करके ही सिखाती हैं जिससे जिंदगी का व्यावहारिक ज्ञान हासिल हो सके।

बुकवा : आयल ऑन कैनवास

एक पेंटिंग है’बुकवा’। इस नाम को नए ज़माने, ख़ास कर नगरीय जीवन में रचे-बसे लोग, शायद ही पहचान पायें-इससे अपनापा तो बहुत दूर की बात है।किंतु संतोष का विषय यही है कि आज भी ग्रामीण जीवन में नवजात शिशु(जनमतुआ) को कम से कम एक साल तक, दिन में तीनों वक़्त, उबटन-तेल से मालिश अवश्य की जाती है।इस चित्र में पूरा ग्रामीण परिवेश उपस्थित है अर्थात बाग-बगीचा, जनसामान्य घर की देहरी, छोटी चारपाई यानी खटोला पर एक मां बच्चे को अपनी दोनों टांगों के बीच लिटा कर मालिश करती हुई। इस प्रकार हम देखें तो डॉ लालरत्नाकर ने अपने चित्रों के माध्यम से ग्रामीण जीवन की सामान्य से सामान्य दिनचर्या एवं परंपराओं को अपने चित्रों में उतार दिया है जिसे देखकर मन ग्रामीण जीवन की निर्विकार प्रकृति का मुरीद हो जाता है।

उनके द्वारा पत्थर के कोल्हू पर उकेरी गई कलाकृतियों को पूर्वांचल के कई जिलों के गांवों में से खोज निकाला गया है। अब जबकि लगभग सौ साल से गन्ना पेराई की यह पुरानी कोल्हू वाली व्यवस्था बंद है तथा उसकी जगह पर नई तकनीकी मशीनों ने कार्यभार संभाल रखा है, ये पुराने पत्थर के बने कोल्हू परित्यक्त अवस्था में कहीं औंधे मुंह कूड़े-कचरे के ढेर में लावारिस से पड़े हैं। डॉ रत्नाकर ने बाकायदा गांव में जाकर ऐसे प्रस्तर-कोल्हुओं का सर्वेक्षण किया है तथा उन पर उकेरे गए चित्रों और कलाकृतियों को कला की बारीकियों से समीक्षा किया है जो कला जगत के लिए उनका एक सकारात्मक योगदान है।

अपने चित्र में चित्रकार डॉक्टर लाल रत्नाकर स्त्री देह की सुंदरता का अक्स तो दिखा रहे हैं लेकिन उस सुंदरता को प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने का  जो सुनहरा मौका वे सृजित कर देते हैं उससे इस सुंदरता की अर्थवत्ता तथा उसकी प्रासंगिकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार वे अपने कई चित्रों में समाज के निचले वर्ग के कामगारों की मेहनत-मशक़्क़त भरी जिंदगी को भी वे अपने चित्रों में उतार देते हैं। जैसे साफ़-सफ़ाई में लगे स्त्री-पुरुष, झाड़ू लेकर अपने कार्य में किस प्रकार सेवा भावना से लगे हुए हैं तथा वहीं बैठा कोई धर्म का तथा कथित पंडा-पुरोहित अपनी माला-टीका,छाप-तिलक, धोती-जनेऊ के लम्पट, साज-सज्जा में अपनी शातिर नज़रों से किस प्रकार उन्हें देखता है – यह भी चित्र वहां मिलते हैं।यही नहीं बल्कि गांव-गिरांव में पूजा-पाठ, हवन-पूजन के नाम पर किस प्रकार ब्राह्मणवादी परंपरा लोगों को मानसिक गुलाम बनाकर उनका आर्थिक शोषण कर रही है- इसके भी चित्र वहां बहुतायत से देखे जा सकते हैं।वास्तव में डॉ.लालरत्नाकर का एक-एक चित्र अपने आप में कथानक के साथ पूरा उपन्यास है, जिसके बारे में विस्तार से बात की जा सकती है।

पाहुन : आयल कैनवॉस

पाहुन नाम के उनके बनाये हुए चित्र में एक जीती जागती कहानी नज़र आती है जो ग्रामीण परिवेश में पाहुन अर्थात नई व्याहता का का दूल्हा (पति) पाहुन को किस तरह ऊंचा आसन दिया गया है तथा उसकी सास मां नीचे मचिया पर बैठकर उससे तनिक पर्दा करके कुशल क्षेम पूछ रही हैं और पाहुन हथेली को ठोढ़ी पर टिकाए, तनिक बड़े लोगों के मर्यादा में, संकोच भाव प्रकट करते हुए मुखातिब है । चारपाई से सटे हुए दो बच्चे भी दिखाई देते हैं जो किसी मेहमान या पाहुन के आने पर अक्सर जुट आते हैं। चारपाई के पीछे जैसे नेपथ्य में कुछ पड़ोसिनें आपस में विचार-विमर्श कर रही हैं जो शायद, नए मेहमान के आने के सम्बन्ध में ही कोई टीका-टिप्पणी कर रही हों। पूरे चित्र में सास और दामाद के बीच में जो वार्तालाप है वह स्थिर होते हुए भी गतिमान है। मर्यादावश, लाजवन्ती नई नवेली, दूर ओट में खड़ी, घूंघट की आड़ से पाहुन के साथ चल रही बातचीत का टोह ले रही है। कुल मिलाकर यह चित्र बेजोड़ है तथा आपसी प्रेम-व्यवहार एवं नाते-रिश्ते के अदब लिहाज के पारंपरिक तरीक़ों को बख़ूबी व्यक्त करता है।

डॉक्टर लाल रत्नाकर ने चित्रकला सृजन के अलावा पुरानी लोक-कला परंपरा पर गहरा शोध कार्य भी किया है जो अपने तरह का अनोखा कार्य है।

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उदाहरण के लिए उनके द्वारा पत्थर के कोल्हू पर उकेरी गई कलाकृतियों को पूर्वांचल के कई जिलों के गांवों में से खोज निकाला गया है। अब जबकि लगभग सौ  साल से गन्ना पेराई की यह पुरानी कोल्हू वाली व्यवस्था बंद है तथा उसकी जगह पर नई तकनीकी मशीनों ने कार्यभार संभाल रखा है, ये पुराने पत्थर के बने कोल्हू परित्यक्त अवस्था में कहीं औंधे मुंह कूड़े-कचरे के ढेर में लावारिस से पड़े हैं। डॉ रत्नाकर ने बाकायदा गांव में जाकर ऐसे प्रस्तर-कोल्हुओं का सर्वेक्षण किया है तथा उन पर उकेरे गए चित्रों और कलाकृतियों को कला की बारीकियों से समीक्षा किया है जो कला जगत के लिए उनका एक सकारात्मक योगदान है। मज़े की बात यह है कि इन कोल्हुओं के ऊपर बने चित्रों के कलाकार के बारे में कोई अता-पता नहीं है। यह क़यास ही लगाया जा सकता है कि पत्थर के कोल्हू-निर्माण में लगे हुए मज़दूर एवं शिल्पी वर्ग ने ही यह कार्य अंजाम दिया होगा और उनकी औक़ात दिहाड़ी मजदूरों से कुछ ज़्यादा नहीं रही होगी। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है भारत में ज़्यादातर शिल्प कलाएं इसी प्रकार मज़दूरों और शिल्पियों का ख़ून पीकर अपने मालिकों के गाल की लालिमा चमकाने में लगी हुई थीं-वह चाहे प्राचीन भारत रहा हो या मुगल शासन काल रहा हो। हां ब्रिटिश शासन काल में काग़ज़ों, दस्तावेजों, कलाकृतियों के बारे में अधिक सुसंगत ढंग से सोच विचार, रख-रखाव किया गया।अत: इस दौर में कुछ विलक्षण प्रतिभाओं को छिटपुट पहचान मिलती रही। जो भी हो यह सच है कि इन कोल्हुओं पर बनाए गए चित्रों में जो लोक-जीवन, लोक-संस्कृति और प्रकृति की निराली छटा उकेरी गई है उसे देख कर बनाने वाले शिल्पकार और चित्रकार के प्रति मन में अगाध श्रद्धा पैदा होना स्वाभाविक है। किंतु खेद का विषय है कि हम ऐसे कलाकारों के बारे में कुछ भी नहीं जानते। डाक्टर लाल रत्नाकर ने ही इन चित्रों की गहरी खोजबीन की है। यही नहीं उन्होंने विभिन्न कोल्हुओं पर बने चित्रों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया है। ज़्यादातर कलाकृतियों में ग्रामीण-जीवन से जुड़ी हुई परिपाटियों, पक्षियों, वृक्षों आदि चित्रणों को देखा जा सकता है। रुचिकर विषय यह भी है कि हथौड़ी-छेनी के ज़रिए, बिना किसी ट्रेनिंग के, ये शिल्पी और मज़दूर कितनी बारीकी से चित्रों को उकेरे हैं। इन्हें देख कर पुराने अजंता-एलोरा के चित्र याद आने लगते हैं। कुल मिलाकर डॉ लाल रत्नाकर ने चित्र कला और शिल्प कला के इस अनोखे युग्म को खोज निकाला है तथा इसमें छिपी हुई लोक संस्कृति को भी परिभाषित किया है ।

समग्रतामें डा. लालरत्नाकर के चित्रों में जिस समाजवाद का झंडा बुलंद है उसकी आवाज़ गली-मोहल्ले,गांव-गांव से अपनी बेचैनी के साथ नमूदार हो रही है जो शायद एक सच्चे कलाकार की कामयाबी की निशान देही करता है। कला-साम्राज्य की जिस पाएदारी, जिस पारितोषिक एवं जिस पहचान के हक़दार डॉ.लालरत्ना कर हैं, वह शायद उन्हें आज तक भी नहीं मिल पाया  है ।यही भारतीय सामाजिक विभेद की कलई खोलने के लिए पर्याप्त है जिसके कारण एक बहुत बड़े वर्ग के पास उपलब्ध कला तथा तकनीक बिना प्रोत्साहन के अंतिम सांसे  गिन रही है ।शायद इस देश में जाति तथा वर्ग चरित्र के कारण लाल रत्नाकर जैसे कितने ही कलाकार खुद अपने देश-समाज में ही अनचीन्हे बने हुए हैं।किंतु जो लोग कला के मर्म को समझते हैं, ऐसे कला-उपासकों के ज़रिए उनकी कलाकृतियों ने देश-विदेश में धूम मचा रखी है ।कला के साथ परिवर्तनकारी सोच का ऐसा समन्वय बिरलाही  कहीं मिले। ऐसे मनीषी कलाकार को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।


बी.आर.विप्लवी मशहूर ग़ज़लकार, कवि, कथाकार, चिन्तक एवं सामाजिक विमर्शकार हैं।

1 Comment
  1. बी आर विप्लवी says

    डाक्टर लाल रत्नाकर के चित्रों की प्रासंगिकता ग्रामीण जीवन के अन्तर्द्वन्द के संक्रमण कालीन अवयवों के सापेक्ष देखने में अधिक है। बधाई एवं शुभकामनाएं “गांव के लोग “संपादक मंडल को।

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