क्रूरता : सब जग देखा एक समाना डायरी (11 सितंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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बरसों बाद एक परेशानी फिर से परेशान कर रही है। मैं इसे बीमारी नहीं कहता। हालांकि मेरे चिकित्सक इसे एक बीमारी की संज्ञा देते हैं और ठीक होने की दवा भी। परेशानी यह है कि मुझे रोज सुबह उठने पर पीठ और कंधे के पास दर्द का अनुभव होता है। किसी-किसी दिन यह अनुभव बहुत कड़वा होता है। कभी-कभी कम कड़वा। लेकिन दर्द तो रहता ही है। ऐसा पहले भी होता था एक दशक पहले संभवत: यह शुरू हुआ। किसी साल पांच दिन का मेहमान तो किसी साल एक महीने तक मेरे शरीर में रहा। इस बार भी बीते एक सप्ताह से डेरा जमाए बैठा है। इस कारण होता यह है कि आंखें बहुत पहले खुल जाती हैं और मैं दर्द को झेलता रहता हूं। दो दिन पहले एक डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने बस एक दवा दी है। खाने से आराम है, परंतु पूर्ववत नहीं हो पाया हूं।

मजे की बात यह है कि दर्द का अनुभव अधिकतम एक घंटे तक ही होता है। फिर पूरे दिन दर्द गायब रहता है। गोया दर्द ना होकर अलार्म हो गया हो। इसका काम मुझे जगा देना है और फिर शांत हो जाना है। मुझे लगता है कि मौसम बदलने का असर मेरे शरीर पर पड़ता है। हर मौसम के हिसाब से अलग-अलग। मतलब यह कि जब गर्मी खत्म होती है और बरसात के दिन शुरू होते हैं तो मुझे बुखार आता है। बरसात के बाद ठंड के आगमन के पहले यह दर्द। और ठंड के बाद गर्मी के आगमन के पहले बुखार।

मेरे गृह प्रदेश बिहार में होने वाली हिंसक घटनाएं कम नहीं हैं। अभी दो दिन पहले बिहार में एक त्यौहार तीज मनाया गया। यह त्यौहार महिलाएं करती हैं ताकि पतियों की आयु लंबी हो। इसके लिए वह 24 घंटे तक निर्जला उपवास करती हैं। अब सोचिए कि कोई महिला जो अपने पति के लिए व्रत कर रही हो और दिन भर भूखी-प्यासी हो, यदि उसी दिन उसे उसके ससुराल वाले जिंदा जला दें तो ऐसी हिंसा को क्या कहा जाए। यही हुआ है जहानाबाद में

बुखार तो सामान्य तौर पर एक-दो दिनों में ठीक हो जाता है। परंतु, यह दर्द बेहद खास है। मेरा इम्तिहान लेता रहता है। अब मैंने इसका उपाय खोज निकाला है। दर्द के अनुभव से अधिक मेरा मस्तिष्क कुछ दूसरी सूचनाएं ग्रहण करे, इसके लिए कुछ नया पढ़ता हूं। कुछ ऐसा जिसमें नयी तरह की सूचनाएं हों ताकि मस्तिष्क व्यस्त हो जाय। फिर होता यही है कि आधा-एक घंटा के बाद दर्द नहीं रहता।

आज भी दर्द का अनुभव हो रहा है। लेकिन शायद दवा का असर है। कल और परसों के जितनी पीड़ा नहीं है। बस सुबह उठकर एक कप कॉफी पी और दिमाग को सूचनाएं देने के लिए जनसत्ता का ई-पेपर देख रहा हूं। पहली खबर झकझोरने वाली है। अफगानिस्तान में तालिबानियों ने पूर्व उपराष्ट्रपति अमरूल्लाह सालेह के बड़े भाई रोहुल्लाह सालेह की हत्या कर दी है। खबर के मुताबिक तालिबानियों ने उनकी हत्या इसलिए की क्योंकि वे पंजशीर से काबुल जाने की फिराक में थे। यह खबर झकझोर रही है। खबर के अनुसार, रोहुल्लाह की हत्या से पहले तालिबानियों ने उन्हें कोड़ों से पीटा। फिर बिजली के तारों से प्रहार किया। इसके बाद उनका गला रेता और जब वे तड़प रहे थे तब उनके उपर गोलियों की बौछार कर दी।

एक खबर और है जिसके कारण मैं यह सोचने पर बाध्य हो रहा हूं कि हिंसा चाहे कहीं भी हो, उसके स्वरूप में बहुत अधिक अंतर नहीं है। यह खबर है आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले से। आंध्र प्रदेश भारत का ही एक प्रांत है। अफगानिस्तान का हिस्सा नहीं है। बीते बुधवार की रात यहां एक 26 साल की महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। लेकिन इसके पहले जो कुछ हुआ वह तालिबानियों की क्रूरता से भी अधिक क्रूर है। अपराधियों ने पहले पीड़िता के पति को पीट-पीटकर अधमरा कर दिया। पीड़िता गिड़गिड़ाती रही। लेकिन अपराधियों के मन पर उसकी याचना का कोई असर नहीं हुआ। अपराधियों ने उसके पति को इतना पीटा कि वह उठकर बैठने की स्थिति में भी नहीं था। फिर अपराधियों ने उसे एक पेड़ से बांध दिया। इसके बाद उसकी आंखों के सामने उसकी पत्नी के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया।

अब मेरे सामने तीन हिंसक घटनाएं हैं। मेरे पास कोई मानक नहीं है जिससे मैं यह निर्धारित कर सकूं कि कौन-सी घटना अधिक हिंसक है और कौन-सी कम हिंसक।लेकिन इन तीनों घटनाओं में एक बात कॉमन है- वर्चस्व। अफगानिस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया जा रहा है।

बात हिंसा की हो तो मेरे गृह प्रदेश बिहार में होने वाली हिंसक घटनाएं कम नहीं हैं। अभी दो दिन पहले बिहार में एक त्यौहार तीज मनाया गया। यह त्यौहार महिलाएं करती हैं ताकि पतियों की आयु लंबी हो। इसके लिए वह 24 घंटे तक निर्जला उपवास करती हैं। अब सोचिए कि कोई महिला जो अपने पति के लिए व्रत कर रही हो और दिन भर भूखी-प्यासी हो, यदि उसी दिन उसे उसके ससुराल वाले जिंदा जला दें तो ऐसी हिंसा को क्या कहा जाए। यही हुआ है जहानाबाद में। मृतका के पिता ने मामला दर्ज कराया है। मरने से पहले मृतका ने पुलिस को जो बयान दिया, वह कल्पना से भी परे है। उसकी शादी 2015 में हुई थी। उसके ससुराल वाले दहेज के लिए दबाव बनाते थे। तीज के दिन भी दहेज को लेकर बक-झक हुई और परिजनों ने अनामिका को जला दिया।

अब मेरे सामने तीन हिंसक घटनाएं हैं। मेरे पास कोई मानक नहीं है जिससे मैं यह निर्धारित कर सकूं कि कौन-सी घटना अधिक हिंसक है और कौन-सी कम हिंसक। लेकिन इन तीनों घटनाओं में एक बात कॉमन है- वर्चस्व। अफगानिस्तान में जो कुछ हो रहा है, वह वर्चस्व स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। इसी तरह का वर्चस्व स्थापित करने के लिए घटना बिहार के फारबिसगंज के भजनपुरा गांव में जून, 2011 में घटित हुई थी। भाजपा के एक उद्योगपति विधान पार्षद का वर्चस्व जमीन पर कायम हो, इसके लिए भजनपुरा के लोगों पर पुलिस के द्वारा गोलियां चलायी गयी थीं। क्रूरता की सारी हदें पार करता हुआ बिहार पुलिस का एक जवान एक सत्रह साल के किशोर नौजवान, जिसे गोलियां लग चुकी थीं, उसके शरीर पर कूद रहा था।

आज जब उस घटना की याद आ रही है तो एक नयी बात समझ में आ रही है कि पुलिस का वह जवान किशोर के अधमरे शरीर पर कूद क्यों रहा था? एक कारण तो यह कि वह मुसलमान था। असल में भजनपुरा गांव में मुसलमान रहते हैं और उनकी ही जमीनें हड़पी जा रही थीं, तो विरोध भी वे ही कर रहे थे। तब भी बिहार में भाजपा सत्ता में थी और आज भी है। यह मुमकिन है कि भजनपुरा के उस नौजवान के साथ क्रूरता का प्रदर्शन इसलिए किया गया ताकि भाजपा बिहार के मुसलमानों में खौफ पैदा कर सकें और हिंदुओं को बर्बर बनने के लिए तैयार किया जा सके।

अफगानिस्तान में भी यही हो रहा है। रोहुल्लाह सालेह की बर्बर हत्या कर वहां के बाशिंदों को डराया जा रहा है। रही बात भारत में हो रही हिंसाओं की तो यह सब भी एक जैसा ही है। अभी डेढ़ साल पहले ही अमेरिका के मिनियापोलिस में जार्ज फ्लॉयड नामक अश्वेत की हत्या उसकी गर्दन को घुटने से दबाकर कर दी गयी थी। इस घटना के पीछे भी वर्चस्व ही था।

ऐसी अनेकानेक घटनाएं होती रहेंगी। वर्चस्व बनाए रखनेवाले अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए ऐसी क्रूरताएं करते रहेंगे। विश्व के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से। उनके खिलाफ आवाजें भी उठेंगी। ठीक वैसे ही जैसे फ्लॉयड की हत्या के बाद उठीं। लेकिन वह अमेरिका का मामला था। वहां हुक्मरानों में इतनी गैरत थी कि वह उन्होंने सार्वजनिक तौर पर माफी मांगी। यह मुमकिन है कि अफगानिस्तान में जब तालिबान शासन करने लगें तब वे भी अपनी क्रूरता के लिए माफी मांगेंगे। लेकिन हमारे अपने देश के हुक्मरान का तो इतना नैतिक रूप से पतन हो चुका है कि वह गुजरात दंगे में मारे गए हजारों लोगों की तुलना कुत्ते के पिल्ले से करता है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

 

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