Saturday, February 7, 2026
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पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

साहित्य

वीरेंद्र यादव बनाम ज्वालामुखी यादव

आज सुबह अभी हम इलाहाबाद से आई प्रो राजेंद्र कुमार के न रहने की दुखद खबर से उबरे भी नहीं थे कि लखनऊ से प्रख्यात आलोचक वीरेंद्र यादव के जाने की स्तब्धकारी खबर आई। सहसा भरोसा करना मुश्किल था कि यह कैसे हो सकता है? दो दिन पहले उनके बीमार होने की सूचना मिली थी, लेकिन यह बीमारी इतनी घातक है यह न मालूम था। उनके जाने से बहुत कुछ खाली हो गया. वह गर्मजोशी से भरे बुद्धिजीवी थे जो केवल किताबी आलोचना तक सीमित नहीं थे, बल्कि लगभग सभी समकालीन मुद्दों पर लिखते और बोलते थे और बेलाग बोलते थे। उनके व्यक्तित्व के इन्हीं पहलुओं को छूता प्रख्यात कथाकार मधु कांकरिया की एक छोटी टिप्पणी जो उनके बहत्तरवें जन्मदिन पर चार साल पहले प्रकाशित की गई थी। आज पुनः उनको श्रद्धांजलिस्वरूप प्रकाशित की जा रही है।

मूँदहु आंख भूख कहुं नाहीं

अब गरज तो विश्व गुरु कहलाने से है, भूख बढ़ाने में विश्व गुरु कहलाए तो और भूख मिटाने में विश्व गुरु कहलाए तो। उसके ऊपर से 111 की संख्या तो वैसे भी हमारे यहां शुभ मानी जाती है। भारत चाहता तो पिछली बार की तरह, भूख सूचकांक पर 107वें नंबर पर तो इस बार भी रह ही सकता था। पर जब 111 का शुभ अंक उपलब्ध था, तो भला हम 107 पर ही क्यों अटके रहते? कम से कम 111 शुभ तो है। भूख न भी कम हो, शुभ तो ज्यादा होगा।

विश्वगुरु की सीख का अपमान ना करे गैर गोदी मीडिया

इन पत्रकारों की नस्ल वाकई कुत्तों वाली है। देसी हों तो और विदेशी हों तो, रहेंगे तो कुत्ते...

तुम्हारी लिखी कविता का छंद पाप है

मणिपुर हिंसा पर केन्द्रित कवितायें  हम यहाँ ख्यातिलब्ध बांग्ला कवि जय गोस्वामी की कुछ कवितायें प्रकाशित कर रहे हैं।...

हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर हुआ संगोष्ठी का आयोजन

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में  हरिशंकर परसाई और शंकर शैलेंद्र की जन्मशती पर संगोष्ठी का...

इन दिनों कट्टर हो रहा हूँ मैं…                 

आजकल मैं बहुत हीन भावना में जी रहा हूँ । सामान्यतौर पर मैं सामान्य मनुष्य के जैसा जीवन ही जीना चाहता रहा हूँ। मगर...

समाज विज्ञान के बरअक्स बौद्ध सभ्यता का सवाल

भाषा वैज्ञानिक डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह की पुस्तक 'बौद्ध सभ्यता की खोज' में मौर्यकालीन मगध से सिंधु क्षेत्र तक फैली सभ्यता को बौद्ध परंपरा...

सूफ़ीवादः एक नूर ते सब जग उपज्यां

दूसरी किस्त दक्षिण भारत में सूफ़ियों का आगमन ख़्वाजा हसन बसरी (मृ. 734 ई.) से बताया जाता है लेकिन इसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य मौजूद नहीं...

यातना की नदी में तैरने का अनुभव: कब तक मारे जाओगे

पुस्तक समीक्षा जिस समय शरण कुमार लिम्बाले की मराठी आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ का हिन्दी अनुवाद आया था और वह बहुत ज्यादा पढ़ी जा रही थी, उस...

सूफ़ीवादः एक नूर ते सब जग उपज्यां

पहली किस्त ..विश्व के सभी धर्मों की उत्पत्ति, तत्कालीन समाज के अनसुलझे, अतार्किक, पाखंडी और दुरूह क्रियाकलापों के समाधान की सरलीकृत, अंगीकृत, रहस्यवादी प्रक्रिया...

शब्द की अग्नियात्रा का शिल्पी: ओमप्रकाश वाल्मीकि

कवि और कथाकार ओमप्रकाश वाल्मीकि (30 जून 1950 - 17 नवम्बर 2013) का आत्मसंघर्ष अब स्थापित होकर प्रतिष्ठित हो गया है। उनकी व्यापक संवदेना...
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