सूफ़ीवादः एक नूर ते सब जग उपज्यां

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

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पहली किस्त ..

विश्व के सभी धर्मों की उत्पत्ति, तत्कालीन समाज के अनसुलझे, अतार्किक, पाखंडी और दुरूह क्रियाकलापों के समाधान की सरलीकृत, अंगीकृत, रहस्यवादी प्रक्रिया है। ‘सभी धर्मों में कमोबेश रहस्यवाद की प्रवृत्ति पाई जाती है। रहस्यवादी प्रवृत्ति, धर्म से जुड़ी होकर भी धर्म के संस्थानिक रूप की विरोधी होती है। वह प्रत्येक व्यक्ति की आध्यात्मिक, दार्शनिक जिज्ञासा के स्वाभाविक एवं लोकतांत्रिक अधिकारों को बनाये रखने की दृष्टि से जुड़ी होती है। रहस्यवादी मानता है कि संपूर्ण सांसारिक गतिविधियां परम सत्ता से पैदा होकर उसी में विलीन हो जाती हैं। रहस्यवादी परम सत्ता को सांसारिक बुद्धि से नहीं, आंतरिक साधना से जानना चाहता है। वह सबसे ज्यादा प्रेम की अनुभूति पर बल देता है। इस प्रकार प्रेम साधना ही रहस्यवादी साधक की सच्ची साधना होती है। उसमें ‘मैं’ का पूर्ण विसर्जन करना पड़ता है। इससे परमात्मा से जो अंतरंगता स्थापित होती है, उससे कोई अलग या पराया नहीं रह जाता।’1 सूफ़वादी  विचारधारा के मूल में इसी दर्शन का प्रभाव है।

मुअतज़ला पंथ इस्लामी विधि में सुन्नी सम्प्रदाय के धर्मशास्त्रीय सिद्धान्त ‘इजमाअ‘ (सर्वसम्मति) को अमान्य मानता था। इसी युग में ‘मुशक्कीन (द्विधावादी) विचार पद्धति का जन्म हुआ जो मूलतः प्रकृतिवादी थे। इसके प्रमुख प्रतिनिधि इब्न-अशरस और अलजाहिज़ (मृ.869 ई.) थे। एक अन्य उदारवादी पंथ ‘अहिया-ए-सनद‘ ईरान में प्रचलित हुआ। इसके विरोध में अबुल हसन अलअशअरी (मृ. 941 ई.) ने अशाअरा आंदोलन को जन्म दिया। यही वह पृष्ठभूमि है, जिसने सूफ़ीवाद को जन्म दिया।

धर्म मानव निर्मित हैं। यह और बात है कि इनकी रचना प्रक्रिया में हमने निर्माता को परम मानव या ईश्वरीय शक्ति का वाहक स्वीकार कर, उसे अपना नियंता मान लिया है। कोई भी धर्म शून्य से पैदा नहीं हुआ। नवीन धर्म पर पूर्वगामी धर्मों के उज्जवल पक्षों का न्यूनाधिक ही सही, प्रभाव पड़ा है। स्वयं नवीन धर्मों के देवदूत, किसी न किसी पूर्वगामी धर्म में ही जन्म लिये हैं। यानी कि उनके बाल्यावस्था पर पूर्वगामी धर्मों का प्रभाव पड़ा है। ऐसे में संयुक्त धर्मोत्पत्ति के कारण अनेको मिश्रित धर्म साखाओं की भी उत्पत्ति हुई है। जैसे कि हिन्दू धर्म पर पाषाणकालीन मूर्ति पूजा, पशु-पक्षी पूजा, प्राकृतिक शक्तियों का दैवीयकरण, मूर्तिपूजा से विरक्ति, इस्लाम धर्म की उत्पत्ति पर उसके पूर्वगामी आत्मा-परमात्मा के रहस्यवादी दर्शन, माला और छाप-तिलक, धूनी-साधना और भजन-कीर्तन का और सिक्ख धर्म पर हिन्दू धर्म, संत साहित्य, सूफीवाद और  रहस्यवाद का। ऐसे में सूफीवाद की उत्पत्ति इस्लाम धर्म के अंदर, पूर्ववर्ती धर्म साधना के औजारों के साथ, प्रेममार्गी आलंबनों को आत्मसात करते हुये ‘एक नूर ते सब जग उपज्यां’ के मिथकीय परिकल्पना से हुई जान पड़ती है। यानी कि इस्लाम के रहस्यवादी चिंतक ही सूफी कहलाते हैं। सूफीवाद या तसव्वुफ, हिंदुओं के विशिष्ट अद्वैतवाद से बहुत भिन्न नहीं है। यह इस्लाम का एक रहस्यवादी पंथ है। ‘सूफी’ मूल रूप से पैगंबर, कुरआन और हदीस के वचनों को मानते हैं पर अपनी साधना में इस विश्वास को तरजीह देते हैं कि धर्म बाह्याचार का नहीं, आंतरिक अनुभूति का मामला है। आमतौर पर वे अपने सिद्धांतों को कुरआन और हदीस के हवाले से पुष्ट करते हैं लेकिन जहां तालमेल नहीं बैठ पाता वहां अपनी अलग व्याख्या भी देते हैं।’2 वे परमात्मा को प्रेम स्वरूप मानते हैं। परमात्मा के प्रति प्रेम को वे धार्मिक आचरण की कसौटी मानते हैं। सूफी साधक अल शिवाली के अनुसार सूफ़ीवाद में-‘प्रेम प्रज्ज्वलित अग्नि के समान है जो परम प्रियतम की इच्छा के सिवा हृदय की समस्त चीजों को जला कर खाक कर डालता है।’ कुछ सूफी विद्वानों ने सूफ़ीवाद को कुरआन एवं शरीअत की प्रतिबद्धता की पुष्टि के लिये तो कुछ ने इस्लाम के पैतृक वजन और अधिकार से बच निकलने के साधन के रूप में उपयोग किया। शुरूआती सूफ़ी विद्वानों, जैसे कुछ महिलाओं यथा-रबिया (9वीं सदी) और नूरी (10वीं सदी) ने दुनियावी त्याग पर जोर दिया और बतलाया कि आध्यात्मिक उपलब्धि ईश्वर को अपने भीतर ही खोज लेने में है। इसी प्रकार रूमी के सामाजिक विकास का सिद्धान्त, भारत के पूर्ववर्ती आध्यात्मिक सिद्धातों से मेल खाता प्रतीत होता है ।

सूफ़ीवाद, तमाम वादों में सन्निहित प्यार-मुहब्बत का फकीरी पैगाम है। सूफ़ीवाद पर हिन्दू धर्म के अद्वैतवाद के प्रभाव को ‘वहदतुलवजूद‘ नाम दिया जाता है। भारतीय सूफ़ीवाद में ‘वहदतुलवजूद‘ का प्रमुख स्थान तो है परन्तु उसमें अनेकानेक विचारधाराएं समाहित हैं। दरअसल जब इस्लाम धर्म का यूनानी, ईरानी तथा भारतीय विद्वानों से संपर्क हुआ तो इन देशों के धर्मों यहूदीमत, ईसाईमत, वेदान्त, बौद्ध और पारसीमत की समस्याओं से तर्क-वितर्क भी प्रारंभ हुआ। अरबवासी यहूदियों और ईसाइयों से परिचित थे ही। उनके आक्षेपों का भी उन्हें संज्ञान था।3 कुछ विद्वान जो मुसलमान हो गए थे, वे अपने पूर्व धर्म-सिद्धान्तों से इस्लामी सिद्धान्तों का परीक्षण कर रहे थे। ऐसे ही तर्कों  उत्तराधिकार एवं राजनैतिक नियमों आदि को लेकर समय के साथ मतभेद प्रारम्भ हुए और सर्व प्रथम ख़ारिजी, मुरीजी, शिया और कादिरी संप्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ।4 कालांतर में शिया संप्रदाय के चिंतन में तमाम बदलाव आए। उनका एक वर्ग ‘गुलात‘ हिन्दू धर्म से मिलते-जुलते सिद्धांतों में विश्वास करने लगा।5 वे ‘गुलुब‘ और ‘तक़सीर‘ में विश्वास करने लगे। ‘गुलुब‘ अर्थात मनुष्य ईश्वरत्व तक पहुंच सकता है और ‘तक़सीर‘ अर्थात ईश्वर मानव के धरातल पर उतर सकता है। इस प्रकार वे ‘इमाम‘ में ईश्वरत्व की स्थापना करने लगे। आगे चलकर उनका विश्वास ‘हुलूल‘ अर्थात ईश्वर के मानव रूप में प्रकट होने, ‘तसबीह‘ अर्थात शरीरधारी ब्रह्म एवं ‘रजा‘ अर्थात इमाम के पुनर्जन्म तक पहुंच गया6 इस प्रकार शियाओं के अंतर्गत अनेक उपसंप्रदाय भिन्न-भिन्न देशों में विभिन्न नाम से प्रकट हुए। इनमें से अली इलाही उपसंप्रदाय विशेष महत्व का है जो ईरान और भारत में फैला। इसी प्रकार बसरा में इमाम सहन अल बसरी, जो मदीना में पैदा हुए थे और बसरा में रहने लगे थे के शिष्य अबू हुजैफा वासिल-बिन-अता-अल गज्ज़ाल (699 से 749 ई.) ने अलग होकर ‘मुअतज़ला‘ संप्रदाय का प्रादुर्भाव किया जो बुद्धिवादी और तार्किक थे। ‘मुअतज़ला‘ आन्दोलन को इस्लाम में ‘एतज़ाल‘ नाम दिया गया है। मुअतज़ला आन्दोलन ने अद्वैतवाद से बहुत कुछ ग्रहण किया। धीरे-धीरे इनमें सन्यासवृत्ति एवं चिंतन के मनोभाव उत्पन्न हुए जो आगे चलकर सूफ़ीमत के रूप में सामने आया। मुअतज़ला पंथ इस्लामी विधि में सुन्नी सम्प्रदाय के धर्मशास्त्रीय सिद्धान्त ‘इजमाअ‘ (सर्वसम्मति) को अमान्य मानता था। इसी युग में ‘मुशक्कीन (द्विधावादी) विचार पद्धति का जन्म हुआ जो मूलतः प्रकृतिवादी थे। इसके प्रमुख प्रतिनिधि इब्न-अशरस और अलजाहिज़ (मृ.869 ई.) थे। एक अन्य उदारवादी पंथ ‘अहिया-ए-सनद‘ ईरान में प्रचलित हुआ। इसके विरोध में अबुल हसन अलअशअरी (मृ. 941 ई.) ने अशाअरा आंदोलन को जन्म दिया। यही वह पृष्ठभूमि है, जिसने सूफ़ीवाद को जन्म दिया।

सूफ़ीमत पर वेदान्त एवं बौद्ध धर्म के प्रभाव को यूरोपीय समीक्षकों ने भी स्वीकार किया है । फ्रांसीसी विद्वान डोजी, होपेनहावर गोल्डजिहर ह्यूगेस तथा सर विलियम जोन्स आदि का ऐसा ही मत है।7 लेकिन निकोल्सन, ब्राउन का मत है कि सूफ़ीमत मूलतः यूनानी नव अफलातूनी दर्शन से प्रभावित है तथा इस पर कुछ नास्टिक, मानी एवं बौद्ध धर्म के भी प्रभाव हैं। इन मतांतर का कारण यह हो सकता है कि सातवीं सदी तक सूफ़ी मत की कोई विशिष्ट मान्यता या चिंतन धारा न थी। केवल सन्यासपूर्ण विरक्त जीवन, आत्मचिंतन, भगवतप्रेम तथा तल्लीनता का प्राधान्य था। इसमें उत्तरोतर विकास हुआ और आगे जाकर नवीं सदी से लेकर परवर्ती सूफ़ियों की चिंतन धाराओं पर हिन्दू और बौद्ध धर्म का प्रभाव पड़ा । ऐसा स्वाभाविक ही था । क्योंकि अरब से भारत के संबंध बहुत पुराने समय से रहे हैं। अंक ज्ञान को भारत से ग्रहण करने के कारण ही वे इसे हिन्दसा कहते हैं। कालगणना भी उन्होंने भारत से ही सीखी थी।

सत्ता संघर्ष और रक्तपात ने भी मनुष्य को सूफ़ीवाद की ओर ढकेलने का काम किया। आठवीं सदी से लेकर नवीं सदी तक लगातार अरब राष्ट्रों में सत्ता संघर्ष हुए। इस प्रकार सत्ता युद्ध कलह एवं रक्तपात से मन हटाकर आत्मलीन होने या धूनी रमाकर ध्यानमग्न होने, माला फेरने की संस्कृति सूफ़ीमत के रूप में सामने आई। सूफी़मत ने बहुत हद तक इस्लाम को लोकप्रिय बनाने, उसे फैलाने में मदद पहुंचाई। इस्लामी साम्राज्य के पूर्वी उपनिवेश-खोरासान, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, सीस्तान, धर्म परिवर्तन के पूर्व हिन्दू या बौद्ध थे । इसलिये सूफ़ीमत पर इन धर्मों का प्रभाव स्वाभाविक है। सूफ़ियों ने हिन्दू चिंतनधारा से प्रत्यक्ष रूप से तथा बौद्ध धर्म से परोक्ष रूप में विचार ग्रहण किए। ‘निर्वाण‘ या ‘मोक्ष‘ की भांति ‘फना‘ की भावना, त्याग एवं सन्यासपूर्ण जीवन विधि, जपमाला आदि, भारतीय साधना से लिया। भगवान बुद्ध के जीवन कथाओं को सूफ़ी संतों के जीवन के साथ जोड़कर बताया जाने लगा।

ईरान के इमाम ग़जाली के जरिये सूफीवाद भारत पहुंचा

भारतीय उपमहाद्वीप में सूफ़ीवाद को इस्लामी धर्मोत्थान  का सबसे बड़ा आंदोलन कहा जा सकता है। सूफ़ीमत ने सीमाओं के परे एवं धर्म विभाजन की रेखाओं को तोड़ते हुए सभी प्रकार के लोगों को आकर्षित किया। भारत में सूफ़ीवाद इस्लाम और हिन्दू धर्म के सम्मिश्रण की कड़ी बनी। यद्यपि सूफ़ीवाद के मूलभूत सिद्धांत, दर्शन एवं पीठिका की खोज असंभव है।8 तथापि सूफ़ी संतों के महान उद्देश्य विभिन्न चमत्कारिक कथाओं में मिल जाते हैं। वे सूफ़ी संत, जिनके आचरण और व्यवहार ने लोगों के मन मोह लिए, मुसलमानों में ही नहीं, हिन्दुओं में भी इस्लाम के प्रति विश्वसनीयता उत्पन्न कर सर्व धर्म समभाव के पुष्प उपजाए, मानवीय मरूस्थलों को हरा-भरा कर इंसानियत के उपवन लगाये, उनके विचार ही आगे चलकर सूफ़ीवाद के सिद्धान्त बने। यह और बात है कि उनके श्रद्धालुओं ने  चमत्कारपूर्ण कथाओं द्वारा उन्हें मानवीय स्वभाव से हटाकर पारलौकिक प्राणी बना दिया। उनका कार्यक्षेत्र इतना व्यापक बना दिया कि प्रकृति के कई विधान उनके सामने गौण नज़र आने लगे। सूफ़ी संत ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों और पंचभूतों पर अपनी स्वतंत्र सत्ता सिद्ध करते रहे। परिणामस्वरूप सूफ़ीवाद के लोक व्यावहारिक दर्शन मज़ारों, कुल, उर्स, संदल, नज्र-नियाज़, चढ़ावे और कव्वालियों में देखने को मिलने लगे।9 सूफ़ीवाद सरलीकृत और क्लिष्टता का अद्भुत संगम है। इसके अर्थ विवेचन में बड़ी-बड़ी बारीकियां उत्पन्न की गयीं हैं।  सर्वाधिक प्रचलित विचार यह है कि अरबी शब्द ‘तसव्वुफ़‘ की धातु अरबी अक्षरों-‘स्वाद‘, ‘वाव‘, ‘फे़‘ से उद्धृत है, जिसका भावार्थ होगा-स्वयं को सूफ़ी जीवन-शैली के प्रति समर्पित कर देना। अन्य स्थितियों में इसका भावार्थ सीधे मूलधातु से प्राप्त किया जाए तो ‘सौफ़‘, या ‘सूफ़, अर्थात ऊन या ऊनी वस्त्र होगा। अने हदीसों में कहा गया है कि इस्लामिक पैग़म्बर ऊनी वस्त्र पहनते थे।10 यह भी संभव है कि ‘तसव्वुफ़‘ शब्द ‘सौफ़‘ या ‘सूफ़‘ के अतिरिक्त किसी अन्य पारिभाषिक शब्द से उद्धृत हुआ हो।11 इनके अलावा कुछ अन्य व्याख्याएं भी बताई जाती हैं। जैसे कि पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद के द्वारा निर्मित कराया गया मदीना मस्ज़िद के सामने जो चबूतरा था उसे ‘सुफ़्फा‘ कहा जाता था। इसी ‘सुफ़्फ़ा‘ या ‘सुफ्फाह‘ शब्द से सूफ़ी शब्द बना। कुछ लोग ग्रीक शब्द ‘सोफिया‘ ‘सोफिस्ता‘ या ‘सोफी‘ से इस शब्द की उत्पत्ति मानते हैं। कुछ लोग ‘बनू सूफा‘ नामक अरब की एक भ्रमणशील जाति से इस की उत्पत्ति जोड़ते हैं। अधिकांश सूफ़ी विचारकों ने ‘सूफ़ी‘ शब्द की उत्पत्ति ‘सफ़ा‘ से ही माना है। ‘सफ़ा‘ शब्द का अर्थ ‘पवित्रता‘ है। इस मत के अनुसार पवित्र जीवन व्यतीत करने वाले महात्माओं को ही सूफ़ी कहा गया। उपरोक्त तमाम मतों में से ‘सौफ‘ या ‘सूफ़‘ से ही सूफ़ी की उत्पत्ति भाषाशास्त्र की दृष्टि से सही प्रतीत होती है।

सूफी संत जलालुद्दीन रूमी (साभार – विकिपीडिया )

शुरुआत में हमने सूफ़ीवाद के कुछ मूलभूत विचारों का जिक्र किया है। यहां इस दृष्टि की विवेचना करेंगे कि सूफ़ी किस मानी में दूसरे संप्रदायों से अलग हैं । इसके लिये हमें कुछ सूफ़ी विद्वानों के बताए सिद्धान्तों का अनुसरण करना होगा। सुविख्यात सूफ़ी विद्वान हज़रत जुनैद बग़दादी ने सूफ़ीवाद की आठ विशेषताएं बताई हैं-‘सख़ावत (दानशीलता), ‘रिज़ा‘ (सहमति), ‘सब्र‘ (धैर्य), ‘इशारत‘ (संकेत), ‘गुरबत‘ (उत्प्रवासन-अन्य देश में जाकर रहना), ‘सौफ़‘ या ‘सूफ़‘ (ऊनी वस्त्र), ‘सयाहत‘ (यात्रा), ‘फुक्र‘ (निर्धनता)। फिर इसका स्पष्टीकरण भी किया है-दानशीलता के आदर्श पैग़म्बर इब्राहिम है उन्होंने अपने प्राणों से लेकर सुपुत्र तक को ईश्वर के मार्ग में बलिदान कर दिया। सहमति के आदर्श पैग़म्बर अय्यूब हैं, जिन्होंने अपने घर-बार तथा विशाल परिवार के विनाश एवं प्रताड़ित होने तथा अपने शरीर में कीड़े पड़ जाने पर भी धैर्य का परित्याग नहीं किया। संकेत के आदर्श पैग़म्बर ज़कारिया हैं, जिन्होंने ईश्वरी आदेश के अनुपालन में अनेक दिनों तक मौन धारण किया तथा संकेत द्वारा बातें करते रहे। उत्प्रवासन के आदर्श पैग़म्बर यहिया हैं, जो ईश्वर की कृपा प्राप्ति के लिए अपने ही देश में प्रवासी बनकर रहे। ऊनी वस्त्र धारण करने का पैग़म्बर मूसा ने अपने जीवन का आदर्श बनाया। यात्रा की पराकाष्ठा पैग़म्बर ईसा से प्राप्त होती है, जो ईश्वर के मार्ग पर एक प्याला और एक कंघी लेकर घर से चले थे परन्तु एक व्यक्ति को चुल्लू से पानी पीते देखा तो प्याला फेंक दिया तथा एक व्यक्ति को अपनी अंगुलियों को बालों में फेरते देखा तो कंघी फेंक दी। निर्धनता की पराकाष्ठा इस्लामी पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद में है, जिन्हें समस्त ईश्वर ने विश्व के समस्त कोष का अधिकारी बनाया, परन्तु उन्होंने अपनी निर्धनता पर गर्व किया तथा ईश्वर से प्रार्थना की: ‘‘हे पालनहार ! मुझे निर्धनता की स्थिति में जीवित रख, निर्धनता की स्थिति में मृत्यु प्रदान कर तथा निर्धनों की श्रेणी में मेरा लेखा-जोखा कर।‘12 सय्यद अली हज़वेरी का कथन है- ‘‘सूफ़ियों तथा अध्यात्मिक महापुरूषों का मूल मिशन ही यह था कि जनसाधारण के भीतर उस वास्तविक धार्मिकता एवं ईश्वरी उपासना की मूल आत्मा जागृत एवं प्रज्ज्वलित की जाए, जो विभिन्न नबियों के आह्वान का मूल उद्देश्य था। परन्तु यह बात निरंकुश एवं अन्यायी शासकों को असह्य थी। अतः सूफियों ने अपनी बात ऐसी भाषा, शब्दावली में व्यक्त किया कि उनके समुदाय के लोग तो उसे भली-भांति समझ लें परन्तु यदि यह बात उनके क्षेत्र के बाहर जाए तो दूसरे इस परम्परा के भेद को न पा सकें।‘‘

ईरान के इमाम ग़जाली के जरिये सूफीवाद, तुर्की होते हुये भारत पहुंचा। बाद में सूफियों का आगमन इराक तथा मध्य एशिया से भी हुआ। ईरान के सूफी संतों, खास तौर पर- जलालुद्दीन रुमी और हाफ़िज शीराज ने सुफीवाद को अपने कलामों के जरिये बुलंदी पर पहुंचाया। सूफ़ियों की सत्यवादिता, न्यायप्रियता एवं शुद्ध आध्यात्मिक जीवन ने  भारतीयों का मन जीत लिया। उनकी उदारता, कट्टरवादिता से विरक्ति ने धार्मिक सीमाएं तोड़ दीं। सूफ़ियों ने धर्मशास्त्रवादियों की अनेक पाबंदियों को तोड़ दिया और हिन्दू जनमानस से घुल-मिल गए। उनसे उन्हीं की शैली में बात की। संगीत से ‘समाअ‘ की महफिलें सजायीं। प्रेम और श्रद्धा से भारतीय उपवन सुगंधित हो उठा। सूफ़ियों ने इस्लामी पैग़म्बर के परिवारजनों के सम्मान एवं प्रेम में डूबकर तमाम भाव व्यक्त किए एवं कविताएं लिखीं। उनके संदेश महफ़िलों, सभाओं के माध्यम से जनता तक पहुंचे। सूफ़ी कलंदर संगीत एवं कविता के रसिया थे। इस परंपरा के विशिष्ट सूफ़ी शेख़ लाल शहब़ाज कलंदर की ख़ानकाह, सहेबान सिंध (पाकिस्तान) मे हज़रत अली की स्तुति में गीत अत्यंत उत्साह से गाए जाते हैं- दमादम मस्त कलंदर, अली दा पहला नम्बर!

(सुभाष चन्द्र कुशवाहा जाने-माने कवि, कथाकार, संस्कृतिकर्मी और इतिहासकार हैं )

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