यातना की नदी में तैरने का अनुभव: कब तक मारे जाओगे

   डॉ. एन सिंह

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पुस्तक समीक्षा

 जिस समय शरण कुमार लिम्बाले की मराठी आत्मकथा ‘अक्करमाशी’ का हिन्दी अनुवाद आया था और वह बहुत ज्यादा पढ़ी जा रही थी, उस समय हिन्दी में भी आत्मकथाएँ लिखी जाने लगी थीं। बहस में एक बात बराबर उभरकर आ रही थी कि जब तक अनुसूचित जाति में शामिल समस्त जातियों की पीड़ा अभिव्यक्त नहीं होगी, तब तक दलित साहित्य पूर्ण नहीं होगा।  नरेन्द्र वाल्मीकि ने कब तक मारे जाओगे का सम्पादन कर दलित साहित्य के एक अभाव की पूर्ति की है। नहीं तो इन दाहक अनुभवों से गुजरने का मौका ही नहीं मिलता और न ही इस इतनी बड़ी समस्या से रूबरू होने का अवसर मिलता। सचमुच इस काव्य संग्रह में संग्रहित कविताओं को पढ़ना यातना की उफनती हुई नदी में तैरने जैसा है।

इस संग्रह में 62 रचनाकारों की 129 रचनाएँ शामिल है। जिसमें वरिष्ठतम् कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि से लेकर नवोदित कवियत्री दीपमाला और सूरज कुमार बौद्ध तक शामिल हैं। इन सभी कवियों ने सफाई कामगार समुदाय की जन्मगत और कर्मगत यातनाओं को मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। जो पाठक को देर तक तिलमिलाने के लिए पर्याप्त है। इस सम्बन्ध में पुस्तक के सम्पादक नरेन्द्र वाल्मीकि ने लिखा है कि – ‘यह संग्रह उस समाज की समस्याओं पर केन्द्रित है जो आज भी कई स्थानों पर हाथ से मल उठाने को मजबूर हैं। अब भी सफाई से जुड़े पेशे में संलग्न हैं। यूँ तो हम विश्वशक्ति बनने का दावा कर रहे हैं, लेकिन वहीं एक जाति विशेष के लोग आज भी देश में घोर अमानवीय कार्य को बिना किसी सुरक्षा के करने को मजबूर हैं।’ आगे सम्पादक ने कई और भी महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। जैसे क्या इस समुदाय के कुछ लोगों के पैर धोने मात्र से इस समुदाय की समस्याओं का अन्त हो जाएगा? या फिर कोरोना काल में सफाई कर्मचारियों को फूल-मालाएँ पहनाने से उनकी सामाजिक स्थिति में कोई अन्तर आने की सम्भावनाएँ हैं? जबकि सीवर की सफाई करते समय कोरोना काल में असमय मृत्यु को प्राप्त हुए सफाई कर्मचारियों के परिवार प्रायः भुखमरी के कगार पर हैं। ऐसे में किसी धार्मिक गुरू द्वारा इस अमानवीय कृत्य को ‘आध्यात्मिक सुख की अनुभूति’ बताना कितना अमानवीय है।

खैर, इस संग्रह में संग्रहित रचनाकारों की रचनाओं पर इसी दृष्टि  से बात करना अनिवार्य है कि वे इस कृत्य को कितना घृणित और अमानवीय मानते हैं और इससे मुक्ति का मार्ग मात्र डॉ अम्बेडकर के विचारों में निहित है जो शिक्षा से होकर गुजरता है। इस पुस्तक के चैथे पृष्ठ पर कानपुर के प्रख्यात लेखक  देवकुमार का एक प्रतीकात्मक चित्र छपा है। जिसमें झाडू को कलम के रूप में रेखांकित किया गया है। मेरी दृष्टि में यह कविताओं से भी अधिक संदेशप्रद प्रतीत होता है।

वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि इस यातनामय जीवन को उतना ही पुराना मानते हैं जितना कि हिन्दू धर्म है। क्योंकि यह अछूतपन और अस्वच्छ पेशे हिन्दू धर्म की ही देन हैं। वे लिखते हैं कि –

जब भी देखता हूँ मैं/झाडू या गन्दगी से भरी बाल्टी/कनस्तर /किसी हाथ में/मेरी रगों में/दहकने लगते हैं/यातनाओं के कई हजार वर्ष एक साथ।

इन हजारों वर्षों में दलित हिन्दुओं का गुलाम रहा है और करीब नौ सौ वर्ष पूरा देश कभी मुगलों का और कभी अंग्रेजों का गुलाम रहा है। लेकिन इस देश के जीवन में 15 अगस्त 1947 को एक नया सवेरा आया। देश आजाद हो गया और भारत का संविधान लिखने का अवसर प्रज्ञासूर्य बाबा साहब डॉ भीमराव अम्बेडकर को मिला। उन्होंने मनुष्य मात्र को समान घोषित कर सबके लिए शिक्षा के द्वार खोल दिए। लेकिन हिन्दू चूँकि हजारों वर्षों से वर्णव्यवस्था को जी रहा था, इसलिए सफाई कामगारों के जीवन में उतना परिवर्तन नहीं आया, जितना वांछित था। सम्भवतः इसे ही ओमप्रकाश वाल्मीकि ने अपनी कविता ‘झाडूवाली’ में अभिव्यक्त किया है –

जब तक रामेश्वरी के हाथ में/खड़ांग-खांग घिसटती लौह गाड़ी है/मेरे देष का लोकतन्त्र/एक गाली है।

डॉ सुशीला टाकभौरे इसी तथ्य को कुछ दूसरी तरह अभिव्यक्त करती हैं। उन्हें लगता है कि जब पूरा देश  उन्नति कर रहा है, तब यह सफाई कामगार समाज वहीं का वहीं क्यों खड़ा है? इसे वह पौराणिक प्रतीकों में पिरो कर व्यक्त करती हैं अपनी कविता यह कौन सा समाज है में –

यह कौन सा समाज है/बरसों से ठहरा है/दया और ग्लानि की जमीन पर/बरसों से उसके पैरों में वही है दासता की बेड़ियाँ/हाथों में वही हैं नरक सफाई के औजार/सिर पर भी वही है त्याज्य अपवित्रता का बोझ/कोई परिवर्तन नहीं।

अजय यतीश भी इसी तथ्य को रेखांकित करते हैं कि यह सदियों का संताप आज भी इस वर्ग के साथ-साथ चल रहा है। वे लिखते हैं कि –

शताब्दियों की गुलामी/और उस गुलामी की/यातना से उपजी/पीड़ा और अपमान से/आज भी इनकी पीढ़ियाँ/झुलस रही हैं।

जैसा कि स्वयं नरेन्द्र वाल्मीकि ने अपने सम्पादकीय में लिखा है कि – ‘इस संग्रह के सभी कवियों ने इस अमानवीय व्यवस्था पर अपनी रचनाओं द्वारा सवाल खड़े किए हैं। अपना प्रतिरोध जाहिर किया है और इस घृणित पेशे से जुड़े लोगों को दिशा देने का काम किया है। अपनी रचनाओं के माध्यम से सफाई कामगार समुदाय को शिक्षा की ओर अग्रसर होने का सन्देश देने का प्रयास किया है।’ सचमुच अस्पृश्यता की इस समस्या का समाधान डॉ अम्बेडकर के ही पास है जो जाति विनाश और हिन्दू धर्म के त्याग से सम्भव है।’ और यह रास्ता शिक्षा से ही होकर गुजरता है। इस संग्रह के कई कवियों की कविताओं में जो बहुत ही मुखर होकर अभिव्यक्त हुआ है, जैसा कि डॉ सुरेखा ने लिखा है –

चलूँगी बाबा साहब के मार्ग पर / जहाँ मिलेगी मुझे उन्नति/बता दूँगी सबको एक दिन /कि /झाडू, पंजर, तसला/नहीं हैं मेरी बपौती।“

डॉ पूनम तुषामड़ इसे थोड़ा और स्पष्ट करती हैं। उन्होंने बाबा साहब के तीनों सिद्धान्तों को रूपायित किया है –

सबसे पहले घृणित पेशे को छोड़ो/सम्मानित जीवन के लिए/शिक्षित हो, संघर्ष करो, जागो/खुद को स्वच्छ काम से जोड़ो।

सामंतवादी शक्तियाँ अज्ञान का अंधकार फैलाकर मनुष्य को गुलाम बनाने की प्रक्रिया को अंजाम देती हैं। इसीलिए हिन्दू धर्म में स्त्री और शूद्र की शिक्षा का निषेध किया गया है। बल्कि वर्ण व्यवस्था ने तो चारों वर्णों के कर्तव्य भी चिन्हित किए हैं कि कौन पढ़ेगा, कौन पढ़ाएगा और कौन केवल सेवा करेगा। यह अज्ञान ही छुआछूत का कारण बना। इसका कितनी कड़ाई से पालन होता था इसके उदाहरण एकलव्य और शम्बूक हैं। सम्भवतः इसीलिए अरविन्द भारती ने लिखा है कि –

निश्चय कर लिया है मैंने/इस अंधकार को/अपने बच्चों के जीवन में/कभी पड़ने नहीं दूँगा/अच्छी शिक्षा दिलाकर/ले जाऊँगा उनको/उजालों की ओर।

इस काव्य संग्रह के सम्पादक और कवि नरेन्द्र वाल्मीकि ने अपनी कविता आखिर कब तक में इस पूरे संग्रह का निचोड़ ही दे दिया है कि जब तक यह समाज बाबा साहब के रास्ते ”शिक्षा, संगठन और संघर्ष पर चलकर गन्दे कामों के विरुद्ध बिगुल नहीं बजाएगा तब तक इन्हें इससे मुक्ति नहीं मिलेगी। चूँकि छुआछूत हिन्दू धर्म की ही देन है इसलिए हिन्दू धर्म, उसकी मान्यताओं और परम्पराओं से मुक्त होकर ही यह सम्भव हो पाएगा। वे लिखते हैं –

सुनो सफाई कर्मियो!/अब बजा दो/बिगुल/इन गन्दे कामों के/खिलाफ/हिला दो चूल/उन दिव्य सुख/ बताने वालों की/तोड़ दो/सारे बन्धन/जो/बाधक बनते हैं/तुम्हारी तरक्की के/रास्तों में।

कुल मिलाकर कब तक मारे जाओगे एक थीमेटिक काव्य संग्रह है जो एक जरूरी काम है, जो बहुत पहले किया जाना चाहिए था। लेकिन इसका श्रेय नरेन्द्र वाल्मीकि को मिलना था, सम्भवतः इसीलिए इसमें विलम्ब हुआ। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए नरेन्द्र जी को उनके हिस्से का श्रेय दिया जाना चाहिए और उनकी सूझबूझ तथा बौद्धिक क्षमता को बधाई दी जानी चाहिए। मैं उम्मीद करता हूँ कि भविष्य में भी वे इसी तरह के कुछ अनूठे कार्य करेंगे!

(डॉ. एन सिंह दलित चिन्तक और आलोचक हैं)

कब तक मारे जाओगे; सम्पादक  : नरेन्द्र वाल्मीकि

प्रकाशक : सिद्धार्थ बुक्स, शाहदरा, दिल्ली;  पृष्ठ संख्य : 240 ; मूल्य: रुपए 150/-

 

 

2 Comments
  1. Narendra Valmiki says

    पुस्तक समीक्षा प्रकाशित करने के लिए संपादक जी का हार्दिक आभार

  2. Dr amit Satanker says

    किताब की समीक्षा ने पढ़ने की उत्सुकता जगा दी है

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