बेसिर-पैर के दलित-ओबीसी (डायरी (28 दिसंबर, 2021) 

नवल किशोर कुमार

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यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी अनेक बार इस बात को दर्ज कर चुका हूं। आज फिर कर रहा हूं और दुख की अनुभूति भी कर रहा हूं। दरअसल, जब कभी सामाजिक उत्पीड़न की घटना सामने आती है तब इस तरह की अनुभूति होती है। इस बार उत्तराखंड के चंपावत जिले के एक गांव की घटना है, जहां पिछले 13 दिसंबर को सवर्ण छात्रों ने एक दलित महिला रसोइया सुनीता के हाथों से बना खाना खाने से इंकार कर दिया था। सवर्ण छात्रों के विरोध को देखते हुए राज्य सरकार ने उस दलित महिला रसोइया को काम से हटा दिया और एक दूसरी महिला जो कि सवर्ण है, को नियुक्त कर दिया। हालांकि नयी नियुक्त महिला की जाति क्या है, अभी तक यह बात सामने नहीं आयी है। मुमकिन हो कि वह ब्राह्मणी हो।

ब्राह्मण रसोइए से बात याद आयी। बिहार और बंगाल में ब्राह्मण रसोइयों की एक समय बड़ी पूछ होती थी। वे रसोइए होते भी बड़े कमाल के थे। एक बार एक ब्राह्मण रसोइए के हाथ का खाना खाने को मिला था। तब मैं आज अखबार में नौकरी करता था। उन दिनों पटना के खासमहल के इलाके में जबरदस्त खलबली थी। खासमहल की जमीनें यानी वे जमीनें जिन्हें राज्य सरकार ने एकदम न्यूनतम राशि लेकर लोगों को रहने के लिए दिया था। अब सरकार किराये की रकम को बढ़ा रही थी। बढ़ा क्या रही थी पचास रुपए प्रति कट्ठा की दर को ढाई सौ रुपए करने जा रही थी। अच्छी खास बात यह कि खासमहल की ये जमीनें पटना शहर के पॉश इलाकों में हैं। यहां रहनेवाले अधिकाशं सवर्ण हैं।

तो जिस ब्राह्मण रसोइए ने पार्टी थी, वह भी खासमहल की जमीन पर ही अपने पूरे परिवार के साथ रहता था। उसने पार्टी इसलिए दी थी क्योंकि मैंने खासमहल के बाशिंदों से जुड़ी खबरों को लगातार लिखा था और राज्य सरकार ने किराए की रकम बढ़ाने के फैसले को वापस ले लिया था। इसी बात की खुशी थी उस ब्राह्मण रसोइए को। मैं उसके बारे में नहीं जानता था। वह तो हमारे संपादक दीपक पांडे सर ने एक दिन कहा कि आज भोज खाने चलना है और तुम्हारा रहना जरूरी है। अब संपादक महोदय की बात काे ना कैसे कहता।

खाना वाकई बहुत स्वादिष्ट था। मांसाहार का प्रबंध भी था। ब्राह्मण रसोइए के बारे में दीपक पांडे सर ने ही जानकारी दी कि ये बहुत प्रसिद्ध रसोइया रहे हैं। इनके पूर्वजों ने अंग्रेजों को और उसके पहले के शासकों को भी खाना पकाकर खिलाया है। अब तो ये (वृद्ध हो चुके ब्राह्मण रसोइए की ओर इशारा करके) अंतिम ही हैं। फिर उस वृद्ध रसोइए ने अपनी वे तस्वीरें दिखायीं, जिनमें डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर जयप्रकाश नारायण तक खाना खा रहे थे। एक बार उन्होंने शायद गांधी जी को भी खाना खिलाया था।

उत्तराखंड के चंपावत जिले के एक गांव की घटना है, जहां पिछले 13 दिसंबर को सवर्ण छात्रों ने एक दलित महिला रसोइया सुनीता के हाथों से बना खाना खाने से इंकार कर दिया था। सवर्ण छात्रों के विरोध को देखते हुए राज्य सरकार ने उस दलित महिला रसोइया को काम से हटा दिया और एक दूसरी महिला जो कि सवर्ण है, को नियुक्त कर दिया। हालांकि नयी नियुक्त महिला की जाति क्या है, अभी तक यह बात सामने नहीं आयी है। मुमकिन हो कि वह ब्राह्मणी हो।

तो कुल मिलाकर यह कि ब्राह्मण रसोइयों की खूब चलती थी एक समय। लेकिन मुझे लगता है कि वे ठीक ही थे। मेहनती थे और श्रम करते थे। वे उन ब्राह्मणों से तो अच्छे ही थे, जो मंदिरों में घंटा बजाते हैं।

एक घटना और याद आयी। वह काका कालेलकर थे। भारत में बने पहले ओबीसी आयोग के अध्यक्ष। वे ब्राह्मण जाति के थे और श्रम करते थे। उनकी खासियत यह थी कि वे अपने साथ एक ब्राह्मण रसोइया ही रखते थे। जहां जाते वहां या तो अपने रसोइए को लेकर जाते या फिर संबंधित अधिकारियों को ब्राह्मण रसोइए का प्रबंध करने का आदेश देते थे।

खैर, मैं वह बात कहना चाहता हूं, जिसे सोचकर मुझे दुख की अनुभूति होती है। चंपावत के गांव में जिस दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से सवर्ण बच्चों ने मना कर दिया था, उसका नाम है सुनीता। उसका अपना बच्चा भी उसी सरकारी स्कूल में पढ़ता है, जहां वह रसोइया थी। मुझे एक साथी ने जानकारी दी है कि यह एक शर्त भी है रसोइया की नियुक्ति के संबंध में कि उसका कोई बच्चा उस स्कूल में पढ़ता भी है या नहीं। अब उसे नौकरी से निकाल दिया गया है तो उसके उपर आर्थिक संकट भी है।

दलित संगठनों का अपना ही चाल-चरित्र है। ओबीसी भी केवल हुआं-हुआं करने में विश्वास रखते हैं। यह देश तो सवर्णों का ही है। वे जो चाहेंगे वही होगा।

अब देखिए कि हुआ क्या है। फेसबुक, ट्वीटर और अन्य माध्यमों के जरिए लोगों ने इस खबर को अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल किया। दलितों ने तो जैसे पूरा दम ही लगा दिया मानो वे सवर्णों को देश से निकालकर ही दम लेंगे। सवर्ण इस मामले में चौंकन्ने थे। उन्होंने खामोश रहकर सबकुछ देखा। फिर हुआ वही जो सवर्ण चाहते थे। दलित रसोइया को हटाकर सवर्ण रसोइया की नियुक्ति हो गई। कारण बता दिया गया कि सुनीता की नियुक्ति में अनियमितता बरती गयी थी।

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उधर सोशल मीडिया पर दलितों को चढ़ा बुखार उतर गया है। अब कोई भी इस मामले में बात नहीं कर रहा है। मैं तो यह देखकर हैरान हूं कि लोग सुनीता के पक्ष में खड़े क्यों नहीं हो रहे हैं? एक तो उसका सार्वजनिक अपमान किया गया। उसे यह बताया गया कि वह दलित है और अछूत है। उसके हाथ का बना खाना सवर्ण नहीं खा सकते हैं। यह बात किसी और ने नहीं बल्कि उत्तराखंड सरकार ने कही। और देश भर के दलित बुद्धिजीवी अब खामोश हैं। क्या दलित संगठनों को यह मांग नहीं उठानी चाहिए कि उत्तराखंड सरकार सुनीता से माफी मांगे और उसे सम्मान के साथ काम पर वापस रखे।

खैर, दलित संगठनों का अपना ही चाल-चरित्र है। ओबीसी भी केवल हुआं-हुआं करने में विश्वास रखते हैं। यह देश तो सवर्णों का ही है। वे जो चाहेंगे वही होगा।

2 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    विचारणीय और यथार्थ पूर्ण टिप्पणी। आपके इस कथन/धारणा में सच्चाई है कि, “दलित संगठनों का अपना ही चाल-चरित्र है। ओबीसी भी केवल हुआं-हुआं करने में विश्वास रखते हैं। यह देश तो सवर्णों का ही है। वे जो चाहेंगे वही होगा।” ऐसा न होता तो दलित, पिछड़े, आदिवासी और अल्पसंख्यक इस देश के 80% से अधिक होने पर भी सवर्णों, मनुवादियों और धर्मांधों के तलवे चाटते और मानसिक रूप से उनके गुलाम बने रहते।

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