दलित साहित्य में भूख और भोजन का चित्रण

अनीता भारती

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पहला भाग

यह बड़ी विचित्र बात है कि जिस समाज के पास हमेशा भोजन का भयंकर अभाव रहा और इस भयंकर अभाव के चलते उसे अपना और अपनी तमाम भूखी पीढ़ियों का अस्तित्व बचाने के लिए रात दिन जद्दोजहद करनी पड़ी आज उसी भयंकर अभाव को राजनीति में बेहिसाब इस्तेमाल किया जा रहा है,आज उस दलित समाज के लिए इससे बड़ी विडम्बना क्या होगी? बहुत समय से देखने में आ रहा है कि दलित राजनीति के नाम पर आजकल के नेताओं का फैशन बन गया है दलितों के घर बैठकर भोजन करना और यह समझना कि इससे समाज में समानता आ जायेगी, भेदभाव, छुआछूत मिट जायेगा और साथ साथ दलित वर्ग का वोट भी उनको मिल जायेगा। एक भूखे अभावग्रस्त पीड़ित दुखी समाज के साथ इससे बड़ा और भद्दा मजाक कोई और हो ही नही सकता।

दलित वर्ग को भूखा मारकर उनका नाम इतिहास से मिटाने की साजिश का और उसके परिणाम का पूरे दलित साहित्य में मिलता है। सवर्ण समाज द्वारा दलित समुदाय के साथ बरते गए भेदभाव में सबसे घिनौना और अमानवीय अत्याचार है, उनको उनके मूलभूत जीवन के सर्वप्रथम आधार भोजन से वंचित करना।

भोजन का एक राजनीति होती है जिसका इस्तेमाल या प्रयोग भारत में दलित समाज के साथ किया गया। एक पूरे के पूरे वर्ग को भोजन से वंचित रखा गया। भोजन से वंचित कर उसको शिक्षा और सम्मान से वंचित कर दिया गया।  शिक्षा और भोजन से वंचित करना एक ऐसा षड़यंत्र था, ऐसी जातिवादी राजनीति है जिसके पैर ब्राह्मणवाद की चोटी पर टिके रहे है। दलित समाज को कभी भरपेट भोजन नही मिला। उसकी अनेक पीढ़िया भूख मिटाने की चाह में रोटी का एक एक टुकड़ा पाने के लिए मरती खपती रही पर यह उसे कभी शान्ति से नसीब नही हुआ। भरपेट रोटी खाने के चाह में, भूख मिटाने की पीड़ा में उसे गुलामी की गर्त में धकेला जाता रहा, उस पर अनेक अत्याचार किए जाते रहे पर इस विषमतामूलक समाज में किसी को यह कभी दिखाई नही दिया।

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यहां भोजन का मतलब भोजन या पौष्टिक भोजन से नही है परन्तु यहाँ उसके जीने लायक खाने के लिए भोजन की है। सवाल है क्या दलित समाज को कभी भरपेट भोजन मिला? इसका उत्तर है नहीं। फिर सवाल उठता है क्यों? क्योकि उन्हें दलित समाज को अपना गुलाम बनाना था ताकि वे अपने अधिकारों की मांग न करे और न ही अपने हड़पे गए संसाधनों को वापिस लेने की बात उठाएँ। किसी कौम को भोजन वंचित रखना उसे अपना जूठन खाने पर मजबूर करना, न केवल उसे उसकी इंसानी गारिमा से गिराना है अपितु उस वर्ग को ऐसे नैराश्य और हताशा के ऐसे गहन अंधकार में धकेल देना है जिसमें वह सिर्फ और सिर्फ पूरा जीवन खाने के बारे में सोचता रहे और किसी तरफ उसकी निगाह न उठा सके। न वह व्यवस्था से विद्रोह कर सके और न ही व्यवस्था के ठेकेदारों को चुनौती दे सके। भोजन का काम है शरीर को स्वस्थ रखना और शरीर से मन को स्वस्थ रखना परंतु जब उसके शरीर को ही पूरी खुराक नही मिलेगी तो उसकी दिमागी खुराक भी पूरी न होगी। चूहे खाना, यही दलित जीवन की विडम्बना रही है।

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बाबा साहेब ने कहा था कि-  जिस जाति और समाज को मिटाना हो, उसका इतिहास मिटा दो। लेकिन यहां दलितों के इतिहास मिटाने की साजिश के पीछे केवल सामाजिक जातीय भेदभाव ही नही है बल्कि उसके आर्थिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक कारणों के साथ साथ और भी अन्य कारण है। भारत में जिस तरह से वर्ण व्यवस्था और जातिवाद के अंतर्गत एक वर्ग को भूखा रखकर उसे तमाम तरह के साधनों और संसाधनों से जान-बूझकर वंचित किया गया, ऐसा विश्व में कहीं और उदाहरण देखने को नही मिलेगा।

दलित वर्ग को भूखा मारकर उनका नाम इतिहास से मिटाने की साजिश का और उसके परिणाम का पूरे दलित साहित्य में मिलता है। सवर्ण समाज द्वारा दलित समुदाय के साथ बरते गए भेदभाव में सबसे घिनौना और अमानवीय अत्याचार है, उनको उनके मूलभूत जीवन के सर्वप्रथम आधार भोजन से वंचित करना। भोजन भी क्या सिर्फ दो जून की रोटी से वंचित करना और उसके बदले उसे अपनी सड़ी गली जूठन, मरे जानवरों का माँस, चूहे, जंगली घास- पात, चावल की खुद्दी, माँड, जंगली फल, इमली के बीज, जहरीला अनाज खाने पर मजबूर करना जबकि यह देश, यहाँ की जमीन, मनुष्य के दिल-दिमाग को विकसित करने वाले तमाम तरह के स्वादिष्ट और पौष्टिक खाद्य पदार्थो के भंडार भरी हुई है।

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मनुष्य के जीवन में भोजन के महत्व को किसी भी प्रकार से नकारा नही जा सकता। अच्छा भोजन मनुष्य के लिए उतना ही जरूरी है जितनी की अन्य चीजें मसलन साफ हवा, पानी और स्वस्थ वातावरण। अच्छा भोजन मनुष्य को सुन्दर, स्वस्थ, शक्तिशाली, बुद्धिमान और सचेत बनाता है। भोजन के विभिन्न तत्व उसे जीवन में ऊर्जा देते है। भोजन से संतुष्टमन और स्वस्थ शरीर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। उसे बीमारियोँ से दूर रखता है। भरपेट भोजन मनुष्य को खुशहाल, प्रसन्न और ताकतवार बनाता है। इसके विपरित भोजन की कमी या फिर सड़ा गला बासी अनुपयोगी मनुष्य को कमजोर, बीमार और कुपोषित बनाता है। वह बीमारियों की गिरफ्त में सबसे पहले आता है। भोजन के अभाव में उसका शारीरिक और मानसिक विकास रूक जाता है। सदियों से भूखे व्यक्ति और भूखे समाज की जिदंगी से आनन्द व सुख के पल हमेशा दूर रहते है। भूख उसकी आंतरिक और बाहरी ऊर्जा, उमंग, आशा को खत्म कर उसके अंदर दीनता, निराशा, और अवसाद को बढ़ावा देती है। सदियों से भूख से मारे लोग धीरे धीरे व्यक्तिगत और सामाजिक तौर पर हाशिये पर चले जाते है। यह अपने आप नही हो रहा है बल्कि इसको बड़ी कुटिलता पूर्वक किया जाता रहा है।

एक तरह से यह बात इस तरह की जा सकती है कि भारत के जाति और धर्म के आधार पर वर्चस्ववादी समाज ने बड़ी कुटिलता से पूरे दलित वंचित वर्ग को सदियों से भूखा रखकर उसके दिल दिमाग पर काबू कर लिया और उसको अंधविश्वास, भाग्यवाद, अज्ञानता और अशिक्षा के भंवर में डालकर बड़े ही षड़यंत्रकारी तरीके से उसकी रचनात्मकता, सृजनात्मकता, मौलिकता को खत्म करने की साजिश की है। अक्सर होता यही है कि मनुष्य की जीवन में जिसका अभाव होता है उसका पूरा ध्यान दिल दिमाग ऊधर ही होता है इसलिए दलितों को दीन हीन दशा में पहुँचाकर उसके हकों में आराम से सेंध लगाई जा सके और अपने जीवन को खुशहाल और ऐशो आराम से युक्त बनाया जा सके। यानीकिसी समाज विशेष को भोजन से महरूम करना एक ऐसी ओच्छी और छोटी राजनीति का हिस्सा है जिससे किसी वंचित समूह की सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक तौर पर उसकी भागीदारी शून्य घोषित की जा सके। उसको इस राजनीति में फंसा कर निकम्मा, अक्षम, अयोग्य घोषित किया जा सके। भूखजीवन के आत्मविश्वास को खा जाती है और जब जीवन में आत्मविश्वास नही रहेगा तो जीवन क्या शेष रहेगा।

लेखिका कौशल्या बैसन्त्री के माता-पिता मजदूर थे। अनेक कष्ट सहते हुए उन्होंने अपनी बेटियों को स्कूल भेजा। सारे जातीय उत्पीड़न अपमान और उपेक्षा सहते हुए किसी दलित माता- पिता का अपने भूखे बच्चों की भोजन की भूख को मारकर शिक्षा की भूख जगाकर उसे शांत करने के लिए स्कूल भेजना वास्तव में ऐसे प्रेरणादायक उदाहरण है जो पूरी दुनिया में शायद ही कहीं मिले।

हमारे भारत में दो तरह के समाज है। दो तरह के घर है। दो तरह के व्यक्ति है। एक है सदियों से भूख से बेदम समाज, घर और व्यक्ति। दूसरा है जरुरत से ज्यादा खाने और सजोने वाला समाज, घर और व्यक्ति। एक तरफ दलित समाज है जिसकी थाली भोजन से खाली है और वह तानों तकाजों अशिष्ट अपशिष्ट और अपमान से भरी हुई वहीं दूसरी ओर सवर्ण समाज है जिसकी थाली तमाम तरह के स्वादिष्ट, लाभकारी और पौष्टिक भोजन से भरी है। इनकी भोजन की थाली में खाने- पीने को तरह-तरह की एक से एक उमदा चीजे जरुरत से ज्यादा उपलब्ध रही है। वर्चस्वशाली समाज में लोगों के लिएअच्छी किस्म का अनाज, दाल, चावल, सूखे मेवे, फल, सब्जियां, दूध, दही और अन्य चीजों की कोई कमी नही थी। सवर्ण समाज के पास रहने को साफ-सुथरा घर, घर में बंधे दुधारु पशु, फल सब्जी के लिए बड़े बड़े खेत थे। खाने को ताजा खाना। पीने को साफ सुथरा पानी, घर में कुएं खुदे हुए। खाने में तरह तरह के स्वादिष्ट पकवान और उनसे मिलने वाले तमाम प्रोटीन विटामिन आयरन और कैल्शियम। इधर भूख से बेदम बेहाल व्याकुल बचपन और उसके बाद पूरा जीवन।

भोजन सिर्फ शरीर और मन को स्वस्थ ही नहीं बनाता बल्कि वह खुशी प्रकट करने का माध्यम भी है। इसलिए हर खुशी के मौके पर चाहे वह किसी के जन्म का अवसर हो, किसी का जन्मदिन हो, शादी हो, कोई तीज त्योहार हो, घर में अन्न के भरे भंडार सारी खुशियों को चार गुना बढ़ा देते है। यही भोजन शरीर में पहुँचकर शरीर की मांस पेशियों को मजबूत करता है। हडिडयों को मजबूत करता है शरीर को सुंदर स्वस्थ और सडौल बनाता है।

कौशल्या बैसंत्री की आत्मकथा में बचपन और अभाव 

प्रसिद्ध दलित स्त्रीवादी लेखिका कौशल्या बैसन्त्री अपनी आत्मकथा में अपने स्कूली जीवन में अपने भोजन और अन्य सवर्ण समाज के बच्चों के भोजन के अंतर पर लिखती है-

ब्राह्मणों की लड़कियां बहुत अच्छे-अच्छे साफ-सुथरे कीमती कपड़े पहनकर आती थी। वे अच्छे टिफिन बॉक्स में (पीतल का) खाना लेकर आती था। उसमें कभी पूरी, कभी परॉठे, कभी पोहे, कभी सूजी का हलवा, कभी कुछ पकवान रहता सफेद रोटियां जिसमें घी लगा रहता। सब्जी या आचार के साथ वे खाती…….उनके खाने खुशबू और खाना देखकर मैं ललचा जाती थी। सोचती थी, ऐसा खाना मुझे कब नसीब होगा?

दोहरा अभिशाप में कौशल्या बैसन्त्री ने भी बरसात के दिनों में घर में खाना खाने के लिए आने वाली भीषण कठिनाइयों का वर्णन किया है। सभी दलित साहित्यकारों ने बरसात के रोमांटिक रूप की जगह उसके कुरुप और कष्टकारी रूप का चित्रण किया है। बरसात उनके लिए सुंदर और रोमांटिक हो सकती है जिनका घर पक्की छत और दीवार वाला है। जिनका घर भोजन के भंडार से भरा है। जिनके घर ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों की कमी नही है।

लेखिका कौशल्या बैसन्त्री के माता-पिता मजदूर थे। अनेक कष्ट सहते हुए उन्होंने अपनी बेटियों को स्कूल भेजा। सारे जातीय उत्पीड़न अपमान और उपेक्षा सहते हुए किसी दलित माता- पिता का अपने भूखे बच्चों की भोजन की भूख को मारकर शिक्षा की भूख जगाकर उसे शांत करने के लिए स्कूल भेजना वास्तव में ऐसे प्रेरणादायक उदाहरण है जो पूरी दुनिया में शायद ही कहीं मिले।

तुलसीराम अपनी आत्मकथा के पहले भाग मुर्दहिया में भूख की विवशता के बारे में जब लिखते है तो लगता है जैसे दलितों की भूख मिटाने की विवशता के आगे मनुष्य की अंदर की मानवता मर गयी है। तुलसीराम जी लिखते है –बरसात के दिनों में भुखमरी की स्थिति पैदा हो जाती। शुरू-शुरू में जब तेज बारिश से कट-चुकी फसलों वाले खेत में पानी भर जाता तो, उनके अन्दर बिल बनाकर चूहे डूबते हुए पानी की सतह पर आ जाते थे। गांव के बच्चे तरकुल या खजूर के पत्तों से बनी झाडू लेकर उन चूहों पर टूट पड़ते और उन्हें मारकर ढ़ेर सारा घर लाते।इसी तरहबरसाती मछलियां भी उस गरीबी में बड़ी राहत पहुंचाती थी।

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सुप्रसिद्ध चिंतक और आलोचक तुलसीराम जी अपनी आत्मकथा मुर्दहिया मे कई जगह अपने व दलित समाज के भूख शांत करने लिए किए गए उपाय के भयानक चित्र खींचे है। बरसात में भोजन के अभाव में मरे चूहे खाने की तरह ही मरे जानवर का मांस खाने का भी वर्णन जिस तरह किया है उससे दलितों की दुर्दशा और उनकी अखाद्य अशिष्ट पदार्थ खाने की विवशता दिखती है। मुर्दहिया के पृ.15 पर तुलसीराम जी लिखते है –  सन् 1860 या 70 के दशक के मालूम पड़ते हैं। मैं इन संस्करणों को बहुत ध्यान से सुनता था। एक ऐसे ही संस्करण में दादी ने बताया कि जब वह ब्याह कर हमापे गाँव आई तो देखा कि गाँव में किसी की गाय, भैंस या बैल मर जाता तो पास स्थित जंगल में लो जाकर उसका चमड़ा निकाला जाता फिर उसके बाद गंड़ासे और कुल्हाड़ियों से काट-काटकर उसका मांस सारे दलित बांस से बनी हुई टोकरियों में भरकर घर लाते। मांस काटने का काम प्राय महिलाएं करती थीं। दादी यह भी बताती कि जिस समय कोई चमार पुरूष मरे हुए जानवर का चमड़ा निकाना शुरू करता, अचानक सैकड़ों की संख्या में वहां गिद्ध मंडराने लगते  तथा दर्जनों कुत्ते आकर भौंकने लगते थे। कुछ सियार भी चक्कर मारते किन्तु कुत्तों और महिलाओँ की उपस्थिति को देखते हुए वे पास नहीं आ पाते। मरे पशु के मांस के बंदरबांट में महिलाओं के साथ कुत्तों और गिद्धों में उग्र होड मच जाती थी। दादी भी इस होड़ में शामिल हुआ करती थी। दादी मांस के कुछ हिस्से को आवश्यकतानुसार तुरंत पकाती किन्तु अधिकांश बचे हुए कच्चे मांस को कई दिन तक तेज धूप में सुखाती। खूब सूख जाने पर मांस को कच्ची मिट्टी से बनी कोठिली में रखकर बंद कर देती। इस प्रक्रिया से सूखे मांस का भंडारण बढ़ता जाता और साल के उन महीनों जे जब खाने की वस्तुओं का टोटा पड़ जाता तो सूखे मांस को नए तरीके से पका-पकाकर परिवार के लोग अपना पेट भरते। मरे हुए इन पशुओं के मांस को डांगर कहा जाता था।

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दोहरा अभिशाप में कौशल्या बैसन्त्री ने भी बरसात के दिनों में घर में खाना खाने के लिए आने वाली भीषण कठिनाइयों का वर्णन किया है। सभी दलित साहित्यकारों ने बरसात के रोमांटिक रूप की जगह उसके कुरुप और कष्टकारी रूप का चित्रण किया है। बरसात उनके लिए सुंदर और रोमांटिक हो सकती है जिनका घर पक्की छत और दीवार वाला है। जिनका घर भोजन के भंडार से भरा है। जिनके घर ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों की कमी नही है। जिनके घर ईंधन से भरे हैं उनके लिए बरसात खुशियों की बौछार हो सकती है परंतु अभाव और गरीबी के मारे दलितों के लिए यह हमेशा उसकी दुश्मन ही रही है। वैसे ही दलितों के पास खाने के लिए कुछ नही होता था और ऊपर से बरसात उन्हें जीते जी मार देती थी। ऐसी स्थिति में भी दलित महिलाओं ने अपना घर चलाने के लिए, अपने बच्चों का पेट भरने के लिए तमाम तरह के जुगाड़ लगाकर, अपने ऊर्जावान और तेज दिमाग का इस्तेमाल कर भूखे रह कर जीने की विपरित परिस्थितियों को कड़ी टक्कर दे अपने बच्चों के लिए भोजन का इंतजाम किया। लेखिका कमनी आत्या की विपरित स्थितियों मेंभोजन की समझ और जानकारी किसी भोजन विशेषज्ञ की विशेषज्ञता को सहज ही मात दे सकती है। एक भूखी पीढ़ी की स्त्री भूखी प्यासी स्त्री जो तमाम तरह के उत्पीड़न अत्याचार सहकर भी अपना परिवार पाल सकती है, इस अभाव में भी उसके बच्चे पढ़ लिखकर दुनिया को अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकते है तो सोचो यदि इस पूरी पीढ़ी को यदि अपनी प्रतिभा और क्षमता दिखाने का पूरा सहयोग पूर्ण अवसर मिला होता तो आज हमारा भारत कितना आगे होता। लेखिका अपनी बुआ की भोजन संग्रहण और जानकारी को सांझा करते हुए कहती है –

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बरसात शुरू होने के पहले बहुत जोर की आँधी आती थी। पड़ोस की कमनी आत्या (बुआ) सुबह के अँधेरे में हमें इमलियाँ बीनने के लिए बुलाने आती थी। मैं और मेरी छोटी बहन उनके साथ ईसाइयों के पुराने श्मशान (कब्रिस्तान) जाते थे। कब्रिस्तान अंग्रेजों के जमाने का था। और अब उसका उपयोग नहीं हो रहा था। उसके पास के रास्ते पर चहल-पहल भी कम रहती थी। हमको कब्रिस्तान में जाने से डर लगता था। वहाँ टूटे-फूटे मज़ार थे। कमनी बाई में हिम्मत देती थीं। वह यहाँ हमें इसलिए लाती थीं कि यहाँ डर के मारे कोई नही आता था, इसलिए खूब इमलियाँ मिल जाती थीं। यहाँ इमली के बड़े-बड़े पेड़ थे और इमलियाँ भी बड़ी-बड़ी और मोटी थीं। हम थैले भरकर इमलियाँ लाते। इमली के ऊपर का छिलका उतारकर बीज और रेशे निकालकर इमली धूप में सुखाते थे। माँ इन इमलियों में नमक मिलाकर उसके बड़े-बड़े लड्डू बनाकर किसी डब्बे में भरकर रख देती थीं र जरूरत पड़ने पर हम इसे उपयोग में लाते थे। हम बेर भी  तेलंगखेड़ी के जंगल से बीनकर लाते थे। हम बेर को खूब सुखाते। बाद में मां इन बेरों को ओखली में कूटतीं और और बीज निकालकर बेर का पाउडर बनातीं। फिर उसमें नमक मिलाकर उनकी बड़े की तरह टिकियां बनाकर धूप में सुखाती थी। गर्मी के दिनों में माँ इन बड़ों को पानी में घोलकर, उसमें चीनी मिलाकर हमें कभी-कभी पिलाती थीं। माँ कहती थईं कि इनको पीने से लू नहीं लगती। इमली के बीजों को हम आग में भूनकर खाते थे सुपारी की तरह। मां कभी महुए के साथ इमली के बीजों को पकाकर हमें खिलाती थीं। …..  शानिवार के दिन कमनी आत्या के साथ कोई बहन बड़े बँगलों के कंपाउंड के बाहर या मैदानों में साग तोड़ने जाती थी। चरोटा, चौलाई, पातूर, खापखुटी वगैरा नाम का साग तोड़कर लाते थे सब्जी बनाने को। इस मिश्रित साग की सब्जी बड़ी ही स्वादिष्ट बनती थी।

यू.एन. की एक रिर्पोट के अनुसार भारत में सवर्ण महिलाओं की औसत उम्र जहाँ 54.1 साल है वही दलित महिलाओं की औसत उम्र 39.5 है। यानी की सवर्ण महिलाओं के जीवन से लगभग 14.6 साल कम है। यानी दलित महिलाएं सवर्ण महिलाओं के मुकाबले 14.6 साल पहले इस दुनिया से विदा हो जाती है।

 भोजन की जद्दो जहद में स्त्रियों के साथ उनके दलित पुरुषों, भाइयों और पतियों ने जिस तरह से साथ निभाया यह भी काबिले-तारीफ़ है। कौशल्या बैसन्त्री का भाई भी अपने माता-पिता की तरह अपने छोटे भाई-बहनों की भूख को शांत रखने के लिए भोजन की व्यवस्था में घर का साथ देता है। वह पढ़ने लायक है।

भैया चिन्ता के साथ हमारे सुख-दुख और भूख-प्यास का ख्याल करते थे। छिन्दोले के पेड़ से पीले पके छिन्दोले  तोड़कर लाते थे। डॉक बंगले के पास जामुन के बड़े पेड़ से थैली भरकर पकी मीठी जामुन तोड़कर लाते, सामने की अमराई से आम तोड़कर लाते जिससे भूख से राहत मिलती। इस तरह जो मिल जाता, हम उसी में खुश हो जाते। रूपये खर्च करना और बाजार से खरीदकर खाना हमारे लिए मुश्किल था। कभी आम-जामुन के साथ झगड़े भी आते। लोग उलाहना देते हुए हमारे घर तक लड़ने लाते थे। तब माँ पिताजी शंकर भैया को डांटते और मारते थे। हम बहन-भाई माँ-पिता का आदर करते हुए उनकी हर बात मानते थे। रोटी न रहने पर पानी पीकर पेट भर लेना सामान्य बात थी। भूख लगने पर मैं इमली के पेट के नीचे गिरी इमली चुनकर खाती थी। बहन समझाती थी- इमली के पेट पर भूत रहते हैं, अकेली नहीं जाना।

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जिस समाज और व्यक्ति ने भूख नही झेली वह भूख की विवशता और इसकी कमी से उपजे भयानक परिणाम कभी नही समझ सकता। भूख केवल अकेली नही होती भूख के साथ उसका पूरा ताम झाम होता है जब इंसान भूख होता है तब वह किसी अन्य चीज के बारे में सोच नही सकता। वह रात दिन अपनी भूख मिटाने के बारे में सोचता रहेगा। उसके लिए जीवन के लिए और अन्य आवश्यक तत्व गौण हो जायेगे। दलितों में भी दलित यानी दलित स्त्री की पीड़ा का वर्णन कैसे किया जा सकता है। इस पीड़ा की शिकार दलित महिला की भूख की त्रासदी सबसे भयानक और त्रासद है। यू.एन. की एक रिर्पोट के अनुसार भारत में सवर्ण महिलाओं की औसत उम्र जहाँ 54.1 साल है वही दलित महिलाओं की औसत उम्र 39.5 है। यानी की सवर्ण महिलाओं के जीवन से लगभग 14.6 साल कम है। यानी दलित महिलाएं सवर्ण महिलाओं के मुकाबले 14.6 साल पहले इस दुनिया से विदा हो जाती है। दलित  महिलाओं महिलाओं का पूरा जीवन जातीय अपमान, उपेक्षा और प्रताड़ना में बीतता है। यहाँ तक की बच्चा पैदा करने के बाद भी जब उन्हें पौष्टिक भोजन की सबसे ज्यादा जरुरत होती है तब भी वे भूखी रहती है और ऐसा वैसा खाने पर मजबूर हो जाती है जो उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत ही हानिकारक होता है।

मराठी आत्मकथा में भूख से जद्दोजहद 

शांता कृष्ण कांबले की आत्मकथा नाजा

शांता कृष्ण कांबले की आत्मकथा नाजा पृ. 7- में लालू महारिन के जचकी के बाद घर में खाना उपलब्ध न होने के कारण पडौस के खेत में घुसकर कच्चे भुट्टे खाती है। यह वहीं देश है जहाँ किसी जानवर के बच्चा होने पर लोग उस जानवर से सहानुभूति प्रकट करते उसको गरम हलवा आदि खिलाते है। परंतु दलितों की स्थिति जानवरों से भी बदतर है। दलितों की भूखी औरतें भूख से झटपटाती हुई इधर से ऊधर अपमानित और शोषित होती रही है। शांता कृष्ण कांबले कहती है-

लालू महारिन को बच्चा हुआ। बारह दिन हो गए लेकिन घर में खाने को एक दाना नहीं था। पेट भूख के मारे जल रहा था। क्या खाए, कुछ सूझ नहीं रहा था। एकाएक लालू उठ खड़ी हुई। नवजात को गुदड़ी में सुलाया। ऊपर से कपड़ा ओढ़ाया और रामा चौगुले के केले के बगान की ओर निकल गई। केड़वारी से ही सटा हुआ भुट्टे का खेत था। लालू उसी में घुस गई और कच्चे भुट्टे तोड़कर खाने लगी। दूर से ही रामा चौगुले ने यह देखा तो आवाज़ लगाई- कौन है भुट्टे के खेत में? भुट्टा तोड़ते तुझे शरम नहीं आती क्या?” यह कहते-कहते वह पास आ गया तो देखा लालू थी। वह बोला –अरी कच्चे भुट्टे खा रही है लालू ने कहा –मैं बारह दिन से जच्चगी में हूँ। घर में खाने के एक दाना नहीं है और पेट में आग लगी है। क्या खाऊँ मैं ?”….

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जब शांता कृष्ण कांबले की माँ जब लालू के पास गई और बोलीलालू, तूने कैसे कच्चा भुट्टा खाया रे। बारह दिन के बच्चे को तकलीफ नहीं होगी।’

लालू ने यह सुनकर कहा –गवला बाई मुझे कुछ नहीं होगा। तुम्हें याद है न जब तुम्हारा तुका बारह दिन का था नाजा बारह दिन की थी। तब भी कुछ खाने को नही था। तब तुमने मुझसे कहा था कि चल लालू मेरे साथ दंडा की बाड़ी से बाजरे की खुद्दी ले आएँ। हमने बारह दिन के बच्चे को टोकरी में डाला और चल पड़े। बच्चों की टोकरियाँ महने गौशाले में रख दी थी। जब हम बाजरे की खुद्दी ले रहे थे कितनी तेज हवा चली और दोपहर में ही झमाझम पानी बरसने लगा था। तुझे याद है बरसात रुकने का नाम नही ले रही थी। हम लोग दौडकर गौशाला में गए तो देखा वहां भी पानी भर गया था। हमने टोकरियां सूखी जगह पर रखी और हाथ से बाजरे को रगड़कर खाने लगी। बाद में घर जाकर उसे चक्की में पीसा और टिक्कड़ बनाकर बाल-बच्चों को दिया तब जाकर उनके पेट में कुछ गया। भूख के आगे किसका जोर चलता है। लालू की आँखें टप टप बरस रही थी।

इसी तरह के भूख की विभीषिका के दिल तोड़ वर्णन बेबीताई कांबले की आत्मकथा जीवन हमारा में भी है। कहानी सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कहानी कफन में बुधिया का बच्चा पैदा करते हुए भूख से मरना, इसी तरह की त्रासदी है। दलित महिलाएं हमेशा कुपोषण की शिकार रही है इसलिए अक्सर सबसे ज्यादा अनीमिया की शिकार भी वही सबसे ज्यादा है। अनीमिया होने से अनेक जानलेवा रोग जनमते है और वह सहज ही उनकी शिकार हो अल्पायु में इस दुनिया को छोड देती है।

क्रमशः …. 

अनीता भारती जानी-मानी कवि-कथाकार और दलित लेखक संघ की अध्यक्ष हैं। 

2 Comments
  1. […] दलित साहित्य में भूख और भोजन का चित्रण […]

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