क्या शुद्रातिशूद्र समाज ने शिवाजी के राज्याभिषेक की कीमत चुकाई?

एच एल दुसाध

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आज विश्व इतिहास के महान योद्धाओं में से एक छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती है। इतिहास के एक ऐसे दौर में जब पूरे भारत में मुसलमानी सत्ता से निजात पाने के लिए हिन्दू अपने ईष्ट से प्रार्थना कर रहे थे, वैसे समय में महाराष्ट्र के शुद्र समाज में जन्मे शिवाजी महाराज ने हिन्दुओं की वंचित व बहिष्कृत जातियों को संगठित कर अपने खास रण कौशल और तलवार के बूते विशाल मराठा साम्राज्य की स्थापना किया। उनके अवदानों से धन्य महारष्ट्र के लोगों ने उनके नाम पर एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन लेकर असंख्य स्मारक खड़े किये हैं और सोत्साह हर साल धूमधाम से उनकी जयंती मनाते हैं। इस वर्ष इस खास अवसर को यादगार बनाने के लिए बहुजन चित्रकार हरि भारती ने एक भिन्न परिकल्पना की। वह पिछले कुछ दिनों से अतीत और वर्तमान के बहुजन नायकों का पेन्सिल स्केच बनाकर सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं, जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं। लोगों से मिल रहे प्यार से उत्साहित होकर उन्होंने आज के विशेष अवसर के लिए शिवाजी का स्केच बनाया और मुझे उन पर परिचयात्मक लेख लिखने का अनुरोध किया। शिवाजी महाराज पर बनाया गया उनका पेन्सिल स्केच इतना अदभुत था कि मैं कि लिखने से पीछे हट गया, क्योंकि मुझे लगा स्केच की क्वालिटी के साथ मैं न्याय नहीं कर पाउँगा। पाठक लेख के साथ संलग्न वह स्केच देखकर मेरी मनस्थिति का अनुमान लगा सकते हैं। बहरहाल, वह मुझसे ही लिखवाने के लिए आग्रही थे, इसलिए उनकी भावना का ख्याल करते हुए अंततः लेख लिखने का मन बनाया। यह मैंने उसी फ़ॉर्मेट में तैयार करने का प्रयास किया है, जिस फ़ॉर्मेट में उन्होंने इसके पहले के नायकों का परिचय लिखा है।

पहले से ही महाराष्ट्र में संन्यासी रामदास, तुकाराम आदि के निरंतर सक्रियता से बहुजन समाज में नवजागरण का भाव विद्यमान था। उन दिनों मुसलमान शासन के अग्रग्रासी नीति के फलस्वरूप ब्राह्मणों के शास्त्रों द्वारा परिचालित हिन्दू समाज संकटग्रस्त हो गया था। मुस्लिम प्रभुत्व के उस दौर में ब्राह्मणवादी समाज के अस्तित्व रक्षा के लिए एक नायक के अविर्भाव की जरुरत थी। ऐसी स्थिति में शिवाजी का आविर्भाव हुआ।

  • छत्रपति शिवाजी महाराज
  • नाम : छत्रपति शिवाजी भोसले
  • जन्म : 19 फ़रवरी, 1630
  • मृत्यु : 3 अप्रैल, 1680
  • पिता : शाहजी भोसले
  • माता :  जीजाबाई
  • संतान : संभाजी, राजाराम, रमाईबाई आदि
  • घराना : भोसले
  • समाधि : रायगढ़

सिख धर्म के उदभव के काल में दक्षिण-पश्चिम भारत के सह्याद्री पहाडियों की गोद में शुद्र शाहजी भोसले के तरुण तनय शिवाजी एक भयंकर उग्रता के साथ अपने उच्चाशा के स्वप्न शिखर पर पहुँचने के लिए परिश्रमी शुद्र मावली मराठा-महार किसानों के हल के अग्रभाग को सैनिकों के तलवार के रूप में तब्दील एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापित किये। पहले से ही महाराष्ट्र में संन्यासी रामदास, तुकाराम आदि के निरंतर सक्रियता से बहुजन समाज में नवजागरण का भाव विद्यमान था। उन दिनों मुसलमान शासन के अग्रग्रासी नीति के फलस्वरूप ब्राह्मणों के शास्त्रों द्वारा परिचालित हिन्दू समाज संकटग्रस्त हो गया था। मुस्लिम प्रभुत्व के उस दौर में ब्राह्मणवादी समाज के अस्तित्व रक्षा के लिए एक नायक के अविर्भाव की जरुरत थी। ऐसी स्थिति में शिवाजी का आविर्भाव हुआ। सर्वप्रथम उन्होंने मावली किसानों को लेकर छोटी-छोटी सेनाएँ बनायीं और फिर छापामार युद्ध पढ़ती को अपनाया। इस युद्ध पद्धति के जरिये उन्होंने आदिल शाह के कब्जे से कई दुर्ग मुक्त करा लिए। उनके इन दुसाहसिक कार्यों से कुपित होकर आदिल शाह ने उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया। इससे कुछ सालों तक शिवाजी खामोश रहकर धीरे-धीरे विशाल सेना संगठित करने में लग गए। बाद में इसी सेना के जरिये उन्होंने विशाल मराठा साम्राज्य का विस्तार किया। हिन्दू समाज में हिन्दू धर्मशास्त्रों द्वारा शुद्रातिशूद्रों के लिए हथियार स्पर्श निषिद्ध था। किन्तु हिन्दू धर्म के निषेधाज्ञायों की उपेक्षा कर शिवाजी अपने असाधारण शौर्य और रणकौशल से मुसलमानी सत्ता के खिलाफ संग्राम चलाकर महाराष्ट्र में मराठा साम्राज्य  कायम कर लिए।

साम्राज्य विस्तार के बाद महानायक का विजय मुकुट धारण किये वही शिवाजी जब सन 1673 में विधिवत अपने राज्याभिषेक की तैयारी में जुटे, महाराष्ट्र में तहलका मच गया काँप उठा महारष्ट्र का ब्राह्मण समाज एक शूद्र के राज्याभिषेक की बात सुनकर! ऐसे में ब्राह्मणों का प्रभावशाली तबका उनके राज्याभिषेक के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। ब्राह्मणों के प्रबल विरोध के समक्ष मुगलों के शिराओं में आतंक का संचार करने वाले महानायक शिवाजी को समझौते के लिए बाध्य होना पड़ा। समझौता स्वरुप करोड़ों रुपये के घूस के विनिमय में काशी के पंडित गंगाभट्ट को राजी कराया गया। भट्ट ने उदयपुर के राणाओं की वंशतालिका से उनका नाम जोड़कर क्षत्रिय के रूप में उत्तोलित करने का सफल उपक्रम चलाया। क्योंकि हिन्दू धर्म शास्त्रों के मुताबिक सिर्फ क्षत्रिय ही राजा बनने का अधिकारी हो सकता है। क्षत्रिय के रूप में उत्तोलित होने के लिए शिवाजी ब्राह्मणों के मध्य प्रचुर स्वर्ण मुद्रा वितरित कर धूमधाम से आठ दिनव्यापी ’व्रात्योष्टम यज्ञ’ कराये। यज्ञ शुद्धिकरण द्वारा शूद्र से उन्हें क्षत्रिय के रूप उत्तोलित किया गया। इसके बाद विशाल अर्थदान के विनिमय में ब्राह्मणों को उनके राज्याभिषेक के लिए आशीर्वाद देने को तैयार किया गया। किन्तु करोड़ों की नकदी और प्रचुर स्वर्ण पाने के बावजूद  ब्राह्मणों ने मुगलिया सलतन के त्रास और इतिहास स्रष्टा शिवाजी का राज्याभिषेक हाथ से नहीं, बाएँ पैर के अंगूठे से किया। राज्याभिषेक के बाद राजा बने, रायगढ़ दुर्ग के छत्रपति शिवाजी! लेकिन शूद्र से नकली क्षत्रिय बने शिवाजी का शासन ब्राह्मणों ने लम्बे समय तक कायम नहीं रहने दिया।

पेशवा का पद वंशानुगत नहीं था। पेशवाई सत्ता के वास्तविक संस्थापन का तथा पेशवा पद को वंश परम्परागत रूप देने का श्रेय ऐतिहासिक क्रम से सातवें पेशवा, बालाजी विश्वनाथ को है। बालाजी विश्वनाथ के समय से ही पेशवा लोग महाराष्ट्र के महज मंत्री नहीं- एकछत्र शासक रहे।

शूद्र शक्ति के नौका पर सवार होकर विपद-वैतरणी पार करते ही ब्राह्मण उनको शेष करने में जुट गए और जल्द ही कर भी दिये। शिवाजी राजा बनें 1674 में और उनकी मृत्यु हुई 3 अप्रैल 1680 को। थोड़े ही अंतराल में उनके उनके दोनों पुत्र- संभाजी (1680- 1689) और राजाराम (1689- 1700) भी कालकवलित हुए। थोड़े से अंतराल के मध्य शिवाजी और उनके दोनों पुत्रों का कालकवलित होना निश्चय ही एक बड़ा षड्यंत्र था, जिसे उद्घाटित करने के लिए इतिहासकारों ने अपेक्षित मेहनत नहीं की। बहरहाल शिवाजी के दोनों पुत्रों के मृत्यु के बाद सत्ता शिवाजी के पौत्र व संभाजी के पुत्र छत्रपति शाहूजी के हाथ में आई, जिन्होंने 1713 में प्रधानमंत्री या पेशवा पद पर नियुक्त किया चित्तपावन ब्राह्मण बालाजी विश्वनाथ को! 1720 में शाहूजी ने बालाजी के मृत्युपरांत उनके सुयोग्य पुत्र बाजीराव प्रथम को उनके स्थान पर नियुक्त किया। 28 अप्रैल, 1740 को बाजीराव राव के आकस्मिक निधन के बाद शाहूजी ने उनके ज्येष्ठ पुत्र नाना साहेब को पेशवा नियुक्त किया। किन्तु 15 दिसंबर, 1749 को शाहू महाराज की मृत्यु के बाद मराठा साम्राज्य की राजसत्ता पेशवाओं के हाथ में केंद्रित हो गयी और पूना बन गया पेशवाई सत्ता का केंद्र।

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पेशवा फारसी शब्द है जिसका अर्थ होता है अग्रणी! मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्रियों को पेशवा (मराठी में पेशवे) कहा जाता था। ये राजा के सलाहकार परिषद अष्टप्रधान के सबसे प्रमुख होते थे। राजा के बाद इन्हीं का स्थान आता था। यह छत्रपति शिवाजी महाराज के अष्टप्रधान मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री अथवा वजीर का पर्यायवाची पद था। पेशवा का पद वंशानुगत नहीं था। पेशवाई सत्ता के वास्तविक संस्थापन का तथा पेशवा पद को वंश परम्परागत रूप देने का श्रेय ऐतिहासिक क्रम से सातवें पेशवा, बालाजी विश्वनाथ को है। बालाजी विश्वनाथ के समय से ही पेशवा लोग महाराष्ट्र के महज मंत्री नहीं- एकछत्र शासक रहे।

एक स्वाभाविक परिणति स्वरुप पेशवाई ब्राह्मणों की हुई अर्थात बाजीराव लोग उत्तराधिकार सूत्र से पेशवाई करने लगे। इन पेशवाओं के ज़माने में मूल भारतीय बहुजन समाज पर जो जघन्य अत्याचार, उत्पीड़न हुए उसे देखकर नरक के राजा यमराज भी शर्मिंदा हुए होंगे। शुद्रातिशूद्रों पर अत्यचार के जरिये मानों वे शुद्र शिवाजी के राज्याभिषेक का प्रयाचित किये थे। पेशवाओं का ज़माना बहुजनों से सूद के साथ मूल चुकाने का इतिहास था। अंततः अंग्रेजों के नेतृत्व में 1818 के पहले दिन 500 महारों ने पेशवाओं की विशाल फ़ौज का सफाया कर बहुजनों को पेशवाओं से निजात दिलाया। पेशवाओं ने मानवता को जिस तरह कलंकित किया, उसकी कालिमा धोने में अंग्रेजों के भी पसीने छूट गए।

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अंत में! छत्रपति शिवाजी एक ऐसे महान योद्धा के रूप में याद किये जाएँगे, जिन्हें बहुजनों के राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले ने शुद्रातिशूद्रों का नायक करार दिया। इस महानायक ने विश्व इतिहास में शौर्य का विरल इतिहास रचने के लिए हिन्दू धर्म शास्त्रों की अवहेलना करने का साहस जुटाया, किन्तु अंततः राज्याभिषेक के लिए ब्राह्मणों से समझौता करने के लिए विवश हुए और उनके राज्याभिषेक की कीमत बहुजनों को पेशवा ब्राह्मणों का अमापनीय अत्याचार सहकर अदा करनी पड़ी।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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