जीवन का हर रंग दिख रहा है नदी यात्रा के दौरान

अमन विश्वकर्मा

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भौगोलिक और भौतिक दृष्टि से वरुणा नदी में पानी का स्तर कम हो जाने से आस-पास के क्षेत्रों में भू-जल स्तर की समस्या गहराती ही जा रही है। जलवायु परिवर्तन इसका जीता-जागता प्रमाण है। संक्षेप में कहें तो संपूर्ण स्थिति निराशाजनक है। भारतीय संस्कृति और जीवनदर्शन में नदी को माँ के समान माना गया है जो हमारे खेतों को, हमारी फसलों को अमृत रूपी जल देती है। आसपास के किसान वरुणा का पानी खेती के लिए उपयोग में तो लाते हैं लेकिन उससे फसलें नष्ट होने की निराशा भी है। ग्रामीणों के अनुसार एक समय में यह पानी इतना साफ था कि इसको हर काम में उपयोग में लाया जाता था। नदी किनारे सस्ती जमीन होने के नाते यहाँ धीरे-धीरे बाजार बसने लगे- होटलों और फैक्ट्रियों के। इनकी गंदगी सीधे वरुणा नदी में आज  गिराई जाने लगी है।

इस नदी को अगर धार्मिक स्थिति से देखें तो वरुणा तट पर पंचकोशी तीर्थ के अनेकों मंदिर और रामेश्वर जैसे प्रसिद्ध तीर्थस्थल हैं। सदानीरा नदियों में शुमार यह नदी 20-25 बरस पहले लगभग 202 किमी के प्रवाह क्षेत्र को वर्षाजल के माध्यम से प्राकृतिक रूप से समेटती थी। आसपास के क्षेत्र में मनमोहक हरियाली बिखेरती हुई यह नदी गंगा में समाहित हो जाती है। आज से मात्र बीस साल पूर्व वरुणा नदी काफी गहरी हुआ करती थी और सालो-साल स्वच्छ जल से भरी रहती थी जिससे आस-पास के ग्रामीण खेती, पेयजल, दैनिक क्रियाकलाप, श्राद्ध-तर्पण समेत पशुपालन के लिए इसी पर निर्भर रहते थे। वरुणा तट पर पाए जाने वाली पेड़-पौधे जैसे नागफनी, घृतकुमारी, सेहुड़, पलाश, भटकटैया, सर्पगंधा, चिचड़ा, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, शैवाल, पाकड़, पीपल, नीम, बरगद इसके जल को साफ रखते थे। वरुणा का दुख हमारी माँ का दुख है और हम अपनी माँ पर आए संकट की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। यहाँ नदी अध्येता राकेश कबीर की काव्य-पुस्तक नदियाँ बहती रहेंगी की एक कविता बेचारी नदियाँ की पंक्तियाँ लिखना लाज़मी है-

कल-कल बहते गंदे नाले/नदियाँ सूखी जाती हैं,/ सूख रही हैं झीलें कई/ दरिया की साँस टूटी जाती हैं/भर दिए गए कुएँ सारे
तालाब बेपानी हुए जाते हैं/अब तो शहर के गंदे नालों से ही/बची है नदियों में मामूली-सी हरकत/वरना पहाड़ वाले ने तो पानी की सप्लाई/उन्हें कब की बंद कर रखी है/कहाँ जाएँगे प्यास बुझाने बेज़ुबान परिंदें/इंसानों ने तो अपनी दुर्गति ख़ुद ठानी है!

नदी और पर्यावरण पर तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद वरुणा का यह हाल देखकर हम विमर्श करने लगे कि तभी मेरी नज़र ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ के एक बोर्ड पर पड़ गई, जो गिर चुकी थी और उस पर प्रकृति रूपी घास ने अपना कब्जा जमा लिया था।

वर्तमान में सरायमुहाना यानी राजघाट से फुलवरिया (कैंटोन्मेंट) तक लगभग 22 किमी क्षेत्र तक बदबूदार गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है। मात्र इस 22 किलोमीटर के क्षेत्र में सीवर और ड्रेनेज खुलेआम बहते देखे जा सकते हैं। लोहता, कोटवा क्षेत्र में मल और घातक रसायन सीधे नदी में बहाए जा रहे हैं। पिछली यानी पाँचवीं यात्रा के दौरान मैंने इन नालों का जिक्र भी किया था। ग्रामीणों ने इस नाले की खूब भर्त्सना की थी। नाले में गंदगी की भयावहता देख हम लोग भी दंग रहे गए थे। दूसरी तरफ, शहरी क्षेत्र में लगभग दर्जनभर नाले प्रत्यक्षत: वरुणा में मल और गंदगी गिराते देखे जा सकते हैं। ऊपर से कोढ़ में खाज की तरह जनपद मुख्यालय से सटे वरुणा पुल पर से प्रतिदिन मृत पशुओं के शव और कसाईखाने के अवशेष, होटलों में बन रहे खाने के अपशिष्ट इसी नदी में गिराए जाते हैं। नदी किनारे के रहवासियों के अनुसार होटलों, चिकित्सालयों और रंग कारखानों की सीवर लाइनें प्रत्यक्ष अथवा भूमिगत रूप से इसमें मिला दी गई है।

नदी यात्रा का नेतृत्व करते हुए रामजी यादव_Photo Credit : Aparnaa

ये जानकारियाँ हमें पिछली पाँच यात्राओं में ग्रामीणों और वरुणा नदी किनारे रहने वाले लोगों से मिलीं।

गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के तत्वावधान में नदी एवं पर्यावरण संचेतन यात्रा का रविवार को छठवाँ आयोजन हुआ। इस यात्रा में मैंने महसूस किया कि समय बीतने के साथ और जनसंख्या के दबाव व पर्यावरण के प्रति उदासीनता के चलते वरुणा नदी सूखने लगी है। यहा कहा जा सकता है कि इसे जिंदा रखने के लिए नहरों से पानी तो ज़रूर छोड़ा जाने लगा लेकिन नहरों से पानी कम और सिल्ट ज्यादा गिर रही है। नदी की सफाई न होने से सिल्ट नदी में हर तरफ जमा हो गई, जिससे वरुणा काफी उथली हो गई है। यही कारण है कि अब झील और नदी में बरसाती पानी भी एकत्र नहीं हो पाता है और वरुणा अपने उद्गम से लेकर सम्पूर्ण मार्ग में सूखती जा रही है। कमोबेश यही हालत 20 किमी दूर भदोही जनपद तक है जहाँ विभिन्न नालों के मिलने से यह पुन: नदी के रूप में दिखाई देने लगती है। दूसरी तरफ, यही हालत वाराणसी में इसके संगम स्थल तक भी है। यात्रा के दौरान कुछ लोगों ने बताया कि नदी किनारे होटलों और चिकित्सालयों के अपशिष्ट भोर के अंधेरे में नदी में फेंके जाते हैं। नदी किनारे जीवन जीने की लालसा में नदी के किनारे पंचसितारा होटल, कॉलोनियाँ और बड़े-बड़े इमारतों का निर्माण निरंतर जारी है।

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छोटी-छोटी नदियां विलुप्त होने की कगार पर हैं

नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा की शुरुआत भक्तूपुर गाँव के कैलहट क्षेत्र से हुई। यहाँ स्थित अखाड़ा और उसमें कसरत करते युवा व बुजुर्ग अपने दुनिया में मगन थे। हमको ऐसा नज़ारा काफी बरस बाद देखने को मिला। पचइयाँ यानि नागपंचमी के अवसर पर कुश्ती की परम्परा और युवाओं के दैनिक जीवन में अखाड़ों पर रियाज मारने का चलन खत्म होता जा रहा है। कुश्ती की याद मेरे पास भी है जब मैंने अपने दादाजी से पटखनी खाई थी। खैर, अखाड़े के पास कहानीकार संजय गौतम, लेखक संतोष कुमार, किसान नेता रामजनम, सामाजिक कार्यकर्ता नंदलाल मास्टर, गोकुल दलित, ग्राम्या  संस्थान के सुरेंद्र कुमार, अनूप श्रमिक, मनोज यादव, लालजी यादव, सुजीत यादव के साथ गाँव के लोग पत्रिका के सम्पादक रामजी यादव और कार्यकारी सम्पादक अर्पणा के साथ मेरा जुटान हो गया था।

सुबह के साढ़े छह बज रहे थे लेकिन धूप का तीखापन शरीर को चुभ रहा था। सावन की शुरुआत हो गई है लेकिन वाराणसी जिले को अभी तक बारिश की एक बूंद तक नसीब हुई है। फिर भी गाँव का माहौल शांत और शीतल था। पेड़ों की छाँव नेशनल हाइवे की तरफ से आ रही गर्म हवाओं को शीतल बना दे रहा था। इस बार टीम नदी किनारे होते हुए गाँव के और भी अंदरुनी इलाकों में जाने वाली थी। पिछली बार रामजी भैया ने बताया था कि जैसे-जैसे यात्रा बढ़ेगी पर्यावरण का नज़ारा और आकर्षक होता जाएगा। मैंने भी सोचा– वहाँ इंसानों की आबादी कम होगी, तभी। वर्तमान समय में मनुष्य प्रदूषण करने वाला स्रोत स्वयं बन गया है, क्योंकि प्रकृति में कोई भी ऐसी विधि नहीं पाई जाती है जो कि मनुष्य के द्वारा निर्मित पदार्थों को अपघटित कर सके और उन तत्वों को प्रकृति के चक्र में कर दे।

कैलहट घाट स्थित अखाड़े पर कसरत करते युवा पहलवान_Photo Credit : Aparnaa

अखाड़े पर बुजुर्गों और युवाओं ने अपने-अपने विचार साझा किए। जहाँ बुजुर्गों ने बताया कि रियाज के बाद हमलोग इसी वरुणा नदी में नहा लिया करते थे वहीं युवाओं ने कहा कि हम तो अब हैंडपम्प के पानी से नहाते हैं। नदी किनारे वहीं एक हैंडपम्प भी है जिसे एक बार पुश करने पर एक गिलास पानी तो निकल ही जा रहा था, शीतल और सोनहट वाला पानी। अखाड़ा के पास एक कैलहट मंदिर भी था जिसका अपना इतिहास है। अखाड़ा पर रियाज वगैरह के बाद लोग इसी मंदिर को नमन कर अपने घर को जाते हैं। छः बाइ छः के क्षेत्रफल में स्थापित इस मंदिर में पत्थर की लगभग 18 मूर्तियाँ हैं। एक मूर्ति पर लाल चुनरी ओढ़ाई गई थी। आसपास एकदम साफ-सुथरा था अंदर छोटी-छोटी सात से आठ घंटियाँ भी बंधी थी। मुराद पूरी होने पर लोगों ने देवी-देवताओं के नाम चढ़ावा चढ़ाया था।

नदी किनारे पगडंडी पर हमने यात्रा की शुरुआत की। आपस में नदी और पर्यावरण पर बातचीत करते-करते हम आगे बढ़ रहे थे। वरुणा नदी बीच में कहीं-कहीं सूख गई थी। बीच की जमीन दिख रही थी। सिल्ट और काई पानी की परतों पर जमी हुई थी लेकिन दूसरे इलाकों की अपेक्षा यहाँ कम थी। उसका कारण यह था कि यहाँ नदी किनारे लोग कम आते हैं। मानव शौच भी कहीं-कहीं था। तो कहीं-कहीं लोग अपने परिजनों के साथ घास-फूस काट रहे थे गाय-गोरू को खिलाने के लिए। रास्ते में मुझे एक ग्रामीण मिल गए नाम था सरोज मौर्या। नदी की स्थिति पूछने पर उन्होंने बताया-

‘सर, मैं पढ़ा-लिखा हूँ लेकिन गाँव में ही बस गया हूँ।’

इसी रास्ते वरुणा नदी में गिरती है गंदगी

‘ओह, तो क्या हुआ अपने गाँव के लिए उस शिक्षा का प्रयोग करते रहिए।’

‘जी सर, करता भी हूँ।’

‘यह कैलहट गाँव है?’

‘हम्म।’

‘कुछ बरस पहले नदी कैसी थी?’

‘बढ़िया थी, मैं छोटा था तो घरवालों के साथ आता था। खेत पर काम करने के बाद बाउजी मेरा हाथ-पैर, मुँह इसी पानी से धुलवाते थे। कभी-कभी नहला भी देते थे। यह गर्मी में रोज होता था।’

वरुणा नदी में जगह-जगह जलस्तर हो गया हैं काफी कम

‘अच्छा, खेतों के लिए पानी उपयोग में लाते हैं कि नहीं?’

‘इस समय कम हो गया है। कुछ फसलों के लिए साफ पानी की आवश्यकता पड़ती है तो हम जमीन की बोरिंग से ले लेते हैं। पिछले नवम्बर माह में तो पानी की कमी के कारण हम खेत ही नहीं जोत पा रहे थे। सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत पर ड्रेनेज खोला गया। तब जाकर खेती-बारी हो पाई। शिकायत मैंने ही की थी।’

‘इधर कुछ नाली या सीवर है कि नहीं, जो नदी में गिरते हों?’

‘हैं तो बहुत, लेकिन बारिश नहीं होने के कारण सब सूख गए होंगे। लेकिन कुछ नालों में आज भी सीवर का पानी गिरता रहता है। आइए एक-दो नाले रास्ते में ही दिख जाएँगे। मैं आगे चल रहा हूँ आपको दिखा दूँगा।’

ग्रामीणों को जागरूक करते चल रही नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा की टीम

रास्ते में एक नाले की ओर इशारा करते हुए सरोज ने बताया कि इस नाले में लगभग छह से सात गाँवों के सीवर गिरते हैं। बारिश के दिनों में यहाँ से गंदगी की मोटी धार नदी में गिरती है।

बीच यात्रा में ग्रामीण हमसे जुड़ रहे थे। कोई पूछता यह क्या हो रहा है तो कोई खेत की समस्याओं के समाधान या निदान की बात करता। नदी किनारे होते हुए भी कहीं-कहीं मिट्टी सूर्ख हो चुकी थी। ग्रामीणों ने इसका कारण वरुणा नदी के गिर रहे स्तर को बताया। नदी के इस पार से उस पार जाने के लिए लोग उसी चलकर जा रहे थे। मात्र कमर तक पानी में एक-दो जगहों पर भैंसों को नहलवाया जा रहा था। इसी दरम्यान सामाजिक कार्यकर्ता मनोज यादव भी फेसबुक पर आनलाइन हो गए। नदी यात्रा की भूमिका रखने के बाद मनोज ने सभी लोगों को परिचय लिया। लाइव वीडियो में पत्रिका गाँव के लोग की कार्यकारी सम्पादक अपर्णाजी ने कहा हम जब से यात्रा निकाल रहे हैं तब से देख रहे हैं कि वरुणा नदी की हालत काफी खराब हो चुकी है। वर्तमान में नदी का पानी काला या हरा हो चुका है वहीं, ग्रामीणों के अनुसार, 20-25 साल पहले इसी नदी का पानी लोग पीते थे, खाना बनाते थे। इस नदी यात्रा के माध्यम से हमारा यही उद्देश्य है कि आने वाले दिनों में हम इन समस्याओं के समाधान पर काम करेंगे ताकि नदी के मूल स्वरूप को बचाया जा सके। इसके बाद पत्रिका गाँव के लोग के सम्पादक रामजी यादव ने बताया कि इस यात्रा के माध्यम से हम लोगों के अंदर संचेतना जगा रहे हैं ताकि नदी और पर्यावरण को लेकर जागरुक हो सकें। पहले की अपेक्षा अब लोगों का यात्रा से जुड़ाव बढ़ रहा है। इस यात्रा के दौरान हमने देखा कि खेती के लिए पानी का एकमात्र साधन नदी ही बची है। बोरिंग की मशीनें कहीं-कहीं ही पहुँच पा रही हैं। यह एक ऐसी समस्या है जिसकी भयावहता आने वाले दिनों में और बढ़ जाएगी। इन्हीं समस्याओं के समाधान को हम नदी यात्रा निकाल रहे हैं। उद्गम से संगम तक की यह यात्रा चमाँव से शुरू हुई थी और आज गोसाईपुर तक जा रही है। हम देख रहे हैं कि जो लोग गाँव से निकलकर शहरों में गए उन्होंने अभी तक अपनी यादों में ही गाँव की याद को बरकरार रखा है। उनका मानना है कि गाँव बदल रहा है जोकि गलत है। ऐसे लोगों को गाँव की वास्तविकता से परिचित होना चाहिए।

वरुणा नदी के किनारे घास काटने आई वृद्ध महिला

यात्रा फिर आगे बढ़ने लगी। नदी के एक किनारे एक युवक अपनी माँ के साथ घास काट रहा था। बातचीत में महिला ने बताया कि यहाँ हम लोग सिर्फ जानवरों के लिए घास काटने आते हैं। इससे यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वरुणा अब सिर्फ जानवरों के काम की नदी रह गई है। इसमें जानवर ही नहाते हैं, इसके किनारे जानवर ही विचरण करते हैं। आते तो इंसान भी है लेकिन सिर्फ शौच करने या मछली मारने। यात्रा के दौरान चार-पाँच स्थानों पर लोग मछली मार रहे थे। रविवार का दिन यानी छुट्टी और मछली की पार्टी! इस माहौल को देखकर गोकुल दलित का मन ललच रहा था। नंदलाल मास्टर के साथ दोनों ने मिलकर शाम की पार्टी का शायद प्लान भी बना लिया था। यहाँ वरुणा नदी में सिंधरी मछली ज्यादा मिलती है। नदी में कहीं-कहीं सैवाल मंडरा रही थी लेकिन उस पर गंदगी की मोटी-मोटी परत जमी हुई थी। जलकुम्भी का डेरा था, वह अलग। हवाओं से उड़ रही बड़ी-बड़ी घास अलग ही माहौल बना रही थी। यहाँ की हरियाली देखकर लग ही नहीं रहा था कि हम बनारस में हैं। कहाँ शहर की गर्म हवा और कहाँ हर वक्त ताजी लगने वाली गाँव की ठंढी हवा!

आगे बढ़ने पर एक वृद्ध सिर और कमर पर गमछा बाँधे मिल गए। हाथ में खुरपी लेकर घास काट रहे थे। नाम था- रघुवर। नदी स्थिति पर बातचीत में उन्होंने बताया- ‘तोहरे सामने हौ बचवा। हमहन त एम्मन नहइले, खइले कुल हई! तू लोग का करत हउवा?’

‘हम लोग नदी यात्रा निकाल रहे हैं, लोगों को जागरूक करने के लिए।’

‘बढ़िया काम त हौ।’

यह कहकर वे फिर अपने काम में तल्लीन हो गए। तीखी धूप में काम करते हुए देखकर मैंने उनसे ज़्यादा सवाल नहीं किया।

तीखी धूप में भी किसान का काम जारी है

यात्रा के दौरान पाँच-छः जगह मुझे सीवर के छोटे-छोटे पाइप दिखाई पड़े और उसमें से धीरे-धीरे गिरता गंदा पानी। कहीं-कहीं पानी ने खुद खेतों की मिट्टी को काटकर अपना रास्ता बना लिया था। आगे बढ़ने पर नदी का पानी काला और हरा दोनों तरह का दिखा। चटखती धूप में हम सभी पसीने-पसीने हो गए थे। एक जगह थोड़ी बैठकी हुई। पर्यावरण पर विचार-विमर्श के बाद यात्रा जारी रखते हुए श्यामजी भैया के सुझाव पर उनके एक परिचित के यहाँ भी ठहराव हुआ। यहाँ गुड़ और पानी से हम सभी लोगों का आवभगत हुआ। पेड़ों की छाँव आनंद दे रही थी। कुछ लोग खटिया पर बैठे तो कुछ लोग लेटकर कमर सीधी करने लगे। नदी यात्रा समाप्ति की ओर थी। वहाँ से चलते समय एक सज्जन ने हमें ट्रैक्टर की यात्रा भी करवा दी। सभी लोग ट्रैक्टर-ट्राली पर सवार हो गए थे। थोड़ी देर में हम भक्तूपुर के पहले ही एक ईंट-भट्ठे के पास उतर गए। वहाँ से फिर हाथ में बैनर लेकर यात्रा गाँव-गाँव, तीरे-तीरे चलने लगी। सावन के महीने में बारिश भले न हुई हो लेकिन पेड़ों पर झूले टंग गए थे। बच्चे उस पर लटककर मनभावन सावन का औपचारिक आनंद ले रहे थे। दूसरी तरफ, नदी और पर्यावरण पर तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद वरुणा का यह हाल देखकर हम विमर्श करने लगे कि तभी मेरी नज़र राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के एक बोर्ड पर पड़ गई, जो टूट कर गिर चुका था और उस पर प्रकृति रूपी घास ने अपना कब्जा जमा लिया था।

 

वरुणा नदी पर ही निर्भर हैं किनारे के लोग_Photo Credit : Aparnaa
वरुणा की हाल-अहवाल जानती नदी एवं पर्यावरण संचेतन यात्रा की टीम

 

अमन विश्वकर्मा गाँव के लोग से सम्बद्ध हैं।

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