Tuesday, April 16, 2024
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मौसम की मार और सरकार की दोहरी नीतियों की मार झेलता किसान

कल हुई अचानक हुई बारिश से खेतों में अनावश्यक पानी के जमा हो जाने से सब्जियों और रबी की फसलों को बहुत नुकसान पहुंचा है। साथ ही आम के पेड़ों में लगी हुई बौर झड़ गईं। जिसके चलते आम के उत्पादन पर भी फर्क दिखाई देगा।

वाराणसी। जहां एक तरफ किसान हरियाणा के शंभू सीमा पर एमएसपी की मांग को लेकर दिल्ली कूच करने के लिए 13 फरवरी से आंदोलनरत हैं, वहीं दूसरी तरफ बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि की वजह से खेतों में खड़ी फसलों पर प्राकृतिक नुकसान से परेशान है।

कल हुई अचानक बारिश ने उत्तर प्रदेश में खेतों में लगी रबी के फसल को बहुत नुकसान हुंचाया है। बारिश के चलते बीज की अंकुरित फसलें झड़कर जमीन पकड़ ली। सरसों की पकी फसलों के दाने झड़ गए हैं। इस तरह बेमौसम की फसलों ने किसान की कमर तोड़ कर रख दी।

रबी की गेहूं, चना, मटर, अलसी, सरसों, मसूर जैसी खरीफ फसलों के बनिस्बत कम पानी की जरूरत पड़ती है। इस मौसम में हरी सब्जियों के उत्पादन की बहार रहती है। इस तरह अचानक हुई बारिश से खेतों में अनावश्यक पानी के जमा हो जाने से सब्जियों और रबी की फसलों को बहुत नुकसान पहुंचा है। सतह ही आम के पेड़ों में लगी हुई बौर झड़ गईं। जिसके चलते आम के उत्पादन पर भी फर्क दिखाई देगा।

क्या कहते हैं मौसम वैज्ञानिक

मौसम विभाग ने अभी रुक-रुक कर बारिश होने की चेतावनी दी है, एक मार्च से लेकर 3 मार्च तक देश के अनेक हिस्सों में तेज बारिश के साथ उत्तर प्रदेश में गरज के साथ बारिश होगी और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ओला वृष्टि की आशंका है। जिससे किसानों में चिंता बढ़ गई है।

वौज्ञानिकों का कहना है कि तेज हवा के चलने से गेहूं की फसल के गिरने और फलियों के टूटने और दाने गिरने से नुकसान होगा। हालांकि ये पानी गेहूं की फसल के फायदेमंद है क्योंकि इससे किसानों को गेहूं की सिंचाई नहीं करना पड़ेगी।

किसानों ने क्या कहा 

मिर्जापुर क्षेत्र के किसान निरहु नारायन ने बताया कि हमारी खरीफ की फसल भी सूखे के चपेट में आ गई गई थी, जिसके कारण धान की पूरी नर्सरी सूख गई थी और अब रबी फसलों पर बिना मौसम बारिश। इस तरह दो-दो फसल का नुकसान हो गया और कर्ज अलग चुकाना है। इस तरह हर साल मौसम की मार हमें झेलना पड़ रहा है, जिसके कारण कर्ज की राशि बढ़ती ही जा रही है। इस नुकसान के लिए हम चाहते हैं कि सरकार मुआवजा दे ताकि हम किसान कुछ संभाल सकें।

एक तरफ किसान कर्ज लेकर बीज,खाद, सिंचाई और ट्रेक्टर की व्यवस्था करते हैं, वहीं तैयार होती फसलों पर बारिश हो जाने से उनकी उम्मीद और अच्छे भविष्य पर पानी फिर जाता है।

यहीं स्थिति मड़िहान गाँव की है, जहां के किसान इस बारिश से दुखी और परेशान हैं। वहाँ के एक किसान भागा लाल ने बताया कि इस समय किसानों ने सरसों की फसल काटकर थ्रेसिंग कराने का काम शुरू ही किया था कि धूप नहीं निकलने और बारिश हो जाने से सरसों के दाने में दाग होने लगे और खलिहान में रखी हुई फसल पानी पड़ने से खराब होनी शुरू हो गई है।

क्या आप लोगों प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का लाभ नहीं लेते तब उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में खरीफ में धान और रबी में गेहूं की फसल का ही बीमा होता है। जबकि यहाँ सरसों, मसूर, चना की फसल भी होती है लेकिन इधर तीन वर्षों से इन फसलों के नुकसान की क्षतिपूर्ति नहीं कर रही है, कारण पूछने पर वे बताने में असमर्थ थे।

एक किसान ने नाम नही लिखने की शर्त पर कहा कि उन्होने कहा कि पिछले तीन वर्षों से किसी न किसी कारण फसल खराब हो रही है। नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि सरकार की सारी योजनाएँ केवल कागज पर ही है। प्रचार-प्रासर अखबारों और होर्डिंग पर बहुत दिखाई देता है लेकिन जमीनी स्तर पर किसान अपने अधिकार के लिए इस कार्यकाय, उस बाबू और अधिकारी के लिए दौड़ते रहते हैं।

पथरौर सहकारी समिति के सचिव से निटेश मिश्र से बात करने पर उन्होने उन्होने बताया कि इस क्षेत्र में केवलधान और गेहूं के हि फसलों का बीमा होता है। कारण पूछने पर बताने में असमर्थ रहे।

किसानों पर बढ़ता दबाव आत्महत्या का कारण 

सरकार द्वारा किसानों के लिए तैयार की गई नीतियों में इतनी खामी है, जिसका दबव किसान पर पड़ता है। कर्ज लेकर खेती करने का नतीजा लगातार कर्ज में रहना । बैंक और साहूकार वसूली के लिए लगातार दबाव बनाते हैं, जिससे उनका आसान कदम आत्महत्या होता है।

खेती किसानी की आधुनिक तकनीकें और तरीके आ जाने की  बाद भी इधर देश में किसानों की आत्महत्याओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। किसान कर्ज लेकर ज्यादा फसल की उम्मीद में इन माध्यमों से खेती करते हैं लेकिन मौसम की मार से फसलों को नुकसान होता है और किसान आत्महत्या कर लेता है।

सरकार किसानों को उनके अधिकार और सुविधा देने के खिलाफ है क्योंकि 2020-21 में किसान 13 महीने आंदोलन किए थे तब मोदी ने विधान सभा चुनाव के चलते तीन कृषि कानून को रद्द कर एमएसपी बढ़ाने की वादा किया था। लेकिन तीन वर्ष बाद तक सरकार ने कोई बात नहीं की, जिसके चलते 13 फरवरी से किसान दिल्ली चलो के नारे के साथ आंदोलन शुरू कर दिये हैं लेकिन सरकार किसानों से इतना डर गई है कि दिल्ली न पहुँच पाये इसके लिए सीमा पर हि कीलें लगाका, दीवारें बनवाकर सात-सात बेरिकेड लगवा दिया हैं।

एनसीआरबी डेटा से पता चलता है कि 2014 और 2020 के बीच 6 वर्षों में किसान आत्महत्या की घटनाएं अधिक रही हैं। 2014 में 5,600 किसानों की आत्महत्या हुई, और 2020 में 5,500 किसानों की आत्महत्या हुई। यदि कृषि मजदूरों को 2020 की संख्या में जोड़ा जाए, तो आत्महत्याओं की संख्या बढ़कर 10,600 से अधिक हो जाएगी।

देखा जाय तो अकेले उत्तर प्रदेश में 2017 से 2021 के बीच 398 किसानों ने आत्महत्यायें की। राज्यसभा में एक लिखित प्रश्न का जवाब देते हुए कृषि मंत्री ने यह बात बतायी थी। वहीं, 2014 के एक आंकड़े पर गौर करें तो इस वर्ष 145 किसानों ने आत्महत्या की है। ये किसान कर्ज से परेशान होकर आत्महत्या किये। जहां अदानी-अंबानी का करोड़ों-अरबों का कर्ज माफ किया गया लेकिन ये आत्महत्या करने वाले किसानों पर हजारों रुपए का हि कर्ज था जिसके लिए उन पर दबाव बनाया जाता है।

इससे पहले की किसान किसानी करने से दूर हो जाएँ,  सरकार को किसानों के प्रति सकारात्मक सोच के साथ कोई ठोस रणनीति बनानी चाहिए जिससे किसान किसानी से दूर ना हो और लोगों को अनाज उपलब्ध होता रहे।

देश की अर्थव्यसथा को मजबूत करने और लोगों की अनाज की जरूरत पूरी करने वाले किसान दोहरी मार झेल रहे हैं। उन्हें अपनी फसलों के लिए न तो उचित मंडी मिल पा रही है न ही सही एमएसपी। ऐसे में किसान की मुसीबत बढ़ ही रही है।

गाँव के लोग
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