माँ की बनाई ज़मीन पर खड़े होकर पिता यह सब कर सके…(भाग -तीन)

मन्नू भंडारी

2 638

भाग तीन

पिताजी के इन्दौर से अजमेर आने का जो कारण जाना तो मैं हैरान रह गई। जो व्यक्ति डेबिट-क्रेडिट तक का  मतलब तक न जानता रहा हो, वह सट्टा खेले? मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था। पर सही है, जब आदमी के पास पैसा होता है तो घेराबन्दी करने वाले लोगों की कमी भी नहीं रहती। वे लोग समझाते, सब्ज़बाग़ दिखाते और पिताजी जब अपनी नासमझी प्रकट करते तो कहते कि आपको कुछ कहीं करना होगा, बस पैसा लगाना होगा और जो मुनाफ़ा होगा उसमें से कुछ प्रतिशत हमारा, बाक़ी आपका। शुरू में शायद कुछ कमा कर ही दिखाया होगा और बिना कुछ करे-धरे ही घर में आई इस लक्ष्मी से पिताजी की मति तो भ्रष्ट होनी ही थी, सो हुई। पर जब पासा पलटा तो ऐसा कि पिताजी को बिलकुल कंगाल करके छोड़ दिया। जिन लोगों ने दाँव लगाया था, उन्होंने बहुत समझाया किदिवाला निकाल दीजिए। सट्टे का रुपया भी कोई चुकाया जाता है क्या? पर पिताजी नहीं माने। जिस इन्दौर में वे इतनी शान-शौकत से रहे, यशस्वी होकर रहे वहाँ दिवालिया बनकर रहते…यह तो उनके अहं और शायद उनकी नैतिकता को भी बर्दाश्त नहीं था। वे नहीं माने और अपने घर का सब कुछ स्वाहा कर दिया उन्होंने। माँ का गहना तो जाना ही था ऐसे में और माँ ने चुपचाप अपना तिनका-तिनका निकाल कर दे दिया और हाथ में काँच की चूड़ियाँ,गले में ‘बजट्टी’ (मंगल-सूत्रा का पर्याय) और सिर के ‘बोर’ के सिवाय उनके पास कुछ नहीं रहा। इन हालात में पिताजी के लिए इन्दौर में रहना सम्भव नहीं था। सो वे पत्नी, बच्चे और ढेर सारे क़र्ज़े के साथ अजमेर आ गए। अजमेर में आर्थिक रूप से पैर ज़माने के लिए पिताजी को उनकी पुस्तक ‘भारत के देशी राज्यों का इतिहास’ से बड़ी मदद  मिली। पिताजी की इस योजना से प्रसन्न कई राज्यों ने अपने इतिहास की सामग्री के साथ-साथ काफ़ी पैसा भी दिया और पुस्तक छपने पर उसकी कई प्रतियाँ भी ख़रीदीं। इसमें कोई सन्देह नहीं था कि राज्यों का यह सहयोग संकट के दिनों में पिताजी के लिए बहुत सहायक सिद्ध हुआ और जैसे-तैसे उनके पैर अजमेर में जम गए।

मैंने देखा कि गर्मी के दिनों में पिताजी सोते तो माँ उन्हें पंखा झलने के लिए बैठती। दिन भर के काम से थकी-हारी माँ कभी ऊँघने लगती तो पिताजी की नींद उचट जाती और वे भन्ना पड़ते- ‘अरे, पंखा क्यों बन्द कर दिया...देखती नहीं, कैसी गर्मी पड़ रही है।’ आखि़र एक दिन मैं बिगड़ पड़ी- ‘गर्मी क्या केवल आपको सता रही है, माँ को नहीं?’

यह सब तो मैंने सुना और विस्तार से ही सुना पर कभी किसी से यह नहीं सुना कि माँ ने पिताजी को कभी भी उनके इस कुकर्म के लिए कोसा हो, कभी रोई भी हो या कि इफ़रात समृद्धि के बाद भयंकर आर्थिक संकट में घर चलाने में अपनी असहमति जताई हो। नहीं जानती कि सहनशीलता के साथ-साथ ही अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति से तालमेल बिठाते चलने की, सबको समान भाव से स्वीकारते चलने की उनकी इस क्षमता को मैं उनकी विशेषता मानूँ या उनकी मजबूरी। इस पूरे प्रसंग में पिताजी के अहं, उनके साहस और नैतिकता पर कितने क़सीदे काढ़े गए — बोलकर भी और लिखकर भी। मैं यह नहीं कहती कि उनके लिए जो कुछ भी बोला या लिखा गया वह ग़लत था ! नहीं, वे उसके हक़दार थे। मेरी शिकायत बल्कि कहूँ कि तक़लीफ़ है तो केवल इतनी कि कोई दो शब्द माँ के लिए भी तो कह-बोल देता। क्यों नहीं कभी किसी ने यह महसूस किया कि माँ अपनी सहनशीलता, अपने धैर्य और हर स्थिति में अपने सहयोग से ही वह ज़मीन बिछाती चली जा रही थी, जिस पर खड़े होकर पिता यह सब कर सके। जिस माँ ने कभी किसी के विरोध में भी एक शब्द तक नहीं कहा, वह अपनी प्रशंसा में क्या कहती भला, पर पिताजी या कोई और तो कुछ कह ही सकता था। पर नहीं, कम से कम उस ज़माने में, जब औरत को ही कोई कुछ नहीं गिनता था तो उसके योगदान को भला कौन गिनता और क्यों गिनता। जीवन भर और बाद में भी उपेक्षित रहना ही उनकी नियति थी, सो माँ ने भी उसे सहा और भोगा।

माँ की ज़िन्दगी का इतना हिस्सा तो मैंने केवल सुनी हुई बातों के आधार पर ही लिखा है, अब एक संक्षिप्त सा ब्यौरा उन बातों का प्रस्तुत करूँगी जिसकी मैं चश्मदीद गवाह रही हूँ। दोनों बड़े भाई पढ़ने बाहर चले गए और सुशीला भी सोलह साल की उम्र में शादी करके कलकत्ता चली गई तो पहली बार मुझे अपने वजूद का अहसास हुआ। अपने आसपास की स्थिति पर…घटनेवाली घटनाओं को मैं केवल देखती ही नहीं थी…उन पर प्रतिक्रिया भी व्यक्त करती थी…कभी-कभी तो झगड़े के अन्दाज़ में।

अजमेर का मकान दुमंज़िला था। ऊपर की मंज़िल में पिताजी का साम्राज्य था और नीचे की मंज़िल में हम भाई-बहनों के साथ माँ रहती थी। पिताजी की रियासत तो चली गई थी पर रईसी तो जैसे उनके ख़ून में मिली हुई थी जो अब जितनी भी और जैसे-तैसे निभ रही थी तो केवल माँ के बूते पर। मैंने देखा कि गर्मी के दिनों में पिताजी सोते  तो माँ उन्हें पंखा झलने के लिए बैठती। दिन भर के काम से थकी-हारी माँ कभी ऊँघने लगती तो पिताजी की नींद उचट जाती और वे भन्ना पड़ते- ‘अरे, पंखा क्यों बन्द कर दिया…देखती नहीं, कैसी गर्मी पड़ रही है।’ आखि़र एक दिन मैं बिगड़ पड़ी- ‘गर्मी क्या केवल आपको सता रही है, माँ को नहीं?’ बिना कोई काम किए भी आपको तो रोज़ दिन में सोने को चाहिए पर अगर सुबह से मरती-खटती माँ को थोड़ी सी झपकी भी आ जाए तो यह गुनाह हो गया? सुना तो माँ मुझ पर ही बिगड़ पड़ी- ‘क्यों करती है ऐसी बातें? उनको आदत है शुरू से सोने की तो सोएँगे नहीं क्या और गर्मी में थोड़ा सा पंखा झल दूँगी तो कौन सा घिस जाऊँगी।’ पर लगता है पिता ने ज़रूर अपनी इस ज़्यादती को शायद महसूस किया होगा इसलिए जैसे ही ज़रा से रुपए हाथ में आए, उन्होंने एक छोटा-सा टेबिल-फैन ख़रीद लिया।

माँ की पक्षधरता के चलते मैं हमेशा पिता के गुणों की अनदेखी ही करती रही। उसका बोध तो मुझे तब हुआ जब बड़े होकर अनेक महत्वपूर्ण लोगों के मुँह से जब-तब उनकी उदारता, उनकी नैतिकता, उनकी सहृदयता और निपट अकेले अपने दमख़म पर रचे गए उनके अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश की मुक्तकंठ से प्रशंसा सुनी। मैंने चाहे उनके गुणों की अवहेलना की हो पर माँ शुरू से ही शायद उनके प्रति सचेत थीं ! केवल सचेत ही नहीं, बल्कि एक भयंकर हीन-भाव से ग्रस्त भी रहती होंगी। बुद्धिजीवी पिता और निरक्षर

पिताजी ऊपर की मंज़िल से आवाज़ लगाते…अरे सुनती हो ज़रा पानी पिला जाओ तो माँ ख़ुद (नौकर से कभी नहीं ) सत्तर सीढ़ियाँ चढ़कर उन्हें पानी पिलाने जाती और दिन में करीब बार आठ-दस बार उन्हें यह मशक्कत करनी पड़ती। एक बार मुझे ग़ुस्सा आया तो मैंने एक सुराही ले जाकर ऊपर रख दी- ‘प्यास लगे तो इसमें से निकाल करपानी पी लीजिए।’ पर फिर वही आवाज़। माँ के मना करने पर भी इस बार मैं ऊपर गई- ‘क्या बात है, सुराही तो रखी है इससे लेकर पानी क्यों नहीं पी लेते आप?’ ‘अरे पर कोई ढालकर तो दे … जानती तो है, मुझसे यह सब नहीं होता।’

‘यानी कि आप तो ढालने का काम भी नहीं कर सकते और माँ सारे दिन सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरने की झखमारी करती रहे?’

‘तू जा नीचे, क्यों जब देखो तब ऐसी-वैसी बातें करती रहती है? मुझे तो कोई परेशानी नहीं, तुझे क्या परेशानी  हो रही है।’ पीछे खड़ी माँ सुराही में से पानी ढाल रही थी।

‘ठीक है आपको यह हम्माली करनी है तो करो।’ और मेरा ग़ुस्सा साफ़ पिताजी से माँ की ओर सरक आया और मैं नीचे उतर आई। आज सोचती हूँ कि मुझे जो माँ की हम्माली या कहूँ कि ग़ुलामी लगती थी, हो सकता है कि माँ को वह अपनी फ़र्ज़ अदायगी लगती हो और इसीलिए यह सब करते हुए उन्हें कष्ट नहीं बल्कि फ़र्ज़ अदायगी का  संतोष…सुख ही मिलता हो।

इतना ही नहीं, आर्थिक संकट के दिनों में क़र्ज़ माँगने के लिए भी माँ को ही जाना पड़ता था। लोगों को देने के लिए जिस पिता की हथेली हमेशा उल्टी ही रही हो, माँगने के लिए सीधी होकर वह किसी के सामने फैले, यह उनके अहं और स्वाभिमान को बर्दाश्त ही नहीं था। दो-तीन परिवार थे, जहाँ से रुपए मिल जाते थे। (रुपया आते ही तुरंत उन्हें लौटा भी दिया जाता था पर माँगना तो माँगना ही था और इस स्थिति से भी गुज़रना तो माँ को ही पड़ता था) एक बार की बात मुझे याद है। पता नहीं, पिताजी का पैसा कहाँ अटका पड़ा था और घर की हालत ऐसी स्थिति पर आ गई कि माँ खाना बनाए तो कैसे …. घर में सब्ज़ी लाने तक के पैसे नहीं। कोई पन्द्रह दिन से मैं अपनी टूटी चप्पल में कील ठोंक-ठोंक कर काम चला रही थी पर अब वह भी सम्भव नहीं रह गया था। हारकर पिताजी ने माँ को एक परिचित परिवार से पच्चीस रुपए माँगकर लाने को कहा। उम्मीद थी कि इनसे पाँच-सात दिन तो काम चल जाएगा और तब तक रुपया भी आ जाएगा। दोपहर में माँ रुपए माँगकर लाई, पर उसी दिन शाम को कम्युनिस्ट पार्टी के मिस्टर पन्नीकर आ गए और बोले- ‘भंडारी जी, मुझे दस रुपयों की सख़्त ज़रूरत है, जानता हूँ आपके  सिवा कोई मेरी मदद नहीं करेगा, सो…’ और पिताजी जब माँ से उन माँगे हुए रुपयों में से दस रुपए माँगने गए  तो माँ ने ज़िन्दगी में शायद पहली बार विरोध किया, ‘अरे, आपको मालूम तो है कि मन्नू पन्द्रह दिन से टूटी चप्पल घसीट रही है, अब कॉलेज क्या नंगे पाँव जाएगी। सब्ज़ी छोड़िए, घर में एक बूँद घी तक नहीं कि दाल छौंक कर  ही खिला दूँ। कह दीजिए कि इस समय…’माँ ने वाक्य भी पूरा नहीं किया था कि पिताजी एक़दम बिगड़ पड़े- ‘बेवकूफों जैसी बात मत करो- कितना विश्वास लेकर आए हैं वे मेरे पास और मैं उन्हें मना कर दूँ?’ माँ ने फिर कुछ नहीं कहा, बस, चुपचाप रुपए लाकर दे दिए पर उनके जाते ही मैंने भन्नाना शुरू कर दिया- इस उम्मीद में कि कम से कम आज तो माँ भी मेरे स्वर में स्वर मिलाकर अपनी मजबूरी,अपना दुख ज़रूर व्यक्त करेगी पर दुख जताना तो दूर उल्टे वे तो मुझे ही समझाने लगीं, ‘तूने नहीं देखे वे दिन सो कैसे समझेगी ? पर मैंने तो देखे हैं। हालात अच्छे थे तो कैसे दोनों हाथों से ज़रूरतमंदों को पैसा लुटाते थे…जान ले कि यह उदारता तो ख़ून में रची-बसी है इनसे माँगने वाले को मना करना तो इनके लिए मरने जैसा है। म्हारी ही मत मारी गई थी जो मना करने लगी।’ सुना तो मैं हैरान, परेशान।

किस मिट्टी की बनी है मेरी ये माँ, जिन्हें न कभी कोई दुख व्यापता है, न ग़ुस्सा। अभी भी इन्हें दुख हो रहा है तो पिता के बिगड़े हालात पर… उनकी मजबूरी पर। लेकिन उनके इस रवैये पर मैं तो एकदम बिफर पड़ी- ‘दूसरों के लिए तो यह उदारता और घरवालों के लिए केवल फटीचरी। अरे, अब मैं बच्ची नहीं रही, ख़ूब  समझती हूँ। दूसरों के लिए करो तो तारीफ़ … वाहवाही जो मिलती है। घरवाले क्या तारीफ़ करेंगे और क्यों करेंगे…वह तो उनके फ़र्ज़ के खाते में चला जाएगा। और उन्हें तो हर समय तारीफ़ चाहिए। अब आपको फिर किसी के घर  हाथ फैलाने भेजेंगे और आप हैं कि चली भी जाएँगी। कंगली बनकर हाथ फैलाती फिरें आप और उदारता की वाह  वाही लूटें वे।’ ग़ुस्से में और भी जाने क्या कुछ बोलती रही थी…पर माँ ने तो शायद सुना ही नहीं, वे भीतर चली गई थीं। आ कर उन्होंने मेरे हाथ में दो रुपए रखे…तू इतना ग़ुस्सा मत कर! आज ही नई चप्पल मँगवा ले (उन दिनों में दो रुपए में चप्पल आ जाती थी! ) मुझे नहीं मालूम कि बचे हुए रुपयों से उन्होंने क्या-क्या सामान मँगवाया… मालूम है तो केवल इतना कि पिताजी को चार सब्ज़ियों वाला वैसा ही खाना खिलाकर दोपहर में वे बिना पिताजी के कहे ही पड़ोस के घर से पन्द्रह रुपए और माँग लाई और सुचारु रूप से घर की गाड़ी गुड़काने लगी।

पिताजी ऊपर की मंज़िल से आवाज़ लगाते...अरे सुनती हो ज़रा पानी पिला जाओ तो माँ ख़ुद (नौकर से कभी नहीं ) सत्तर सीढ़ियाँ चढ़कर उन्हें पानी पिलाने जाती और दिन में करीब बार आठ-दस बार उन्हें यह मशक्कत करनी पड़ती। एक बार मुझे ग़ुस्सा आया तो मैंने एक सुराही ले जाकर ऊपर रख दी- ‘प्यास लगे तो इसमें से निकाल करपानी पी लीजिए।’ पर फिर वही आवाज़। माँ के मना करने पर भी इस बार मैं ऊपर गई- ‘क्या बात है, सुराही तो रखी है इससे लेकर पानी क्यों नहीं पी लेते आप?’ ‘अरे पर कोई ढालकर तो दे ... जानती तो है, मुझसे यह सब नहीं होता।’

आज माँ पर लिखते हुए समझ ही नहीं आता कि धरती से भी ज़्यादा धैर्य वाली इस माँ को धिक्कारूँ या उसके आगे नतमस्तक होऊँ? नहीं, नतमस्तक तो मैं न तब कभी हुई, न इस ज़िन्दगी में कभी हो सकती हूँ। होती हूँ तो केवल चकित…चकित से भी ज़्यादा शायद दुखी। क्यों सहती रही हैं वे पति की इन ज़्यादतियों को?

आज इसी ‘क्यों?’ का जवाब ढूँढ़ते हुए जब मैं बहुत तटस्थ होकर स्थितियों का विश्लेषण करने बैठी तो जिस नतीजे पर पहुँची, वही शायद उनकी ज़िन्दगी की सच्चाई है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माँ की पक्षधरता के चलते मैं हमेशा पिता के गुणों की अनदेखी ही करती रही। उसका बोध तो मुझे तब हुआ जब बड़े होकर अनेक महत्वपूर्ण लोगों के मुँह से जब-तब उनकी उदारता, उनकी नैतिकता, उनकी सहृदयता और निपट अकेले अपने दमख़म पर रचे गए उनके अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश की मुक्तकंठ से प्रशंसा सुनी। मैंने चाहे उनके गुणों की अवहेलना की हो पर माँ शुरू से ही शायद उनके प्रति सचेत थीं !  केवल सचेत ही नहीं, बल्कि एक भयंकर हीन-भाव से ग्रस्त भी रहती होंगी। बुद्धिजीवी पिता और निरक्षर माँ। पिता के सरोकार थे- देश की राजनैतिक स्थितियाँ…समाज की समस्याएँ और  उनका कर्मक्षेत्र था केवल पढ़ना-लिखना। और माँ के लिए उनका घर ही उनका देश था और घरवाले ही उनका समाज, और उनका कर्मक्षेत्र था उनकी रसोई। अब दोनों का तालमेल हो तो किस आधार पर? ऐसी स्थिति में मेरी निरक्षर माँ को पिता की ज़िन्दगी में अपनी सार्थकता सिद्ध करने का शायद एक ही रास्ता दिखाई देता था कि उनकी हर इच्छा को, उनकी आज्ञा और उनकी हर उचित-अनुचित ज़रूरत को, उनका अधिकार समझ कर पूरी लगन और निष्ठा के साथ पूरा करती रहे। बुद्धि से नहीं, रात-दिन की अपनी हाड़तोड़ मेहनत, अनन्त धैर्य और सहनशक्ति से ही पति की ज़िन्दगी में कम से कम अपने लिए थोड़ी सी जगह तो बना ले। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जगह तो उन्होंने बना ली थी, बल्कि वे एक तरह से अनिवार्य ही हो गई थीं पिताजी के लिए। पिताजी के सारे काम माँ के  ज़िम्मे, यहाँ तक कि कोश का नया भाग छपकर आता तो किताबों के बड़े-बड़े पार्सल तक वे ही सीतीं। घर में दो-दोनौकर थे पर पिताजी को किसी का काम पसन्द ही नहीं आता। माँ ने भी ऐसा काम कभी किया तो नहीं था पर सीखा और उनके मन-पसन्द पार्सल तैयार करने लगीं। उनके काग़ज़-पत्तर भी वे ही सँभालती। कभी कुछ गड़बड़ हो जाती तो पिताजी से बेपढ़ी-लिखी, मूरख औरत के विशेषणों में लिपटी फटकार तो झेलनी ही पड़ती। ऊपर पिता के पास तीन खानोंवाली एक बड़ी-सी राइटिंग टेबल थी… रोज़ शाम को एक टाइपिस्ट भी आता था, क्यों नहीं वे ख़ुद अपने सारे काग़ज़-पत्तर सँभाल कर रखते ? नहीं, रखेंगी सब माँ ही। हर काम में हर क़दम पर रात-दिन पिता की हाज़िरी में रहनेवाली माँ अनिवार्य तो थी ही पिताजी के लिए, पर किस क़ीमत पर ?

पिता को अपने हर काम में…हर समय माँ की उपस्थिति अनिवार्य लगती थी तो उन्हें यह बर्दाश्त ही नहीं कि माँ अपनी इच्छा से कहीं आएँ-जाएँ। यों तो उस ज़माने में औरतें वैसे भी ज़्यादा कहीं आती-जाती ही नहीं थीं पर कभी-कभी अपने सगे सम्बन्धियों के यहाँ मिलने…शादी ब्याह में शिरकत करने या जब-तब उपाश्रय में महाराज साहब के बखान (व्याख्यान) सुनने तो जाती ही थीं। पर माँ तो पिताजी की अनुमति मिलने पर ही कहीं जा पाती थीं। पर्यूषण पर्व के अवसर पर ही जब औरतें तो क्या , पुरुष भी चार-पाँच दिन उपाश्रय में ही गुज़ारते हैं, माँ को केवल एक दिन जाने की अनुमति मिली हुई थी सो भी केवल तीन-चार घण्टों के लिए।

क्यों आई हो यहाँ...वहीं जाकर रहो...’माँ थरथराती रहीं...हाथ जोड़-जोड़कर माफ़ी माँगती रहीं - भाई के दुलार भरे आग्रह के आगे अपनी विवशता की बात बताती रहीं पर पिता के तेवर ढीले नहीं पड़े तो नहीं ही पड़े। पिता तो शायद अपनी शादी के बाद कभी अपने ससुराल गए ही नहीं, पर माँ पर भी ऐसी पाबंदी। दोपहर में माँ थाली परोसकर खाने के लिए बुलाने गईं तो इन्कार कर दिया...‘नहीं खाना मुझे खाना-वाना...जाओ यहाँ से।

आर्य समाजियों में दीक्षित होने के कारण पिता ने तो जैनियों के धरम-करम कभी माने ही नहीं। पर माँ अपने लिए क्यों कभी नहीं कह सकीं कि इन दिनों तो मैं तीन-चार दिनों तक ज़रूर जाऊँगी। नहीं, पिता की अनुमति तो हमेशा उनके सिर-माथे पर रही, उसके आगे अपनी इच्छा-अनिच्छा की औक़ात ही क्या भला ! लेकिन हद तो तब हुई जब एक बार भतीजे की शादी पर मामा ने बहुत-बहुत आग्रह ही नहीं किया बल्कि बहन को लेने के लिए किसी को भेज भी दिया। पिताजी ने भेजा तो सही पर इस हिदायत के साथ कि चार दिन बाद ज़रूर लौट आना। यहाँ की स्थिति से अनभिज्ञ मामा ने यह कहकर कि बरसों बाद तो आप आई हैं, माँ को दो दिन और रोक लिया। एक सप्ताह बाद जब माँ लौटीं तो पिता जैसे इस ‘अक्षम्य अपराध’ के लिए आग-बबूला — ‘क्यों आई हो यहाँ…वहीं जाकर रहो…’माँ थरथराती रहीं…हाथ जोड़-जोड़कर माफ़ी माँगती रहीं – भाई के दुलार भरे आग्रह के आगे अपनी विवशता की बात बताती रहीं पर पिता के तेवर ढीले नहीं पड़े तो नहीं ही पड़े। पिता तो शायद अपनी शादी के बाद कभी अपने ससुराल गए ही नहीं, पर माँ पर भी ऐसी पाबंदी। दोपहर में माँ थाली परोसकर खाने के लिए बुलाने गईं तो इन्कार कर दिया…‘नहीं खाना मुझे खाना-वाना…जाओ यहाँ से।’ माँ फिर रो-रोकर हाथ जोड़-जोड़ कर माफ़ी माँगने लगीं और बस, इसी बिन्दु पर मेरी सहनशक्ति ने जवाब दे दिया। अपने कमरे से निकलकर चिल्लाकर मैंने भी कहा- ‘क्यों ख़ुशामद कर रही हैं आप? अरे अपने भाई के घर दो दिन ज़्यादा रह आईं तो क्या यह कोई ऐसा गुनाह है, जिसके लिए हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी जाए? ग़ुलाम समझ रखा है क्या आपको? जाइए आप रसोई में। भूख लगेगी, तो अपने आप खाएँगे।’ पर भीतर जाने की बजाय माँ के जुड़े हुए हाथ मेरी ओर मुड़़ गए- ‘क्यों बोल रही है मन्नू तू ऐसी बातें…भगवान के वास्ते चुप कर और भीतर जा।’ ग़ुस्से में मैं भीतर गई। करें भी तो क्या करें ऐसी माँ के लिए!

जब-तब मेरे इस तरह के बकने-झखने का प्रतिवाद तो पिता ने कभी नहीं किया (करते भी भला किस आधार पर! ) पर बस मुझसे बोलचाल बन्द कर देते थे और यह अबोला कभी-कभी तो महीने भर तक भी चलता रहता। 1947 में इण्टर पास करने के बाद मैं ख़ुद अजमेर छोड़कर भाई-बहनों के साथ रहने कलकत्ता चली गई। सोचा था  वहीं से बी.ए करूँगी पर सितम्बर में जाने के कारण एडमिशन नहीं मिला तो प्राइवेट की तैयारी करने लगी। इस  दौरान मैं अजमेर-कलकत्ता के बीच आती-जाती रही। जितने समय अजमेर रहती, कोशिश यही करती कि माँ-पिताजी के सम्बन्धों पर बात न करूँ। बात भी क्या करती, उनके सम्बन्धों का तो वही पुराना ढर्रा और उन दोनों का अपना वही पुराना रवैया। फिर भी एक घटना का उल्लेख ज़रूर करूँगी। माँ के तीनों लहँगे काफ़ी फट चुके थे। कपड़े बेचने जो मदन फेरीवाला घर आया करता था वह दो-तीन महीनों से आ ही नहीं रहा था। उस ज़माने में मैं भी अजमेर में अकेले बाज़ार नहीं जाती थी तो एक दिन मैंने ही पिताजी से कहा कि शाम को जब आप बाहर जाते हैं तो माँ के लिए जैसे भी हो, दो लहँगों का कपड़ा ज़रूर लेते आएँ। उन्हें दुकान समझाई, किस तरह का कपड़ा लाना है, कितना लाना है, सब लिखकर दे दिया। वे भी बड़ी ख़ुशी से तैयार ही वहीं हुए बल्कि यह भी कहा, ‘अरे तुम्हारे लहँगे फट गए तो कहा क्यों नहीं…मैं लेकर आता।’ तत्परता से दी गई इस स्वीकृति ने तो माँ के चेहरे पर दस गुना ज़्यादा ख़ुशी पोत दी। मैं और माँ पिता के लौटने की प्रतीक्षा में बैठे थे। कोई दो घण्टे बाद पिता लौटे…उनके हाथ में एक बंडल भी था। जैसे ही मैं उछल कर बाहर आई वे बोले- ‘अरे मन्नू, देख तो आज क्या किताबें मिली हैं…कब से कृष्णा ब्रदर्स में इनको मँगाने के लिए कह रखा था, मँगाकर ही नहीं दे रहा था…आखि़र आज जाकर मिली हैं । तुझे तो इन विषयों में कोई दिलचस्पी ही नहीं पर अब बी.ए में आ गई है, पढ़ा कर कुछ ऐसी चीज़ें भी‑‑‑’’ गदगदाते स्वर में वे बोले जा रहे थे।

उनको बीच में ही टोककर मैंने पूछा-‘और माँ का लहँगा?’

‘अरे!’ वे जैसे असमान से गिरे — ‘कृष्णा ब्रदर्स के यहाँ किताबें देखकर मैं तो एकदम ही भूल गया। कल बस, कल ज़रूर ला दूँगा।’

मैं भी क्या कहती- फिर भी इतना तो ज़रूर कहा- ‘ज़िन्दगी भर माँ आपके लिए मरती-खपती रहीं और आप  आज पहली बार उनके लिए कुछ लेने गए और वह भी भूल गए।’

‘अरे कहा न, कल ज़रूर ला दूँगा।’ और वे अपनी नई किताबों में डूब गए। मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, दूसरे दिन नौकर से ताँगा मँगवा कर मैं ख़ुद बाज़ार गई और माँ के लिए दो ओढ़नी और तीन लहँगों के कपड़े ले आई। माँ को कपड़े तो मिल गए पर जानती हूँ, यही काम यदि पिता ने किया होता तो..। पर कैसे करते! मैं और माँ शायद भूल ही गए थे कि पिता ने तो अपने कपड़े तक कभी नहीं ख़रीदे। उनके कपड़े ही क्या, ताज़िन्दगी खादी ही तो पहनी सो माँ ही भाइयों को खादी-भण्डार भेजकर उनके कमीज़-पाजामे के लिए खादी और सर्दी में गरम कोट के लिए पट्टू मँगवाती थीं।

क्रमशः

मन्नू भंडारी हिंदी की शीर्षस्थ कहानीकार और उपन्यासकार हैं।

2 Comments
  1. […] माँ की बनाई ज़मीन पर खड़े होकर पिता यह सब … […]

Leave A Reply

Your email address will not be published.