गुजरात के नरेंद्र मोदी और बिहार के कामेश्वर यादव (डायरी,14 नवंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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बात करीब दस दिन पुरानी है। मैं पटना में अपने घर पर था। अचानक एक सवाल मेरे संज्ञान में लाया गया। दरअसल, मेरी छोटी बेटी श्रेया का जन्म 14 नवंबर, 2016 को हुआ और मेरी बड़ी बेटी का सवाल भी इसी तारीख से संबंधित था। उसने पूछा कि 14 नवंबर को बाल दिवस के रूप में क्यों मनाया जाता है? आखिर नेहरू जी ने बच्चों के लिए ऐसा क्या किया था?
मुझे उसका सवाल अच्छा लगा था। मैंने उसे केवल इतनी जानकारी दी कि पंडित नेहरू बच्चों से स्नेह रखते थे और इस कारण ही उनके जन्म दिवस को बच्चों के दिन के रूप में मनाया जाता है। यह बेहद खास है। मेरी बेटी का अगला सवाल था कि क्या यह बिल्कुल वैसे ही जैसे हमारे अन्य पर्व-त्यौहार हैं? मैंने कहा कि एक अर्थ में तो इसका जवाब सकारात्मक है। लेकिन एक मौलिक अंतर यह है कि पर्व-त्यौहारों का धार्मिक महत्व होता है। जबकि नेहरू जैसे अन्य नायकों से जुड़े दिनों का ऐतिहासिक महत्व है। हालांकि यह भी गुण-दोष रहित नहीं है।

ये वही नेहरू थे, जो डॉ. आंबेडकर द्वारा तैयार हिंदू कोड बिल के पक्षधर थे, लेकिन हिंदू कट्टरपंथियों व पितृसत्तावादियों के आगे झुक गए थे। लेकिन मुझे लगता है कि हर आदमी चाहे वह कितना भी साहसी क्यों न हो, उसका व्यवहार काल और परिस्थिति के आधार पर निर्भर करता है। निश्चित तौर पर यदि जयप्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने डॉ. आंबेडकर के जैसे नेहरू का साथ दिया होता तो हिंदू कोड बिल को पारित करवाने से वे पीछे नहीं हटते।

 

उस दिन तो मैंने अपनी बेटी को यह कहकर समझा दिया। लेकिन मुझे लगता है कि मुझे उसे इस बारे में विस्तार से बताना चाहिए था कि बच्चों के लिए नेहरू ने क्या-क्या किया। मुझे उसे बताना चाहिए था उन पत्रों के बारे में जो एक पिता के रूप में उन्होंने अपनी बेटी इंदिरा को लिखा था। वे कमाल के पत्र थे। अपने बच्चे को समाज से परिचित कराने के लिए एक पिता द्वारा लिखा गया सुव्यवस्थित पत्र। इससे एक बात और स्पष्ट है कि नेहरू न केवल एक संवेदनशील पिता थे, बल्कि वे एक सजग नागरिक भी थे। उनकी एकमात्र बेटी थी और उनके अंदर बेटे की चाह नहीं थी। यदि होती तो उनके बेटे भी होते। नेहरू एक उदार पिता थे। उन्होंने बेटी द्वारा अंतरधार्मिक शादी किये जाने के फैसले का समर्थन किया। यह वाकई बहुत बहादुरी वाला फैसला था। ये वही नेहरू थे, जो डॉ. आंबेडकर द्वारा तैयार हिंदू कोड बिल के पक्षधर थे, लेकिन हिंदू कट्टरपंथियों व पितृसत्तावादियों के आगे झुक गए थे। लेकिन मुझे लगता है कि हर आदमी चाहे वह कितना भी साहसी क्यों न हो, उसका व्यवहार काल और परिस्थिति के आधार पर निर्भर करता है। निश्चित तौर पर यदि जयप्रकाश नारायण, डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे नेताओं ने डॉ. आंबेडकर के जैसे नेहरू का साथ दिया होता तो हिंदू कोड बिल को पारित करवाने से वे पीछे नहीं हटते।

यह सभी जानते हैं कि 1947 में जो आग मुल्क में लगाई गई थी, उसके खलनायक कौन थे और ऐसा नहीं है कि वह बेवकूफ है। आरएसएस एक शातिर संगठन है जो इस देश के हिंदू-मुसलमानों को ऐसे सवालों में उलझाकर रखना चाहता है ताकि लोग उन्मादी बनें और यह देश फिर से धर्म के आधार पर बंटे।

 

वर्तमान में नेहरू निशाने पर हैं। आरएसएस के नेतागण इस देश को फिर से दो भागों में बांटने को पागल हाे चुके हैं। वे ऐसा क्यों कर रहे हैं, इस सवाल को फिलहाल यही छोड़ता हूं। अभी तो केवल यह कि वे कर क्या रहे हैं। कल की ही ही बात है कि मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम रानी कमलापति के नाम पर कर दिया गया। ऐसा करने की मांग मध्य प्रदेश के हिंदू कट्टरपंथी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किया था। इसके लिए चौहान ने नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है। अपने बयान में इस हिंदू कट्टरपंथी मुख्यमंत्री ने कहा है कि रानी कमलपाति अंतिम हिंदू रानी थी। जबकि अपने इसी बयान में उन्होंने यह भी कहा है कि वह गोंड आदिवासी समुदाय की थी। यानी इस हिंदू कट्टरपंथी मुख्यमंत्री ने एक तीर से दो निशाने साधने का प्रयास किया है। एक तरफ तो उन्होंने गोंड आदिवासी समुदाय की एक ऐतिहासिक महिला को हिंदू साबित करने का प्रयास किया है और दूसरा इसी बहाने वह हिंदुओं को स्पष्ट संदेश दे रहे हैं कि यहां अब केवल हिंदुओं का राज है।

मेरी नजर में नरेंद्र मोदी और कामेश्वर यादव में कोई अंतर नहीं है। दोनों के दोनों ब्राह्मण् वर्ग के मानसिक गुलाम हैं।

 

एक और उदाहरण है सिने अभिनेत्री कंगना राणावत का। उसने अब पूछा है कि 1947 में कौन सी जंग लड़ी गई थी? उसने यह भी कहा है कि यदि कोई उसे यह बता दे तो वह अपना पद्मश्री सम्मान लौटा देगी। अब यह सभी जानते हैं कि 1947 में जो आग मुल्क में लगाई गई थी, उसके खलनायक कौन थे और ऐसा नहीं है कि वह बेवकूफ है। आरएसएस एक शातिर संगठन है जो इस देश के हिंदू-मुसलमानों को ऐसे सवालों में उलझाकर रखना चाहता है ताकि लोग उन्मादी बनें और यह देश फिर से धर्म के आधार पर बंटे।
अब सवाल यह कि आरएसएस ऐसा करना ही क्यों चाहता है? इसका जवाब बेहद आसान है। दरअसल मुट्ठी भर द्विजवर्ग इस देश में लोकतंत्र के बदले राजतंत्र चाहते हैं ताकि उनका वर्चस्व कायम रहे और वे जानते हैं कि वे ऐसा कर सकते हैं क्योंकि इस देश में बहुसंख्यक हिंदू हैं और इनमें से भी 85 फीसदी दलित-बहुजन हैं, जिनके पास न तो राजनीतिक सत्ता है, न सामाजिक सत्ता और ना ही आर्थिक सत्ता। सबसे दिलचस्प यह कि भारत के प्रभुवर्ग ने अपने वर्चस्ववाद को बनाए रखने के लिए दलित-बहुजन वर्ग के लोगों को अपना माध्यम बनाया है। हालांकि यह भी नया नहीं है। मैं तो 1989 में बिहार के भागलपुर में हुए दंगे के बारे में सोच रहा हूं, जिसमें दसियों हजार लोग मारे गए और दिलचस्प यह कि पूरा ठीकरा एक कामेश्वर यादव के नाम पर फोड़ दिया गया था। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कामेश्वर यादव निर्दोष था।
मेरी नजर में नरेंद्र मोदी और कामेश्वर यादव में कोई अंतर नहीं है। दोनों के दोनों ब्राह्मण् वर्ग के मानसिक गुलाम हैं।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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