माननीय न्यायाधीश महोदय को डर (डायरी 14 मई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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डर सभी को लगता है। यह एक ऐसी बात है, जिसके लिए किसी की आलोचना नहीं की जानी चाहिए। लेकिन इस पर विचार जरूर किया जाना चाहिए कि आदमी को डर लगता ही क्यों है? मसलन, मैं अपनी ही बात करता हूं। दिल्ली में मैंने अपने लिए कोई वाहन नहीं रखा है। जबकि पटना में मैं अपने ही वाहन का उपयोग करता हूं। हालांकि अब पटना में रहना बहुत कम होता है। चार-पांच महीने पर कभी एक सप्ताह के लिए तो कभी दो सप्ताह। दिल्ली में मुझे डर लगता है यहां के वाहनचालकों से। वे इतनी तेजी से चलाते हैं कि आदमी देखकर ही डर जाय। हालांकि दिल्ली की सड़कें अच्छी हैं और चौड़ी हैं। महत्वपूर्ण सड़कों पर पैदल चलनेवालों के लिए जगह है। पटना की सड़कों में यह बात नहीं है।
खैर, आम आदमी और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के डर में अंतर होता है। आम आदमी इसलिए डरता है क्योंकि वह जिम्मेदारियों से बंधा होता है। जिम्मेदारियां उसे डरपोक बना देती हैं। मेरे मामले में तो यही सच है। लेकिन मेरा डर मेरे काम को प्रभावित नहीं करता। सावधानियां बरतता हूं। विशेषाधिकार प्राप्त लोगों का डरना अलग कारणों से होता है। हालांकि जिम्मेदारियां उनके पास भी होती हैं। लेकिन वे डरते अपने स्वार्थ की वजह से भी हैं।

केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक रपट देख रहा हूं तो दिल्ली में सांसदों, अधिकारियों और जजों की सुरक्षा के लिए 22 हजार जवानों की तैनाती की गई है। यह एक बड़ी संख्या है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रियों आदि की सुरक्षा में लगे जवानों की संख्या अतिरिक्त है। बिहार की बात करूं तो नीतीश कुमार भले ही 17-18 साल से सीएम हैं, लेकिन जनता से इतने भयभीत रहते हैं कि अपने आसपास तो जवानों को रखते ही हैं, उस राह भी पुलिस के जवानों काे खड़ा कर देते हैं, जिधर से वे गुजरते हैं।

 

विशेषाधिकार प्राप्त लोगों में हुक्मरान भी शामिल होता है। वे हुक्मरान भी, जो जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं। भारत में तो अब यह चलन ही बन गया है। अभी हाल ही में बिहार के एक टूटपूंजिया नेता उपेंद्र कुशवाहा को बिहार सरकार ने वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी। अब इसका क्या मतलब है, यह तो उपेंद्र कुशवाहा ही जानते होंगे। मैं तो यह समझ रहा हूं कि उन्हें डर लगा होगा और उन्होंने नीतीश कुमार को अपने डर से वाकिफ कराया होगा। वरना नीतीश कुमार को सपना थोड़े ना आया होगा।
उपेंद्र कुशवाहा तो महज एक उदाहरण हैं। ऐसे अनेकानेक उदाहरण भरे पड़े हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक रपट देख रहा हूं तो दिल्ली में सांसदों, अधिकारियों और जजों की सुरक्षा के लिए 22 हजार जवानों की तैनाती की गई है। यह एक बड़ी संख्या है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रियों आदि की सुरक्षा में लगे जवानों की संख्या अतिरिक्त है। बिहार की बात करूं तो नीतीश कुमार भले ही 17-18 साल से सीएम हैं, लेकिन जनता से इतने भयभीत रहते हैं कि अपने आसपास तो जवानों को रखते ही हैं, उस राह भी पुलिस के जवानों काे खड़ा कर देते हैं, जिधर से वे गुजरते हैं।
इससे एक वाकया याद आया। पिछले ही साल दिसंबर के महीने में पटना में था। दोपहर बाद करीब चार बजे घर से निकला कि शहर को देख लूं। गांव की सड़क पार कर जैसे ही मुख्य सड़क पर आया तो देखा कि चप्पे-चप्पे पर पुलिस के जवान खड़े हैं। अनिसाबाद मोड़ पर लोगों को रोक दिया गया है। सड़क पर खड़े दो सितारावाले एक पुलिस अधिकारी से पूछा तो भड़क गया। फिर शायद उसे यह लगा कि मैं कुछ खास हूं तो उसने कहा कि सीएम साहब इधर से गुजर रहे हैं।

विशेषाधिकार प्राप्त लोगों में हुक्मरान भी शामिल होता है। वे हुक्मरान भी, जो जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं। भारत में तो अब यह चलन ही बन गया है। अभी हाल ही में बिहार के एक टूटपूंजिया नेता उपेंद्र कुशवाहा को बिहार सरकार ने वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा दी। अब इसका क्या मतलब है, यह तो उपेंद्र कुशवाहा ही जानते होंगे।

इस तरह की संस्कृति पहले नहीं थी। मुझे तो लालू प्रसाद एक उदाहरण लगते हैं। तब वे मुख्यमंत्री थे। हालांकि पुलिस की गाड़ियां होती थीं। लेकिन वे मिलते सबसे थे। कहीं भी रूक जाते और लोगों से बात करने लगते थे। उनसे भी अधिक बेखौफ कर्पूरी ठाकुर थे। पटना में गांधी संग्रहालय के निदेशक डॉ. रजी अहमद ने यह किस्सा सुनाया था कि सीएम रहते हुए ठाकुर जी कैसे लोगों से मिलते थे। मार्निंग वॉक के दौरान एक बार वे नंदलाल के होटल तक चले आए। यह एक प्रसिद्ध समाजवादी होटल विधायक क्लब के अहाते में हुआ करता था। अब नहीं है क्योंकि समाजवादी नीतीश कुमार ने विधायक क्लब को तोड़वाकर वहां भव्य इमारत बनवा दिया है। नंदलाल जी के होटल की खासियत चाय और मकुनी थी। मकुनी सत्तू की रोटी को कहते हैं। इसे घी के साथ परोसा जाता है।
खैर, हुक्मरानों को डर लगता है। इसकी वजह केवल यही है कि वे जनोन्मुख नहीं होते। कुछेक नेता अवश्य हुए हैं, जिन्हें किसी प्रकार की सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती। इनमें अधिकांश वामपंथी हैं।
लेकिन जज अलग होते हैं। मैंने ऐसे जज के बारे में नहीं सुना, जिसने डर लगने की बात कही हो। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें डर नहीं लगता होगा। हालांकि एक जज हुए प्रवास कुमार सिंह। चारा घोटाला मामले में सीबीआई की विशेष अदालत के जज रहे। उन्होंने पहली बार लालू प्रसाद, जगन्नाथ मिश्रा आदि को दोषी करार दिया था और पांच साल की सजा मुकर्रर की थी। जिस दिन उन्होंने फैसला सुनाया था तब उन्होंने यह अवश्य कहा था कि फैसला सुनाने के लिए अदालत आने में उन्हें खौफ महसूस हुआ था। उनके खौफ की वजह राजनीतिक थी। यह तो हर कोई समझ सकता था। हालांकि यह भी मुमकिन है कि उन्होंने यह भांप लिया हो कि वह जो फैसला सुनाने जा रहे हैं, उसमें खाेट है। सच क्या था, यह तो प्रवास कुमार सिंह ही जानते होंगे।
कल एक और जज को डरते देखा। ये बनारस में सीनियर डिवीजन जज हैं। ज्ञानवापी मस्जिद मामले की सुनवाई इनकी ही अदालत में चल रही है। इनका नाम है न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर। इनका कहना है कि फैसला सुनाए जाने के दौरान इनके परिजन इनकी सुरक्षा के लिए चिंतित थे। चिंता करनेवालों में इनकी पत्नी और मां भी थीं। यह मैं नहीं कह रहा। न्यायाधीश महोदय का बयान दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता में प्रकाशित है।
बहरहाल, डर के पीछे सबकी अपनी-अपनी वजहें होती हैं और निर्भीकता के भी अपने-अपने कारण। निर्भीकता के लिए इश्क जरूरी है। कल कुछ पंक्तियां जेहन में आयीं।
तुम हो तो असर है, कितनी हर्षित यह भूमि है,
पत्थरों पर भी देखो जरा, खूबसूरत हरियाली है।
नदियों पर है जादू, फूलों की लाली तुम्हारी है,
बात झूठ है कि यह धरती हसीनों से खाली है।
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