हिंदुत्ववादी शिक्षानीति की काट के लिए एजुकेशन डाइवर्सिटी बने विपक्ष का मुद्दा

एच एल दुसाध

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2022 में अनुष्ठित होने जा रहे 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव की तिथियाँ घोषित हो गयी हैं। उत्तर प्रदेश में सात चरणों में मतदान होंगे तो मणिपुर में दो चरणों में! शेष बचे तीन राज्यों- पंजाब, उत्तरखंड और गोवा- में एक चरण में चुनाव संपन्न होगा।  चुनाव परिणाम 10 मार्च को घोषित होंगे।  बहरहाल चुनाव की तिथियाँ घोषित होने के पहले पारंपरिक चुनाव प्रचार तुंग की ओर अग्रसर था, किन्तु कोरोना के नयी लहर को देखते हुए चुनाव आयोग ने उस पर अंकुश लगा दिया है।  नामांकन और मतदान की तिथियाँ घोषित करने के साथ चुनाव ने 15 जनवरी तक के लिए चुनावी  रैलियों, नुक्कड़ सभाओ, रोड शो , पदयात्रा इत्यादि पर रोक लगा दी है। कोरोना की बढ़ती लहर को देखते हुए उम्मीद करनी चाहिए कि यह रोक 15 जनवरी से आगे भी जारी रहेगी।  इससे उन दलों की सम्भावना पर असर पड़ेगा जो दल अपनी रैलियों में भारी भीड़ जुटाकर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाते दिख रहे थे।

बहरहाल चुनाव का प्रोग्राम घोषित होने के पहले जो पार्टी बढ़त बनाती हुई दिख रही थी, वह भाजपा है. भाजपा ने चुनाव की तिथियाँ घोषित होने के दो-तीन सप्ताह पहले ही हिन्दू धर्म संस्कृति के जयगान और मुस्लिम विद्वेष के प्रसार जरिये उस हेट पॉलिटिक्स को तुंग पर पंहुचा दी है जिसके सहारे वह दो सीटों से आगे बढ़कर  केंद्र से लेकर राज्यों में अप्रतिरोध्य बन गयी।  इस बीच चुनाव आयोग द्वारा डिजिटल चुनाव प्रचार का निर्देश दिए जाने के बाद वह और बेहतर स्थिति में आ गयी है।  क्योंकि डिजिटल तकनीकी के इस्तेमाल के मामले में  वह विपक्ष, खासकर बहुजनवादी दलों से काफी आगे है. ऐसे में बदले हुए हालात में बहुजनवादी दलों को अब और गंभीरता से चुनाव में उतरने और मुद्दे उठाने की जरुरत है , खासकर आर्यावर्त की ह्रदयस्थली उत्तर प्रदेश में।

उसका शेष एजेंडा बचा है आंबेडकर के संविधान के मूल ढांचे को बदलकर देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करते हुए हिन्दू धर्माधारित मनुस्मृति इत्यादि के कानूनों द्वारा भारत समाज को परिचालित करना! और 2025 का उसका सपना तभी पूरा हो सकता है, जब 2022 में यूपी उसके हाथ में आये। अतः संघ के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए विपक्ष को 5 राज्यों के चुनावों में अपना अधिकतम जोर यूपी में भाजपा को शिकस्त देने पर लगाना होगा। ऐसे में विपक्ष, विशेषकर बहुजनवादी दलों को इस बार के चुनाव को यूपी में भाजपा को रोकने के एक अवसर के रूप में ग्रहण करना पड़ेगा।

कोरोना के साये में होंने वाले पांच राज्यों के चुनाव की तिथियों की घोषणा के बाद देश की निगाहें उत्तर प्रदेश पर टिक गयी हैं क्योंकि पांच राज्यों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यूपी ही है, जहाँ से देश के राजनीति की दिशा तय होती है। यूपी न सिर्फ राजनीतिक लिहाज से सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रदेश है बल्कि यह उस हिन्दू धर्म- संस्कृति की ह्रदय स्थली है, जहां से राम मंदिर निर्माण का मुद्दा उठाकर भाजपा पूरे देश में फैली और अब यहीं से उसने अयोध्या और काशी की भांति मथुरा-वृन्दावन में भव्य निर्माण की आवाज़ बुलंद कर दी है।  बहरहाल योगी के कुशासन और आतंक राज से त्रस्त यूपी की जनता इस इस सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्य से  भाजपा को सत्ता से आउट करने का मन बना चुकी है और भाजपा को इस बात का इल्म भी हो चुका है. पर, चूँकि उसके लिए यूपी जीतना हर हाल में जरुरी है, इसलिए वह इस बार  नफरत की राजनीति को पहले से भी कहीं ज्यादा ऊंचाई देने पर आमादा नजर आ रही है।  इसलिए ही धर्म संसद से मुसलमानों के सम्पूर्ण सफाए का आह्वान किया गया है; इसीलिए ही योगी आदित्यनाथ ने कह दिया है इस बार यूपी का चुनाव 80 बनाम 20 का अर्थात हिन्दू बनाम मुस्लिम का है।  भाजपा के लिए हर हाल में यूपी जीतना इसलिए जरुरी है क्योंकि इसी राज्य पर निर्भर है उसके पितृ संगठन आरएसएस का 2025 का सपना।

अब उसका शेष एजेंडा बचा है आंबेडकर के संविधान के मूल ढांचे को बदलकर देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करते हुए हिन्दू धर्माधारित मनुस्मृति इत्यादि के कानूनों द्वारा भारत समाज को परिचालित करना! और 2025 का उसका सपना तभी पूरा हो सकता है, जब 2022 में यूपी उसके हाथ में आये।

2025 में संघ की स्थापना के सौ साल पूरे हो रहे हैं।  अपनी स्थापना के सौंवा वर्ष पूरा होने के पहले संघ अपना चरम लक्ष्य साध लेना चाहता है। यूपी से नफरत के राजनीति की  गंगोत्री बहाकर भाजपा ने केंद्र से लेकर राज्यों में जो सत्ता दखल किया है, उसके जरिये वह सवर्णों के हाथ में शक्ति के समस्त स्रोत थमाने के लिए निजीकरण  और विनिवेशीकरण इत्यादि के माध्यम से वर्ण व्यवस्था के वंचितों (दलित-आदिवासी –पिछड़ों) को मानवीय समता दिलाने वाले संविधान को प्रायः पूरी तरह व्यर्थ कर चुकी है। अब उसका शेष एजेंडा बचा है आंबेडकर के संविधान के मूल ढांचे को बदलकर देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करते हुए हिन्दू धर्माधारित मनुस्मृति इत्यादि के कानूनों द्वारा भारत समाज को परिचालित करना! और 2025 का उसका सपना तभी पूरा हो सकता है, जब 2022 में यूपी उसके हाथ में आये। अतः संघ के मंसूबों पर पानी फेरने के लिए विपक्ष को 5 राज्यों के चुनावों में अपना अधिकतम जोर यूपी में भाजपा को शिकस्त देने पर लगाना होगा। ऐसे में विपक्ष, विशेषकर बहुजनवादी दलों को इस बार के चुनाव को यूपी में भाजपा को रोकने के एक अवसर के रूप में ग्रहण करना पड़ेगा।  इसके लिए बहुजनों में सापेक्षिक वंचना को अभूतपूर्व ऊंचाई देने के साथ, ऐसे मुद्दे उठाने होंगे, जिनसे हिन्दू राष्ट्र के खतरे से हिन्दू धर्म के जन्मजात वंचितों स्थाई तौर पर निजात दिलाई जा सके। इस लिहाज से  विपक्ष अगर हिन्दू राष्ट्र के खतरे से जन्मजात वंचितों  को बचाना चाहता है उसे सबसे पहले राष्ट्रीय शिक्षा नीति – 2020 की जगह वैकल्पिक शिक्षा नीति का मुद्दा वंचित वर्गों मध्य  ले जाना होगा क्योंकि सितम्बर 2020 में पारित मोदी सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति से हिन्दू राष्ट्र की जमीन पुख्ता और बहुसंख्य लोगों का भविष्य अन्धकारमय होना तय सा दिख रहा है।

हिन्दू राष्ट्र में इसी को आधार बनाकर शूद्रातिशूद्रों को उन पेशों से जुड़ी शिक्षा लेने के लिए बाध्य कर दिया जायेगा, जो हिन्दू धर्माधारित वर्ण-व्यवस्था में इनके लिए निर्दिष्ट रहे। इसके दूरगामी परिणाम को देखते हुए बहुजन शिक्षाविदों की स्पष्ट राय है कि नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में घुमा- फिराकर दलित, आदिवासी , पिछड़ों व इनसे धर्मान्तरित तबकों को जाति आधारित पेशों से जोड़ने का तानाबाना बुना गया है ताकि अघोषित रूप से वर्ण व्यवस्था फिर से लागू हो और संविधान आधारित समाज व्यवस्था स्वतः ध्वस्त हो जाय।

मोदी राज में सितम्बर 2020 में पारित नयी शिक्षा नीति का पूरा ताना-बाना परोक्ष रूप से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अंग्रेजों  द्वारा लागू सार्वजनिक शिक्षा नीति के पूर्व युग में ले जाने के हिसाब से बुना गया है, जिसमें हिन्दू धर्मादेशों के जरिये शुद्रातिशूद्रों के लिए शिक्षा पूरी तरह निषिद्ध रही: शिक्षा का सम्पूर्ण अधिकार सिर्फ सवर्णों को रहा। किन्तु विश्वमय मानवाधिकारों के प्रसार के चलते हिंदुत्ववादियों के लिए वर्तमान में संभव नहीं कि वे गैर-सवर्णों को शिक्षा क्षेत्र से पूरी तरह बहिष्कृत कर दें।  इसलिए नयी शिक्षा नीति में ऐसी व्यवस्था की गयी है, जिससे गुणवत्ती शिक्षा पर सवर्णों का एकाधिकार हो जाए और  शुद्रातिशूद्रों इससे  बाहर हो जाएँ।  महात्मा गांधी के शब्दों में वे अधिक से अधिक इतनी ही शिक्षा अर्जित करें, जिससे शुद्र्त्व अर्थात गुलामों की भांति सेवा-कार्य बेहतर तरीके से संपन्न कर सकें। नयी शिक्षा नीति के अध्याय – 20 के पृष्ठ 357 से 372 तक वोकेशनल एजुकेशन का जो नक्शा तैयार किया गया है, उसमें  जाति आधारित पेशों को बढ़ावा दिया गया है।  मुमकिन है हिन्दू राष्ट्र में इसी को आधार बनाकर शूद्रातिशूद्रों को उन पेशों से जुड़ी शिक्षा लेने के लिए बाध्य कर दिया जायेगा, जो हिन्दू धर्माधारित वर्ण-व्यवस्था  में इनके लिए निर्दिष्ट रहे। इसके दूरगामी परिणाम को देखते हुए बहुजन शिक्षाविदों की स्पष्ट राय है कि नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में घुमा- फिराकर दलित, आदिवासी , पिछड़ों व इनसे धर्मान्तरित तबकों को जाति आधारित पेशों से जोड़ने का तानाबाना बुना गया है ताकि अघोषित रूप से वर्ण व्यवस्था फिर से लागू हो और संविधान आधारित समाज व्यवस्था स्वतः ध्वस्त हो जाय।  मोदी राज में हिन्दू राष्ट्र के सपनों को मूर्त रूप देने के लिए देश की लाभजनक कम्पनियों, रेल, हवाई अड्डों, अस्पताल इत्यादि को निजीकरण और विनिवेशीकरण के जरिये उन तबकों के हाथों में देने का बलिष्ठ प्रयास हो रहा है, जिनको हिन्दू धर्म में शक्ति के समस्त स्रोतों के भोग का दैविक अधिकार(डिवाइन राइट्स) है।  नयी शिक्षा नीति में सम्पूर्ण एजुकेशन सेक्टर इसी दैविक अधिकारी वर्ग अर्थात सवर्णों के हाथ में देने का सुपरिकल्पित डिजायन तैयार किया गया है। ऐसा लगता है हिन्दू राष्ट्र में सरकार शिक्षा का सम्पूर्ण दायित्व निजी क्षेत्र क्षेत्र वालों के हाथ में सौंप कर विश्वविद्यालयों को परीक्षा आयोजित करने व डिग्रियां बांटने तक महदूद रखना चाहती है। और शिक्षा जब भारत के  वर्णवादी निजी क्षेत्र के स्वामियों के हाथ में चली जाएगी तो उसका दलित–आदिवासी और पिछड़ों पर क्या असर पड़ेगा, उसका अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा।

नयी शिक्षा नीति में सरकारी स्कूलों में छात्र मातृभाषाओँ में जबकि प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेजी भाषा में पढ़ेंगे। इससे शिक्षा के क्षेत्र में विराट वैषम्य की सृष्टि होगी, जिससे सर्वाधिक प्रभावित होगा दलित–आदिवासी- पिछड़ा और इनसे धर्मान्तरित तबका। नयी शिक्षा नीति में आम लोगों को जो सबसे सकारात्मक चीज दिख रही है, वह यह कि शिक्षा का बजट 3 से 6 प्रतिशत हो जायेगा। लेकिन जब यह तय सा दिख रहा कि संघवादी सरकार आदर्श हिन्दू राष्ट्र को ध्यान में रखकर शक्ति के समस्त स्रोत सवर्णों के हाथ में देने तथा शुद्रातिशूद्रों को बिलकुल सर्वस्व-हारा और गुलाम बनाने पर आमादा है, क्या बढ़े बजट का लाभ उन वर्गों को मिल पायेगा, जिनके लिए शिक्षा ग्रहण करना हिन्दू धर्म में अधर्म है?

 शिक्षा निजी सेक्टर के हाथ में जाने पर भविष्य में पूरी तरह विपन्न होने जा रहे वंचित वर्गों के लिए अपने बच्चों को निजी क्षेत्र की मंहगी शिक्षा सुलभ कराना आकाश कुसुम हो जायेगा और  इन वर्गों के विद्यार्थियों के लिए डॉक्टर, इंजीनियर ,प्रोफ़ेसर इत्यादि बनना प्रायः असंभव हो जायेगा। आज बड़े-बड़े कई विश्वविद्यालय धार्मिक कर्मकांड का कोर्स कराने जा रहे हैं, नयी शिक्षा नीति परवान चढ़ने पर समस्त विश्वविद्यालयों में ही ऐसे कोर्स शुरू हो जायेंगे। इससे भारत में सभ्यता का पहिया बैक गियर में चला जायेगा और वैदिक युग जैसा समाज आकार लेने लगेगा। नयी शिक्षा नीति में सरकारी स्कूलों में छात्र मातृभाषाओँ में जबकि प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेजी भाषा में  पढ़ेंगे।  इससे शिक्षा के क्षेत्र में विराट वैषम्य की सृष्टि होगी, जिससे सर्वाधिक प्रभावित होगा दलित–आदिवासी- पिछड़ा और इनसे धर्मान्तरित तबका। नयी शिक्षा नीति में आम लोगों को जो सबसे सकारात्मक चीज दिख रही है, वह यह कि शिक्षा का बजट 3 से 6 प्रतिशत हो जायेगा। लेकिन जब यह तय सा दिख रहा कि संघवादी  सरकार आदर्श हिन्दू राष्ट्र को ध्यान में रखकर शक्ति के समस्त स्रोत सवर्णों के हाथ में देने तथा शुद्रातिशूद्रों को बिलकुल  सर्वस्व-हारा और गुलाम बनाने पर आमादा है, क्या बढ़े  बजट का लाभ उन वर्गों को मिल पायेगा, जिनके लिए शिक्षा ग्रहण करना हिन्दू धर्म में अधर्म है? कुल मिलाकर हिन्दू राष्ट्र को ध्यान में रखते हुए नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में हिन्दू धर्म के शिक्षा-निषिद्ध तबकों को गुणवत्ती शिक्षा से दूर रखने की एक सुपरिकल्पित व्यवस्था की गयी है, जिसकी काट ढूंढनी जरुरी है। यदि काट नहीं ढूंढी गयी तो वंचित समुदायों  की नस्लें उस शिक्षा से महरूम हो जाएँगी, जिसके जोर से ही दिन ब दिन बढ़ते प्रतियोगिता के दौड़ में कोई समाज अपना वजूद बचा सकता है। और इसकी एकमेव काट है – एजुकेशन डाइवर्सिटी !

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वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में व्याप्त भेदभाव  ख़त्म करने तथा वंचितों को उनका प्राप्य दिलाने के लिए एजुकेशन डाइवर्सिटी से बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता.एजुकेशन डाइवर्सिटी का मतलब शिक्षण संस्थानों में छात्रों के प्रवेश, अध्यापन में शिक्षकों की नियुक्ति व संचालन में विभिन्न सामाजिक समूहों का संख्यानुपात में प्रतिनिधित्व। एजुकेशन डाइवर्सिटी के जरिये ही दुनिया के लोकतान्त्रिक रूप से परिपक्व देशों में शिक्षा पर समूह विशेष के वर्चस्व को शेष कर सभी सामाजिक समूहों को अध्ययन-अध्यापन का न्यायोचित अवसर सुलभ कराया गया है। एजुकेशन डाइवर्सिटी अर्थात शिक्षा में विविधता नीति के जरिये ही तमाम सभ्यतर देशों में शिक्षा का प्रजातान्त्रिकरण मुमकिन हो पाया है। अमेरिका में भूरि-भूरि नोबेल विजेता देने वाले हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लेकर नासा जैसे सर्वाधिक हाई प्रोफाइल संस्थान तक सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू कर वहां के तमाम वंचित समूहों और महिलाओं को अध्ययन-अध्यापन इत्यादि का न्यायोचित अवसर मुहैया कराते रहते है।

ऐसे में विपक्ष यदि हिन्दू राष्ट्र के खतरे से सचमुच चिंतित है तो उसे समान शिक्षा नीति जैसे घिसे-पिटे एजुकेशन पॉलिसी से आगे बढ़कर एजुकेशन डाइवर्सिटी लागू करवाने की घोषणा करनी होगी।  इससे हिन्दू राष्ट्र में सारा कुछ हिन्दू ईश्वर के उत्तमांग से जन्मे लोगों (सवर्णों) के हाथ में सौपने का संघ का सपना ध्वस्त हो जायेगा। एजुकेशन डाइवर्सिटी पॉलिसी शिक्षा क्षेत्र में सवर्णों के एकाधिकार को ध्वस्त कर देगी। इसके फलस्वरूप डीयू- बीएचयू, आईआईटीज, एम्स से लगाये समस्त मेडिकल कॉलेजों इत्यादि में सवर्ण छात्र और गुरुजन, प्रिंसिपल और वीसी मात्र 15 प्रतिशत तक सिमटने के लिए बाध्य होंगे। शिक्षण संस्थानों में एडमिशन, शिक्षकों की नियुक्ति और मैनेजमेंट में सवर्णों के हिस्से का बचा हुआ अतिरिक्त 60-70 प्रतिशत अवसर दलित, आदवासी, पिछड़ों  और अल्पसंख्यक स्त्री-पुरुषों के मध्य बंटने के रास्ते खुल जायेगा। इससे भारत में हिन्दू राष्ट्र की जगह एक ऐसे समाज निर्माण की जमीन तैयार हो जाएगी जहाँ सवर्ण, ओबीसी, एससी/ एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों के स्त्री-पुरुषों को  शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक और धार्मिक) के भोग का  समान अवसर  होगा तथा भारत का लोकतंत्र विश्व के लिए एक मॉडल बनेगा !

 

दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कैसे हो संविधान के उद्देश्यों की पूर्ति जैसी चर्चित पुस्तक के लेखक हैं।

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