Saturday, April 13, 2024
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कांग्रेस के इतिहास में पहली बार सोशल जस्टिस का पिटारा                                      

तृणमूल 2024 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी और उनकी पार्टी किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगी। कहने  की जरूरत नहीं कि एक बच्चा भी बता देगा कि 2 मार्च को आये तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने मोदी को इतना ताकतवर बना दिया है कि उनके खिलाफ लगातार ताल ठोकने वाली ममता सरेंडर की मुद्रा में आ गयी हैं और उनके रास्ते का अनुसरण अन्य कई आग मार्का विपक्षी नेता भी कर सकते हैं,यह सोचकर ही 2024 में मोदी-मुक्त भारत का सपना देखने वाले सदमे में आ गए हैं।

 पूर्वोत्तर के चुनाव परिणामों से और ताकतवर हुए मोदी !

2 मार्च को आये पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने देश की राजनीतिक फिजा को बदलने के साथ ही पहले से ही अप्रतिरोध्य बने मोदी को और ताकतवर बना दिया है। इन चुनाव परिणामों ने उनके मुकुट में कुछ और पंख जोड़ दिये हैं। भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित पार्टी के तमाम नेता इन परिणामों का श्रेय प्रधानमंत्री के नेतृत्व को देने में एक दूसरे से होड़ लगा रहे हैं। लगता है पूर्वोत्तर के इन परिणामों ने मोदी को एक अलग किस्म की संतुष्टि दी है। उन्होंने इन नतीजों से गदगद होकर कहा है,’विपक्षी दल देश-विदेश में लगातार भाजपा को अल्पसंख्यक विरोधी होने का झूठ फैलाते रहे हैं। सबसे पहले गोवा और अब मेघालय तथा नगालैंड के अल्पसंख्यकों ने भाजपा को समर्थन देकर इस झूठ का पर्दाफाश कर दिया है। नतीजों से साफ़ है कि अल्पसंख्यक बहुल नगालैंड और मेघालय में भाजपा का समर्थन बढ़ रहा है। लम्बे समय से इस तरह के झूठे प्रचार के जरिये जनता को गुमराह करने की कोशिश की जाती रही है। भाजपा इन सभी झूठ का पर्दाफाश करने में सफल रही है।  भाजपा को बनिया पार्टी, हिंदी पट्टी की पार्टी से लेकर शहरी मध्यम वर्ग की पार्टी बताकर इसके जनसमर्थन को नकारने की कोशिश की गयी है।लेकिन गरीबों, पिछड़ों और दलितों ने भारी संख्या में भाजपा को समर्थन देकर इस मिथक को तोड़ दिया है। इसी तरह भाजपा को आदिवासियों का समर्थन नहीं होने का भ्रम फैलाया गया, जिसे पिछले विधानसभा चुनाव में गुजरात की आदिवासी जनता ने तोड़ दिया।’ त्रिपुरा में कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन को मिली हार पर तंज कसते हुए कहा है कि ‘जनता को गुमराह करने के लिए दोनों एक राज्य में दोस्ती करते हैं तो दूसरे राज्य में कुश्ती करने का दिखावा करते हैं।’ केरल पर मोदी ने कहा कि कांग्रेस और वामपंथी भले ही यहाँ विरोधी होने का दिखावा कर रहे हों, लेकिन हकीकत यही है कि ‘दोनों आपस में मिले हुए हैं। उम्मीद है केरल में भी जल्द ही भाजपा की सरकार बनेगी।’  केरल पर मोदी के उद्गार  के बाद राजनीतिक विश्लेषकों ने  कयास लगाना शुरू कर दिया हैं कि केरल जय के लिए भविष्य में वह  गोवा और पूर्वोत्तर के इसाई अल्पसंख्यकों की तरह वहां के इसाई संगठनों और राजनीतिक दलों से हाथ मिला सकते हैं, जहाँ ईसाईयों की आबादी 20 प्रतिशत है।

त्रिपुरा का चुनाव परिणाम वाम दलों के अंत का संकेत है 

बहरहाल पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के साथ पांच राज्यों के छः विधानसभा उप चुनावों के जो परिणाम आये हैं, वह भारत जोड़ो यात्रा से उत्साहित कांग्रेस के लिए भले ही कुछ राहतकारी हो, किन्तु भारतीय राजनीति में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराने वाले वाम दलों के लिए  त्रिपुरा का चुनाव शायद बहुत बड़े खतरे की घंटी है। कोलकाता का लाल दुर्ग ध्वस्त होने के बाद वामपंथियों की उम्मीदें खासतौर से त्रिपुरा पर ही टिकी थी।’  किन्तु 1972 के बाद कांग्रेस को फीका करके जिस तरह वामदलों ने त्रिपुरा में अपनी सबल उपस्थिति दर्ज करायी, उसके 2018 से कमजोर पड़ने का जो सिलसिला हुआ, वह 2023 में और आगे बढ़ गया है। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा, माकपा और कांग्रेस ने क्रमशः 35, 16 और शून्य सीटें जीती थीं। 2023 में वह आंकड़ा क्रमशः 32, 11 और तीन का हो गया है।  ऐसे में जिस तरह भाजपा 2018 के बाद दुबारा स्पष्ट बहुमत से सत्ता में आई है तथा जिस तरह 2018 के मुकाबले 2023 में माकपा के पांच सीटों की गिरावट दर्ज हुई है, उससे लगता है वाम दलों का बंगाल जैसा हश्र त्रिपुरा में भी हो गया है, जिससे उबरना अब बहुत ही कठिन है।

 बहरहाल इसाई अल्पसंख्यक प्रधान मेघालय और नगालैंड में भारी समर्थन पाने के साथ जिस तरह भाजपा त्रिपुरा का वाम- किला ध्वस्त की है, उससे मोदी और अप्रतिरोध्य बन गए हैं। इससे 2024में मोदी का विकल्प बनने का सपना देख रहे नेताओं के कॉन्फिडेंस पर बुरा असर पड़ा है, जिसकी सबसे बड़ी मिसाल ममता बनर्जी हैं। तीन राज्यों के आये विधानसभा चुनाव परिणाम एवं बंगाल के सागरदिघी विधानसभा सीट पर उपचुनाव में वाम समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार के हाथों तृणमूल प्रत्याशी की हुई करारी हार के बाद ममता ने एलान किया है कि तृणमूल 2024 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़ेगी और उनकी पार्टी किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगी। कहने  की जरूरत नहीं कि एक बच्चा भी बता देगा कि 2 मार्च को आये तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों ने मोदी को इतना ताकतवर बना दिया है कि उनके खिलाफ लगातार ताल ठोकने वाली ममता सरेंडर की मुद्रा में आ गयी हैं और उनके रास्ते का अनुसरण अन्य कई आग मार्का विपक्षी नेता भी कर सकते हैं,यह सोचकर ही 2024 में मोदी-मुक्त भारत का सपना देखने वाले सदमे में आ गए हैं। किन्तु ऐसे निराश लोगों के लिए एक बेहद सकारात्मक सन्देश रायपुर में अनुष्ठित कांग्रेस के 85 वें अधिवेशन से आया है, जिस पर खासतौर से नजर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की पड़ी है।

कांग्रेस के इतिहास में रायपुर में पहली बार खुला सोशल जस्टिस का पिटारा!

लोकसभा चुनाव 2024 की पृष्ठभूमि में 24 से 26 फ़रवरी तक रायपुर में आयोजित कांग्रेस का 85वां अधिवेशन एक ऐसी महत्वपूर्ण राजनीतिक इवेंट था, जिस पर पूरे देश की निगाहें टिकी रहीं। ऐतिहासिक भारत जोड़ो यात्रा के कुछ अंतराल बाद आयोजित इस अधिवेशन से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं और लोगों के प्रत्याशा के मुताबिक इसमें ऐसे कई महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुए जिनका असर युगांतरकारी हो सकता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्ताव हैं, जिनकी अधिकांश बुद्धिजीवियों ने प्रायः अनदेखी कर दी है। किन्तु इस पर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश की पैनी नजर पड़ी, उन्होंने अधिवेशन की समाप्ति के बाद कांग्रेस इतिहास में पहली बार सोशल जस्टिस का पिटारा  शीर्षक से एक वीडियो जारी कर  रायपुर अधिवेशन से पारित प्रस्ताव पर राय देते हुए कहा है,’दोस्तों रायपुर के 85वें कांग्रेस अधिवेशन में ऐसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गए हैं, जिनकी जानकारी यदि देशवासियों को हो जाय तो उनकी समझ में एक नया अध्याय जुड़ जायेगा। और तो और खुद देश भर में फैले कांग्रेसियों को भी पता नहीं कि उनकी पार्टी ने रायपुर में कितना महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित कर दिया है। दोस्तों, मैंने अतीत में बतौर रिपोर्टर कांग्रेस के कई अधिवेशन कवर किये हैं लेकिन अब रेगुलर रिपोर्टिंग नहीं करता,इसलिए रायपुर नहीं गया। लेकिन सूचना के आधार पर रायपुर अधिवेशन में सामाजिक न्याय से जुड़े जो प्रस्ताव पारित किये गए हैं, वैसे प्रस्ताव कांग्रेस पार्टी पारित कर सकती है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती! ऐसे प्रस्ताव के विचार कांग्रेस पार्टी में कभी उठे ही नहीं और जिसने कभी उठाने की कोशिश की उसे हूट कर दिया जाता था। कांग्रेस पार्टी के इतिहास में नेहरू, इंदिरा और राजीव युग में ऐसा सोचा भी नहीं गया। लेकिन हैरत की बात है कि कांग्रेस के कई बड़े-बड़े नेताओं के साथ टीवीपुरम  इस ऐतिहासिक घटना पर चुप्पी साधे हुए है।

योगी सरकार में बुनकरों पर बिजली बिल की मार

बहरहाल रायपुर के कांग्रेस अधिवेशन से जो सामाजिक न्याय का पिटारा खुला है उसमें एक उच्च न्यायपालिका में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण पर विचार करने का भी प्रस्ताव है। इस सम्बन्ध में कहा गया है, ‘यह सुनिश्चित करने के लिए कि  न्यायपालिका भारत की सामाजिक विविधता का प्रतिबिम्ब है, कांग्रेस पार्टी उच्च न्यायपालिका में एससी-एसटी-ओबीसी के लिए आरक्षण पर विचार करेगी। इसी भावना से भारतीय न्यायायिक सेवा बनाने के लिए लिए सुधार किये जायेंगे!’ इन वर्गों के लिए आम बजट का हिस्सा निर्धारित करने और उनमे से गरीब तबकों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग  (ईडब्ल्यूएस) कोटे में शामिल करने का वादा कांग्रेस ने किया है। कांग्रेस ने महिला आरक्षण बिल, जिसे 2010 में पारित किया गया था, पर यू टर्न लेते हुए कहा है कि वह  ’33% के भीतर आरक्षित श्रेणियों के लिए उचित प्रावधान के साथ इसे पारित करना सुनिश्चित करेगी।’ यह विस्मित करने वाली बात है क्योंकि 2010 में कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने कोटा के भीतर कोटा लाने के लिए सहयोगी दलों की मांग  को ख़ारिज कर दिया था। रायपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने दशकीय जनगणना के साथ–साथ एक सामाजिक-आर्थिक जनगणना कराने के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया है। जातिगत जनगणना में गैर-अधिसूचित और खानाबदोश जनजातियों की भी जनगणना की जाएगी। रायपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने भारत के सबसे बड़े सामाजिक समूह ओबीसी के उत्थान के प्रति समर्पित एक मंत्रालय गठित करने का भी वादा किया है।  पार्टी ने एससी, एसटी,ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के साथ शैक्षणिक संस्थानों में होने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए, उनके शिक्षा सम्मान के अधिकार की रक्षा और सुरक्षा के लिए रोहित वेमुला अधिनियम नामक एक विशेष अधिनियम बनाने की प्रतिबद्धता भी जाहिर की है। कांग्रेस ने सामाजिक न्याय का जो पिटारा खोला है उसमें  एक प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय विकास परिषद् के तर्ज पर सामाजिक न्याय परिषद् गठित करने का वादा भी है।  यही नहीं कांग्रेस पार्टी ब्लॉक, जिला, राज्य से राष्ट्रीय स्तर पर वर्किंग कमिटी में 50 % स्थान दलित, आदिवासी,पिछड़े, अल्पसंख्यक और महिलाओं के लिए आरक्षित करने की भी प्रतिबद्धता जाहिर की है। सामाजिक न्याय से जुड़े प्रस्तावों के अतिरिक्त रायपुर अधिवेशन के दौरान कांग्रेस ने गांधी परिवार के प्रभाव से मुक्त होने के नैरेटिव को सेट करने की कोशिश के तहत स्टीयरिंग कमिटी ने निर्णय लिया है कि वर्किंग कमिटी के लिए चुनाव नहीं होंगे, बल्कि पार्टी प्रेसिडेंट खड्गे मनोनीत करेंगे।

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उपरोक्त तथ्य पत्रकार उर्मिलेश के इस दावे पर मोहर लगाते हैं कि कांग्रेस ने अपने इतिहास में पहली बार खोला है सामाजिक न्याय का पिटारा! पर, क्या कांग्रेस सामाजिक न्याय से जुड़े नागपुर प्रस्ताव को लागू करेगी, इसे लेकर उन्हों ने खुद ही संशय व्यक्त किया है। उन्होंने अपने वीडियो में कहा है कि ऐसा लगता है कांग्रेस के ढेरों नेता राहुल गाँधी के प्रभाव में आकर आधे-अधूरे मन से इसका समर्थन किये हैं। ऐसे में क्या कांग्रेस इन प्रस्तावों को लागू करने के लिए अपने नेताओं को राजी कर पायेगी और क्या खुद कांग्रेस नेतृत्व में इसे लागू करने की इच्छाशक्ति है?अपनी शंका के समर्थन में उन्होंने राजीव गाँधी और पंडित नेहरू का दृष्टान्त सामने रखते हुए बताया है कि नेहरू काका कालेलकर आयोग की सिफारिशे लागू करने से पीछे हट गए थे,जबकि राजीव गांधी  ने मंडल आयोग की सिफरोशो के खिलाफ इस कदर प्रचंड रोष प्रकट किया था कि पिछड़ों का कांग्रेस से हमेशा के लिए मोह भंग हो गया। उनके इस युक्ति का समर्थन करते हुए वीडियो देखने वाले कई दर्शकों ने नागपुर प्रस्ताव लागू होने पर संदेह जाहिर किया है। लेकिन अपवादस्वरूप खड़े हुए ऐसे कुछेक दृष्टान्तों की अनदेखी कर दिया जाय तो पता चलेगा कि मूलतः सवर्णों की पार्टी होकर भी कांग्रेस ने दलित, पिछड़े, अकलियतों को सत्ता में भागीदारी देने सहित आजादी का सफल चखाने में बेमिसाल काम किया है। डॉ.आंबेडकर और बाबू जगजीवन राम जैसे दलित तथा के कामराज जैसे ओबीसी के टैलेंट का राष्ट्रहित में बेहतर उपयोग करने वाली कांग्रेस ने मंडल पूर्व युग में बिहार में दरोगा प्रसाद राय और मंडल आयोग के अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद जैसे ओबीसी, अब्दुल गफूर जैसे मुस्लिम तथा भोला पासवान शास्त्री जैसे दलित को एकाधिक बार मुख्यमंत्री बनाया। इसी दौर में बिहार के प्रतिवेशी राज्य यूपी में भी राम नरेश यादव और बाबू बनारसी दास जैसे गैर-सवर्णों को सीएम बनाया। आजादी के बाद कांग्रेस ने ही ढेरों सरकारी संस्थान खड़े किये, जो दलित, आदिवासी, पिछड़े, अकलियतों की उन्नति और प्रगति में सहायक हुए। आज बहुजनों को गुलामों की स्थिति में पहुचाने के लिए मोदी सरकार अंधाधुंध उन्हें बेचने में सर्वशक्ति लगा रही। कांग्रेस की ही इंदिरा गांधी ने विभिन्न संस्थानों का राष्ट्रीकरण करके राष्ट्र के साथ गैर-सवर्णों के सशक्तिकरण में ऐसी भूमिका अदा की कि आज हर बहुजन किसी नए इंदिरा गाँधी के उदय की कामना कर रहा है। बहरहाल पंडित नेहरु और राजीव गाँधी के जरिये कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले उर्मिलेश जैसे विद्वानों को नहीं भूलना चाहिए कि आज कांग्रेस जाति-मुक्त समाज में जन्मीं सोनिया गाँधी जैसी एक ऐसी असाधारण शख्सियत के एरा में साँस ले रही है, जिनके जैसा कोई राजनीतिक व्यक्तित्व भारत भूमि को अपनी उपस्थिति से धन्य किया ही नहीं!

 

मत भूलें कि कांग्रेस सोनिया एरा से गुजर रही है!

जातिवादी भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह यह है कि इस समाज में ऐसा कोई पैदा ही नहीं हुआ जो समग्र वर्ग की चेतना से समृद्ध हो।  हर किसी की चेतना स्व-जाति/वर्ण की स्वार्थ सरिता के मध्य घूर्णित होती रही, जिसका बड़े से बड़े साधु-संत, राजा राममोहन राय और पंडित विद्यासागर जैसे समाज सुधारक, सूर-तुलसी-बंकिम-प्रेमचंद – निराला जैसे साहित्यकार तथा नेहरू-इंदिरा-राजीव गाँधी, जय प्रकाश नारायण, ज्योति बासु ,पंडित नरसिंह राव, अटल-बिहारी वाजपेयी और मोदी जैसे ताकतवर नेता तक अपवाद न बन सके। सबके सब जातिवादी ही रहे। इसी व्याधि के हाथों मजबूर होकर मंडलोत्तर भारत में वाजपेयी ने जो देश बेचने का सिलसिला शुरू किया, उसे प्रधानमंत्री मोदी ने तुंग पर पहुंचा दिया है। भारतीय राजनीति की विवेचना करते समय अक्सर लोग मार्क्स के वर्ग संघर्ष के इतिहास जैसे कालजयी सिद्धांत की अनदेखी कर जाते है।  बहरहाल मार्क्स ने जिस वर्ग-संघर्ष की बात की है, भारत में वह सदियों से वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा। जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है, वह वर्ण-व्यवस्था बेसिकली एक आरक्षण-व्यवस्था रही, जिसमें शक्ति के समस्त स्रोत(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक- धार्मिक) ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के लिए आरक्षित रहे। शूद्रातिशूद्र इनसे पूरी तरह बहिष्कृत रहे। सवर्णों का आरक्षण पर एकाधिकार आंबेडकर के प्रयासों से पूना-पैक्ट से टूटना तब शुरू हुआ, जब कांग्रेस के सौजन्य से पूना-पैक्ट के जरिये दलित-आदिवासियों को आरक्षण मिलना शुरू हुआ। तब संघ परिवार, वाम दल सहित सम्पूर्ण सवर्ण समाज आरक्षण के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। इनके खिलाफ चट्टान की भांति सिर्फ कांग्रेस खड़ी रही। बाद में जब संविधान के जरिये आधुनिक आरक्षण का चिरस्थायी बंदोबस्त हुआ, तब भी वामपंथी, संघी सहित पूरा सवर्ण समुदाय नाखुश था।

 किन्तु 7 अगस्त, 1990 को जब मंडल आयोग की संस्तुतियों के जरिये पिछड़ों को आरक्षण मिलने की घोषणा हुई। भारत में आरक्षण पर केन्द्रित वर्ग संघर्ष खुलकर सामने आ गया। तब सवर्णों के छात्र और उनके अभिभावक, लेखक-पत्रकार, साधु-संत सहित उनके तमाम दल अपने-अपने स्तर पर आरक्षण के खिलाफ खुलकर सामने आ गए। इसी क्रम में संघ परिवार ने भाजपा ने मंडल के खिलाफ मंदिर आन्दोलन छेड़ दिया। परवर्तीकाल में जब मंदिर आन्दोलन के जरिये संघ प्रशिक्षित वाजपेयी के हाथ में सत्ता आई, उन्होंने वर्ग संघर्ष का खुला खेल खेलते हुए अपने वर्ग-शत्रुओं को फिनीश करने देश बेचने और समस्त सरकारी संस्थान निजी क्षेत्र अर्थात सवर्णों के हाथ में देने का जो सिलसिला शुरू किया उसे नरेंद्र मोदी ने एक्सट्रीम पर पहुचाते हुए आज आरक्षण को लगभग कागजों की शोभा बनाकर रख दिया है। बहरहाल 1996 में अल्पकाल के केन्द्रीय सत्ता का स्वाद चखने वाली चैम्पियन आरक्षण-विरोधी संघ के राजनीतिक संगठन भाजपा के जब नए सिरे से सत्ता में आने की जमीन तैयार हो रही थी, उन्हीं दिनों राजनीति के प्रति वितृष्णा पोषण करने वाली सोनिया गाँधी इतिहास की मांग पर 1998 में अनिच्छापूर्वक भारतीय राजनीति में सक्रिय हुईं. उसके बाद कांग्रेस में सोनिया एरा शुरू हुआ। इस एरा में  आरक्षण पर केन्द्रित वर्ग संघर्ष का जो अध्याय रचित हुआ, उसमे एक प्योर  सवर्णवादी दल होने के बावजूद कांग्रेस की भूमिका विशुद्ध वर्ग मित्र की रही।

सोनिया एरा में आरक्षण के अध्याय में जुड़े नए-नए पन्ने!

सोनिया एरा में जब नवउदारवादी अर्थनीति के जनक डॉ.मनमोहन सिंह, वाजपेयी के बाद खुद 2004 में सत्ता में आये तो नरसिंह राव द्वारा शुरू की गयी नीति को आगे बढाने में गुरेज नहीं किया। किन्तु उन्होंने कभी भी अटल बिहारी वाजपेयी या आज के मोदी की भांति इस हथियार का निर्ममता से इस्तेमाल आरक्षण के खात्मे में नहीं किया। सोनिया गाँधी के प्रभाव में वह बराबर इसे मानवीय चेहरा देने के लिए प्रयासरत रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल में नवउदारवादी अर्थनीति से हुए विकास में दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यकों इत्यादि को वाजिब भागीदारी न मिलने को लेकर समय-समय पर चिंता ही जाहिर नहीं किया, बल्कि विकास में वंचितों को वाजिब शेयर मिले इसके लिए अर्थशास्त्रियों के समक्ष रचनात्मक सोच का परिचय देने की अपील तक किया। डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में ही 2006 में उच्च शिक्षण संस्थानों के प्रवेश में पिछड़ों को आरक्षण मिला, जिससे उच्च शिक्षा में उनके लिए सम्भावना के नए द्वार खुले, जिसे आज मोदी सरकार नयी शिक्षा नीति के जरिये व्यर्थ करने पर आमादा है. उच्च शिक्षा में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के बाद ही डॉ. मनमोहन सिंह ने प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण लागू करवाने का जो प्रयास किया वैसा, अन्य कोई न कर सका। उन्हीं के कार्यकाल में मनरेगा शुरू हुआ। यह निश्चय ही कोई क्रांतिकारी कदम नहीं था, किन्तु इससे वंचित वर्गों को कुछ राहत जरुर मिली। मनरेगा इस बात का सूचक था कि भारत के शासक वर्ग में वंचितों के प्रति मन के किसी कोने में करुणा है। चूँकि भारत का इतिहास आरक्षण पर केन्द्रित संघर्ष का इतिहास है, इस लिहाज से यदि भाजपा से कांग्रेस की तुलना करें तो मात्रात्मक फर्क नजर आएगा। संघी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी के कार्यकाल तक आरक्षण पर यदि कुछ हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ इसका खात्मा हुआ है, जोड़ा कुछ भी नहीं गया है। इस मामले में कांग्रेस चाहे तो गर्व कर कर सकती है कि एक सवर्णवादी दल होकर भी उसने सोनिया एरा में आरक्षण के अध्याय में नए-नए सकारात्मक पन्ने जोड़े हैं।

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सोनिया एरा में ही डॉ. मनमोहन सिंह के पहले दिग्विजय सिंह ने 2002 में डाइवर्सिटी केन्द्रित भोपाल घोषणापत्र के जरिये सर्वव्यापी आरक्षण का एक ऐसा नया दरवाजा खोला जिसके कारण बहुजनों में नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों इत्यादि समस्त क्षेत्रों में आरक्षण की चाह पनपी, जिसके युगांतरकारी परिणाम आने के लक्षण अब दिखने लगे हैं। भोपाल से निकली डाइवर्सिटी अर्थात सर्वव्यापी आरक्षण की आइडिया के फलस्वरूप ही 2009 में मायावती सरकार ने 25 लाख तक के ठेकों में एससी/एसटी के लिए 23% आरक्षण लागू किया तो आज झारखण्ड में पीडब्ल्यूडी के  25 करोड़ तक के ठेकों में एसटी, एससी, ओबीसी के लिए आरक्षण लागू हो चुका है।  सोनिया एरा में दिग्विजय सिंह ने जो कुछ किया आज उसके फलस्वरूप ही तमिलनाडु के 36, 000 मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति एससी,एसटी,ओबीसी और महिलाओं को आरक्षण लागू हो चुका है, यह बात और है कि सवर्ण इसके खिलाफ कोर्ट में चले गए हैं। सोनिया एरा में मध्य प्रदेश से निकली सर्वव्यापी आरक्षण(डाइवर्सिटी) ने आंध्रप्रदेश में जगन मोहन रेड्डी, छतीसगढ़ में भूपेश बघेल को आरक्षण के अध्याय में कुछ-कुछ पन्ने जोड़ने के लिए प्रेरित किया है। सोनिया एरा में ही 2022 के 23 फ़रवरी को  मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पुरानी पेंशन योजना फिर से लागू करने की घोषणा की, जिसे बहुजनों के वर्ग-शत्रु भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी ने 2005 में बंद कर दिया था। ऐसे में सोनिया काल में जिस तरह आरक्षण के अध्याय में नए-नए पन्ने जुड़े हैं, उसे देखते हुए आशावादी हुआ जा सकता कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस ने सामाजिक न्याय का जो अभूतपूर्व पिटारा खोला है, उसका असर जमीन पर जरूर दिखेगा। आशावादी होने का एक अन्यतम कारण यह भी है कि पहले तो सोनिया अकेले थीं, अब तो उनकी योग्यतम संतान राहुल गाँधी भी नए अवतार में आ गए हैं, जो उन्हीं की तरह न सिर्फ समग्र वर्ग की चेतना से समृद्ध हैं बल्कि आरक्षण विरोधी भाजपा के खिलाफ सबसे मुखर आवाज के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

2024 में चमत्कारिक परिणाम दे सकता है सामाजिक न्याय का पिटारा! 

बहरहाल जिस तरह 2004 में कांग्रेस ने सोनिया गाँधी के नेतृत्व में अटल बिहारी वाजपेयी के शायनिंग इंडिया को पूरी तरह म्लान कर दिया था, वैसा ही परिणाम 2004 में रायपुर से खुला सामाजिक न्याय का पिटारा भी दे सकता हैं। यह लेखक वर्षों से दावा करता रहा है कि अप्रतिरोध्य बनी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को शिकस्त देने जैसा आसान पॉलिटिकल टास्क कुछ हो ही नहीं सकता, बशर्ते की चुनाव को सामाजिक न्याय के मुद्दे पर केन्द्रित किया जाय। क्योंकि भाजपा चैम्पियन सामजिक न्याय विरोधी पार्टी होने के कारण सामाजिक न्याय के  पिच पर टिक ही नहीं सकती। उसकी इस दुर्बलता को किसी ने बेहतर समझा तो वह लालू प्रसाद यादव रहे। उन्होंने 2014 में मोदी के पीएम बनने के बाद जब बिहार में पहली बार 2014 अगस्त में 10 सीटों पर होने वाले उपचुनाव में मोदी का सामना किया, स्लोगन दिया, मंडल ही बनेगा कमंडल की काट! और उपचुनाव पूर्व उन्होंने मंडल की काट के लिए आवाज उठाया, हमें सरकारी ठेकों सहित विकास की तमाम योजनाओं में एससी,एसटी,ओबीसी और अकलियतों को 60% आरक्षण चाहिए! इसके फलस्वरूप जब उपचुनाव परिणाम आया देखा गया, लालू वाले गठबंधन को 10 में 6 सीटें मिल गईं। इसके बाद 2015 के बिहार विधानसभा में मोहन भागवत ने जब आरक्षण के समीक्षा की बात की, पहले से ही चुनाव को मंडल बनाम कमंडल पर केन्द्रित करने में जुटे लालू जी ने  फिजा में यह सन्देश देना शुरू किया, ‘तुम आरक्षण का खात्मा करना चाहते हो, हम सत्ता में आये तो संख्यानुपात हर तबके को हर क्षेत्र में आरक्षण देंगे’! उनके इस निरंतर आह्वान के बाद जब चुनाव परिणाम आया देखा गया कि 24. 4% वोट शेयर के साथ मोदी की भाजपा को महज 53 सीटें, जबकि राजद को 81 और जदयू को 70 सीटें मिलीं। तब मोदी अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे और देश बेचने तथा संवैधानिक संस्थाओं को दोजख में मिलाने जैसे कुकर्म में लिप्त नहीं हुए थे. लेकिन 2015 के बाद देश की दिशा तय करने वाले यूपी-बिहार के किसी भी चुनाव, 2017 के यूपी विधानसभा, 2019 के लोकसभा, 2020 के बिहार विधानसभा और 2022 के यूपी विधानसभा चुनावों में सामाजिक न्याय का मुद्दा जरा भी उच्चारित नहीं हुआ। फलतः जहाँ सामाजिक न्यायवादी पार्टियाँ हाशिये पर चली गईं, वहीँ मोदी और उनकी भाजपा अप्रतिरोध्य बन गए। तो मोदी के ताकतवर बनाने में कोई कमाल नहीं, सिवाय इसके कि यूपी-बिहारी की सामाजिक न्यायवादी दलों ने सामाजिक न्याय से दूरी बनाकर मोदी एंड भाजपा को वॉकओवर दे दिया। कुछ अज्ञात कारणों से यूपी-बिहार के सामाजिक न्यायवादी दल आज भी सामाजिक न्याय से सौ-सौ हाथ की दूरी बनाये हुए हैं।  इससे कांग्रेस के लिए वहां  सामाजिक न्याय का पिच मुक्त हो गया है, जिस पर भाजपा कभी टिक ही नहीं सकती। ऐसे में कांग्रेस यदि रायपुर से खुले सामाजिक न्याय के पिटारे में सप्लाई, डीलरशिप, ठेकेदारी, पार्किंग, परिवहन, विज्ञापन निधि, फिल्म-मीडिया, पौरोहित्य इत्यादि में आरक्षण का मुद्दा शामिल कर ले तो वह 2004 के बाद समग्र वर्ग की चेतना से समृद्ध रीयल मदर इंडिया सोनिया गाँधी को उनके राजनीतिक जीवन के अंत में एक और ग्रैंड तोहफा दे सकती है!

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