सत्यनारायण का पीढ़ा

विभांशु केशव

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फिलहाल शरीर का आयतन बढ़ा हुआ है। कुछ भावनाओं के सम्मान के बोझ से शरीर का ‘ग्रॉस वेट’ बढ़ गया है। जेब में रखे पदार्थों का वजन भी जोड़ दिया जाय, तो ग्रॉस वेट बॉडी मास इंडेक्स के अनुसार ‘ओवरवेट’ हो गया है। बीएमआई से कम या अधिक वजन स्वास्थ्य के लिए खतरे की घंटी माना जाता है। तरक्की के लिए खतरे की घंटी को अनसुना कर देता हूँ।

एक धर्माचार्य का बॉडी मास इंडेक्स देखने पर हैरत में पड़ जाता हूँ। ओवरवेट शरीर का आयतन अंड क बंड है, फिर भी खतरे की घंटी नहीं बज रही। वजन इतना अधिक है कि उसका पेट उसके पैर से दो कदम आगे ही रहता है। गर्दन का पता ही नहीं चलता। पैर घुटने के नीचे के नज़र आते हैं। इसकी शारीरिक संरचना के बारे में बताना हो, तो कहा जा सकता है कि सिर है, बाकी सब पेट है। धड़ नहीं है।

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बनारस-धर्म की नगरी, संस्कृति की नगरी, सर्व विद्या की राजधानी, सबसे प्राचीन शहर। कोई विशेषण छूट रहा हो, तो अपने से जोड़ लें।

बनारस के साथ उपर्युक्त विशेषण इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार खबरों के ‘इंट्रो’ में प्रयोग करते रहे हैं। अब नहीं करते। अब वे इंट्रो में ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र’ का प्रयोग करते हैं। ठीक ही करते हैं। जब धर्माचार्यों ने हर-हर महादेव को हर-हर मोदी में बदल दिया है, तो पत्रकारों ने भी बदलाव को स्वीकार कर लिया। बदलाव के साथ पत्रकारों ने काशी को कुछ झूठे विशेषणों से मुक्ति भी दिलाई है। ठीक ही किया।

पत्रकारों को अगले बदलाव के लिए भी तैयार रहना चाहिए। हो सकता है धर्माचार्य हर-हर मोदी को हर-हर गोलवलकर, हर-हर गोडसे में बदल दें। ऐसी स्थिति में पत्रकारों के लिए कोई विशेषण बचेगा ही नहीं। पत्रकार खुद एक विशेषण हो जाएंगे- एक थे पत्रकार।

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इंट्रो के लिए एक विशेषण बचा हुआ है। पर उस विशेषण की तरफ अब तक नहीं देखा है। तो आगे भी देखने की जुर्रत न करें। जब हर-हर गोलवलकर और गोडसे हो जाएगा, तब उस विशेषण की तरफ देखने वाले को गोली मार दी जाएगी। उस विशेषण का नाम सुनते ही पोंगापंथ के छप्पन भोग की थाली का स्वाद कसैला हो जाता है। उस विशेषण की तरफ देखने से धर्माचार्यों की आँख में किरकिरी पड़ जाती है।

केदारनाथ सिंह ने उस किरकिरी के बारे में बताया है-

इस शहर में बसंत

अचानक आता है

और जब आता है तो मैंने देखा है

लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ से

उठता है धूल का एक बवंडर

और इस महान पुराने शहर की जीभ

किरकिराने लगती है

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‘बंच ऑफ थॉट्स‘ की शाखाएँ जब उस विशेषण के ललाट पर त्रिपुंड की स्थापना कर देंगी, तब उस विशेषण की तरफ देखा जा सकता है। शर्त ये रहेगी कि उस विशेषण के उन्हीं ‘थॉट्स’ का प्रयोग करना होगा, जो धर्माचार्यों द्वारा ‘सर्टिफाइड’ होंगे। अर्थात गुड़ को गोबर कहना होगा। गोबर को गुड़।

बनारस में बंच ऑफ थॉट्स की अनेक दुकानें हैं। कुछ स्थाई हैं। कुछ चलती-फिरती हैं। स्थाई दुकान वालों की ‘वेल्थ’ अच्छी है। चलती-फिरती वालों की वेल्थ कमजोर है।उनके वेल्थ की कमजोरी दूर करने के लिए ‘ईडब्ल्यूएस’ की व्यवस्था की गई है।

गरीब के लिए ‘सरकारी गरीब’ बनना कठिन होता है। काफी दौड़ भाग करनी पड़ती है। वहीं अमीर कुछ ले-देकर बैठे-बैठे सरकारी गरीब भी बन जाता है। ये आरोप नहीं है। व्यवस्था है।

ईडब्ल्यूएस कोटे के एक प्रचारक सुबह-शाम घूम-घूम चंदन का त्रिपुंड लगाते हैं। दोपहर में दुकान रोक देते हैं। दोपहर में उनके ललाट का पारा चढ़ने लगता है। चंदन की शीतलता को गर्मी सताने लगती है। शीतलता छाँव में विश्राम करने चली जाती है।

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त्रिपुंड की वाई-फाई से जब से गोबर के वैज्ञानिक गुणों का प्रचार-प्रसार हुआ है, गोबर की सरकारी खरीद शुरू हुई है, तब से गोबर महँगा हो गया है। पाँच रुपए में उतना गोबर नहीं मिलता, पाँच रुपये में जितना चंदन ललाट पर लगा देते हैं।

बनारस में ललाट पर चंदन का त्रिपुंड सावधानी से लगवाना चाहिए। यहाँ चंदन में चूना लगाने वाले बहुत हैं। चूने का त्रिपुंड मस्तिष्क पर आघात कर सकता है। मस्तिष्क को चूना लगा सकता है। पाँच रुपये में ललाट पर चंदन में चूना ऐसे चिपोरते हैं, जैसे जनवाद के चेतना की आत्मा पर गोबर लीप रहे हों।

ईडब्ल्यूएस कोटे वाले प्रचारक चंदन का चूना लगाने के लिए ललाट की तलाश में थे। उन्हें मेरा ललाट दिखा- लगा लो बच्चा। मैनें मना कर दिया- पहले ही ठंडा हो चुका हूँ। प्रतिरोध की ऊर्जा को मार चुका हूँ। चंदन की शीतलता लेते-लेते शरीर ठंडा पड़ चुका है। ठंडे पड़ चुके शरीर को श्मशान जाना पड़ता है। उधर ही जा रहा हूँ। मुर्दे को चंदन लगाने का क्या फायदा? प्रचारक ने समझाया- ऐसा नहीं होता बच्चा। देखो, कितने लोग वर्षों से चंदन का त्रिपुंड लगाकर अस्सी से राजघाट के बीच घूम रहे हैं। वे अब तक मणिकर्णिका घाट नहीं गए। प्रचारक को मैंने समझाया- उनके मस्तिष्क में प्रतिरोध की ज्वाला धधकती है। ज्वाला को शांत रखने के लिए वे ललाट पर चंदन लगाते हैं। उनके ललाट पर रोज चंदन लगाया करिए। नहीं लगाएंगे तो प्रतिरोध की ज्वाला की चपेट में आकर वे तख्तापलट कर देंगे।

प्रतिरोध की ज्वाला में धधकते हुए लप्प-लप्प कविता रचने वाले जनता के एक कवि बनारस आए। ललाट पर सफेद चंदन का त्रिपुंड लगवा लिया। कवि के ललाट पर त्रिपुंड से साहित्य जगत में ऊर्जा बढ़ गई। प्रतिरोध का साहित्य दो गुटों में बँट गया- एक त्रिपुंड के समर्थन में। एक विरोध में। प्रतिरोध के साहित्य में ‘आउटसाइडर’ भी आ गए। दक्षिणपंथी भी त्रिपुंड की वाई-फाई के वैज्ञानिक गुणों को बताने लगे।

कवि ने अपने समर्थन में देश भर के त्रिपुंड साहित्य को प्रस्तुत कर दिया। कवि के विरोधी तब भी शांत नहीं हुए। मुझे लग रहा था, त्रिपुंड के शास्त्रार्थ में कवि नए पुराण की रचना कर देंगे- त्रिपुंड पुराण। जिस तरह वे लप्प-लप्प प्रतिरोध की कविता रचते हैं, उसके अनुसार त्रिपुंड पुराण की रचना उनके लिए चंदन घिसने जितनी आसान है। विरोधियों के झाँसे में आकर वे शाश्वत रचने से चूक गए।

मुझे कवि के त्रिपुंड लगाने से कोई शिकायत नहीं। हो सकता है कवि ने अपने ‘रिसीवर’ की भावना का सम्मान करने के लिए अपने ललाट पर त्रिपुंड बनवाया हो। कवि को अपने मस्तिष्क में धधकने वाली प्रतिरोध की ज्वाला के वशीभूत होकर क्रांतिकारी कदम उठाने से बचने के लिए त्रिपुंड की शीतलता लेते रहना चाहिए। कवि अगली बार बनारस आयें, तो ‘रिसीव’ करने का अवसर मुझे प्रदान करें। मेरे पास स्पेशल क्वालिटी का सफेद चंदन है। जब तक कवि त्रिपुंड पुराण की रचना नहीं कर लेंगे, तब तक चंदन का रंग नहीं उतरेगा।

बनारस में प्रतिरोध की ज्वाला को शांत करने वाले ‘रिसीवर क्रांतिकारी’ बहुतायत में हैं। उनमें से ही किसी एक ने कवि को भी रिसीव किया होगा।

एक रिसीवर क्रांतिकारी कवि भी है। प्रगतिशील भी है। जनवादी भी है। संस्कार भारती भी है। देवी-देवताओं की शरण में जाने वालों को ‘गाइड’ भी करता है। प्रतिरोध के साहित्य का पुरोहित है। लहरतारा भी जाता है। जैसी जरूरत पड़ती है, वैसा मास्क लगा लेता है।

लहरतारा की तरफ जाने पर संस्कार भारती के पान में किरकिरी पड़ जाती है। किरकिरी को सुपारी समझ पान के साथ चबा जाता है। लाभ की पीक को बाहर नहीं थूकता। पेट के अंदर ही थूक लेता है। लाभ की पीक पेट में थूकते-थूकते उसका पेट पैर से एक कदम आगे रहने लगा है। पेट दो कदम आगे रहने लगेगा, तब साहित्य में उसकी प्रोन्नति होगी। पुरोहित से महंत बन जाएगा।

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त्रिपुंड प्रकरण के कुछ दिन पूर्व रॉयल्टी प्रकरण भी उठा था। साहित्य के पुरोहित और महंत भी रॉयल्टी को तर्कसंगत बनाने की माँग कर रहे थे। नरो वा कुंजरो के अंदाज में।

लेखन को ईश्वर की असीम अनुकम्पा मानने वालों को पारिश्रमिक न मिलने का दुखड़ा नहीं रोना चाहिए। या पारिश्रमिक की माँग ही नहीं करनी चाहिए। जिसकी असीम अनुकम्पा से वे लिख रहे हैं, पारिश्रमिक भी वही ले ले रहा है। मैं तो कहता हूँ ईश्वर की असीम अनुकम्पा वालों को अपना पुरस्कार किसी मंदिर में चढ़ा देना चाहिए। पुरस्कार राशि दान पेटी में डाल देनी चाहिए।

अक्सर सुनने को मिलता है- अमुक ने फलाने भगवान को लाखों रुपये का स्वर्ण मुकुट चढ़ाया। अमुक ने फलानी देवी को अपनी जीभ चढ़ाई। ऐसा कभी नहीं सुनने को मिला- अमुक ने अपना पुरस्कार चढ़ाया। ये करोड़ों देवी- देवताओं के साथ सरासर धोखा है। अन्याय है। जिसकी असीम अनुकम्पा से पुरस्कार मिला, उसे पुरस्कार चढ़ाकर उसके साथ न्याय किया जाए।

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मेरे एक मित्र का नाम ईश्वर है। जब कभी ‘ईश्वर की असीम अनुकम्पा से हमारे चिरंजीवी पुत्र अमुक का विवाह’ वाला निमंत्रण पत्र मिलता है, तब उससे पूछता हूँ- क्या बे, मैरिज ब्यूरो का भी काम शुरू कर दिये? वो बताता है- आज तक मैंने कुछ किया ही नहीं। सब जबदरस्ती मेरा नाम हर काम में घुसेड़ देते हैं।

वैज्ञानिक चेतना से संपन्न दृष्टिकोण रखने वाले एक मार्क्सवादी आलोचक एक बार सत्यनारायण के पीढ़े पर बैठे हुए बरामद हुए। उनकी वैज्ञानिक चेतना पर सवाल उठे। उन्होंने सवालों का खंडन किया- वे पत्नी की भावना का सम्मान करने के लिए सत्यनारायण के पीढ़े पर बैठे थे।

इधर वैज्ञानिक चेतना से संपन्न दृष्टिकोण रखने वाला एक शोषित क्रांतिकारी रहता है। शोषितों से उसका वर्ग नहीं मिलता, पर रिश्तेदारों की भावनाओं का सम्मान करते-करते वो शोषित हो गया। वो प्रतिदिन वैज्ञानिक चेतना की चिता से उठने वाला धुआँ सोखता है। उसकी सास की इच्छा है कि उसे मोक्ष मिले। वो काशी में मरे। अगर काशी में न मरे, तो चिता मणिकर्णिका घाट पर ही जले। उसकी सास की भावना का सम्मान करते हुए एक दिन मैंने उससे कहा- हरिश्चंद्र घाट पर अंतिम संस्कार करवाना। बिजली से भक्क से जल जाओगे। ज्यादा धुआँ भी नहीं होगा। तुम्हारे मरने के बाद लोग कहेंगे कि वैज्ञानिक चेतना से संपन्न थे, इसलिए बिजली से जले। उसने बड़ी मासूमियत से बताया- बिजली का नाम सुनते ही सास की भावना पर वज्रपात हो जाएगा।

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इधर हँसी-मजाक में कहा जाता है- जिसकी तरफ धुआँ अधिक जाता है, उसकी सास उसे बहुत मानती हैं। सास की भावना का सम्मान करते हुए उसने इसे सच कर दिखाया है। उसके सिर पर सास की भावना से चौबीस घंटे वैज्ञानिक चेतना की चिता से उठने वाला धुआँ छाया रहता है।

इंट्रो में मैंने बताया है कि फिलहाल शरीर का आयतन बढ़ा हुआ है। ओवरवेट हो गया हूँ। ओवरवेट होने का कारण बनारस आने वाले साहित्यकारों का रिसीवर बनने की इच्छा है। रिसीवर बनने के लिए जेब की संख्या बढ़ानी पड़ी। बीस-बाइस जेब रखता हूँ। जेब में बीड़ी, खैनी, सिगार, जनेऊ रखता हूँ। पता नहीं कब किसी साहित्यकार को भावना का सम्मान करने की जरूरत आन पड़े। मुक्तिबोध पोज के सम्मान के लिए बीड़ी जलानी पड़े। नागार्जुन पोज के लिए खैनी रगड़नी पड़े। चे ग्वेरा पोज के लिए सिगार दगानी पड़े। निराला पोज के लिए जनेऊ पहनानी पड़े। महादेव की जड़ी और बूटी भी रखता हूँ। जिसको जरूरत होगी, चुपके से दूँगा। किसी को नहीं बताऊँगा। उनके तांडव की अवधि खुद बताएगी कि उन्होंने जड़ी ली थी या बूटी।

महँगाई के दौर में भी मैं स्पेशल क्वालिटी का सफेद चंदन रखता हूँ। इसका आविष्कार मैंने खुद किया है। चूने में फेविकोल मिलाकर सफेद चंदन का आविष्कार किया है। शीतलता लाने के लिए फ्रीजर में रखता हूँ। मुफ्त में ललाट पर लगने वाला मेरा चंदन टिकाऊ रहता है। पाँच रुपये वाले की तरह पसीने से अंड-बंड फैलने नहीं लगता। अपने चंदन का चूना जिसको लगा दूँगा, वो त्रिपुंड पुराण की रचना किए बिना नहीं रुकेगा।

बीड़ी, खैनी, सिगार, जनेऊ, स्पेशल चंदन का वजन बहुत नहीं है। वजन पीढ़े का है। पीढ़ा भी रखता हूँ। किसी साहित्यकार को किसी अपने की भावना का सम्मान करने के लिए सत्यनारायण के पीढ़े पर बैठना पड़े, तो पीढ़ा तुरंत हाजिर कर दूँगा।

इन सबका वजन मैं प्रतिरोध का मास्कवादी क्रांतिकारी बनने के लिए ढो रहा हूँ। वजन तले दब कर तरक्की करना चाहता हूँ। पहले पुरोहित बनूँगा। फिर महंत। फिर प्रतिरोध को चूना लगाऊँगा। मुफ्त में।

विभांशु केशव तेजस्वी युवा व्यंग्यकार हैं। वाराणसी में रहते हैं।

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