Tuesday, February 27, 2024
होमविश्लेषण/विचारभारतीय अदालतों की दो खूबसूरत कहानियां (डायरी 30 अप्रैल, 2022)

ताज़ा ख़बरें

संबंधित खबरें

भारतीय अदालतों की दो खूबसूरत कहानियां (डायरी 30 अप्रैल, 2022)

सियासत में कहानियां गढ़ी जाती हैं। यही सियासत की खासियत है। इसे मैं अवगुण नहीं मानता। वजह यह कि सियासत में कभी कोई सीधी रेखा नहीं होती। सियासतदान चाहे किसी भी विचारधारा को माननेवाला हो, वह नाक की सीध में चलने का संकल्प भी कर ले, लेकिन चल नहीं सकता। लेकिन सियासी कहानियां होती बड़ी […]

सियासत में कहानियां गढ़ी जाती हैं। यही सियासत की खासियत है। इसे मैं अवगुण नहीं मानता। वजह यह कि सियासत में कभी कोई सीधी रेखा नहीं होती। सियासतदान चाहे किसी भी विचारधारा को माननेवाला हो, वह नाक की सीध में चलने का संकल्प भी कर ले, लेकिन चल नहीं सकता। लेकिन सियासी कहानियां होती बड़ी दिलचस्प हैं। इतनी दिलचस्प कि आदमी बस सुनता ही जाय।
मैं तो ब्राह्मण धर्म को माननेवाले एक परिवार में जन्मा। बचपन में ही देवी-देवताओं की कहानियों से परिचय हुआ। थोड़ा और बड़ा हुआ तो यक्ष और गंधर्वों के बारे में जानकारी मिली। थोड़ा और बड़ा हुआ तो उर्वशी और मेनका जैसी अप्सराओं की कहानियां पढ़ने-सुनने को मिलीं। और बहुत बाद में यह जानकारी भी पुराणों में सामने आयी कि जिसे हम देवी कहते हैं, वह भी एक अप्सरा जैसी ही थी, और देवताओं ने उसे एक खास मिशन पर एक दानवराज को मारने के लिए भेजा था। तो उस देवी ने पहले तो उस दानवराज को अपने हुस्न के जाल में फंसाया और उसके साथ शादी करने का प्रस्ताव किया। यह मुमकिन है कि उन दिनों विवाहपूर्व भी शारीरिक संबंध बनाने को लेकर सामाजिक सहमति रही होगी, तो उस देवी ने दानवराज के साथ शारीरिक संबंध भी स्थापित किये और फिर एक दिन उसकी धोखे से हत्या कर दी। इस कहानी की नायिका को आज भी प्रथम पूज्या का सम्मान हासिल है।

[bs-quote quote=”अपरेश चक्रवर्ती ने जिग्नेश को जमानत दे दी और असम पुलिस को झूठे मुकदमे दर्ज करने के लिए डांटा। महज एक हजार रुपए के निजी मुचलके पर जिग्नेश को रिहा किया गया। लेकिन बरपेटा पुलिस की जिस महिला पुलिसकर्मी ने जिग्नेश के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था, उसने अपनी शिकायत में कहा था कि जिग्नेश ने उसका शील भंग करने की नीयत के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया था। गवाह के रूप में बरपेटा पुलिस की ओर से दो गवाह भी थे, और वे दोनों भी बरपेटा पुलिस के जवान ही थे।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

खैर, कहां मैं पुराणों में उलझ गया। मैं तो आज की सियासी कहानी दर्ज करना चाहता हूं। पिछले दिनों गुजरात के वड़गाम विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित दलित विधायक (अब कांग्रेसी) जिग्नेश मेवाणी को असम की पुलिस ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ ट्वीट करने के आरोप में गुजरात जाकर गिरफ्तार कर लिया। मामला भी एक भाजपाई कार्यकर्ता ने ही दर्ज कराया था। फिर पांच दिनों के बाद जिग्नेश मेवाणी को असम के कोकराझार जिले की एक निचली ने जमानत दे दी। एक तरह से यह एक कहानी का अंत हो सकता था। लेकिन नहीं, यहां से तो कहानी का आगाज होता है।
दरअसल, हुआ यह कि कोकराझार जिले की निचली अदालत के द्वारा जमानत दिये जाने के ठीक बाद असम पुलिस ने जिग्नेश को दुबारा गिरफ्तार कर लिया। पहले मुझे इसकी जानकारी नहीं थी कि मामला क्या रहा। बहुत खंगालने के बाद केवल इतनी जानकारी प्राप्त हो सकी कि जिग्नेश के ऊपर एक महिला पुलिसकर्मी के खिलाफ अभद्रतपूर्ण व्यवहार के मामले में मुकदमा दर्ज कराया गया है। वह भी असम के बरपेटा जिले में।
मैं असम कभी नहीं गया। लेकिन गूगल से यह जानकारी मिल रही है कि कोकराझार और बरपेटा के बीच सत्तर किलोमीटर की दूरी है। अब मैं यह सोच रहा हूं कि आखिर कोकराझार जिले की पुलिस के पास पुलिसकर्मियों की संख्या इतनी कम है या फिर जिग्नेश कोई कुख्यात अपराधी हैं, जिनके लिए असम सरकार को कई जिलों की पुलिस बुलानी पड़ी थी?
खैर, असम सरकार और असम पुलिस की यह कहानी केवल इतनी नहीं थी कि जिग्नेश के खिलाफ बरपेटा में मामला दर्ज किया गया और उन्हें फिर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। कहानी के मूल तत्व का मुख्य सिरा ही गायब था कि आखिर जिग्नेश ने मुकदमा दर्ज करानेवाली महिला पुलिसकर्मी के साथ किया क्या था? वजह यह कि जिग्नेश एक समझदार और सुलझे हुए युवा हैं। अब यह तो कोई नहीं यकीन कर सकता है कि उन्होंने किसी पुलिसकर्मी को गाली दी होगी या फिर उसके ऊपर हाथ छोड़ा होगा। फिर ऐसा क्या आरोप था उस महिला पुलिसकर्मी की शिकायत में?
इसका खुलासा बरपेटा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश अपरेश चक्रवर्ती के द्वारा कल जिग्नेश की जमानत संबंधी याचिका की सुनवाई के बाद हुआ। अपरेश चक्रवर्ती ने जिग्नेश को जमानत दे दी और असम पुलिस को झूठे मुकदमे दर्ज करने के लिए डांटा। महज एक हजार रुपए के निजी मुचलके पर जिग्नेश को रिहा किया गया। लेकिन बरपेटा पुलिस की जिस महिला पुलिसकर्मी ने जिग्नेश के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था, उसने अपनी शिकायत में कहा था कि जिग्नेश ने उसका शील भंग करने की नीयत के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार किया था। गवाह के रूप में बरपेटा पुलिस की ओर से दो गवाह भी थे, और वे दोनों भी बरपेटा पुलिस के जवान ही थे।

[bs-quote quote=”भारतीय न्यायपालिका का खूबसूरत पक्ष। दोनों ही मामलों में अदालत ने इंसाफ किया है। हालांकि दोनों अदालतों के वरीयता क्रम में बहुत फर्क है। कहां सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश और और कहां बरपेटा जिले के जिला सत्र अदालत के न्यायमूर्ति। लेकिन यही तो बात है भारत की इन दोनों कहानियों में। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को और जिला व सत्र अदालत ने राज्य सरकार को सबक दिया।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

मैं उस महिला पुलिसकर्मी को ऊर्वशी और मेनका नहीं कहूंगा। निस्संदेह वह एक बहादुर महिला हाेंगी। लेकिन पुलिसिया सिस्टम की शिकार हो गयी होंगी। बरपेटा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश अपरेश चक्रवर्ती ने अपनी सुनवाई में ठीक ही कहा कि पुलिस की हिरासत में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में कोई व्यक्ति किसी महिला पुलिसकर्मी के साथ शील भंग करने की नीयत के साथ अभद्रतापूर्ण व्यवहार कैसे कर सकता है।
खैर, यह तो साफ है कि असम की सरकार, जिसके मुखिया ब्राह्मण वर्ग के हैं, ने ही ऐसी साजिश रची होगी। ठीक वैसे ही जैसे ब्राह्मण ग्रंथों में संकलित कहानियों में उल्लेख मिलता है। विश्वामित्र और मेनका की कहानी तो एकदम खास है।
बहरहाल, आज की दूसरी सियासी कहानी मोहम्मद कमर नामक एक शख्स की है। कल सुप्रीम कोर्ट के न्ययाधीश डीवाई चंद्रचूड़, और न्यायाधीश हिमा कोहली की खंडपीठ ने अपने एक फैसले में मोहम्मद कमर को रिहा करने का आदेश दिया। मोहम्मद कमर के बारे में कहानी यह है कि वह पाकिस्तान का नागरिक है, इसी के आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया था। उसने मेरठ में ही एक भारतीय महिला के साथ विवाह कर लिया और दोनों को पांच संतान भी हुए। मोहम्मद कमर के पास भारत में रहने के लिए वैध दस्तावेज नहीं थे और इस आरोप में अदालत ने उसे तीन साल की सजा मुकर्रर की थी, जो कि वर्ष 2015 में ही पूरी हो गयी थी। मोहम्मद कमर ने पाकिस्तान वापस जाने से मना कर दिया था और तभी से वह जेल में कैद था।
अब कल सुप्रीम कोर्ट ने उसे यह कहते हुए रिहा कर दिया कि किसी भी व्यक्ति को आजीवन कैद में नहीं रखा जा सकता है। भारत सरकार मोहम्मद कमर को पाकिस्तान भेजने का उपाय करे और अगले चार महीने के अंदर अदालत को सूचित करे।
तो इस कहानी में और इसके पहले की कहानी में एक बात कॉमन है। यह कॉमन बात है भारतीय न्यायपालिका का खूबसूरत पक्ष। दोनों ही मामलों में अदालत ने इंसाफ किया है। हालांकि दोनों अदालतों के वरीयता क्रम में बहुत फर्क है। कहां सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश और और कहां बरपेटा जिले के जिला सत्र अदालत के न्यायमूर्ति। लेकिन यही तो बात है भारत की इन दोनों कहानियों में। सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को और जिला व सत्र अदालत ने राज्य सरकार को सबक दिया।
कभी-कभी हमारे देश की अदालतें विश्व की सर्वश्रेष्ठ अदालतें लगती हैं। लगता है कि इनके कारण इंसाफ जिंदा रहेगा। फिर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पद पर कितना भी पाजी क्यों न आसीन हो।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं

गाँव के लोग
पत्रकारिता में जनसरोकारों और सामाजिक न्याय के विज़न के साथ काम कर रही वेबसाइट। इसकी ग्राउंड रिपोर्टिंग और कहानियाँ देश की सच्ची तस्वीर दिखाती हैं। प्रतिदिन पढ़ें देश की हलचलों के बारे में । वेबसाइट की यथासंभव मदद करें।

2 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

लोकप्रिय खबरें