Wednesday, May 29, 2024
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गाजियाबाद का शराब किंग- बाहुबली डीपी यादव जिसे यूपी की कोई भी सत्ता झुका नहीं सकी

उत्तर प्रदेश के बाहुबली – 8 दूध के कारोबार से दुनियादारी शुरू की पर पहचान बनी दारू। जब दारू का नशा सिर चढ़कर बोलने लगा तब सत्ता के सियासी गलियारे में भी अपनी कुर्सी बुक करवा ली। सियासी सफर में जब सम्मान दांव पर लगा तो हथियारों की हुंकार से हवाओं में अपने नाम की […]

उत्तर प्रदेश के बाहुबली – 8

दूध के कारोबार से दुनियादारी शुरू की पर पहचान बनी दारू। जब दारू का नशा सिर चढ़कर बोलने लगा तब सत्ता के सियासी गलियारे में भी अपनी कुर्सी बुक करवा ली। सियासी सफर में जब सम्मान दांव पर लगा तो हथियारों की हुंकार से हवाओं में अपने नाम की सिहरन भर दी। हर पार्टी के साथ पर हर जगह अपनी मनमानी की, जिसकी वजह से किसी के साथ लंबा साथ नहीं चला तब अपनी ही पार्टी बना ली। अब राजनीति का राग कमजोर पड़ गया है, असलहों के बल पर हासिल की हुई ताकत कमजोर हो गई, फिलहाल कविता की किताब जरूर छप गई।

25 जुलाई, 1948 को जिला बुलंदशहर का गाँव सर्फाबाद एक इतिहास का गवाह बनने जा रहा था। यह गाँव अब नोयडा में है। इसी गाँव में 25 जुलाई को एक डेयरी चलाने वाले जगदीश यादव के घर एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम रखा गया धर्मपाल यादव। धर्मपाल सात भाई और तीन बहनों के परिवार में पलने-बढ़ने लगे। घर में पढ़ाई-लिखाई का कोई खास माहौल नहीं था। बावजूद इसके पढ़ाई से धर्मपाल की अच्छी-भली ना सही पर ठीक-ठाक दोस्ती हो गई। पढ़ना-लिखना उम्र के साथ बढ़ रहा था। इसी के साथ पुश्तैनी धंधे की समझ भी बढ़ रही थी। एक दिन किताब-कॉपी कहीं बहुत दूर छूट गई और सायकिल पर दूध का डिब्बा बंध गया। दूध बेचने के साथ धर्मपाल कुछ और बेचने की कला भी सीख रहे थे। जाने खुद से या किसी की सलाह से धर्मपाल के दूध वाले दिमाग में दारू बेचने का नशा चढ़ गया। हिम्मत बांध कर धर्मपाल ने दूध के साथ दारू बेचने का जो काम शुरू किया, उसने धर्मपाल को कब बाहुबली डीपी यादव बना दिया यह सीधे तौर पर कहना आसान नहीं है। पर मुट्ठी भर पैसे पर पलने वाले परिवार पर जब पैसे की बरसात होने लगी तो गाँव-समाज को भी यह समझते देर नहीं लगी कि उनका दूधिया अपने दूध की तरह सफेद कारोबार नहीं कर रहा है, बल्कि कहीं कुछ तो काला है। दूध बेचने के सिलसिले में धर्मपाल को रोज दिल्ली जाना पड़ता था यहीं उनकी मुलाकात शराब कारोबारी किशन लाल से हुई थी। किशन लाल ने शराब के धंधे का पूरा खेल धर्मपाल को समझाया और सब कुछ समझते ही धर्मपाल दूध के शुद्ध सफेद कारोबार से शराब के काले कारोबार में पँहुच कर डीपी बन गए।

[bs-quote quote=”राजनीति में कदम आगे बढ़ ही रहा था कि एक दिन डीपी यादव का कारनामा पूरे देश के लिए सनसनी बन गया। खबर थी कि हरियाणा के ठेके से शराब खरीदकर पीने वाले 350 लोग मर गए। यह ठेका डीपी यादव का था यह शराब डीपी यादव की थी। 350 लोगों की मौत मामूली संख्या नही थी। राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक हड़कंप मच गया था। जांच कमेटी बनी। हरियाणा पुलिस ने डीपी को मामले में आरोपी बनाया पर डीपी की दूरदर्शिता काम आ गई थी। इतना बड़ा कांड होने के बावजूद अब तक बनाए हुए अपने राजनीतिक संबंध और पैसों के दम पर इतने बड़े मामले को डीपी ने हवा में उड़ा दिया। इस मामले में उनका कुछ नहीं हुआ।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

जोधपुर, राजस्थान से कच्ची शराब मँगवाते, दिल्ली में उस पर ब्रांड का लेबल लगाया जाता और शराब ठेके पर पहुंचा दी जाती। जल्दी ही धर्मपाल इस धंधे में मोहरे से बादशाह हो गए। दूध और तबेले की महक से रची-बसी देहगंध अब कीमती परफ्यूम की महक से बदलने लगी थी। पैसे की बरसात हो रही थी। पैसे से डीपी की लाइफस्टाइल ही नहीं सामाजिक वर्ग भी बदल रहा था। समाज के रसूखदार लोगों के साथ अब उठना-बैठना शुरू हो गया था। सायकिल की जगह लग्जरी कार की सवारी हो रही थी। फिर भी कुछ कम लग रहा था। डीपी दार्शनिक तो नहीं थे पर मंथन खूब करते थे। इस मंथन में समझ में आया कि यह सब कुछ जो कमा रहा हूँ इसे अगर जल्दी ही राजनीति के कवच कुंडल से कीलित नहीं किया तो कब मेहरबान वक्त बुरे वक्त में बदल जाए, इसका कोई भरोसा नहीं है। अब एक तरफ तय हुआ की राजनीति में आगे बढ़ना है तो दूसरी ओर इस काले कारोबार को कुछ सफेद कारोबार के पीछे छुपाना है। इस प्रयास के तहत उन्होंने दादरी के विधायक महेंद्र सिंह भाटी को अपना गुरु बना लिया।

समाजवादी पार्टी के मंच पर धर्मपाल यादव

कांग्रेस के बलराम सिंह यादव जैसे नेताओं से भी निकटता बढ़ी तो बलराम की वजह से गाजियाबाद जिले के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के अध्यक्ष बना दिए गए। महेंद्र सिंह भाटी ने भी अपने चेले को आगे बढ़ाते हुए ब्लाक प्रमुख का चुनाव लड़वा दिया और डीपी चुनाव जीत गए। बिसरख ब्लाक के ब्लाक प्रमुख बन गए। अभी कांग्रेस के साथ कदम बढ़ा ही रहे थे कि 1989 में मुलायम सिंह यादव का बुलावा आ गया। 1989 में ही मुलायम सिंह ने जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई थी और इस समय उन्हें ऐसे लोगों की जरूरत थी जो आर्थिक रूप से भी पार्टी की मदद कर सकें और सामाजिक तौर पर भी पार्टी की राजनीति को आगे बढ़ा सकें। ऐसे में डीपी, मुलायम सिंह के लिए उस समय किसी कुबेर से कम नहीं थे। डीपी मुलायम से मिले और समाजवादी पार्टी के जनरल सेक्रेटरी बन गए।

राजनीति में कदम आगे बढ़ ही रहा था कि एक दिन डीपी यादव का कारनामा पूरे देश के लिए सनसनी बन गया। खबर थी कि हरियाणा के ठेके से शराब खरीदकर पीने वाले 350 लोग मर गए। यह ठेका डीपी यादव का था यह शराब डीपी यादव की थी। 350 लोगों की मौत मामूली संख्या नही थी। राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक हड़कंप मच गया था। जांच कमेटी बनी। हरियाणा पुलिस ने डीपी को मामले में आरोपी बनाया पर डीपी की दूरदर्शिता काम आ गई थी। इतना बड़ा कांड होने के बावजूद अब तक बनाए हुए अपने राजनीतिक संबंध और पैसों के दम पर इतने बड़े मामले को डीपी ने हवा में उड़ा दिया। इस मामले में उनका कुछ नहीं हुआ।

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अभी इस शराब कांड का मामला पूरी तरह से ठंड भी नहीं हुआ था कि सन 1992 में डीपी यादव एक बार फिर बड़ी सुर्खी बन गए। 13 सितंबर, 1992 को गाजियाबाद के भंगेल रोड पर रेलवे का फाटक बंद होने की वजह से पूर्व विधायक महेंद्र सिंह भाटी की गाड़ी आकर रुक गई थी। तभी पीछे से एक और गाड़ी आ गई। गाड़ी से चार लोग असलहे के साथ उतरे और महेंद्र सिंह भाटी की गाड़ी पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में महेंद्र सिंह भाटी और उनके साथ बैठे उदय प्रकाश की मौत हो गई। इस हत्या में नाम आया डीपी यादव का। 1993 के इस केस में सीबीआई ने जांच शुरू की, जिसके आधार पर 22 साल बाद 15 फरवरी, 2015 को डीपी यादव को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। छह साल बाद नैनीताल हाईकोर्ट में इस केस की सुनवाई करते हुए बेंच ने पुराने निर्णय को पलटते हुए डीपी को बाइज्जत बरी कर दिया।

भाजपा के मंच पर अमित शाह के साथ धर्मपाल यादव

सजा और केस के बीच की इस अवधि में डीपी यादव ने राजनीति में कई अहम मुकाम हासिल किए। सन 1993 में मुलायम सिंह यादव ने  डीपी यादव को टिकट दिया और डीपी बुलंदशहर से समाजवादी पार्टी के विधायक बन गए। विधायक बनाते ही डीपी का मन और हाथ दोनों खुल गया। राजनीति की आड़ में काले सफेद हर कारोबार को पूरी तेजी से आगे बढ़ा रहे थे और कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए जिस भी अपराध की जरूरत लग रही थी उसे करने से भी पीछे नहीं हट रहे थे। डकैती, अपहरण, वसूली, मारपीट से लेकर एक-एक कर नौ हत्याओं में डीपी का नाम आ गया। विधायक रहते हुए गैंगस्टर बन गए। टाडा सहित 25 से ज्यादा मुकदमे दर्ज हो गए। नेता कम अब अपराधी ज्यादा हो चुके थे डीपी। डीपी का नाम अब एक ऐसे माफिया के रूप में दर्ज था जिसे डर का पर्याय माना जाने लगा था। इस आपराधिक छवि से मुलायम सिंह के नाम पर भी कालिख लगाने लगी थी जिसकी वजह से उन्होंने डीपी से किनारा करना शुरू कर दिया। मुलायम के इस बदले हुए व्यवहार से आहत होकर डीपी ने समाजवादी पार्टी छोड़ दी। अब बसपा के साथ आगे बढ़ने लगे। 1996 में बसपा के टिकट पर संभल से चुनाव लड़े और सांसद बन गए पर ज्यादा दिन हाथी पर सवार नहीं रह सके। दो साल में ही भाजपा से नजदीकी बढ़ी तब 1998 में भाजपा के समर्थन से निर्दलीय चुनाव लड़कर राज्यसभा पहुँच गए। 2004 में भी भाजपा ने डीपी का खुलकर समर्थन किया और वापस भाजपा के प्रत्याशी के रूप में राज्यसभा पहुँच गए डीपी। भाजपा के साथ भी डीपी की दोस्ती ज्यादा लंबी नहीं चल पाई। 2007 में डीपी यादव ने एक बड़ा राजनीतिक फैसला लेते हुए अपनी खुद की पार्टी बना ली राष्ट्रीय परिवर्तन दल। दर्जनों प्रत्याशी पार्टी से चुनाव लड़े पर जीत सिर्फ दो सीटों पर मिली। खुद सहसवाँ सीट से और पत्नी उमलेश यादव बिसाउली सीट से चुनाव जीतने में सफल रहीं। बाद में पत्नी चुनाव आयोग को अपने चुनाव खर्च का ब्योरा नहीं दे पाईं। इस वजह से 2011 में उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई।

2009 में डीपी ने बसपा से वापसी की और समाजवादी परिवार के सामने उतर गए। मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेन्द्र यादव से वह चुनाव हार गए। 2012 में एक बार फिर बसपा से उनके संबंध खराब हो गए तब सपा के साथ आगे बढ़ने की कोशिश शुरू की पर शिवपाल सिंह यादव के बहुत प्रयास के बाद भी अखिलेश यादव ने डीपी यादव को बाहर का रास्ता दिखाकर साफ कर दिया कि समाजवादी पार्टी में गुंडे-माफियाओं के लिए अब कोई जगह नहीं है। इसके बाद प्रयास किया कि भाजपा के साथ राजनीति आगे बढ़े पर मामला यहाँ भी नहीं बना, तब 2014 में अपनी पार्टी राष्ट्रीय परिवर्तन दल से ही वापस संभल से चुनाव लड़ा लेकिन चुनाव हार गए।

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2002 में बेटी के प्रेमी की हत्या के मामले में भी डीपी यादव का नाम सुर्खियों में आया था। डीपी की बेटी भारती का नीतीश कटारा नाम के लड़के से प्रेम प्रसंग चल रहा था, जिसकी खबर डीपी के बेटे विकास को चल गई थी। 17 फरवरी, 2002 को उस लड़के की अधजली लाश मिली। इस केस मे विकास के साथ दो अन्य अभियुक्तों विशाल और सुखदेव को भी उम्रकैद की सजा सजा सुनाई गई।

तमाम अपराधों के साथ सट्टेबाजी में भी डीपी यादव का नाम सामने आ चुका है। उनका कारोबार और आपराधिक क्षेत्र उत्तर प्रदेश से बाहर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड में भी चलता रहा है। फिलहाल डीपी यादव जेल से बाहर हैं। राजनीति में भी पैर पूरी तरह से डगमगा चुका है, लेकिन इस बीच उनकी कविता की एक किताब जरूर प्रकाशित हो गई है।

कुमार विजय गाँव के लोग डॉट कॉम के मुख्य संवाददाता हैं।

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