Friday, June 14, 2024
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लोक की ताकत से प्रतिरोध का मुहावरा रचने वाले रंगकर्मी थे हबीब तनवीर

हिन्दी रंगमंच के बहुचर्चित रंगनिर्देशक हबीब तनवीर का आज 100वां जन्मदिन है, उनका जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर, छतीसगढ़ में हुआ था। कभी उनके सान्निध्य में थियेटर करने वाले आज के हास्य और कला फिल्मों के अभिनेता संदीप यादव अपनी स्मृतियों के सहारे उन्हें अपनी शब्दांजलि और श्रद्धांजलि दे रहे हैं। संतों केआसपास एक […]

हिन्दी रंगमंच के बहुचर्चित रंगनिर्देशक हबीब तनवीर का आज 100वां जन्मदिन है, उनका जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर, छतीसगढ़ में हुआ था। कभी उनके सान्निध्य में थियेटर करने वाले आज के हास्य और कला फिल्मों के अभिनेता संदीप यादव अपनी स्मृतियों के सहारे उन्हें अपनी शब्दांजलि और श्रद्धांजलि दे रहे हैं।

संतों केआसपास एक विशेष ऊर्जावान औरा होता है, आप उनके सान्निध्य में आकर अपने कर्म उसकी महत्ता और अपने वजूद की ठोस वजह ढूँढ पाते हैं। महान संत किसी को फॉलो नहीं करते हैं, वे सिर्फ़ किसी को अपना आधार बनाते हैं लेकिन अपनी धारा वे ख़ुद चुनते हैं, उस धारा से सबको धीरे-धीरे अवगत कराते हैं, जो सहमत होते जाते हैं वो साथ आ जाते हैं। साथ आये हुए लोग महात्मा के सत्संग में अपने को निखार लेते हैं। अपने गुरु की वाणी, प्रवचन, सूक्ति से अपने में बैठे श्रेष्ठ बिंदु को खोज लेते हैं, गुरु आपकी मदद करते हैं, वे आप में कुछ खोज रहे होते हैं आपको एहसास भी करा रहे होते हैं, डांटकर, डपटकर,  ग़ुस्सा करके, प्यार से, दुलार से। अंततः आप में आपकी खोज करवा देते हैं, आपको कर्तव्यपथ पर ले आते हैं।

हबीब तनवीर ऐसे ही संत थे जो अपने पंथ खोज के लिए देश दुनिया में भटके, दुनिया का थिएटर देखा, वहाँ अपने को शामिल किया। सबकुछ समझने के लिए, फिर विदेश में उन्हें ये इल्म हुआ कि जो मैं खोज रहा हूँ वह तो हमारी भारतीय लोक परंपराओं में पहले से मौज़ूद है, वो हमारी संस्कृति और विधाओं में स्वतः ही निहित है, उसे क्या खोजना।
इसी ज्ञान के बाद हबीब तनवीर भारत वापस लौटते हैं अपना रंगमंच शुरू करते हैं, नये-नये प्रयोग करते हैं।
उसी क्रम में वे अपने गाँव, अपने लोक की तरफ़ लौटते हैं और रात-रात भर नाचा-गम्मत देखकर लोक कलाकारों के मुरीद हो जाते है। यहीं से उनके मन में एक प्रेरणा आती है कि यही लोक कलाकार मेरे कलाकार होंगे और इन्हीं के साथ मेरा थिएटर होगा।

अब समस्या ये आती है कि जैसा थिएटर( नाचा ) ये कलाकार कर रहे हैं, क्या यही मेरा थिएटर होगा- नहीं वो नहीं होगा। उन्होंने सोचा मेरे पास मेरी कहानियाँ होंगी। उन कहानियों में इन कलाकारों को लेकर जाऊँगा इन्हें अपनी तरफ़ मोड़ूँगा, अपनी तरह बदलूँगा। हालाँकि वह बदलना भी एक वक़्त के बाद हबीब साहब ने छोड़ दिया और यह महसूस किया, इन लोककलाकारों के स्थानीय प्रस्तुतीकरण ( जिसे दूसरे शब्दों में रॉ कह सकते हैं)  बिल्कुल वैसे ही किस तरह उपयोग में ला पाऊँगा?

हबीब तनवीर उन्हें उनकी नैसर्गिकता के साथ प्रयोगधर्मी बनाते हैं और अपनी ही लोककला, गायन, लोकगीतों, कहानियों को मंचीय अनुरूपता के साथ प्रस्तुत करते हैं। उनका यह प्रयोग सफल होता है और दर्शक इन लोक कलाकारों को नये कलेवर में देखकर दंग रह जाते हैं। जब हबीब तनवीर के कलाकार मंच पर बिना किसी मंचीय बाध्यता में फँसे अभिनय करते हैं, गाते हैं, बजाते हैं, नाचते हैं तो एक अलग संसार रच देते हैं। लोक को नये कलेवर में लाना एवं मंच के अनुरूप बनाना, उसमें गीत-संगीत नृत्य का प्रयोग और सबसे प्रमुख बिंदु सहज अभिनय से सजाना।

हबीब तनवीर द्वारा मंचित नाटक का एक दृश्य।

इस पंथ को हबीब तनवीर नाम देते हैं- नया थिएटर और नया थिएटर का उदघोष बनता है – जय शंकर ।
हबीब साहब के सभी कलाकार हबीब साहब को जयशंकर बोलकर प्रणाम करते थे, जवाब में हबीब साहब उन्हें जयशंकर बोलकर जवाब देते थे।

नया थिएटर के मुरीद धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं, कोई कलाकार के तौर पर इससे जुड़ता है तो कोई दर्शक के तौर पर। नया थियेटर ने न सिर्फ़ अपने देश में बल्कि दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई।

इंगलैंड के एडिनबरा के इंटरनेशनल थिएटर फेस्टिवल 1982 में हबीब तनवीर के नाटक चरनदास चोर को बेस्ट नाटक का अवार्ड मिलता है। नया थियेटर के सभी कलाकार पूरे यूरोप में छा गए। पूरे यूरोप में नाटक के मंचन करने के बाद जब नया थिएटर मंडली देश लौटती है, तो देश की तात्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी, थिएटर के क्षेत्र में देश का नाम दुनिया भर में रौशन करने के लिए हबीब तनवीर समेत पूरे नया थिएटर को सम्मानित करती हैं।
हबीब जी ने हमेशा ही लोककलाकारों को लेकर नए प्रयोग किए। आगरा बाज़ार, बहादुर कलारिन, मिट्टी की गाड़ी, देख रहे हैं नैन, चरनदास चोर, मुद्राराक्षस, हिरमा की अमर कहानी, जिन लाहौर नहीं वेख्या वो जन्म्या ही नहीं, सड़क, पोंगा पंडित समेत कई अन्य नाटकों के माध्यम से हबीब तनवीर भारतीय रंगमंच में नई धारा की शुरुआत  करते हैं। थियेटर की प्रति अपनी प्रतिबद्धता के साथ-साथ अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को भी निभाते चलते हैं, जनआंदोलनों में शामिल होते हैं, वहाँ नाटक करते हैं और जहां ग़लत हो वहाँ ग़लत का विरोध करते हैं।

धार्मिक अंधता के ख़िलाफ़ उन्होंने पोंगा पंडित नाटक खेला जिसका हिंदू संगठनों ने विरोध किया।  लेकिन संगठनों को पता ही नहीं था की पोंगा पंडित हबीब तनवीर का लिखा नाटक नहीं है बल्कि  वो एक लोक कहानी पर आधारित है जो कि छत्तीसगढ़ के लोग पहले से खेलते आये हैं,  बस हबीब तनवीर उसे अपनी तरह से मंच पर ले आते हैं तो बुरे हो जाते हैं। विरोध झेलना पड़ता है जबकि क़ायदे से होना ये चाहिये था कि धर्म की आड़ में ग़लत काम करने वालों का विरोध करना चाहिए था ना कि उसका जिसने ग़लत के खिलाफ आपका ध्यान आकर्षित किया था।

जिन लाहौर नहीं वेख्या का एक दृश्य, जिसमें अभिनेता के तौर पर संदीप यादव भी शामिल हैं।

असग़र वजाहत साहब के लिखे नाटक जिन लाहौर नहीं वेख्या में कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने मौलाना के माध्यम से इस्लाम की अच्छाइयों को दिखाया है, इस्लाम की श्रेष्ठता को दिखाया। जबकि अगर आप नाटक देखेंगे तो पायेंगे कि उन्होंने इस्लामिक कट्ठरपंथियों को ख़ूब लताड़ा भी है और हिंदू धर्म की महानता की भी बात की है। हबीब तनवीर के पंथ नया थिएटर के अनुयायी दुनिया भर में हैं। सिर्फ़ थियेटर ही नहीं  बल्कि फ़िल्मों में भी तमाम लोग हबीब साहब के मुरीद हैं।

मैं सन् 2006 में पहली बार स्पीक मैके की स्कॉलरशिप पर नया थिएटर में थिएटर देखने, सीखने,समझने गया था। उनके काम करने के तरीक़े को देखकर मैं अचंभित था कि ऐसे भी होता है क्या? धीरे-धीरे मेरी दीवानगी बढ़ती गई। उनके स्नेह और सान्निध्य की वजह से कई साल साथ रहा और सीखता रहा। उनकी गाली, मार, लताड़ सब सुनता रहा, उनके साथ साथ देश भर में घूमना, पूरी नाटक मंडली के साथ ट्रेन व बस का सफ़र करना, सब कलाकारों का मिलजुलकर सेट लगाना, लाइटिंग करना, प्रॉपर्टी का काम देखना, करना, समझना, मंच पर अभिनय, बैक स्टेज की तमाम ज़िम्मेदारी निभाता रहा।
असल में जीवन दर्शन क्या है? यह बात मैंने हबीब साहब के साथ काम करते हुए जाना।
नया थियेटर और हबीब साहब के काम पर शोध करने हेतु भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की तरफ से पहली बार युवा स्कॉलरशिप और दूसरी बार जूनियर फेलोशिप मिली, जिसके तहत हबीब साहब के काम पर कुछ शोध कर पाया लेकिन अभी बहुत कुछ बाक़ी है। आने वाले दिनों मे उन पर कोई किताब या कोई फ़िल्म बनाऊँ, ऐसी इच्छा है।

     

हबीब साहब के सभी कलाकार शानदार थे, जिनमें गोविंदराम निर्मलकर, फ़िदाबाई, दीपक तिवारी, माला मौसी, भुलवाराम, माँ मोनिका मिश्रा तनवीर, चैतराम भैया, उदय काका, मौसा समेत रामचंद्र भैया अनूप भैया। इनमें से कइयों के साथ काम करने का मौक़ा मिला तो कइयों के काम के बारे में मैंने सिर्फ़ सुना ही था। लेकिन उनके साथ काम करने का मौक़ा नहीं मिला पर उनकी महिमा की व्याख्या 2006 के दौरान उपस्थित सभी कलाकारों से सुनी।
आज हबीब साहब 100  वर्ष  के हो गये हैं। वे हमारे लिए और दर्शकों के लिए कहीं नहीं गये बल्कि वे अपने नाटकों के माध्यम से हमेशा ज़िंदा रहेंगे।
नया थिएटर, अभी भी रामचंद्र सिंह जी के निर्देशन में सफलता पूर्वक चल तो रहा है लेकिन नया थिएटर को तमाम सरकारी और आर्थिक सहयोग की जरूरत है, ताकि नये कलाकार हबीब तनवीर की परंपरा को आगे लेकर जा सकें।
हबीब जी को उनके 100वें जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई!

संदीप यादव हिन्दी सिनेमा, वेबसीरिज़ तथा टीवी के स्थापित अभिनेता हैं । 

गाँव के लोग
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