Thursday, July 25, 2024
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पितृसत्ता में औरत के लिए घर भी एक जेल है

मानवाधिकार के क्षेत्र में सीमा आज़ाद एक जाना-पहचाना नाम है। वह छात्र जीवन से ही राजनीतिक-सामाजिक मोर्चे पर सक्रिय रही हैं। ऑपरेशन ग्रीन हंट और विभिन्न योजनाओं में किसानों की जमीन हड़पे जाने केखिलाफ उन्होंने आवाज उठाई जिसके कारण उनकी गिरफतारी हुई। उन्होंने ढाई वर्ष जेल में बिताए और वहाँ कैदी महिलाओं के जीवन को […]

मानवाधिकार के क्षेत्र में सीमा आज़ाद एक जाना-पहचाना नाम है। वह छात्र जीवन से ही राजनीतिक-सामाजिक मोर्चे पर सक्रिय रही हैं। ऑपरेशन ग्रीन हंट और विभिन्न योजनाओं में किसानों की जमीन हड़पे जाने केखिलाफ उन्होंने आवाज उठाई जिसके कारण उनकी गिरफतारी हुई। उन्होंने ढाई वर्ष जेल में बिताए और वहाँ कैदी महिलाओं के जीवन को बारीकी से देखा। इस पर आगे चलकर एक किताब औरत का सफ़र : जेल से जेल तक लिखा जिसे पाठकों ने हाथोहाथ लिया। जेल जीवन पर उनकी किताब ज़िंदाँनामा भी ख़ासी चर्चित रही।  उनका एक कहानी संकलन सरोगेट कंट्री प्रकाशित हो चुका है। फिलहाल सीमा इलाहाबाद में रहकर दस्तक नामक एक पत्रिका का सम्पादन करती हैं। विगत दिनों उनकी बनारस यात्रा के दौरान गाँवकेलोगडॉटकॉम की विशेष संवाददाता पूजा ने बातचीत की।

वर्तमान में आप क्या कार्य कर रहीं हैं?

मेरी खुद की एक मैगज़ीन है दस्तक, जिसकी संपादक मैं स्वयं हूं। और एक मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल(पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) से जुड़ी हुई हूं। इसके साथ ही कहानियां और घटनाएं भी लिखती हूं। मैं रहने वाली इलाहाबाद की हूं।

आपको अपने जीवन में एक बार जेल जाना पड़ा, जो आपके जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट रहा। वहां से यहां तक के सफर पर क्या कहना चाहेंगी आप?

मैं 2004 से दस्तक पर काम करती आ रही हूं, जिसके कुछ ऐसे आर्टिकल्स रहते थे जिसको लेकर कभी- कभी धमकी भरे फोन आ जाया करते थे। जो मैगज़ीन है हम उसकी तरफ से कुछ सर्वे भी किया करते थे, जैसे हमने गंगा एक्सप्रेस रोपवे पर सर्वे किया था। जिसमें किसानों की ज़मीन जा रही थी। तो वे देना चाहते हैं कि नहीं। और जब सरकार ऑपरेशन ग्रीनहंट लेकर आई थी, तो इसपर बहुत सारे आर्टिकल्स लिखे थे। तो हम इस प्रकार के काम करते थे। जिसको लेकर पहले से ही फिज़ा बनी हुई थी कि ऐसे पत्रकारों को जेलों में डाला जा रहा है, ये तो मुझे पता था। लेकिन ये नहीं लगा था कि इतने कम काम और इतनी कम उम्र में मुझे ऐसा कुछ देखना पड़ेगा। इलाहाबाद में बालू माफिया के खिलाफ लिखा था। तो ये नहीं लगा कि इतने कम काम को लेकर ही सरकार मुझे परेशान करना शुरू कर देगी। तो मुझे ये लगता है कि इस रूप में ये टर्निंग प्वाइंट था, लेकिन अब जब मैं आकलन करती हूं उन दिनों का तो लगता है कि वो ऐसा कोई दुखद टर्निंग प्वाइंट नहीं था। क्योंकि मैं एक सोशल एक्टिविस्ट भी हूं तो मुझे लगता है कि हर सोशल एक्टिविस्ट की लाइफ में ये पार्ट आना चाहिए। जेल आना और जाना ये उसका जरूरी हिस्सा है। क्योंकी उस दौरान मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। जो भारतीय सत्ता है उसका एक चेहरा जिसे मैंने कभी नहीं देखा था। उसे जानने का अवसर मिला। भारतीय सत्ता एक ऐसी काली गुफा है जिससे रौशनी नहीं आ सकती। और मैं इसके बारे में कुछ भी नहीं जानती थी। जिसे मैंने उस दौरान जाना और उसकी बारीकियों को सीखा। तो हां ये वाक्या मेरी जिंदगी का पॉजिटिव टर्निंग प्वाइंट था। भले ही इसके चलते मैंने और मेरे परिवार ने बहुत कुछ झेला। लेकिन मेरा मानना है कि वो पॉजिटिव था, मुझे झेलना चाहिए था।

ये घटना किस समय की है? और इसके पीछे का मुख्य कारण क्या था?

ये वाक्या 2010 का है, मैं 2010 में जेल में गई थी और 2012 में बाहर आई थी। करीब ढ़ाई साल मैंने जेल में बिताया। लेख लिखने की वजह से पूछताछ हुई कि ऐसे लेख क्यों लिखे? लेकिन मेरे ऊपर जो मुख्य आरोप था, वो ये कि मैं लेख के माध्यम से माओवादियों का प्रचार करती हूं।

ऐसे कौन-कौन से आर्टिकल्स थे, जिनके कारण आप पर ये इल्जाम लगाए गए?

ऐसा कोई एक आर्टिकल नहीं था, और ये सवाल उनसे पूछना चाहिए। जब पूछताछ हो रही थी तो वो कह रहे थे, ये आर्टिकल क्यों लिखा, वो आर्टिकल क्यों लिखा? उनका सवाल ही ये था कि सरकार विरोधी में ही क्यों लिखती रहती हो? महिला हो, महिलाओं के पक्ष में लिखा करो। दलित और मुसलमानों के पक्ष में क्यों लिखती हो? तो मैंने कहा कि मैं आपके हिसाब से थोड़े न लिखूंगी। जो शोषित वर्ग है मैं उसके लिए लिखती हूं। जो भी मुझे गलत लगता है, मैं उसके लिए लिखती हूं। अभी सरकार धीरे-धीरे इस सूरत(मोड) में पहुंच गयी है कि ज़रा सा भी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाती है, तुरंत हावी हो जाती है। तो ऐसा कोई एक आर्टिकल नहीं था, बहुत सारे आर्टिकल है जिसमें वो लोग बार- बार टारगेट करके एक आर्टिकल के बारे में पूछते थे लेकिन वजह वो नहीं था। जैसे हमने ग्रीन हंट के खिलाफ एक बुकलेट निकाली थी। तो उसके बारे में पूछ रहे थे कि ये क्यों निकाला, इसका मकसद क्या था? फिर लालगढ़ वाले आंदोलन पर ही लेख क्यों लिखा? तो मैं भी बोलती थी कि मैं क्यों ना लिखूं इसपर पूरे देश-दुनिया में लेख लिखे गए हैं। फिर मैं क्यों ना लिखूं।

जब आप जेल में थीं, तो वहां आपने कैसा महसूस किया? बाहर की आज़ादी भरी जिंदगी और जेल में सिर्फ सांस भर जिंदगी, कितना अंतर लगता है ?

इसको बयां करने के लिए मैंने एक नहीं दो जेल डायरी लिखी है। पहला ज़िंदानामा-चांद तारों के बग़ैर एक दुनिया और दूसरा औरत का सफर- जेल से जेल तक इन दोनों जेल डायरी में जेल की पूरी जिंदगी है। जैसा आपने कहा कि वहां पर हम सिर्फ सांस लेते हैं। मैं कहना चाहूंगी कि ऐसा कुछ भी नहीं है। ये जेल का गलत प्रचार है। वहां भी बहुत ज्यादा विरोध है, प्रतिरोध है, क्योंकी वो हमारे समाज का हिस्सा(पार्ट) है। हमारे समाज की जितनी भी गंदगी है वो वहां पर खुल कर दिखती है। तो अगर आपको समाज को समझना है तो आप जेल को देख लीजिए। लड़कियों का काम खाना-बनाने का है तो लड़किया इसे अच्छे से समझ सकती हैं, जब हम चावल पकाते हैं तो चावल के एक दाने से हम उसके पकने का पता कर लेते हैं। ठीक उसी प्रकार समाज की गंदगी का पता करना है तो जेल को देखिए। किस हद तक यहां जाति-व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था कायम है, किस हद तक सांप्रदायिकता है। यानी बाहर जो दुनिया है वहां उसका कई गुना ज्यादा हैं। वहां पर भी लड़ने वाले लोग हैं जो कि लड़ते हैं।

आपने जिन दो डायरियों का ज़िक्र किया, थोड़ा सा उसका सार बताएं। साथ ही आपको ऐसा क्यों लगा कि इस विषय पर लिखना चाहिए  

जेल को लेकर लोगों में बहुत नकारात्मक भावना है। लोगों को लगता है कि जेल जाने के बाद सबकुछ खत्म हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है जेल में भी जीवन चलता है। और मेरे हिसाब से जेल सबसे ज्यादा उम्मीद वाले लोगों की जगह है। और वहां पर बहुत सारे लोग रहते हैं। और जहां लोग रहते हैं वहां जीवन(लाइफ)  होती है। तो उस जीवन(लाइफ) को लोग जाने, इसलिए मैंने ये डायरी लिखी। जेल के नाम से लोग डरते हैं। और इस डर का सरकार इस्तेमाल करती है कि, अगर तुम ये काम करोगे तो हम जेल में डाल देंगे। तो लोगों का वो डर खत्म हो, क्योंकि वो इतनी भी ख़तरनाक जगह नहीं है। थोड़ी-बहुत डर है क्योंकी वहां जो हमारी लोकतांत्रिक अधिकार(डेमोक्रेटिक राइट) है वो खत्म हो जाते हैं। तो इसलिए मुझे लगा कि ये लिखना चाहिए। और जो दूसरी डायरी मैंनै इस चीज को बताने के लिए लिखी कि, जो जेल में बंद अपराधी हैं, वास्तव में वो अपराधी नहीं हैं। ख़ासकर महिला जेल में बंद अपराधी। हमारा जो सिस्टम है वो हमें अपराध करने के लिए बाध्य करता है। जब आप दूसरी डायरी ‘औरत का सफर- जेल से जेल तक’ पढ़ेंगे तो उसमें 27 औरतों की कहानी है, जो कि उनकी जीवन में घटी सच्ची कहानियां हैं, वो यही बयान करती है।

मैंने आपका एक स्टेटमेंट पढ़ा था जिसमें आपने किरण खेर को खुली चुनौती दी थी कि जो भी कहना है मेरे सामने आकर कहें। तो वो क्या वाकया था?

वो वाकया ये था कि पंजाब यूनिवर्सिटी के एक स्टूडेंट फ्रंट ने मुझे बुलाया था और AVBP वालों ने कहा था कि हम सीमा आज़ाद को बोलने नहीं देंगे। तो उसे लेकर एक मतभेद हो गया था। लेकिन जो संस्था(ऑर्गनाइजेशन) थी, उनके लोगों ने मुझे पगड़ी पहनाकर कॉलेज के अंदर घुसा दिया था, और मैंने लोगों के सामने अपने विचार भी रखा। और ये लोग देखते रह गए थे। क्योंकि कॉलेज प्रशासन से लेकर पूरा चंडीगढ़ प्रशासन तक मुझे रोकने में लगा हुआ था। जब मैं बोल के चली गई तो उन लोगों की बहुत फ़ज़ीहत हुई कि अरे इतना इंतजाम किया रोकने का फिर भी बोल के चली गयी। तो किरण खेर ने स्टेटमेंट दिया था कि सीमा आज़ाद कायर है। इसलिए पगड़ी पहनकर आयी थीं। तो उसके जवाब में मैंने कहा था कि कायर आप हैं और आपके संस्कार हैं जिस संस्कारों की आप बात करते हैं। आप किसी को सुनना नहीं चाहते। मैं आपसे झगड़ा करने या आपको मारने-पीटने नहीं आ रही थी। मैं बस अपनी बात रखने आ रही थी। और आप वो भी सुनना नहीं चाहते। तो मैंने ये उसका जवाब दिया था कि मैं आपको चुनौती देती हूं कि, आप आइए और आमने-सामने बहस कर लीजिए। लेकिन आपकी जो हिंदूवादी संस्कृति है उसमें बहस का संस्कृति(कल्चर) ही नहीं है। उसमें गार्गी को भी रोका गया, उसमें अपाला को भी रोका गया। तो आप उसी संस्कृति(कल्चर) के हैं। इसलिए आप किसी बहस को, विरोधी विचार को सुनना नहीं पसंद करते।

आपकी जो पत्रिका है, क्या आप अभी भी उसके लिए काम कर रही हैं?

जी हां, पत्रिका का काम अभी भी उसी प्रकार से चल रहा है। जब मैं जेल में थी उस वक्त बंद था, क्योंकि इसे चलाने वाली मैं ही थी।

आपके लिए वर्तमान में सबसे बड़ा मुद्दा क्या है? जिसपर आप काम कर रहीं हैं, और आगे जिसपर करना चाहेंगी?

हम कभी भी किसी एक मुद्दे को लेकर कार्य नहीं करते हैं। हमारा मानना है कि ये समाज लोकतांत्रिक हो, जनवादी हो। इसलिए उससे जुड़े सभी मुद्दे हमारे मुद्दे हैं। चाहे जाति का सवाल हो या वर्ण-व्यवस्था हो या पितृसत्ता का सवाल हो। ये सारे सवाल हमारे मुख्य सवाल हैं। हमारा मुख्य मुद्दा समाज को लोकतांत्रिक बनाना है।

वर्तमान की सरकार और उसकी नीतियां जैसे एनआरसी, सीएए और कृषि कानून लोगों के लिए अहम मुद्दा बना रहा है। अभी जातिगत जनगणना की भी बात चल रही है इन सब मुद्दों पर आपकी क्या राय है?

ये सारे मुद्दे हमारे मुद्दे हैं। क्योंकि ये सारे मुद्दे और ये सारी बहस इस देश के लोकतंत्र को बचाने की बहस है। जैसे कि किसान आंदोलन है- किसान जिस बात के लिए लड़ रहा है, वो अपने लिए नहीं लड़ रहा है। वो इस देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए लड़ रहा है। इसलिए वो मुद्दा हमारा भी है। जैसे सीएए और एनआरसी वाला आंदोलन चला, जो कि देश को बचाने वाला सबसे बड़ा आंदोलन था। क्योंकि जिस तरह से सरकार उसको लेकर आयी है वो इस देश को दो हिस्सों में बांटने की बात करने वाला कानून है। इसलिए उसके खिलाफ जो लड़ाई है वो लोकतंत्र की लड़ाई है। इसलिए वो हमारी लड़ाई है। और आपने बात की जातीय जनगणना की, तो सरकार इसे कई सालों से टालती रही है। वो इसलिए क्योंकि समाज में ऊपरी तौर पर सिर्फ सवर्ण ही दिखते रहे हैं। और जब जातीय जनगणना हो जाएगी तो सभी को पता चल जाएगा कि बहुजनों(एसटी, एससी, ओबीसी) की संख्या सवर्णों से ज्यादा है। इसलिए सरकार जातीय जनगणना नहीं करती है, और इस बार भी नहीं करने देगी। जो दबित और शोषित लोग जो भी मुद्दा उठाते हैं वो आमतौर पर हमारा मुद्दा है।

2022 में विधानसभा चुनाव होने को है, और सरकार के कामों को लेकर लोगों के मन में नकारात्मक छवि बनी हुई है। तो आपके हिसाब से सरकार के कामों का नकारात्मक(निगेटिव) या सकारात्मक(पॉजिटिव), क्या आस्पेक्ट रहा है?

देखिए मुझे कुछ भी सकारात्मक पक्ष(पॉजिटिव अस्पेक्ट) तो नहीं दिखता है। और अगर इक्का-दुक्का कुछ हो भी तो इतना कम है कि वो नजर-अंदाज करने वाला है। ये सरकार बाकी सारी सरकारों से बहुत ही ज्यादा ख़राब है। लेकिन हम तो इसके पीछे की सरकारों की भी बात कर रहे हैं। जिसने देश को पूरी तरह से साम्राज्यवादियों के हाथ में सौंपने का कार्य किया है। तो उत्तर प्रदेश और केंद्र दोनों जगह वर्तमान की सरकार और पिछली सभी सरकारों ने देश को यहां तक पहुंचा दिया है। लेकिन ये सरकार बाकियों के तुलना में ज्यादा खतरनाक और ख़राब है, क्योंकि ये सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रही है। साथ ही जो पुराना अलोकतांत्रिक समाज था, जिसको वर्ण-व्यवस्था या मनुवादी व्यवस्था कहते हैं उसको लाने पर ये सरकार तुली हुई है। जिसको हम फासीवाद कहते हैं। ये सरकार आक्रामक फा सीवाद के दौर में है। इसलिए ये सरकार बाकि सारी सरकारों से ज्यादा ख़राब है।

2022 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाला है, यह देश का सबसे बड़ा राज्य है, और राजनीतिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है। तो आपकी नजर में यहां किसकी सरकार बन सकती है?

इस पर मेरा कोई अवलोकन नहीं है, और न ही हम इस पर सोचना चाहते हैं। अब ये है कि बीजेपी थोड़ी ज्यादा बुरी हो सकती है। सपा और बसपा इनसे कम बुरे हो सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर सबका एक ही हाल है। सब आपके सामने ही हैं। ऐसा कोई भी नहीं है जिसको नहीं देखा है, सब वहीं चेहरे हैं। तो हमारा कोई मत नहीं है कि कौन आने वाला है और किसे आना चाहिए।

तो क्या आपका वोट नोटा पर जाने वाला है?

हां बिल्कुल, आप कह सकती हैं और हम तो पीयूसीएल(पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज) से हैं। पीयूसीएल तो नोटा लाने वाला है। नोटा चुनाव में एक विकल्प हो इसका मुकदमा पीयूसीएल ने ही किया। तो पीयूसीएल वाले तो नोटा के साथ ही जाएंगे।

हमारे जैसे युवा जो अभी-अभी काम करना शुरू किए हैं, आप उन्हें कुछ संदेश देना चाहेंगी?

बिल्कुल नए लोगों से बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं, और नए लोग पुराने से ज्यादा गतिशील(डायनमिक) और उर्जावान(एनर्जेटिक) हैं। हालांकि सभी पीढ़ी अपनी उर्जा के साथ काम करती रहीं हैं। लेकिन जो ये वाली पीढ़ी है वो अन्य के अनुसार थोड़ी सी ज्यादा गतिशील(डायनमिक) लगती है। क्योंकि इस पीढ़ी के सामने बहुत सारी खिड़कियां एक साथ खुल गई हैं। हमको लगता कि हमारी वाली पीढ़ी में इतनी सारी खिड़कियां एक साथ नहीं खुली थीं। जिसमें उसको हर मुद्दे पर सोचना है, ये पीढ़ी नागरिकता, साम्प्रदायिकता, फांसीवादी, पितृसत्तात्मक जैसे कई चीजों पर लड़ रही हैं। बेरोजगारी, अशिक्षा, जैसी कई चीजों से वो घिरे हुए हैं। और अब पढ़ाई का भी कोई स्कोप नहीं है। कोरोना का बहाना बनाकर हर चीज़ को बंद कर दिया गया है। नौकरी तो पहले से ही नहीं थी। तो ये पीढ़ी ज्यादा परेशानियों से घिरी हुई है इसलिए ज्यादा गतिशील(डायनमिक) है। तो इसलिए हम इनको बहुत उम्मीद से देखते हैं।

आपने कई वर्ग के लोगों  के लिए काम किया है जिनमें एक वर्ग महिलाओं का भी रहा है। इस दौरान आपने महिलाओं के साथ हो रही कई समस्याओं का भी आकलन किया होगा, जैसे घर से लेकर दफ्तर तक हर स्तर पर मानसिकता से लड़ना, अपने ही विचारों से लड़ना, कभी- कभी अपने ही फैसलों के खिलाफ जाना आदि प्रकार के, तो क्या आपको भी कभी इन समस्याओं का सामना करना पड़ा?

अरे बिल्कुल-बिल्कुल। हम कैसे उससे अछूते रह सकते हैं। इसलिए तो डायरी का नाम भी है औरत का सफर जेल से जेल तक। इसका मतलब है कि जो घर है वो भी एक जेल है। तो इस जेल(घर) से उस असली वाले जेल तक का सफर। मैं भी बहुत सामान्य एंव पारम्परिक परिवार से आती हूं। जिनमें पितृसत्ता हावी होती है। उन सारी चीजों को झेल कर ही आगे बढ़ पायी हूं।

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