Saturday, April 13, 2024
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मृत्युंजय के लिए मेरे मन में आजीवन गिल्ट रहा क्योंकि मेरे लिए बच्चे से भी बढ़कर था -1

जी करता है घर छोड़कर भाग जाऊं लेकिन मैंने दो बच्चे पाले हैं। उनका ख्याल आते ही रुक जाता हूँ।’ मैंने पूछा कौन बच्चे? वे दोनों कुत्ते? उन्होंने तुरंत बात काटते हुए कहा – कुत्ते न कहो,उनका नाम चेरी और फेथ है। मृत्युंजय और टफी भी था अब दोनों नहीं हैं।  इस बातचीत से मूलचन्दजी […]

जी करता है घर छोड़कर भाग जाऊं लेकिन मैंने दो बच्चे पाले हैं। उनका ख्याल आते ही रुक जाता हूँ।’ मैंने पूछा कौन बच्चे? वे दोनों कुत्ते? उन्होंने तुरंत बात काटते हुए कहा – कुत्ते न कहो,उनका नाम चेरी और फेथ है। मृत्युंजय और टफी भी था अब दोनों नहीं हैं।  इस बातचीत से मूलचन्दजी के कुत्तों से विशेष प्रेम का पता चलता है।  मृत्युंजय …मूलचन्दजी का एक पालतू कुत्ता था, जिसके बारे में बहुत ही मार्मिक लेख उन्होंने उसके मृत्यु के बाद लिखा। कोई भी इंसान अपने पाले हुए जानवर के साथ रहते हुए कैसे उससे जुड़ जाता और उसे परिवार का एक सदस्य जैसा मानने लगते हैं। दो भागों में प्रकाशित इस लेख में मृत्युंजय के जीवन से लेकर मृत्यु तक की कहानी जो एक रूखे दिखने वाले व्यक्ति के मन की अंदरूनी परतों को खोलती है। वैसे बता दूँ कि हर किसी से दो-दो हाथ करने को तत्पर मूलचन्द सोनकर वास्तव में बहुत दोस्तना, सहयोगी और संवेदनशील इंसान थे — अपर्णा 

मैंने बड़े अरमान से उसका नाम मृत्युंजय रखा था। वह पूरी तरह से इस नाम का अधिकारी भी था। आखिर हो भी क्यों न! उसने बड़ी बहादुरी से मौत को परास्त जो किया था। उस शौर्यगाथा की अपनी एक विलक्षण कहानी है। मुझे बहुत शिद्दत से याद आ रही है 14 अप्रैल 2010 की वह दोपहर जब 24 घंटे से भी कम उम्र का वह प्यारा सा अनाम बच्चा रेंगता हुआ मेरे पैरों के नीचे आकर दब गया था। उसके नन्हें नाज़ुक सिर पर मेरा पैर पड़ गया था। उसका नन्हा-सा सिर मेरे पैरों का वजन सह नहीं पाया था और पिच्ची हो गया था। पूरा मुँह लहू-लुहान हो गया था। वह ज़िन्दगी और मौत के बीच में झूलने लगा था या यह कहना ज्यादा सही होगा कि वह मौत को परास्त करने के लिये युद्धरत हो गया था और अन्ततः विजयी भी हुआ था। उसके इस पराक्रम से मैं इतना प्रभावित हुआ था कि अपने कलम को रोक नहीं सका था और उसकी वीरता के कारनामे को कलमबद्ध कर दिया था।

मृत्युंजय शीर्षक से उसकी यह वीरगाथा मेरी पुस्तक दलित विमर्श और डॉ.अम्बेडकर: एक प्रासंगिक हस्तक्षेप में संकलित है। इसे कई पत्रिकाओं ने भी प्रकाशित किया था। वह जिस चमत्कारिक ढंग से मौत के मुँह से वापस आया था, उसको देखते हुए वह मृत्युंजय नाम का स्वाभाविक अधिकारी हो गया था और मैंने स्वतःस्फूर्त ढंग से उसका यही नामकरण कर दिया था। आपको अंदाजा लग गया हो तो ठीक है वर्ना मैं इस बात से पर्दा उठाये देता हूँ कि मृत्युंजय मेरे मेल पामेरियन का नाम था जो अब इस दुनिया में नहीं रहा। मेरी पामेरियन फीमेल ‘चेरी’ ने दिनांक 13 अप्रैल 2010 को लगभग सात-साढ़े सात बजे सायंकाल चार बच्चे जने थे उनमें एक वह  भी था जो दूसरे दिन मेरे पैरों के नीचे दबकर मृतप्राय हो गया था लेकिन मौत को परास्त करके वापस ज़िन्दगी में लौट आया था।

[bs-quote quote=”मेरा अपराधबोध कहिये या उसके प्रति विशेष लगाव कि मुझे उसकी इस तथाकथित कुरूपता में एक दिलकश खूबसूरती नज़र आने लगी। एक अलग तरह का नूर उसके चेहरे से टपकता हुआ दिखाई देने लगा। हो भी क्यों न! जो हमारा प्रिय होता है उसकी सारी कमियाँ भी हमारे लिये ख़ास हो जाती हैं। मैं उसके मोहपाश में बुरी तरह बँध गया था और इसी वजह से मन ही मन उसे अपने पास ही रखने की मंशा पाल बैठा।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

इस घटना के बाद से न जाने कितना पानी गंगा-जमुना में बह गया होगा। शनैः-शनैः बच्चे बड़े होते गये और परिचितों में बँट भी गये लेकिन मृत्युंजय को मैंने अपने पास ही रखने का निर्णय लिया। वह बच तो गया था लेकिन उसकी एक आँख की रोशनी चली गयी थी और सिर भी टेढ़ा हो गया था। जब वह भौंकता था तो उसका एक कान नीचे की ओर झुक जाता था और चेहरे की बनावट अजीब विद्रूप हो जाती थी। सामान्यजन की भाषा में उसे कुरूप कहा जा सकता है।

मैं अन्दर ही अन्दर इसके लिये स्वयं को ही दोषी मानता था और उसको लेकर एक अपराधबोध सा मेरे अन्दर घर कर गया था। मेरा अपराधबोध कहिये या उसके प्रति विशेष लगाव कि मुझे उसकी इस तथाकथित कुरूपता में एक दिलकश खूबसूरती नज़र आने लगी। एक अलग तरह का नूर उसके चेहरे से टपकता हुआ दिखाई देने लगा। हो भी क्यों न! जो हमारा प्रिय होता है उसकी सारी कमियाँ भी हमारे लिये ख़ास हो जाती हैं। मैं उसके मोहपाश में बुरी तरह बँध गया था और इसी वजह से मन ही मन उसे अपने पास ही रखने की मंशा पाल बैठा। लेकिन वह मंशा ही क्या जो किसी व्यक्ति के मन के अनुसार पूरी हो जाये। मेरी मंशा भी घुटकर रह गयी। अपने निर्णय के विपरीत मैं बहुत दिनों तक उसको अपने पास नहीं रख सका। आदमी और पशु में शायद यही मूलभूत अन्तर है कि आदमी एक दूसरे के प्रति विद्वेष का भाव रखते हुए भी साथ-साथ रहने के लिये समझौता कर सकता है और करता भी रहता है लेकिन पशु तो अपनी प्रकृति के अनुरूप ही जीता है।

तीनों बच्चे बँट गये थे। मृत्युंजय भी जवान हो गया था लेकिन अपने बाप की नज़रों में वह उसका प्रतिस्पर्धी बन गया था। यद्यपि पशुओं में आदमियों की तरह रिश्ते परिभाषित नहीं होते और उनके बीच केवल नर और मादा का ही रिश्ता होता है लेकिन जब हम उन्हें पालते हैं तो उनके बीच के रिश्तों को अपनी ही तरह देखने के आदी हो जाते हैं। उसके बाप का नाम ‘टफी’ था। दोनों बाप-बेटे में टकराव बढ़ने लगा। यद्यपि मृत्युंजय टफी का बहुत लिहाज़ करता था लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है। धैर्य की भी। जीवमात्र में यह गुण एक समान होता है। लिहाज़ा मृत्युंजय भी कभी-कभी उग्र हो जाता और यह उग्रता इतनी बढ़ जाती कि लगता दोनों में खून-खराबा हो जायेगा। मजबूरन मैं उसे अपने पास से हटाने के बारे में सोचने लगा। सवाल वही उठा कि किसको दूँ। काफी सोच-विचार के बाद मैंने यह निर्णय लिया कि उसे अपने साढू के पास रख दूँ। मेरे घरवालों को भी इस पर कोई आपत्ति नहीं थी। मेरे साढू का नाम विकास चन्द्र सोनकर है और उनकी पत्नी का नाम कुसुम सोनकर। उनका आवास गौतम गार्डेन में है जो मेरे आवास के पास ही है लेकिन उनके सामने एक कठिनाई थी। वे दोनों पति-पत्नी सेवारत हैं और घर में कोई अन्य व्यक्ति नहीं है। इसलिये वह उसे ले जाने में झिझक रहे थे। बहरहाल काफी जद्दोजहद के बाद वह तैयार हो गये और उसे अपने साथ ले गये। मृत्युंजय चला गया और मेरे दिल का वह कोना जहाँ वह आबाद था एकदम सूना हो गया। शुरू-शुरू में मैं अक्सर उसको देखने चला जाता। वह बड़े उछाह से मुझसे मिलता। उछल कर मेरी गोद में चढ़ जाता। हम दोनों एक दूसरे को खूब-खूब प्यार करते और इस क्रम में अपने-अपने दर्द की मौन हिस्सेदारी भी करते।

धीरे-धीरे वह अपने नये माहौल में रचने-बसने लगा और मेरे जाने के फ्रीक्वेंसी भी कम होते-होते लगभग समाप्त हो गयी लेकिन मेरी जगह एक दर्द उसका स्थाई साथी हो गया। वह था उसका एकाकीपन। पति-पत्नी दोनों नौ-साढ़े नौ बजे घर से निकल जाते और सायंकाल सात-साढ़े सात बजे या कभी-कभी उसके बाद भी वापस लौटते। अनेक बार ऐसा भी अवसर आता कि किसी पारिवारिक आयोजन के कारण वे रात में भी बाहर रहते। पूरा-पूरा दिन और कभी-कभार पूरी रात वह अकेले कैसे गुजारता होगा, अब उसके जाने के बाद यह सोचकर कलेजा मुँह को आ जाता है। पड़ोसी मेरे साढू या उनकी पत्नी से बताते कि आपका कुत्ता बहुत रोता है। यह बात मेरे कानों तक भी आती थी। सुनकर मैं तब विचलित नहीं होता था, लेकिन अब महसूस होता है कि वह किस यातना से गुज़र कर अपनी तनहाई गुज़ार रहा था। पता नहीं क्या गुज़रती होगी इस तनहाई में उसके ऊपर। सचमुच हम किसी के बारे में बहुत सी बातें उसके जाने के बाद जान पाते हैं। उसके उस एकाकीपन के दर्द का अनुभव मुझे अब हो रहा है। वह निश्चित ही इसे भोगने के लिये नहीं पैदा हुआ था। कोई भी तनहाई को भोगने के लिये नहीं पैदा होता क्योंकि तनहाई जानलेवा होती है और कोई जान देना नहीं चाहता।

[bs-quote quote=”मैं फूट पड़ा और आज भी उसकी यादें बहुत तड़पाती हैं मुझे। मौतें बहुत हुईं। मेरे माँ-बाप मरे, मेरा छोटा भाई भी मौत की दौड़ में मुझसे आगे निकल गया। खानदान में अनेक मौतें हुईं। कई मित्र भी साथ छोड़ गये। भावनाएँ लहू-लुहान हुईं। रिश्ते इतिहास के पन्नों में दर्ज हुए। लेकिन एक बात ऐसी थी जिसने इन मौतों पर मुझे बहुत ग़मज़दा नहीं होने दिया। वह बात थी, अपनी नौकरी के सिलसिले में लगातार घरवालों से कटा रहना लेकिन मेरे पेट्स तो हमेशा मेरे साथ ही रहे। यहाँ तक कि मेरी दिनचर्या को नियंत्रित और नियमित करने लगे।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

मेरा मृत्युंजय शायद तनहाई को झेलते- झेलते झेल नहीं पाया और जब शेयर करने के लिये मैं उपलब्ध हुआ तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी। उसकी बीमारी ही उसका इलाज बन चुकी थी और जब वास्तविक इलाज मिला तो जैसे ज़हर मिल गया। मौत को ठोकर मार कर भगाने वाला वह वीर शायद अपनी तनहाई से ऊब कर मौत को ही अपनी प्रेयसी की तरह प्यार करने लगा था और उसे गले लगाने के लिये मेरी गोद की दरकार थी। वह मुझसे छुपाकर नहीं बल्कि खुल्लमखुल्ला उसका वरण करना चाह रहा था। वह मेरे पास लौटने के इंतज़ार में मौत से मोहलत माँग रहा था और जब लौटा तो अपनी प्रेयसी को अपना लिया। यह एक अद्भुत प्रेम-कहानी की मिसाल है। हाँ, मुझे एकदम से झटका न लगे, इस औपचारिकता को भी निभाना नहीं भूला और कुछ महीने मेरे साथ भी गुज़ारे। क्या यह उसका मेरे प्रति मूक विद्रोह था जिसकी परिणति अन्ततः जीवन से विरक्ति और मौत के वरण में हुई? क्योंकि वह केवल सात साल का ही हुआ था जो उसके जाने की आयु कदापि नहीं थी।

मेरे ‘टफी’ की आयु ग्यारह वर्ष से ऊपर हो चुकी थी। मैं उसे बहुत प्यार से रखता था। काफी देख-भाल करता, फिर भी वह अक्सर बीमार पड़ जाता। उसका इलाज कराता और वह ठीक भी हो जाता। मेरे कुछ मित्रों के पास उससे अधिक आयु के पेट्स थे जो अभी भी हैं। डॉक्टर भी मुझे आश्वासन देते कि अभी इसको कुछ नहीं होगा। उनके आश्वासन से मैं मुतमईन था लेकिन एक बार वह इतना बीमार पड़ा कि कोई भी डॉक्टर उसे बचा नहीं पाया और 21 अगस्त 2016 को वह  मेरी बाँहों में सदा के लिये सो गया।

मैं फूट पड़ा और आज भी उसकी यादें बहुत तड़पाती हैं मुझे। मौतें बहुत हुईं। मेरे माँ-बाप मरे, मेरा छोटा भाई भी मौत की दौड़ में मुझसे आगे निकल गया। खानदान में अनेक मौतें हुईं। कई मित्र भी साथ छोड़ गये। भावनाएँ लहू-लुहान हुईं। रिश्ते इतिहास के पन्नों में दर्ज हुए। लेकिन एक बात ऐसी थी जिसने इन मौतों पर मुझे बहुत ग़मज़दा नहीं होने दिया। वह बात थी, अपनी नौकरी के सिलसिले में लगातार घरवालों से कटा रहना लेकिन मेरे पेट्स तो हमेशा मेरे साथ ही रहे। यहाँ तक कि मेरी दिनचर्या को नियंत्रित और नियमित करने लगे। मेरे खालीपन को भरने लगे। सो, उनका जाना मुझे तोड़ने के लिये ज़रूरत से अधिक होता। टफी हो या मृत्युंजय, उनका जाना मात्र जाना भर नहीं है।

उनका जाना मेरे खालीपन का स्थायीकरण है। मेरी आयु भी इकहत्तर साल की हो गयी और बुढ़ापा अपने आप में एक अपरिभाषित गड्ढा होता है अर्थात् वहाँ खालीपन के लिये तो पर्याप्त स्थान रहता है लेकिन उसे भरनेवाले कभी- कभार ही मिलते हैं। आँसुओं की भूमिका को परिभाषित करने के लिये सुराग शायद यहीं मिलता है और हमेशा पास में मंडराते हुए पालतू पशुओं के महत्व का पता भी यहीं मिलता है। लेकिन माँ-बाप का जाना भी कम दुखदायी नहीं रहा। उनका जाना उस बट वृक्ष का ढह जाना था जिसकी छाया निरापद सरपरस्ती की भूमिका में रहती है, इसलिये उनके जाने से मैं स्वयं को निरीह भी समझता हूँ। और वह खलिश किसी काँटे की तरह मेरे सीने में चुभती भी रहती है लेकिन अपने पालतू पशु तो उन औलादों की तरह होते हैं जो सिर्फ प्यार के अलावा और किसी सम्पत्ति पर अपनी दावेदारी नहीं ठोंकते और प्यार पाने के लिये भी कोई जोर-ज़बरदस्ती नहीं करते। पता नहीं यह जीवन का मनोविज्ञान है अथवा दर्शनशास्त्र ? यह भी पता नहीं है कि यह जीवन को परिभाषित करने में कोई मदद करता है अथवा नहीं क्योंकि जीवन अपने आप में अत्यन्त जटिल है ?

लेकिन एक बात सच है। दुनिया में कोई भी चीज़ निरपेक्ष नहीं होती। दुःख भी नहीं होता। टफी के जाने ने मृत्युंजय की घरवापसी के रास्ते खोल दिये। घर के बच्चे और खासकर मेरी बेटी, मृत्युंजय को वापस लाने की जिद करने लगे। मृत्युंजय के अकेलेपन को लेकर सभी बच्चे चिन्तित रहते थे लेकिन जिस  परिस्थिति में उसे घर से अलग करना पड़ा था, उसके रहते कोई भी उसे लाने के लिये कह नहीं पाता था। उधर मृत्युंजय अपने एकाकीपन को रो-रो कर भरता था और इधर टफी के वियोग में चेरी ने खाना-पीना छोड़ रखा था।

बच्चे मृत्युंजय को लाने की जिद कर रहे थे और मेरे साढू तथा उनकी पत्नी का मन उसमें इतना हिलग गया था कि वे उसे लौटाने के इच्छुक नहीं लग रहे थे। सबसे बड़ी अड़चन उनका पाँच वर्षीय बेटा था जो मृत्युंजय के बाद पैदा हुआ था लेकिन इसके बावजूद उसकी घरवापसी हो गयी। वह संभवतः अक्टूबर के महीने में, जो कि अब मुझे ठीक से याद नहीं है, मेरे पास लौट आया। चेरी भी खुश हो गयी और मृत्युंजय भी खुश हो गया। दोनों को एक दूसरे की कंपनी मिल गयी। चेरी की मनोदशा में भी एकदम से सुधार आ गया। उसने खाना-पीना शुरू कर दिया। मृत्युंजय की भी भूख जग गयी। मार्च तक का पूरा जाड़ा हँसी-ख़ुशी बीत गया लेकिन अप्रैल की शुरुआत से ही मुझे ऐसा लगने लगा कि मृत्युंजय कुछ अवसाद में रहने लगा है।

मैं गाहे-बगाहे अपनी वाइफ से इसका ज़िक्र भी करता और कहता कि मृत्युंजय मनुष्य की तरह व्यवहार कर रहा है। वह न जाने क्यों अवसादग्रस्त रहता है लेकिन इसको लेकर मैं ज्यादा परेशान नहीं हुआ क्योंकि उसकी दिनचर्या लगभग उसी तरह बनी रही। वह खाता-पीता था और आहट मिलने पर भौंकता भी था लेकिन धीरे-धीरे उसका अवसाद उसकी सुस्ती में बदलता गया और शरीर कमजोर होता गया। स्थिति यहाँ तक आयी कि उसके शरीर में मात्र हड्डियाँ रह गयीं। मैंने अपने नियमित डॉक्टर को बुलाया। उनकी भी समझ में कुछ नहीं आया।

बहरहाल, उन्होंने कीड़े की दवा के साथ कुछ और दवाएँ भी दीं। मेरे यह बताने पर कि उसे ओरल दवा देना मुमकिन नहीं है, उन्होंने इंजेक्शन भी लगाया लेकिन उसकी हालत नहीं सुधरी। खाना-पीना तो उसने कई दिन पहले से ही छोड़ रखा था, इसके बावजूद लगातार उल्टियाँ भी करने लगा था। मुझे डी.एन.यादव की याद आयी। इनके विषय में मुझे डॉ.महेन्द्र प्रताप सिंह से जानकारी मिली थी।

क्रमशः

मूलचन्द सोनकर हिन्दी के महत्वपूर्ण दलित कवि-गजलकार और आलोचक थे। विभिन्न विधाओं में उनकी तेरह प्रकाशित पुस्तकें हैं 19 मार्च 2019 को उन्होंने इस संसार को अलविदा कहा।

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2 COMMENTS

  1. बहुत बढ़िया मर्मस्पर्शी संस्मरण। स्व. मूलचंद सोनकर जी ने बहुत डूबकर यह भावपूर्ण संस्मरण को लिखा है जिसकी प्रवाहमयता और संवेदनात्मक संश्लिष्टता पाठक को न केवल बांध कर रखती है बल्कि उसके दिल में उतर जाती है।

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