पटना के एम्स में चाहिए इलाज तो देना होगा वीवीआईपी होने का प्रमाण (डायरी 3 नवंबर, 2021) 

नवल किशोर कुमार

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यह एक मजदूर की दास्तान है और वह भी असंगठित क्षेत्र के मजदूर की जो रिश्ते में मेरा चचेरा भाई भी है। उम्र में मुझसे करीब 7-8 साल बड़ा। नाम है– पप्पू कुमार। अभी हाल ही में इन्होंने अपने एक भाई मुन्ना को झारखंड के रामगढ़ में सड़क दुर्घटना में खोया है। कल शाम को जानकारी मिली कि पप्पू भैया भी दो मंजिले मकान से गिर गए। यह जानकारी दी मेरे सगे बड़े भाई कौशल किशोर कुमार ने। उन्होंने बताया कि पप्पू भैया बेऊर जेल के पास किसी मकान की पुताई कर रहे थे। इसी दौरान उनका संतुलन बिगड़ा और गिर पड़े। शरीर में अधिक कुछ निशान तो नहीं हैं, लेकिन सिर में चोट लगी है।

भैया ने जानकारी दी कि पप्पू भैया को पटना के एम्स में लाया गया है। एम्स में उन्हें दाखिला भी मिल गया और इलाज भी शुरू हो गया। परंतु, एक घंटे बाद ही उन्हें कहा जा रहा है कि एम्स, पटना में उनके इलाज के लिए आवश्यक आईसीयू में खाली बेड नहीं है। अस्पताल के कर्मियों के मुताबिक अस्पताल में आईसीयू की कोई कमी नहीं है, लेकिन वह वीवीआईपी यानी अत्यंत ही महत्वपूर्ण लोगों के लिए आरक्षित है। भैया ने मुझे फोन भी इसी मकसद से किया ताकि मैं अपने स्तर पर कुछ कर सकूं ताकि पप्पू भैया का इलाज एम्स में हो।

मेरे जेहन में बिहार के राजनीतिक सवाल नहीं हैं। फिलहाल तो मैं अपने घर के एक सदस्य पप्पू भैया के बारे में सोच रहा हूं जो कि इसी बिहार के नागरिक हैं और मजदूर हैं, जिनके लिए पटना के एम्स में आईसीयू का कोई बेड खाली नहीं है। उनके परिजनों ने उनके इलाज पर बीते दो दिनों में करीब ढाई लाख रुपए खर्च कर दिए हैं।

मुझे लगा कि भैया कुछ अतिश्योक्ति कर रहा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी मरीज को एम्स में दाखिला मिल जाय और उसका इलाज भी शुरू हो जाय और उसके बाद उसे यह कहा जाय कि अस्पताल में उसके लिए जगह ना हो। मैंने भैया से कहा कि क्या डाक्टरों ने रेफर का कागज दिया है? जवाब मिला– हां। सबूत के तौर पर भैया ने एम्स के डाक्टरों द्वारा लिखे गए रेफरनामे की प्रति भेज दी।

डॉक्टर्स द्वारा दी गई रेफ़र पर्ची

रेफरनामे में इस बात का स्पष्ट विवरण है कि मरीज पप्पू कुमार को ‘निदान’ नामक एक निजी अस्पताल के द्वारा रेफर किया गया, जहां वह 1 नवंबर, 2021 को भर्ती किया गया था। इसके आधार पर एम्स, पटना के टॉमा सेंटर में उसे 2 नवंबर को दोपहर करीब एक बजे भर्ती किया गया। वर्तमान में मरीज अचेतावस्था में है और उसकी स्थिति गंभीर है।

रेफरनामे में इस बात का भी उल्लेख है कि मरीज को जब भर्ती कराया गया था तब उसे वोमेटिंग, नाक-कान से खून का बहने आदि की समस्या थी। रेफरनामे में लिखा गया कि मरीज को दाखिल करने की आवश्यकता है। लेकिन अभी अस्पताल के आईसीयू में जगह खाली नहीं है। इसलिए मरीज को पीएमसीएच या आईजीआईएमएस ले जाने की सलाह दी जाती है। रेफरनामे के अंत में लिखा है– रिग्रेट, जिसका मतलब है कि खेद है।

फिलहाल मैं पटना से प्रकाशित दैनिक भास्कर को देख रहा हूं। इसमें चुनाव परिणाम को महत्ता दी गयी है। नीतीश कुमार ने सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन यह जरूर कहा है कि जनता ने उनके तथाकथित कामों को देखकर वोट किया है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने लालू प्रसाद पर कटाक्ष किया है कि अब उन्हें यानी लालू प्रसाद को समझ में आ गया होगा कि बिहार के मुसहर किसकी तरफ हैं।

रेफरनामे को पढ़ने के बाद मैंने भैया को फोन किया और पूछा कि क्या वाकई में पप्पू भैया की वही हालत है जो कि रेफरनामे में लिखा है? जवाब मिला कि नहीं। हालांकि सिर में चोट जरूर है, लेकिन वह अचेत नहीं हैं। अपने हाथ-पांव हिला रहे हैं। वह बात भी कर रहे हैं। लोगों को पहचान रहे हैं। भैया के मुताबिक, यह एम्स की बदमाशी है। भैया ने वीडियो कॉल के जरिए मरीज पप्पू भैया को दिखाया। मुझे भी लगा कि रेफरनामे में लिखी गयी आधी से अधिक बात तो गलत है।

खैर, मैंने सत्ता पक्ष के एक बड़े नेता जो कि मेरे परिचित हैं, को फोन किया। जब फोन किया तब वे कल कुशेश्वरस्थान विधानसभा क्षेत्र में हुए उपुचनाव में दल के प्रत्याशी को मिली जीत का जश्न मना रहे थे। उन्होंने कहा कि देर रात में बात कर सकेंगे। फिर मैंने विपक्ष के एक बड़े धाकड़ नेता को फोन किया तो वे मुंगेर के तारापुर में थे जहां वोटों की गिनती जारी थी और तब उनके दल के प्रत्याशी को बढ़त हासिल थी। उन्होंने कहा कि वे अभी मुंगेर में हैं, इसलिए अभी कुछ नहीं कर सकते।

तो इस तरह मेरे पास कोई उपाय नहीं था जिससे कि मैं एक मजदूर मरीज को वीवीआईपी बना सकता था। नतीजतन मेरे परिजनों ने पप्पू भैया को एम्स से बाहर किए जाने के बाद एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। फिलहाल उनकी हालत कैसी है, इसकी जानकारी नहीं है। हालांकि यदि कोई विषम परिस्थिति होती तो सूचना मिल ही जाती।

मैं तो यह सोच रहा हूं कि क्या एक मजदूर को आईसीयू में केवल इसलिए जगह नहीं दी जा सकती है क्योंकि वह वीवीआईपी नहीं है? और यदि ऐसा है तो फिर एम्स के होने का मतलब क्या है?

बहरहाल, कल सत्तासीन जदयू को दोहरी सफलता मिली। कुशेश्वरस्थान और तारापुर में जदयू प्रत्याशी को जीत हासिल हुई है। इसमें कुशेश्वरस्थान में विजेता रहे प्रत्याशी को मिली जीत अनुकंपा की जीत है, क्योंकि यह सीट उनके पिता के मरने के बाद खाली हुई थी। वहीं तारापुर में राजद प्रत्याशी ने कड़ी टक्कर दी और अंतिम राऊंड में करीब 3500 मतों के अंतर से हार गए।

फिलहाल मैं पटना से प्रकाशित दैनिक भास्कर को देख रहा हूं। इसमें चुनाव परिणाम को महत्ता दी गयी है। नीतीश कुमार ने सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन यह जरूर कहा है कि जनता ने उनके तथाकथित कामों को देखकर वोट किया है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने लालू प्रसाद पर कटाक्ष किया है कि अब उन्हें यानी लालू प्रसाद को समझ में आ गया होगा कि बिहार के मुसहर किसकी तरफ हैं। दरअसल राजद ने तारापुर से एक मुसहर जाति के व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाया था। जीतनराम मांझी भी मुसहर जाति के हैं। उन्होंने लालू प्रसाद से कहा है कि अब वे यानी लालू प्रसाद मुसहरों को टिकट देकर ठग नहीं सकते।

इस चुनाव को कांग्रेस के लिहाज से भी खूब प्रचारित किया गया। पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण के एक वरिष्ठ पत्रकार ने करीब 15 दिनों पहले मुझे उनके स्वजातीय कन्हैया कुमार पर लिखने को कहा था। तब मैंने उन्हें इतना ही कहा था कि लालू प्रसाद ने बिहार में सवर्णों की हालत मजबूरों वाली कर दी है। फिर चाहे वह कन्हैया कुमार हों या ललन सिंह।

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बहरहाल, मेरे  जेहन में बिहार के राजनीतिक सवाल नहीं हैं। फिलहाल तो मैं अपने घर के एक सदस्य पप्पू भैया के बारे में सोच रहा हूं जो कि इसी बिहार के नागरिक हैं और मजदूर हैं, जिनके लिए पटना के एम्स में आईसीयू का कोई बेड खाली नहीं है। उनके परिजनों ने उनके इलाज पर बीते दो दिनों में करीब ढाई लाख रुपए खर्च कर दिए हैं।

उम्मीद है कि वह ठीक होंगे और जल्द ही मरीज से मजदूर बनेंगे। और बिहार में नीतीश कुमार गाल बजाते रहेंगे। तेजस्वी उनके राज को कोसते रहेंगे। जीतनराम मांझी, ललन सिंह, नीरज कुमार, संजय झा, अशोक चौधरी लालू यादव को गालियां देते रहेंगे।

कल एक कविता जेहन में आयी। मैंने भेड़िया और भेड़ शब्द का उपयोग किया है। भेड़ बिहार की जनता है और भेड़िया कौन है, यह तय भी बिहार की जनता ही करे।

हर जीत के बाद

भेड़िया अट्टहास करता है।

और भेड़ें

मुंह देखती हैं।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

 

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