अपनी परिभाषा बदल रहे हैं स्वदेशी तानाशाह (डायरी : 26 जुलाई, 2021)

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आदमी समय का दास होता है। अमूमन यही कहा जाता है जब कोई उतार-चढ़ाव आता है। खासकर तब जब आदमी के ऊपर कोई संकट हो या उसका कोई बड़ा अहित हुआ हो। सांत्वना देने वाले इसी वाक्य का उपयोग करते हैं कि समय बहुत बलवान होता है। परिस्थितियां हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं। ऐसे ही अनेक वाक्य हैं। मेरे जेहन में देश है। देश यदि संकट में हो तो किस तरह के वाक्यों का इस्तेमाल किया जात सकता है। एक तो यही कि कुछ भी स्थायी नहीं होता। देश बेशक अभी संकट के दौर से गुजर रहा है, यह दौर भी खत्म होगा।

मैं यह सोच रहा हूं कि मौजूदा समय में देश के जो हालात हैं, क्या इसकी कल्पना डॉ. आंबेडकर सहित हमारे देश के उन नेताओं ने किया था, जिन्होंने धर्मनिरपेक्ष व लोक कल्याण्कारी राष्ट्र की बुनियाद रखी? मेरा जन्म आपातकाल के बहुत बाद में हुआ है। आपातकाल को लेकर मेरे पास कहानियां हैं। इनमें से अधिकांश कहानियां उनकी हैं, जो आरएसएस से जुड़े रहे हैं। चूंकि आरएसएस को मैं एक आतंकवादी संगठन मानता हूं तो उससे जुड़े लोगों के द्वारा रचे गए साहित्य पर यकीन नहीं करता। हालांकि इस बात से सहमत हूं कि इंदिरा गांधी के माथे पर एक समय तानाशाही का भूत चढ़ा, जिसे भारतीय जनता ने शांत कर दिया। इसका एक दूसरा पक्ष यह भी है कि चूंकि इंदिरा गांधी ऐसे परिवार की सदस्या थीं, जो लोकतंत्र का समर्थक था। उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू को हमेशा भारत के निर्माता के रूप में याद किया जाएगा। यह मुमकिन है कि सियासती लोकलाज इंदिरा गांधी को इस कारण मिला होगा और इसी लोकलाज के कारण उन्होंने देश में अपनी तानाशाही खत्म की।

दिलचस्प यह कि संसद में सरकार ने न तो जासूसी करवाने की बात कबूली है और ना ही इंकार किया है। यह सब वह डंके की चोट पर कर रही है। मैं आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आसाम में दिए गए भाषण के बारे में सोच रहा हूं।

मैं यह बात इसलिए सोच रहा हूं क्योंकि इंदिरा गांधी आपातकाल के दिनों सर्वशक्तिमान थीं। पूरे तंत्र पर उनका कब्जा था। वह चाहतीं तो बड़े आराम से इमरजेंसी को जारी रख सकती थीं। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने लोकतंत्र को पुनर्स्थापित किया और यह जानते हुए भी कि उनकी हार तय है। और यही हुआ भी। 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी बुरी तरह से हार गयीं और उन्होंने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करते हुए देश की बागडोर मोरारजी देसाई को सौंप दिया। इसके तीन साल के बाद यानी 1980 में जब चुनाव हुए तो देश की जनता ने इंदिरा गांधी में फिर विश्वास व्यक्त किया।

इस वजह से मैं इंदिरा गांधी को तानाशाह नहीं मानता। मैं लालू प्रसाद को भी तानाशाह नहीं मानता। यह इसके बावजूद कि उनके राज में उनकी पत्नी के भाइयों ने बिहार में खूब आतंक मचाया। रणवीर सेना भी इसलिए सिर उठा सकी क्योंकि लालू प्रसाद ने उसे ऐसा करने दिया। यदि लालू प्रसाद चाहते तो रणवीर सेना का फन शुरुआत में ही कुचला जा सकता था। लालू प्रसाद ने बिहार में उच्च शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया। रंजन यादव नामक एक नेता को इसका सर्वेसर्वा बना दिया और रंजन यादव ने पटना विश्वविद्यालय सहित बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में गंद मचाकर रख दिया। उसके पुण्य प्रताप से आज अनेक प्रोफेसर आदि हैं। कई तो जदयू के माननीय भी हैं। स्वयं रंजन यादव ने लालू प्रसाद को वर्ष 2009 में हरा दिया।

मैं बिहार के बारे में सोच रहा हूं। बीते 23 मार्च, 2021 को बिहार विधानसभा में सशस्त्र पुलिसकर्मियों ने विपक्षी सदस्यों के साथ मारपीट की और पूरा देश देखता रह गया। मेरे हिसाब से यह तानाशाही की पराकाष्ठा थी। अभी दो दिन पहले बिहार विधानसभा के एक सदस्य से बात हो रही थी। उनके मुताबिक विधानसभा की आचार समिति कार्रवाई करने का मूड बना चुकी है। इस समिति में भाजपा के तीन सदस्य हैं तथा राजद व जदयू से एक-एक। मैंने पूछा कि क्या समिति इस बात पर भी विचार कर रही है कि किसके कहने पर सदन के अंदर पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया और किसका संकेत पाकर विधायकों के साथ मारपीट की गयी थी।

दिलचस्प यह कि जिस दिन बिहार विधानसभा के अंदर नीतीश कुमार की सरकार ने विधायकों को पिटवाया, उस दिन बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक 2021 को सदन के पटल पर रखा गया था। विपक्षी सदस्य इसे काला कानून बता रहे थे। उनके मुताबिक, यह कानून योगी सरकार के गुंडा एक्ट और नरेंद्र मोदी सरकार के यूएपीए के समान है। चूंकि मौजूदा बिहार विधानसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संख्यात्मक फासला बहुत कम है, इसलिए इस बात की पूरी संभावना थी कि यह विधेयक पारित नहीं हो पाता। विधानसभा हो अथवा संसद, सदस्य हंगामा करते ही हैं। यह कोई नई बात नहीं थी।

फिलहाल जो जानकारी मेरे पास है, उसके हिसाब से बिहार विधानसभा के अध्यक्ष राजद के दो विधायकों के ऊपर गाज गिराएंगे और निश्चित तौर पर स्वयं को पाक साफ बताएंगे।

एक सूचना दिल्ली से है। राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने पैगासस प्रकरण को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है। मैं सोच रहा हूं कि क्या संसद को इस पूरे मामले पर विचार नहीं करना चाहिए कि जासूसी किसने करवायी है‍? दिलचस्प यह कि संसद में सरकार ने न तो जासूसी करवाने की बात कबूली है और ना ही इंकार किया है। यह सब वह डंके की चोट पर कर रही है। मैं आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत द्वारा आसाम में दिए गए भाषण के बारे में सोच रहा हूं। वे यह कह रहे हैं सीएए और एनआरसी से किसी को डरने की जरूरत नहीं है। जबकि सच तो यही है कि सीएए और एनआरसी देश की धर्मनिरपेक्षता को ध्वस्त करने की साजिश है।

कुल मिलाकर यह कि तानाशाही के रूप बदले हैं। मौजूदा तानाशाह इतने निर्लज्ज हैं कि उन्हें आलोचनाओं की परवाह नहीं होती। मैं लोकतंत्र को लेकर चिंतित हूं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

1 Comment
  1. नवल किशोर जी आप बहुत सी तथ्यात्मक और बेबाकी से लिखते हैं । आपका लेखन मुझे बहुत पसंद आता है । बहुत बधाई आपको

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