इतनी खूबसूरत यात्रा के खत्म होने से मन उदास हो जाता है

विनय कुमार

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अंतिम कड़ी

अब रात के ग्यारह बजे इतनी ठण्ड में क्या होगा, पंचर बनेगा या रात यहीं गुजारनी पड़ेगी इसकी चिंता सबको सताने लगी। खैर ड्राइवर ने किसी तरह स्टेपनी निकाली, पहिया बदला और लगाकर आगे चल पड़ा।

लोगों से बातचीत करके और इसके पहले के हिमाचल के अनुभव से मुझको इस बात का अंदाजा तो था कि रास्ता पूरा पहाड़ी होगा और काफी उतार-चढ़ाव से गुजरना होगा। रात को कार या टैक्सी के सफर में मुझे नींद नहीं आती है और मैं बाहर देखने का असफल प्रयास करते हुए जगा रहा। अँधेरे में बहुत कुछ तो नहीं दिख रहा था लेकिन सामने की सड़क और ऊबड़-खाबड़ रास्ता दिखाई दे रहा था। उन लड़कों ने झन्नाटेदार पंजाबी गाने लगा दिए थे और सफर मजे में कट रहा था।ढाबे से निकलते ही मैंने भतीजी को फोन कर दिया कि हम दोनों टैक्सी से चम्बा के लिए निकल गए हैं। हमको उम्मीद थी कि तक़रीबन भोर 3 बजे हम लोग चम्बा पहुँच जायेंगे और भतीजी और उसके रूम मेट हमें लेने बस स्टैंड आ जायेंगे। गाड़ी सुबह के साढ़े तीन बजे चम्बा बस स्टैंड पहुँच गयी और हम दोनों गाड़ी से उतरे ।

एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ से लगभग 7 किमी नीचे उतरने के बाद एक छोटा क़स्बा है जहाँ से बस मिल जाती है। अब हमें थकावट तो नाम मात्र की भी नहीं थी इसलिए हमने पैदल ही 7 किमी चलने का फैसला किया। सामान भी कुछ नहीं था तो पैदल यात्रा कोई कठिन नहीं थी और रास्ता भी ढलान का था इसलिए हम दोनों पैदल ही अगले पड़ाव की तरफ चल पड़े। एकाध किमी चलने के बाद ही सड़क के किनारे एक जगह दो पहाड़ी महिलाएं बैठकर कुछ खाते दिखाई पड़ीं तो हम उनके पास बात करने पहुँच गए। उन्होंने बताया कि वे मंदिर का प्रसाद खा रही हैं और उन्होंने हमें भी खाने का ऑफर दिया। अब इतनी बेशर्मी भी नहीं थी कि उनके हिस्से का प्रसाद खा जाते लेकिन उन मुस्कुराते चेहरों के साथ एक सेल्फी जरूर ले ली

चंद मिनट में भतीजी और उसके रूममेट आ गए और अगले आधे घंटे में काफी चढ़ाई चढ़ने के बाद दोनों फ्लैट पर पहुंचे। उस समय तो नहीं लगा लेकिन जब फ्लैट पर पहुंचकर थोड़ी सांस में सांस आयी तो लगा कि हिन्दुस्तान में भी ऐसी जगहें हैं जहाँ रात के तीन बजे लड़कियां बड़े आराम से अपने फ्लैट से बस स्टैंड तक बिना परेशानी के जा सकती हैं । और इस विचार के आते ही सफर में हुई अब तक की थकान एक मुस्कान में बदल गयी। नींद तो गहरी आनी ही थी, बड़ी मुश्किल से सुबह आठ बजे नींद खुली। और फिर फटाफट फ्रेश होकर हमने नाश्ता किया और चम्बा घूमने निकल पड़े। कहाँ बनारस और दिल्ली का कंक्रीट का जंगल और कहाँ दूर से दिखते खूबसूरत पहाड़, घूमने का असली मजा ऐसी जगहों पर ही आता है । फ्लैट काफी ऊंचाई पर था और उससे भी काफी ऊपर जाकर रास्ता था जिसपर हम लोग हांफते हुए पहुंचे। भतीजी और उसके दोस्तों की पिछले दो महीने में चढ़ान पर चढ़ने-उतरने की आदत पड़ गयी थी लेकिन हमारी हालत खराब होने लगी। बहरहाल थोड़ा रुकते थोड़ा चलते हम लोग चामुंडा मंदिर की तरफ बढ़े जो सड़क से काफी ऊपर एक पहाड़ी पर था। जैसे-जैसे हम लोग ऊपर पहाड़ी पर चढ़ना प्रारम्भ किये, वैसे-वैसे चम्बा के चारों तरफ के पहाड़ और उनमें से बहती रावी नदी दिखाई पड़ने लगी।  अब हर पांच मिनट पर हम ठहरते, चारों तरफ की खूबसूरती निहारते और फिर ऊपर चढ़ते। इसी सब में हम लोग कब ऊपर मंदिर में पहुँच गए, पता ही नहीं चला। खैर मंदिर तो सब जगह के एक जैसे ही होते हैं लेकिन चामुंडा मंदिर के बाहर बैठकर चम्बा को निहारने में जो अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई, उसका शब्दों में वर्णन करना आसान नहीं । कहाँ मेरा अपना घर बनारस जहाँ अगर शहर में निकल गए तो सिर्फ ट्रैफिक का शोर और प्रदूषण और कहाँ चम्बा। जहाँ न तो ट्रैफिक और न ही कोई प्रदूषण। हाँ बनारस में भी गंगा के किनारे सुबह शाम जाना अपने आप में बहुत सुकूनदायी अनुभव होता है लेकिन शहर आपको हदसा देता है। वहां बैठे-बैठे लगभग एक घंटा होने को आया तो भतीजी ने टोका “चाचा, आज आपको खजियार भी जाना है और वहां आने-जाने में 5 से 6 घंटे लग जाएंगे। इसलिए अब यहाँ से निकलिए।” न चाहते हुए भी वहां से उठना पड़ा और फिर ढलान से उतरते हुए एक बार फिर चम्बा के नैसर्गिक सौंदर्य को हम लोगों ने अपनी निगाहों में भरसक कैद किया। अब चम्बा का बस स्टैंड मंदिर से लगभग 6 किमी दूर था लेकिन रास्ता ढलान वाला था इसलिए पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं हुई। पूरा रास्ता बाजार से होता हुआ गुजरा जहाँ कहीं कोई मंदिर था तो कहीं दुकानें । आधे रास्ते पहुँचने पर एक बड़ा-सा पार्क जैसा मैदान मिला जिसके चारों तरफ दुकानें सजी हुई थीं। लोगों ने बताया कि इसे चौगान कहते हैं और यहाँ पर हर साल मिंजर मेले का आयोजन किया जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस मेले में स्थानीय निवासी रंग बिरंगी वेशभूषा में आते हैं। इस अवसर पर यहां बड़ी संख्या में सांस्कृतिक और खेलकूद की गतिविधियां आयोजित की जाती हैं।

लगभग दो किमी आगे आने पर एक जगह पहाड़ी से पानी की पतली धार गिर रही थी और वहां पर कुछ महिलाएं मूली धो रही थीं । दूर से देखने पर दूधिया चमकती मूलियां हमें जैसे खाने का निमंत्रण दे रही थीं और मैं अपने को रोक नहीं पाया। सड़क के उस तरफ जाकर, जहाँ वे लोग मूलियों को धो रही थीं, मैंने पूछा कि क्या ये मूली आपके खेत की है, तो उन्होंने हाँ में सर हिला दिया। अब उनको भी समझ में आ गया था और मैंने भी अगला सवाल पूछ लिया “क्या ये मूलियां हम ले सकते हैं?” उन्होंने तुरंत हँसते हुए दो मूली मेरी तरफ बढ़ाया। मैंने लेकर उनसे पूछा “कितने पैसे देने होंगे इसके?” यह सुनते ही वह महिला थोड़ा नाराज हो गयी हुए बोली “खाने-पीने की चीजों के पैसे लगते हैं क्या?” अब मेरे पास मूलियों को ले लेने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था।

चौगान को थोड़ी देर देखने के बाद हम लोग बस स्टैंड की तरफ बढे जो वहां से थोड़ी ही दूर पर था । चम्बा का बस स्टैंड किसी भी आम बस स्टैंड की तरह ही था और वहां से बहुत-सी जगह जाने के लिए बसें खड़ी थीं। बस स्टैंड से ही लगी हुई रावी नदी बहती है जिसे देखने का लोभ संवरण करना आसान नहीं था और हम लोग कुछ देर के लिए नदी के किनारे जाकर खड़े हो गए। मन तो वहां से आगे जाने का नहीं हो रहा था लेकिन खजियार भी जाना था जिसे मिनी स्विटज़रलैंड भी कहा जाता है। उसे देखने का आकर्षण इससे भी बड़ा था। तो थोड़ी देर में दोनों एक बस में बैठकर खजियार के लिए निकल पड़े।  पहाड़ी रास्ता, खूबसूरत नज़ारे और स्वच्छ ताज़ी हवा, सफर में थकान तो महसूस ही नहीं होनी थी। खैर लगभग दो घंटे में हम खजियार पहुँच गए, बस से उतरते ही सामने फैला बेहद खूबसूरत हरा भरा घास का मैदान, किनारे की तरफ बड़े बड़े पेड़ और हौले हौले बहती हवाएं, दिल तो मानो बावला सा हो गया। पहले तो एक जगह चाय की टपरी पर एक एक प्याली चाय पी गयी, फिर हम लोग आगे मैदान में बढ़ गए। इसी बीच में घोड़े वाले भी पीछे पड़े कि घोड़े पर खुम लीजिये लेकिन न तो इच्छा थी और न ही ज्यादा समय था हमारे पास। इसलिए हम मैदान में एक बेंच पर आकर बैठ गए और चारो तरफ देखते हुए ताज़ी हवा को अपने फेफड़ों में भरने लगे। कुछ ही मिनट में एक स्थानीय बच्चा एक टोकरी में खरगोश लेकर आया और बोला कि इसके साथ फोटो खिंचवानी है आपको? इतने खूबसूरत और प्यारे खरगोश थे कि क्या बताया जाए, उनसे निगाह हटा पाना मुश्किल था। लेकिन यह सब बच्चों को ही ठीक लगेगा और हमारे साथ तो कोई बच्चा नहीं था इसलिए हमने खरगोश के साथ फोटो खींचाने का इरादा मुल्तवी किया और वहां की खूबसूरती को निहारते रहे। कुछ देर बैठने के बाद हमने पूरे इलाके को घूमकर देखने का फैसला किया। मैदान काफी बड़ा था और बीच में छोटा-सा तालाब भी था जिसके आस पास लकड़ी का पुल बना था।

चंबा का एक मंदिर

अगली सुबह भी वैसी ही ठंडी थी जैसी की पिछले दो दिन की लेकिन आज कुछ उदासी सी थी । इतना जल्दी यह यात्रा समाप्त होने जा रही थी कि बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था । बहरहाल बस से पठानकोट पहुँचने में लगभग 6 घंटे लगने थे और शाम को ट्रैन भी थी । कठुआ में एक दोस्त के यहाँ भी मिलने जाना था इसलिए सुबह 8 बजे ही हम लोग बस स्टैंड निकल गए। भतीजी और उसके दोस्त हमें छोड़ने स्टैंड तक आये और फिर हमारी बस पठानकोट के लिए रवाना हो गयी। आते समय तो हम लोग रात में आये थे इसलिए रास्ते का सौंदर्य देख नहीं पाए थे लेकिन जाते समय तो दिन था इसलिए पूरा रास्ता हम लोग बस बाहर खूबसूरती ही देखते रह गए। पहाड़ी रास्ता, हरियाली, बीच में बहती नदी और खेत, कुल मिलाकर लग रहा था मानो हम सफर नहीं कर रहे बल्कि कोई फिल्म देख रहे हैं। इस सफर में कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि बस धीरे चल रही है या रास्ता लम्बा है, बस यही लगता था कि यह सफर चलता रहे।

कुल मिलाकर बेहद रूमानी वातावरण था और चारो तरफ नौजवान जोड़े एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले घूम रहे थे. हम लोगों ने भी लगभग तीन घंटे वहां बिताए और भोजन के बदले वहां पर नाश्ता ही किया। शाम के लगभग चार बजने जा रहे थे और हमारे बस के लौटने का समय भी हो रहा था तो हम लोग बस स्टैंड की तरफ लौटे। लेकिन वहां जाकर पता चला कि हमारी बस तो चली गयी है और अब सिर्फ टैक्सी ही वापस जाने का सहारा थी। वैसे अधिकांश टैक्सियां तो लोगों को लेकर ही आयी थीं जिन्हें उनके साथ ही वापस जाना था लेकिन कुछ खाली टैक्सियां भी थीं जिन्होंने इतना ज्यादा पैसे मांग लिए कि हमारी हिम्मत जवाब देने लगी। हम लोग इसी उधेड़बुन में थे कि वापस कैसे चला जाए तभी एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ से लगभग 7 किमी नीचे उतरने के बाद एक छोटा क़स्बा है जहाँ से बस मिल जाती है। अब हमें थकावट तो नाम मात्र की भी नहीं थी इसलिए हमने पैदल ही 7 किमी चलने का फैसला किया। सामान भी कुछ नहीं था तो पैदल यात्रा कोई कठिन नहीं थी और रास्ता भी ढलान का था इसलिए हम दोनों पैदल ही अगले पड़ाव की तरफ चल पड़े। एकाध किमी चलने के बाद ही सड़क के किनारे एक जगह दो पहाड़ी महिलाएं बैठकर कुछ खाते दिखाई पड़ीं तो हम उनके पास बात करने पहुँच गए। उन्होंने बताया कि वे मंदिर का प्रसाद खा रही हैं और उन्होंने हमें भी खाने का ऑफर दिया। अब इतनी बेशर्मी भी नहीं थी कि उनके हिस्से का प्रसाद खा जाते लेकिन उन मुस्कुराते चेहरों के साथ एक सेल्फी जरूर ले ली । धीरे धीरे हम लोग ढलान पर मजे में उतरते गए, चारों तरफ का प्राकृतिक नजारा किसी को भी सम्मोहित करने के लिए सक्षम था और हम भी सम्मोहित होने से बच नहीं पाए ।

लगभग दो किमी आगे आने पर एक जगह पहाड़ी से पानी की पतली धार गिर रही थी और वहां पर कुछ महिलाएं मूली धो रही थीं । दूर से देखने पर दूधिया चमकती मूलियां हमें जैसे खाने का निमंत्रण दे रही थीं और मैं अपने को रोक नहीं पाया। सड़क के उस तरफ जाकर, जहाँ वे लोग मूलियों को धो रही थीं, मैंने पूछा कि क्या ये मूली आपके खेत की है, तो उन्होंने हाँ में सर हिला दिया। अब उनको भी समझ में आ गया था और मैंने भी अगला सवाल पूछ लिया “क्या ये मूलियां हम ले सकते हैं?” उन्होंने तुरंत हँसते हुए दो मूली मेरी तरफ बढ़ाया। मैंने लेकर उनसे पूछा “कितने पैसे देने होंगे इसके?” यह सुनते ही वह महिला थोड़ा नाराज हो गयी हुए बोली “खाने-पीने की चीजों के पैसे लगते हैं क्या?” अब मेरे पास मूलियों को ले लेने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। भैया ने मूली खाने से मना कर दिया तो एक मूली वापस लौटाकर हम लोग वापस चल पड़े। अब मेरे हाथ में बड़ी सफ़ेद मूली थी जिसे तोड़कर खाते हुए पैदल सफर बहुत ही शानदार था। एक घंटे में ही हम लोग उस कस्बे में पहुँच गए जहाँ से बस मिलनी थी। बस स्टैंड के पास भी एक हनुमान मंदिर था जहाँ भंडारा चल रहा था । हम लोगों ने भी थोड़ा थोड़ा प्रसाद लिया और फिर बस का इन्तजार करने लगे। थोड़ी देर में ही बस आ गयी और हम उसपर सवार होकर वापस चम्बा की तरफ चल पड़े। चम्बा पहुँचते-पहुँचते रात हो गयी और फिर ठहरने के स्थान पर पहुँचने के लिए काफी चढ़ाई चढ़नी थी। फोन पर बात करके भतीजी भी अपने दोस्तों के साथ चौगान पर पहुँच गयी और फिर हम सब बाजार घूमते हुए वापस कमरे पर आ गए।  खाना बना हुआ था और भूख भी लग गयी थी, फिर सबने जम कर खाना खाया और फिर एक कप चाय पीकर बिस्तर में घुस गए। थोड़ी देर दिन भर की घटनाओं पर बात करने के बाद सब लोग नींद की आगोश में समा गए।

अगले दिन सुबह जल्दी-जल्दी करते हुए भी 8 बज गए। फटाफट नाश्ता करके हम लोग निकल पड़े। आज हमें डलहौजी जाना था जो कि चम्बा से लगभग 50 किमी दूर है । डलहौजी धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित एक बेहद खूबसूरत स्थल है और हम लोग चम्बा से मिनीबस द्वारा वहां के लिए निकले। डलहौजी पहुँचने में लगभग 2 घंटे लग गए और उस समय दिन के 12 बज गए थे।  पहले गाँधी चौक, फिर सुभाष चौक पहुंचे जहाँ पर उस दिन आज़ादी से सम्बंधित एक कार्यक्रम चल रहा था और उसे देखने के लिए हम लोग कुछ देर तक रुके रहे। उसके बाद वहां के बाजार में टहलते हुए कुछ खाया-पिया गया और फिर हम लोग पंचफुल्ला गए। यहाँ पर सरदार भगत सिंह के चाचा सरदार अजित सिंह की समाधि थी जहाँ पर हम लोगों ने थोड़ा समय बिताया। मौसम इतना खुशनुमा था कि डलहौजी में कुछ दिन रुकने की इच्छा हो रही थी लेकिन मज़बूरी यह थी कि अगले दिन हमें वापस यात्रा करनी थी और इस वजह से मन मार कर हम लोग शाम को मिनी बस से ही चम्बा वापस आ गए।रात में चम्बा के बाजार में ही हमने भोजन किया और थोड़ी-बहुत खरीददारी भी की। अब अगर आप कहीं गए हैं और वहां से कुछ ख़रीदा नहीं है तो आपका जाना सफल नहीं माना जाता। खैर रात काफी देर तक हम लोग वहां के बाजार में टहलते रहे, फिर चढ़ाई चढ़कर हम लोग रहने के ठिकाने पर पहुंचे। अगले एक घंटे खूब गपशप हुआ और फिर अगले दिन की यात्रा की तैयारी होने लग।  न तो हमें अच्छा लग रहा था और न ही भतीजी को, इस जगह तो कम से कम एक हफ्ता बिताना चाहिए था। लेकिन तीन दिन की छुट्टी के बाद ऑफिस भी पहुंचना था और अगले दिन शाम को कठुआ से हमारी ट्रैन थी जो बनारस अगले दिन शाम तक पहुंचती।

अगली सुबह भी वैसी ही ठंडी थी जैसी की पिछले दो दिन की लेकिन आज कुछ उदासी सी थी । इतना जल्दी यह यात्रा समाप्त होने जा रही थी कि बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था ।  बहरहाल बस से पठानकोट पहुँचने में लगभग 6 घंटे लगने थे और शाम को ट्रैन भी थी । कठुआ में एक दोस्त के यहाँ भी मिलने जाना था इसलिए सुबह 8 बजे ही हम लोग बस स्टैंड निकल गए। भतीजी और उसके दोस्त हमें छोड़ने स्टैंड तक आये और फिर हमारी बस पठानकोट के लिए रवाना हो गयी। आते समय तो हम लोग रात में आये थे इसलिए रास्ते का सौंदर्य देख नहीं पाए थे लेकिन जाते समय तो दिन था इसलिए पूरा रास्ता हम लोग बस बाहर खूबसूरती ही देखते रह गए। पहाड़ी रास्ता, हरियाली, बीच में बहती नदी और खेत, कुल मिलाकर लग रहा था मानो हम सफर नहीं कर रहे बल्कि कोई फिल्म देख रहे हैं। इस सफर में कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि बस धीरे चल रही है या रास्ता लम्बा है, बस यही लगता था कि यह सफर चलता रहे। 2 बजे के आसपास हम लोग पठाकोट पहुँच गए और फिर वहां से कठुआ। अब दो घंटे बाद हमारी ट्रेन थी इसलिए दोस्त ने फटाफट कुछ खिलाया और फिर हमारे लिए रास्ते का खाना भी पैक करा दिया।  दौड़ते-भागते हम लोग स्टेशन पहुंचे और ट्रेन में सवार हो गए। इस बार हमारी ट्रेन छूटी नहीं, सबसे ज्यादा सुकून इसी बात का था। ट्रेन की यात्रा ठीक ही थी, बस खाते-पीते और कुछ पढ़ते-बतियाते हम अगली शाम मिर्जापुर पहुंचे। वैसे तो हमारा टिकट चुनार तक था लेकिन हमें मालूम था कि चुनार से बनारस के लिए रात में सवारी मिलना मुश्किल था। इसलिए हम लोग मिर्ज़ापुर में ही ट्रेन से उतर गए और फिर वहां के बस स्टैंड पहुंचे। पता चला कि अगले तीन घंटे तक वहां से कोई बस बनारस के लिए नहीं है और अगर बनारस जाना है तो बस स्टैंड से मिर्ज़ापुर के बाइपास तक जाना होगा और फिर वहां से बनारस जाने वाली कोई बस मिल सकती है। अब कोई चारा नहीं बचा था इसलिए हमने एक टेम्पो पकड़ा और भागते हुए हम लोग वहां पहुंचे। वहां रात में सड़क के किनारे लगभग आधे घंटे खड़ा रहना पड़ा फिर बनारस जाने वाली एक बस नजर आयी।  उसे रोका गया और फिर हम लोग बनारस के लिए रवाना हुए। उम्मीद थी कि हम लोग अगले 3 घंटे में बनारस अपने घर पहुँच जाएंगे और हम बस की सीट पर सर टिकाकर सो गए। रात 11 बजे बस बनारस कैंट पहुंची और फिर वहां से टेम्पो पकड़कर हम रात 12 बजे अपने घर पहुंचे। शरीर तो थककर चूर हो गया था लेकिन चम्बा की याद ने हमें महसूस नहीं होने दिया। खैर यह यात्रा, जो कि सुखद थी, रोमांचक थी और नए नए अनुभव सिखाने वाली थी, हमें हमेशा याद रहेगी। लेकिन अगली बार जब चम्बा यात्रा की योजना बनेगी तो कम से कम एक हफ्ते का समय लेकर ही जाऊँगा और संभव हुआ तो चम्बा से मणिमहेश की यात्रा भी जरूर करूंगा !

विनय सिंह युवा कहानीकार हैं .फिलहाल उज्जैन में रहते हुए बैंक में पदस्थ हैं।

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