शूद्रों को ब्राह्मणवादी रोग गिनाने की बजाय उसे उखाड़ फेंकने का काम करना होगा

शूद्र शिवशंकर सिंह यादव

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इसी साल छः जून की बात है। 17वेंं आल इन्डिया पीपुल्स साइंस कांग्रेस, (AIPSN) जो 6 जून से 9 जून तक, इक्स्टोल कॉलेज कैम्पस, भोपाल में बहुत ही शानदार आयोजन हुआ था। हमारा अनुमान है, चार दिन तक रहने, खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था के साथ कम से कम 50-60 लाख रुपए खर्च हुए होंगे। यह संस्था करीब-करीब पूरे देश के 25-30 समतावादी, जनवादी, अंबेडकरवादी, प्रगतिशील, लेफ्टिस्ट आदि सामाजिक संस्थाओं का समूह है। देखने से लगता भी था कि पूरे देश के सभी राज्यों के समर्पित कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व भी यह संस्था करती है। प्रचार-प्रसार भी प्रिन्ट मीडिया जैसे बुक, मैगजीन, न्यूज पेपर तथा सोशल मीडिया से भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। इस चार दिन के अधिवेशन में देश के बहुत से सम्मानित बुद्धिजीवी, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार, पत्रकार, वैज्ञानिक, इतिहासकार, सेवानिवृत्त बड़े बड़े अधिकारी आदि सभी ने अपने विचारों से खूब तालियां बटोरी ।
 बहुत से वक्ताओं ने तो पहले से तैयार 40-50 मिनट तक के लिखित भाषणों पर भी खूब वाहवाही लूटी। करीब-करीब सभी वक्ताओं ने देश की वर्तमान राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, यहां तक कि विदेश नीति की दुर्दशा पर भी बड़े विस्तार से प्रकाश डाला। मोदी सरकार की आलोचना भी कई लोगों ने किया। कुल मिलाकर ऐसा लगा जैसे देश में समस्याओं का अम्बार लगा है जिसके नीचे मासूम शूद्र जनता कराह रही है. गोया सदियों से आज तक हालात वैसे के वैसे हैं लेकिन हर क्रान्ति कहीं न कहीं ऐसी जगह पर आकर अटक जा रही है, जहाँ से आगे जाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है।

दरअसल इस अधिवेशन से या ऐसे किसी भी अन्य आयोजन से किसी तरह का कोई नया विचार, जो देश की बदहाली से निकालने के लिए सहायक हो, निकलता नहीं है। मुझे ऐसा महसूस नहीं हुआ। ऐसे भाषण तो अब हर शहर के गली चौराहों पर सुनने को मिलते रहते हैं। सभी ने देश की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार रोगों या कारणों को सविस्तार वर्णन किया, जो आजकल सभी नेता करते हैं, लेकिन इस रोग का या कारण का निदान कैसे हो? वे यह नहीं बताते हैं।

आखिर ऐसा क्यों है?
अगर आयोजन की गहमागहमी और वक्ताओं के जोशोखरोश के हिसाब से देखा जाय मामला बहुत उत्साहजनक लगता है। आमतौर पर लोग ऐसे आयोजनों को लेकर इतनी उम्मीद और सकारात्मकता जरूर रखते हैं कि चलो कुछ तो हो रहा है। जहाँ चारों तरफ हिंदुत्व और ब्राह्मणवाद का बोलबाला है उसमें भी ऐसे आयोजन कुछ तो ढांढस बंधाते ही हैं। लेकिन क्या यह कोई संतोष करनेवाली बात है? मुझे लगता है जब हमारा समाज सो रहा होता है और अपने अधिकारों को तेजी से खोने के बावजूद अपने भविष्य से उदासीन होता है तो ऐसे आयोजन भी उसे झूठा दिलासा भर ही दे पाते हैं। क्योंकि कोई भी  बदलाव अफर्मेटिव एक्शन के बिना संभव नहीं है।
दरअसल इस अधिवेशन से या ऐसे किसी भी अन्य आयोजन से किसी तरह का कोई नया विचार, जो देश की बदहाली से निकालने के लिए सहायक हो, निकलता नहीं है। मुझे ऐसा महसूस नहीं हुआ। ऐसे भाषण तो अब हर शहर के गली चौराहों पर सुनने को मिलते रहते हैं। सभी ने देश की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार रोगों या कारणों को सविस्तार वर्णन किया, जो आजकल सभी नेता करते हैं, लेकिन इस रोग का या कारण का निदान कैसे हो? वे यह नहीं बताते हैं।
हो सकता है,  कुछ लोगों को निदान मालूम भी हो, लेकिन डर, लालच, मौकापरस्ती इन्हें रोक देती हो। जैसे सभी मोदी जी के कार्यकलापों में दोष तो निकालते हैं, लेकिन उन्हें हटाने की तरकीबें नहीं बताते हैं। इस अधिवेशन से लगा कि इनकी विचारधारा सरकार  या सामाजिक परिवर्तन के पक्ष में है और विपक्ष में भी है। असल में में यही द्वैत अथवा दोहरापन किसी स्पष्ट रास्ते पर जाने में बाधा बनते हैं।

हम सब जानते हैं कि मनुवादियों ने वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था का जाल इतनी खूबसूरती से बुना है कि कोई भी फंसे बिना न रहेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्राह्मणों ने सबसे ऊँचा और प्रतिभाशाली स्वयं को रखा है और इस हिसाब से तो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्त्यज सभी उससे नीच हो गए। यह आपत्तिजनक और संविधानविरोधी बात है। सभी को इस विषमता और नफरत पैदा करने वाली मान्यता के खिलाफ खड़ा होना चाहिए।

एक सम्मानित आर्गेनाइजर से मैंने कुछ इन्हीं विषयों पर वहां सवाल खड़े कर दिए। उनका बड़े स्वाभिमान से कहना था कि – बाबा साहब ने भी कहा है, ‘शिक्षित करो, संगठित रहो और संघर्ष करो ।’ यही तो हमलोग कर रहे हैं।
मैंने कहा कि बेशक आप शिक्षा दे रहे हैं, लेकिन सही शिक्षा नहीं दे रहे हैं। उन्हें इसका कुछ प्रमाण भी दे दिया। वे काफी नाराज हो गए। आंख से आंख मिलाना तक बन्द कर दिया।

रोग गिनाने की नहीं, इलाज की जरूरत है 

साथियों! अब हम लोगों को सामाजिक रोग पर विस्तार से चर्चा करने और तालियां बटोरने से भला नहीं होने वाला है। इसके साथ साथ सामाजिक बुराई के निदान पर भी बिना डरे-सहमे चर्चा करनी होगी। व्यवहार में अमल करना होगा। समाज में जाकर बताना होगा कि इस मनुवादी और भेदभावरूपी कैंसर का इलाज कैसे होगा?
हम सब जानते हैं कि मनुवादियों ने वर्ण-व्यवस्था और जाति-व्यवस्था का जाल इतनी खूबसूरती से बुना है कि कोई भी फंसे बिना न रहेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि ब्राह्मणों ने सबसे ऊँचा और प्रतिभाशाली स्वयं को रखा है और इस हिसाब से तो क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्त्यज सभी उससे नीच हो गए। यह आपत्तिजनक और संविधानविरोधी बात है। सभी को इस विषमता और नफरत पैदा करने वाली मान्यता के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। उसे उखाड़ फेंकना चाहिए लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सब के सब इस व्यवस्था में अपने लिए सम्मान खोज रहे हैं और इस प्रकार इसे न केवल जस का तस बनाये रखना चाहते हैं बल्कि लगातार मज़बूत भी करते जा रहे हैं। न तो ब्राह्मणों की पारंपरिक आमदनी कम हो पा रही है और न ही उनका जाल टूट रहा है।
जो शूद्र जातियाँ सदियों से अपमान झेल रही हैं वे भी अपने इस अपमान और वंचना से छुटकारा पाने की बजाय अपने को क्षत्रिय मानना और दिखाना चाह रही हैं। हम सभी जानते हैं कि रोग की जड़ यही है। जब तक यह रहेगा तब तक एक स्वस्थ समाज बनाना असंभव रहेगा।
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लेकिन आज पूरा विश्व शूद्रों की ओर देख रहा है क्योंकि इतिहास ने उसके कंधे पर एक विराट जिम्मेदारी डाली है। वही एकमात्र ऐसा वर्ग है जो अपने साथ पूरे देश को आज़ादी के ऐसे मुकाम पर ले जा सकता है जहाँ किसी तरह की सांस्कृतिक, सामाजिक , राजनीतिक और आर्थिक गुलामी नहीं रहेगी। शूद्रों को एक सुर से ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हर कर्मकांड, विचारों और मान्यताओं को नकारना है। उन्हें किसी भी जाति-श्रेष्ठता के तथाकथित ईश्वरीय विधान को नकारना है। अपने भीतर के भय को भगाना है और जीवन से लेकर मृत्यु तक के बीच के कार्यों में ब्राह्मणों और पुरोहितों को पास भी नहीं फटकने देना है। शूद्रों की जीत भारत का पूरा जीवन-दर्शन और चरित्र बदल सकता है। शर्त यह है कि वे अपने ऐतिहासिक दायित्व को समझें और निर्णायक संघर्ष के लिए दृढ संकल्पित हों।
धन्यवाद। आप के समान दर्द का हमदर्द साथी!
गूगल @शूद्र शिवशंकर सिंह यादव

लेखक शूद्र एकता मंच के संयोजक हैं और मुम्बई में रहते हैं।

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