क्या श्रीलंका में फिर से राजपक्षे की वापसी हो रही है?

विद्या भूषण रावत

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श्रीलंका में भगोड़े राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे की वापसी हो गई है लेकिन इन्होंने देश में हुए पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का मज़ाक बनाकर रख दिया है। वे एक ऐसे राष्ट्राध्यक्ष के रूप में प्रकट हुये जो जन भावनाओं का सम्मान करने की बजाए मुश्किल समय में देश से भाग गया था और एक संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया था। अब जब उनके बनाए हुए प्रधानमंत्री ने उनके स्थान पर राष्ट्रपति का पद संभाल लिया है और सत्ता तंत्र पर अपनी पकड़ बना ली है तो गोटाबाया राजपक्षे बेशर्मी से वापस देश आ गए हैं। सवाल यह है कि क्या श्रीलंका में लोकतंत्र के लिए जो हवा चली क्या वह क्षणिक थी और वह कोई विकल्प नहीं थी? क्या गोटाबाया राजपक्षे को उनके किए की सजा मिलेगी?

अभी दो महीने भी नहीं हुए हैं जब श्रीलंका में राजपक्षे परिवार के शक्तिशाली राष्ट्रवादी नेता असहाय और कायर लग रहे थे, जब उन्हें हवाई अड्डे पर अपमानित किया गया था क्योंकि उन्होंने हवाई अड्डे पर आंदोलनकारी लोगों से खुद को बचाने के लिए विदेश भागने की कोशिश की थी। फिर भी, उन्होंने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया क्योंकि सशस्त्र बलों ने यह अच्छी तरह से जानते हुए कि यह वास्तव में एक आपराधिक कृत्य है, ‘कर्तव्यपूर्वक’ इसका पालन किया। आप किसी व्यक्ति को अपने ही देश से भागने की अनुमति कैसे दे सकते हैं जबकि लोग उसकी जवाबदेही मांग रहे हैं? दुर्भाग्य से, राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ही निशाने पर हैं, जबकि अन्य राजपक्षे चुपचाप खेल का आनंद ले रहे हैं। शायद सही समय के आने का इंतजार कर रहे हैं। प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे ने अब देश के कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में पदभार संभाला है। मुद्दा यह है कि जब देश का तत्कालीन राष्ट्रपति भगोड़ा हो गया और पूरे मंत्रालय ने इस्तीफा दे दिया तो उन्होंने इसकी कमान कैसे संभाली ? लोगों से बात करने के बजाय, ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ ने  तब भी, जब प्रधानमंत्री के रूप में उनकी खुद की नियुक्ति संदिग्ध थी और लोकतंत्र के सभी मानदंडों के खिलाफ थी, प्रदर्शनकारियों को फासीवादी कहा।

हमें उम्मीद है कि श्रीलंका की राजनीतिक ताकतें, नागरिक समाज और अन्य हितधारक हाथ मिलाएंगे और राष्ट्रीय एकता की सरकार बनाएंगे, जिसमें अल्पसंख्यकों और हाशिए पर मौजूद सभी ताकतों को एक साथ लाया जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और विभिन्न देशों की सरकारों को संकट की इस घड़ी में श्रीलंका का समर्थन करना चाहिए और उस पर और ऋण और विभिन्न नियमों और शर्तों का बोझ नहीं डालना चाहिए।

सच कहूं, तो पिछले कुछ दिनों में श्रीलंका में सरकार, विशेष रूप से राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के साथ-साथ उनके मंत्रालय के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध ने हमें मिस्र, ट्यूनीशिया और कई अन्य देशों में हुए शक्तिशाली विरोधों की याद दिला दी, जिन्हें गुलाबी क्रांति कहा गया था। भारत में  इस तरह के बड़े पैमाने पर विरोध दिल्ली की सड़कों पर अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के साथ-साथ निर्भया बलात्कार मामले के विरोध के दौरान देखा गया था, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली के सत्ता केंद्र से कांग्रेस का लंबा निर्वासन हुआ था। लेकिन श्रीलंकाई वसंत निश्चित रूप से उन सभी सत्तावादी शासकों के लिए, जो सोचते हैं कि वे स्वयं ‘कानून’ हैं और जन भावनाओं और शांतिपूर्ण लोकतान्त्रिक प्रतिरोध को सेना और पुलिस  के माध्यम से कुचल सकते हैं, एक दुःस्वप्न की याद दिलाएगा।

श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन का दृश्य आज तक अभूतपूर्व और अविस्मरणीय था। मैं इसे बहुत शुरू से ही फॉलो कर रहा था और श्रीलंका के बहुत से प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों, पत्रकारों की बातों को पढ़ रहा था। जिस तरह से लोगों ने श्रीलंकाई राजनीतिक व्यवस्था के सबसे शक्तिशाली केंद्र पर कब्जा कर लिया वह एक ऐतिहासिक घटना है तथा इसे उदाहरण के रूप रखते हुये राजनीति विज्ञान और इतिहास के छात्रों को लोगों की ताकत के बारे में याद दिलाया जाएगा। जब लोग डरना और आदेश का पालन करना बंद कर देते हैं तो क्या होता है? प्रधानमंत्री और अब राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे का निजी घर भी जला दिया गया था जो बेहद दुखद था लेकिन खुले विरोध में ऐसी चीजें होना तय है, जब राजनीतिक नेतृत्व लोगों के मुद्दों की अनदेखी करता है। प्रधानमंत्री के लिए लोगों की भावनाओं को शांत करना और राजनीतिक दलों के साथ-साथ नागरिक समाज और छात्र संगठनों का भी भविष्य के बारे में सोचने के लिए आह्वान करना जरूरी था। ये विरोध राजनीतिक नहीं थे, बल्कि  गैर-राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित किए गए थे। इसलिए नागरिक समाज और छात्र संगठन भी देश पर शासन करने के लिए व्यापक गठबंधन में हितधारक हैं।

लेकिन 13 जुलाई की शाम को यह पूरा खेल हुआ। यह वह तारीख थी जब राष्ट्रपति ने इस्तीफा देने का वादा किया था लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षरित एक अधिसूचना थी कि उन्होंने प्रधान मंत्री रानिल विक्रमसिंघे को ‘कार्यवाहक राष्ट्रपति’ के रूप में नियुक्त किया है क्योंकि वह देश से दूर होने के कारण अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हैं। इससे स्पष्ट है कि राष्ट्रपति वापस आना चाहते हैं और स्थिति सामान्य होने तक स्वयं के लिए बल्लेबाजी करने वाले प्रधानमंत्री की तलाश कर रहे हैं। तथ्य यह है कि 14 जुलाई तक राष्ट्रपति ने इस्तीफा नहीं दिया था। वह मालदीव में थे और सिंगापुर के लिए एक विशेष विमान में अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यह आश्चर्य की बात है कि श्रीलंका में सभी संवैधानिक संस्थाओं ने वस्तुतः स्वायत्तता नहीं दिखाई।  किसी ने भी राष्ट्रपति और सरकार की शक्ति पर सवाल नहीं उठाया। जबकि यह जरूरी था कि वर्तमान अराजकता को नहीं रोका गया या चीजों में देरी की गई तो अराजकता और तनाव बढ़ने का अधिक खतरा था। बाद में राष्ट्रपति ने  आधिकारिक रूप से इस्तीफा दे दिया और अपने शिष्य विक्रमसिंघे के साथ राष्ट्रव्यापी कर्फ्यू की घोषणा कर दी। उम्मीद है कि श्रीलंका के लोग अपने लिए एक रास्ता खोजेंगे और पिछली गलतियों से सीखेंगे। वर्तमान संकट कई गुना है और राजनीतिक नेताओं और विश्लेषकों को, जो गलत हुआ उसके बारे में ईमानदार आत्मचिंतन करना होगा।

मैं व्यक्तिगत रूप से महसूस करता हूं कि ऐसे कई मुद्दे थे और सभी ने मिलकर अपना प्रभाव डाला था। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्ता बहुत शक्तिशाली हो गई थी और कोई भी उसके गलत होने के लिए सवाल नहीं कर पाया क्योंकि राजपक्षे परिवार सिंहल राष्ट्रवाद का प्रतीक था। मर्दाना राष्ट्रवाद नफरत की जमीन पर पनपा था। यह धार्मिक और एथनिक अल्पसंख्यकों को लगातार बदनाम करने से उपजा था । इस ‘शक्तिशाली’ सिंहली राष्ट्र में सत्ता और अभिजात वर्ग के सभी पापों को नजरअंदाज कर दिया गया था। अब इस राष्ट्रवाद के वही भक्त जोरदार विरोध कर रहे हैं और इसके ‘नायक’ को अब कूड़ेदान में फेंक दिया है, लेकिन सच कहूं तो चीजें इतनी आसान नहीं हैं। राजपक्षे परिवार अभी भी श्रीलंका में है। सिंहल राष्ट्रवाद के नायक महिंदा राजपक्षे अभी भी श्रीलंका में हैं और सारा गुस्सा वास्तव में उनके छोटे भाई गोटाबाया पर कथित गलत तरीके से निपटने के लिए है। अब बहुत से लोगों को लगता है कि महिंदा बेहतर थे और उनकी सलाह को गोटाबाया ने कभी ‘स्वीकार’ नहीं किया। गोटाबाया सिर्फ एक सैना के व्यक्ति थे और उनकी राजनीतिक समझ बहुत कम थी। लेकिन इस तरह के तर्क खतरनाक हैं, क्योंकि श्रीलंका में धार्मिक जातिवादी सिंहल राष्ट्रवाद के नायक महिंदा राजपक्षे ही थे। लेकिन जब उनका कानूनी तौर पर राष्ट्रपति बनना मुश्किल हो गया तो उन्होंने अपने छोटे भाई को राष्ट्रपति बनाकर खुद प्रधानमंत्री का पद संभाल लिया। हकीकत यह है कि वह अपने बेटे को राष्ट्रपति पद के लिए तैयार कर रहे थे।

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कर्ज के जाल में फँसा श्रीलंका

श्रीलंका की आर्थिक हालत बद से बदतर हो चुकी है और देश कर्ज के बोझ तले दब गया है क्योंकि उसके पास कर्ज चुकाने हेतु विदेशी मुद्रा भंडार ही खत्म हो गया है। ऐसी स्थिति पाकिस्तान की भी आ सकती है और दुनिया के बहुत से देश ऐसे हालात में आ चुके हैं। भारत के पास अभी ऐसी स्थिति नहीं आई है लेकिन जिस तरीके से आर्थिक स्थिति को और अधिक विकराल किया जा रहा है, ऐसा होना असंभव नहीं है। श्रीलंका में कर्ज भी मौजूदा आर्थिक संकट और बढ़ती अनिश्चितताओं के कारण हुआ है। भारतीय मीडिया चीन द्वारा दिए गए कर्ज के जाल के बारे में बहुत कुछ बोल रहा है लेकिन हकीकत यह है आर्थिक संकट पूंजीवादी व्यवस्था की देन है। इसमें हर हाल अमेरिका और उसके सहयोगियों का ही लाभ होना है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चीन ने कई ढांचागत परियोजनाओं में निवेश किया हैं और राजपक्षे बंधु उनका बहुत ध्यान आकर्षित करने में सक्षम थे, लेकिन अगर हम आंकड़ों को देखें, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि बड़ी धनराशि और निवेश मूल रूप से अमेरिका के साथ-साथ जापान और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों से हुआ है जिसमें एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक बहुपक्षीय संस्थान हैं। विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संगठनों में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका के प्रमुख ऋणी निम्नलिखित थे-

अंतर्राष्ट्रीय पूंजी बाजार उधार : 16,383 मिलियन अमेरिकी डॉलर (47%)

एशियाई विकास बैंक : 4,415 मिलियन अमेरिकी डॉलर (13%)

चीन : 3,388 मिलियन अमेरिकी डॉलर (10%)

जापान : 3,360 मिलियन अमेरिकी डॉलर (10%)

विश्व बैंक : 3,230 मिलियन अमेरिकी डॉलर (9%)

अन्य: 3,038 मिलियन अमेरिकी डॉलर (9%)

भारत : 859 मिलियन अमेरिकी डॉलर (2%)

स्थानीय मुद्रा में लगातार गिरावट और अमेरिकी डॉलर की वृद्धि ने श्रीलंका जैसे देशों के लिए जटिल समस्याएँ पैदा की हैं। संकट के बाद दुनिया ने देखा कि कई देशों ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को खो दिया। प्रवासियों ने नौकरी खो दी, देश लौट आए। विदेशी आवक, प्रेषण और कम हो गया। दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले स्थानीय मुद्रा के कमजोर होने से संकट और बढ़ गया।

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इसलिए, यह न केवल विदेशी प्रेषण में गिरावट थी, बल्कि विभिन्न उत्पादों जैसे कॉफी, चाय और अन्य प्राकृतिक उत्पादों के निर्यात में भी गिरावट थी, जिनका श्रीलंका निर्यात करता था। अब उस निर्यात का क्या हुआ और श्रीलंका को क्यों इसका नुकसान उठाना पड़ा यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा है लेकिन केवल यही बात नहीं है। जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, बहुत-सी छोटी-मोटी कमियाँ साथ जुड़कर विकराल हो गईं और इसके परिणामस्वरूप ही ऐसा पतन हुआ। हां, उनमें सबसे महत्वपूर्ण बात राजनीतिक नेतृत्व है जो वास्तव में बिना जवाबदेही के सत्ता का आनंद ले रहा था और लोगों की सुनने को तैयार नहीं था। शर्मनाक बात यह कि जब देश जल रहा था तब भी सत्ताधारियों के व्यक्तिगत ऐशो-आराम में कोई अड़चन नहीं थी।

सच कहूं तो श्रीलंका का पतन ‘विश्व व्यवस्था’ का परिणाम है, जहां हर अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन अमेरिकी डॉलर में करना पड़ता है। इससे केवल वही देश बच सकते हैं जो आत्मनिर्भर हैं और निर्यात पर अधिक और आयात पर कम निर्भर हैं। पश्चिमी दुनिया ने रूस के साथ ऐसी स्थिति बनाने की कोशिश की जिससे उसकी मुद्रा खत्म हो जाए और वह घुटनों के बल पश्चिमी देशों के आगे भीख मांगे, लेकिन रूस एक शक्तिशाली और महान देश है। उसने बहुत अधिक जोश और तेज वित्तीय प्रबंधन के साथ प्रतिक्रिया दी, जिसके परिणामस्वरूप रूबल में उच्च वृद्धि हुई और डॉलर लगातार खराब प्रदर्शन करता दिख रहा था, लेकिन कहीं और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी कमी आई। ऐसा तब हुआ, जब रूस प्राकृतिक और खाद्यान्न साधनों के मामले में भी आत्मनिर्भर रहा। वह दुनिया को केवल हथियार ही निर्यात नहीं करता बल्कि खाद्यान्न, खनिज, गैस और तेल निर्यात करने में भी सबसे ऊपर है। इसलिए उस पर ऐसी चालाकियों का असर नहीं पड़ा। उल्टा इस संकट को उन्होंने अपने को मजबूत बनाने में लगाया। लेकिन आयात-निर्यात के बीच असंतुलन अक्सर मुद्राओं के कमजोर होने के कारण होता है। गरीब देश अक्सर इस संकट से जूझ रहे होते हैं। श्रीलंका के पर्यटन को निर्यात में विफलता के अलावा कोविड के बाद के समय में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप इसका विदेशी भंडार खाली हो गया। मतलब साफ है कि यदि हमारा आयात अधिक है और निर्यात कम है तो हमें ऐसे वित्तीय संकट झेलने ही होंगे और आयात अधिक करने के लिए हमें अपने किसानों, खेती और अन्य उत्पादनों को मजबूत करना होगा और उन्हें निर्यात लायक बनाना होगा।

जैविक और रासायनिक की बहस

श्रीलंका में कृषि संकट पूरी तरह से मानव निर्मित था जिसके कारण दक्षिण एशिया के सबसे खूबसूरत देश के जीवन में आपदा आई। कोई भी यह नहीं कह सकता कि जैविक खेती का देश बनाना एक बुरा निर्णय था, फिर भी इसे बहुत सावधानी और धीमी प्रक्रिया के साथ लागू किया जाना चाहिए था। जब किसानों ने स्थिति को अनुकूल बना दिया होता और अपने विकल्प तैयार कर लिए होते। आप पूरे देश को एक दिन में जैविक खेती की ओर जाने का आदेश नहीं दे सकते हैं। यदि आप उन रासायनिक उर्वरकों पर प्रतिबंध लगा देते हैं जिनका किसान लंबे समय से उपयोग कर रहे थे तब किसान कैसे खेती करेंगे। श्रीलंका एक खाद्य संप्रभु देश था जो चाय, कॉफी, केला जैसे कई कृषि उत्पादों का निर्यात करता था। श्रीलंका में 20 लाख किसान हैं जो सब्सिडी वाले उर्वरक प्राप्त करते थे। इसका इसका अर्थ यह हुआ कि यह दक्षिण एशिया की सबसे सफल अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। अचानक उन सभी को बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था और पद्धति को समझे जैविक खेती में जाने के लिए कहा गया। यह समझने की जरूरत है कि जैविक खेती अपने आप में दुनिया भर में एक बहुत बड़ा व्यावसायिक उद्यम बन गई है और जो लोग जैविक खेती को केवल पारंपरिक, गैर-उर्वरक पारंपरिक प्रणाली में मानते हैं, वह वास्तव में इसके पीछे के विशाल अंतर्राष्ट्रीय बाजार की उपेक्षा करते हैं। हालांकि स्थानीय समुदाय कई जगहों पर इसमें लगे हुए हैं। विशेष रूप से आदिवासी और स्थानीय समुदाय जो प्राकृति आधारित जीवन जीते हैं और व्यावसायिक विचारों से दूर रहे हैं। उचित मार्गदर्शन के साथ-साथ सरकारी सहायता के अभाव में, किसानों ने सब कुछ खो दिया। बल्कि श्रीलंका ने जितना सोचा था उससे कहीं अधिक खो दिया। आज, इसके फलस्वरूप श्रीलंका भारी अशांति वाला एक दिवालिया देश बन गया है जिसके कारण पूरे देश में अस्थिरता की स्थिति पैदा हो गई है।

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सच कहूं तो यह प्रश्न जैविक और अजैविक खेती के बीच नहीं, बल्कि चीजों के प्रबंधन की बहस है। याद रखें, अगर गोटाबाया राजपक्षे श्रीलंका में अपने मिशन जैविक खेती में सफल हो गए होते तो आप इन्हीं ‘विशेषज्ञों’ से उनका गुणगान सुन रहे होते कि वह राष्ट्रपति के रूप में कितने महान थे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञ जैविक खेती को बढ़ावा दे रहे हैं। तथ्य यह है कि किसी वैकल्पिक दिशा-निर्देश के अभाव में कृषि क्षेत्र को, जो आज तक उपज बढ़ाने के लिए आधुनिक तरीकों, उर्वरकों आदि के उपयोग पर निर्भर था, अचानक अपने लिए सोचने के लिए छोड़ दिया गया था। हालांकि श्रीलंकाई सरकार ने किसानों की परेशानी और फसल में गिरावट को महसूस किया कि उन्होंने मई 2021 में उर्वरकों पर जो प्रतिबंध लगाकर विदेशी मुद्रा को बचाने के प्रयास किए उससे कोई लाभ नहीं हुआ क्योंकि कृषि की स्थिति बहुत गंभीर हो गई थी इसलिए सितंबर 2021 तक सरकार ने रासायनिक उर्वरक को आयात करने पर लगी रोक को हटा दिया। कार्बनिक और अकार्बनिक के बीच एक बड़ी बहस है। यह स्वस्थ बहस होनी चाहिए लेकिन इन दिनों विभिन्न कॉर्पोरेट घरानों द्वारा प्रायोजित बहसों के कारण आप नहीं समझ पाते कि कौन सच बोल रहा है क्योंकि प्रत्येक के पास दूसरे को गलत साबित करने के लिए ‘भारी-भरकम’ डाटा है। जबकि हर कोई स्वीकार करता और मानता है कि जैविक खेती को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। फिर भी सवाल यह है कि क्या जैविक खेती वास्तव में वैश्विक भूख के व्यापक प्रश्न का कोई समाधान कर सकती है?

क्या कृषि में वैज्ञानिक आविष्कार रुक जाना चाहिए जहां किसान फसल की उपज बढ़ाने के बारे में सोचते हैं। यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर अलग-अलग हितधारकों के बीच गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। वैश्विक भूख ने पहले ही संकट को बढ़ा दिया है और इस सिद्धांत को ध्वस्त कर दिया है कि 2030 तक दुनिया भूख से मुक्त हो जाएगी। इसलिए कृषि नीतियां इस संकट का केवल एक कारण हो सकती हैं, सभी नहीं। इसकी प्रक्रिया मार्च 2021 में शुरू हुई थी जब राष्ट्रपति ने रासायनिक उर्वरक के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन जैसा कि किसानों पर प्रतिबंध के नतीजों का पता चला, तो सितंबर 2021 में इसके आयात की फिर से अनुमति दे दी।

हमारे लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि संसाधनों तक पहुंच और उनके लोकतंत्रीकरण के मुद्दे महत्वपूर्ण हैं या नहीं। हम वास्तव में इस बात पर बहस करें कि क्या अच्छा है, और क्या बुरा है क्योंकि इन तेजी से ध्रुवीकृत समय में लोगों के लिए बिना समझे निर्णय लेना मुश्किल होगा। जब तक वे इसके पीछे की राजनीति और अर्थव्यवस्था को न समझ सके। रासायनिक उर्वरकों और अन्य कीटनाशकों की एक बड़ी कॉर्पोरेट लॉबी है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई कृषि कार्यक्रमों को वित्तपोषित करती है लेकिन बेहद चौंकाने वाली तथाकथित जैविक लॉबी भी अंतर्राष्ट्रीय कॉर्पोरेट द्वारा प्रायोजित है। इसलिए कृषि प्रक्रिया के लोकतंत्रीकरण को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है जिसका अर्थ है कि स्थानीय समुदायों को यह तय करने दें कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। अगर कुछ लोग व्यावसायिक खेती करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसा करने दें लेकिन सरकार को न्यूनतम मानक विकसित करना चाहिए और उन पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए। स्थानीय फसलों और पारंपरिक बीजों को बढ़ावा देने के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है लेकिन एक पूरे देश को उत्पादन के एक प्रकार के तरीके पर नहीं छोड़ा जा सकता है। श्रीलंका को भारत जैसी हरित क्रांति से बहुत कुछ हासिल हुआ। यह दूसरी बात है कि आज हरित क्रांति पर भी सवाल उठ रहे हैं। कोई भी वैज्ञानिक आविष्कार अंतिम नहीं होता है और नए शोध कभी-कभी पुराने निष्कर्षों को खारिज कर देते हैं। इसके अलावा, फसलों का व्यावसायीकरण और दूसरी चीजें भी वास्तव में लोगों को अपने उत्पादन को बढ़ाने के लिए रासायनिक उर्वरकों और अन्य अनैतिक चीजों का उपयोग करने के लिए मजबूर करती हैं। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि स्थानीय सरकार और राष्ट्रीय सरकारें इन मुद्दों पर कड़ी नजर रखें ताकि लोगों के स्वास्थ्य से समझौता न हो।

राष्ट्रवाद ने राजनीतिक भ्रष्टाचार की रक्षा की

राजपक्षे परिवार द्वारा तैयार किया गया कट्टरपंथी सिंहल राष्ट्रवाद वास्तव में इस संकट का कारण था। इस तरह का राष्ट्रवाद हमारे समाज के लिए कैसे और क्यों खतरनाक है, इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए। उनके द्वारा खेले गए खतरनाक खेल ने श्रीलंका को पूरी तरह से खात्मे के कगार पर ला खड़ा किया। श्रीलंका की राजनीति इस बात का उदाहरण है कि कैसे पुराने उपनिवेशों में शक्तिशाली परिवारों और ‘जातियों’ ने पूरी राजनीति और समाज को नियंत्रित किया। हालांकि श्रीलंका में भंडारनायके का परिवार था जो वास्तव में सिरीमावो भंडारनायके की बेटी चंद्रिका कुमारतुंगा के साथ समाप्त हुआ था और 2005 के बाद से राजपक्षे श्रीलंका की राजनीति पर हावी थे। कुल मिलकार यह सिंहली समुदाय की ताकत का नतीजा है जो श्रीलंका की राजनीति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था पर हावी था और कहीं न कहीं इसे उस देश के अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं, मुसलमानों और ईसाइयों के साथ सत्ता साझा करने के लिए तैयार नहीं थे। जनसंख्या के मामले में, श्रीलंका में सिंहली 70%, हिंदू 13%, मुस्लिम 10% और ईसाई 7% हैं। यह विडंबना ही है कि इस बहुसंख्यक सिंहली समाज को यह विश्वास दिलाया गया कि अन्य सभी समाज उनके लिए खतरा हैं। राजपक्षे ने इस राष्ट्रवाद का इस्तेमाल श्रीलंका के सत्ता ढांचे पर अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए किया। 1983 के बाद से श्रीलंका सिंहली और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच बढ़े हुए जातीय तनाव का सामना कर रहा था, जिन्होंने महसूस किया कि उनकी उपेक्षा की गई है। इन अल्पसंख्यकों का सरकार और सिंहली बहुसंख्यक राष्ट्रवाद दोनों द्वारा उत्पीड़न किया गया है। उत्तर के तमिलों ने वी. प्रभाकरन के नेतृत्व में अलग तमिल एलम की मांग की। उन्होंने अपने वांछित राष्ट्र को पाने के लिए लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल एलम (LTTE) का गठन किया। विद्रोह इतना शक्तिशाली था कि श्रीलंका दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक बन गया। 2004 में, तत्कालीन राष्ट्रपति चंद्रिका कुमारतुंगा ने महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया और 2005 में उन्होंने अपनी पार्टी को राष्ट्रपति चुनाव में विजय दिलाई और श्रीलंका के राष्ट्रपति बने। वह एक राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते थे और अपनी शक्ति के आधार को मजबूत करने के लिए बौद्ध सिंहली भावनाओं का इस्तेमाल करते थे। उन्होंने सेना को लिट्टे का सिर कुचलने की पूरी छूट दे दी और 2009 में जाफ़ना इलाके में सशस्त्र बलों को प्रभाकरन को मार गिराने में सफलता मिली। इसका उन्हें राजनीतिक तौर पर बेहद लाभ हुआ। प्रभाकरन की हत्या और लिट्टे के पूर्ण विनाश ने श्रीलंकाई राष्ट्रवादी के रूप में महिंदा राजपक्षे की छवि को बढ़ावा दिया और उन्हें श्रीलंकाई राष्ट्रवाद का सबसे बड़ा नायक बना दिया। महिंदा ने महसूस किया कि उनके सैन्य राष्ट्रवाद को बहुसंख्यक सिंहली पसंद कर रहे हैं और इसलिए उन्होंने एक समावेशी राजनीति बनाने का कोई प्रयास नहीं किया जिसमें तमिलों को समान भागीदार बनाया जा सके। वास्तव में, भारत की तरह महिंदा और उनकी पार्टी को कभी भी अल्पसंख्यक वोटों की ज़रूरत नहीं पड़ी। बौद्ध धर्मगुरुओं ने भी इस चरण का आनंद लिया।

पारिवारिक लाभ के लिए राजनीतिक व्यवस्था का उपयोग

महिंदा राजपक्षे इतने शक्तिशाली हो गए कि उन्होंने संविधान में संशोधन किया और श्रीलंका के राष्ट्रपति होने के लिए शर्त को हटा दिया, क्योंकि संविधान ने राष्ट्रपति के लिए केवल दो कार्यकाल की अनुमति दी थी। उन्होंने एक और संशोधन भी किया जो यह था कि एक राष्ट्रपति, कानून की अदालत में अभियोजन या मुकदमे का सामना नहीं कर सकता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि श्रीलंका, जिसमें फर्स्ट पास्ट द पोस्ट सिस्टम के साथ-साथ आनुपातिक चुनाव प्रणाली के माध्यम से चुने गए कुछ निर्वाचन क्षेत्रों की हाइब्रिड चुनावी प्रणाली थी, ने आनुपातिक प्रणाली को हटा दिया। निश्चित रूप से एक बहुसंख्यक नेता समावेशी राजनीति को पसंद नहीं करेगा। केवल नेता ही नहीं, उनके आसपास के लोग भी ऐसा कभी नहीं चाहते थे। महिंदा अब इतना शक्तिशाली हो गये थे कि उन्हे लगा कि कोई भी उन्हें हराने वाला नहीं है लेकिन 2015 के राष्ट्रपति चुनाव में उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, जिसने मैत्रीपाला सिरिसेना को देश का राष्ट्रपति बना दिया। नए राष्ट्रपति ने फिर संविधान में संशोधन किया और पुराने कानून को वापस लाये कि कोई भी व्यक्ति दो से अधिक कार्यकाल के लिए राष्ट्रपति नहीं बन सकता है। इसने यह सुनिश्चित कर दिया कि महिंदा राजपक्षे फिर से राष्ट्रपति नहीं बन सकते। लेकिन आश्चर्यजनक और चौंकाने वाली बात यह है कि सिरिसेना ने भी प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के साथ गंभीर राजनीतिक मतभेदों के बाद महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया, लेकिन यह बात ठीक से बन नहीं पायी। 2019 के चुनावों में, राजपक्षे भाइयों ने हाथ मिलाया और श्रीलंका पोदुजकानापेरामुना पार्टी से गोटाबाया राजपक्षे के नेतृत्व में चुनाव लड़ा। पार्टी ने चुनाव जीता और इस प्रकार गोटाबाया राजपक्षे जो वास्तव में अपने भाई महिंदा राजपक्षे के अधीन एक सैनिक और रक्षा मंत्री थे, 21 नवंबर 2019 को श्रीलंका के राष्ट्रपति बने। छोटे भाई ने तब बड़े भाई और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। इस प्रकार 9 अगस्त, 2020 को महिंदा राजपक्षे ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की। क्या आप दुनिया में कहीं भी ऐसा कुछ होने की कल्पना कर सकते हैं जहां एक शक्तिशाली राष्ट्रपति अपने हितों की रक्षा के लिए प्रधानमंत्री भी बन जाता है? दुर्भाग्य से, श्रीलंका में भाइयों के खिलाफ ज्यादा विरोध नहीं हुआ और दोनों ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए धार्मिक और जातीय ध्रुवीकरण का इस्तेमाल किया और सत्ता के मजे लेते रहे।

जब श्रीलंका में बढ़ती महंगाई के खिलाफ विरोध शुरू हुआ, तो मई 2022 में प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे को इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसका उद्देश्य विरोध-प्रदर्शनों को रोकना था। दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने तब लोकप्रिय जनादेश के खिलाफ श्रीलंका के प्रधानमंत्री के रूप में रानिल विक्रमसिंघे को नियुक्त किया, क्योंकि उनकी पार्टी के पास पर्याप्त सांसद नहीं थे और प्रदर्शनकारियों को लगा कि यह राजपक्षे परिवार की रक्षा करने का एक जान-बूझकर प्रयास था। विडंबना यह है कि श्रीलंका में विरोध का फोकस राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे के खिलाफ है, जबकि उनके बड़े भाई महिंदा राजपक्षे और उनके बेटे, जो उनके उत्तराधिकारी हैं, अभी भी श्रीलंका में हैं। गोटाबाया राजपक्षे अमेरिकी नागरिक थे और उन्हें उनके भाई महिंदा ने श्रीलंका आने और अपनी सहायता करने के लिए आमंत्रित किया था। उन्हें श्रीलंकाई नागरिकता मिली लेकिन उन्होंने अमेरिकी नागरिकता कभी नहीं छोड़ी। उन्हें 2005 में रक्षा मंत्रालय में सचिव बनाया गया था और 2015 तक, उन्होंने रक्षा मंत्री के रूप में काम किया, जिन्होंने लिट्टे के खिलाफ सभी सैन्य अभियानों को देखा।

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सत्ता, सफलता, लोकप्रियता सभी तानाशाहों के सिर पर चढ़ जाते हैं जो वास्तव में लोकतंत्र के रास्ते से आते हैं। राजपक्षे परिवार या वंश ने वास्तव में औपनिवेशिक लोकतंत्रों में लोगों के लिए एक आदर्श बन गया जहां परिवार, जाति, धर्म, पहचान राजनीति पर हावी है और बाकी भ्रष्टाचार द्वारा नियंत्रित है। राजनीतिक अभिजात वर्ग को राष्ट्रवाद का उपयोग करने में कोई शर्म नहीं है, भले ही उनके पास पश्चिमी दुनिया की नागरिकता हो। विश्वासघात का यह कैसा उत्कृष्ट उदाहरण है कि एक राष्ट्रपति अपने लोगों का सामना करने में असमर्थ है और राष्ट्रपति के रूप में देश छोड़ने के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करता है और मालदीव से जाने और सिंगापुर में उतरने की अनुमति देता है। यह निश्चित है कि उनके मंत्रिमंडल के साथ-साथ परिवार के कई अन्य सदस्य देश छोड़कर संयुक्त राज्य अमेरिका जाने के लिए उत्सुक थे। पश्चिमी नेताओं और उनकी सरकारों से सवाल पूछना महत्वपूर्ण है कि वे कब तक विकासशील देशों के भ्रष्ट नेताओं और तानाशाहों को अपने देशों में पनाह देते रहेंगे।

सबक लेने की ज़रूरत है

श्रीलंका की अराजकता एक और बात को भी दर्शाती है कि सत्ता परिवर्तन के साथ उनकी समस्याएं और कठिनाइयां खत्म होने वाली नहीं हैं। दूसरे, सिस्टम वही रहता है और तीसरा विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) जैसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां श्रीलंका पर कठोर शर्तें लगाने जा रही हैं, जिसका अर्थ है अधिक आयात, उदारीकरण और बड़े निजीकरण की मांग करना। अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ‘मजबूत’ करने का भार अब श्रीलंका जैसे विकासशील देशों के कंधों पर है। वैश्विक दक्षिण के कई अन्य देश श्रीलंका में जो हुआ है उसकी पुनरावृत्ति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसलिए, हमें इस बड़ी तस्वीर को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए कि श्रीलंकाई संकट शक्तिशाली विकसित देशों द्वारा थोपी गई अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय नीतियों और पूरी तरह से भ्रष्ट सांप्रदायिक स्थानीय अभिजात वर्ग का मिश्रण है जो लोगों के भावनात्मक मुद्दों का शोषण करते हैं और उनके आर्थिक मुद्दों का समाधान नहीं करते हैं। आर्थिक नीतियों के खिलाफ श्रीलंका के विद्रोह का अंत, उसकी आर्थिक नीतियों के बदलाव में नहीं होगा, लेकिन मुझे डर है कि देश फिर से उसी तरह की आर्थिक ताकतों के पास जाएगा, जो उन्हें इस स्तर पर ले आए। देखते हैं आगे क्या होता है लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि कोई भी देश अल्पसंख्यकों को हाशिए पर रखकर और अलग-थलग करके आगे नहीं बढ़ सकता। अन्य सभी देशों के लिए यह समझने का समय आ गया है कि अति-राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यक समुदाय को खलनायक बनाकर उन्हें अलग-थलग करने का प्रयास करने वाले लोग वास्तव में ‘बहुमत’ को कहीं नहीं ले जाते हैं, लेकिन उन्हें एक तथाकथित राष्ट्रवादी नेता या राष्ट्रवादी पार्टी के अधीन कर देते हैं जो उनके संकट को हल करने में असमर्थ हैं।

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फिलहाल, हमें उम्मीद है कि श्रीलंका की राजनीतिक ताकतें, नागरिक समाज और अन्य हितधारक हाथ मिलाएंगे और राष्ट्रीय एकता की सरकार बनाएंगे, जिसमें अल्पसंख्यकों और हाशिए पर मौजूद सभी ताकतों को एक साथ लाया जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और विभिन्न देशों की सरकारों को संकट की इस घड़ी में श्रीलंका का समर्थन करना चाहिए और उस पर और ऋण और विभिन्न नियमों और शर्तों का बोझ नहीं डालना चाहिए। ये ऐसा समय है कि विश्व बैंक, आईएमएफ, एशियाई विकास बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को श्रीलंका जैसे देशों से कर्ज माफ करने के बारे में सोचना चाहिए ताकि वे अपने पुराने गौरव पर लौट सकें। लेकिन शायद ऐसा होने वाला नहीं है क्योंकि बिना कर्ज के श्रीलंका आगे नहीं बढ़ सकता। सत्ताधारियों ने मिलकर श्रीलंका की क्रांति को पलट दिया है। नतीजे साफ हैं। जब श्रीलंका में वाकई क्रांति हो सकती है तो सिस्टम ने प्रतिक्रांति कर दी और वापस अपने पुराने ढर्रे पर लौट आया है। विश्व बैंक से लेकर सभी अंतर्राष्ट्रीय संस्थायें अपने थैले खोल वहाँ आएंगी और गरीबों को जो परेशानी होगी उसका कोई समाधान नहीं है। क्या श्रीलंका का संकट जान-बूझकर पैदा किया गया ताकि पूरी तरह से सत्ता पलट न हो और वही लोग लोकतंत्र में बदलाव का नेतृत्व करें जिनके विरुद्ध पूरी लड़ाई थी। श्रीलंका से सीखने की ज़रूरत है। वह वही सिखा रहा है जो अन्ना आंदोलन से हमने नहीं सीखा कि हर एक प्रदर्शन और आंदोलन अच्छे परिणाम नहीं देता। कई बार आंदोलनों के बाद जो नतीजे आते हैं वे उससे ज्यादा भयावह होते हैं जिसके विरुद्ध हम आंदोलन कर रहे होते है। अन्ना आंदोलन का नतीजा है मोदी युग का आगाज और श्रीलंका में राजपक्षे के विरुद्ध आंदोलन रानिल विक्रमसिंघ को अप्रत्याशित रूप से मजबूत करेगा। उम्मीद है श्रीलंका के लोग और नागरिक समाज इन शक्तियों को पहचानेगा और सभी समुदायों को साथ रखकर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाएगा, जिससे वर्तमान सरकार उस एजेंडे पर चले जिसके लिए लोगों ने इतना बड़ा संघर्ष किया।

vidhya vhushan

 

 

 

 

 

विद्या भूषण रावत जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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