‘भारत जोड़ो यात्रा’ क्या बदलेगी देश की तस्वीर?

सलमान अरशद

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आरएसएस और उनके कुनबे की हुकूमत से निराश देश की जनता राहुल गाँधी और उनकी पार्टी के भारत जोड़ो यात्रा को बड़ी उम्मीद के साथ देख रही है। लेकिन भावनाओं में बिना बहे और थोड़ी दूर खड़े होकर जब आप इस कार्यक्रम को देखते हैं तो दो मुख्य आकर्षण हमें नज़र आते हैं, पहली वो तस्वीरें हैं जिनमें राहुल गाँधी विभिन्न जातीय, धार्मिक, नस्लीय समूहों और महिलाओं से बड़ी सहजता से मिल रहे हैं और दूसरी सत्ताधारी दल और उनके समर्थकों की वो प्रतिक्रियाएं हैं जिन पर पहली बार कांग्रेस और उसके समर्थक भारी पड़ रहे हैं। लेकिन इन दोनों ही पहलुओं से ये अनुमान लगाना कठिन है कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ देश में किस तरह के परिवर्तन का वाहक बनेगी या बिना किसी परिवर्तन के एक इवेंट बन कर रह जाएगी!

कुछ प्रश्न जिनके इर्द-गिर्द इस पूरे कार्यक्रम को समझने की कोशिश की जा सकती है वो हैं, कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ क्या देश की सियासत में किसी बड़े बदलाव का संकेत है? क्या देश की अर्थव्यवस्था जो कुछ खास पूँजीपतियों की चरागाह बन गयी है, उस पर भी किसी तरह की कोई रोक लगेगी? और, क्या जनता धार्मिक उन्माद से इतर जीवन से जुड़े मुद्दों पर सियासत को लौटाना चाहती है? ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर बात करें, उससे पहले कुछ मुद्दे जो सीधे-सीधे आपके और हमारे जीवन से जुड़ते हैं, उन्हें देख लीजिये!

राहुल गाँधी और उनकी पार्टी की फ़िलहाल की कोशिशों का मैं समर्थन करता हूँ और जो लोग 'भारत जोड़ो यात्रा' में सहयोग दे रहे हैं उन्हें सलाम करता हूँ। लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं कांग्रेस से सवाल पूछने के हक़ का समर्पण नहीं करूंगा।

 

भारत में शिक्षकों के 11 लाख पद खाली हैं, ये सिर्फ़ शिक्षकों का डाटा है, वरना हर सरकारी विभाग में ऐसे ही लाखों पद खाली हैं जिन्हें भरा नहीं जा रहा है। याद कीजिये कि इस देश में एक व्यक्ति के पीछे चार और लोग पलते हैं, इस तरह महज़ 11 लाख शिक्षकों का पद भरने से लगभग 50 लाख लोगों का जीवन यापन सुगम बनेगा, एक स्कूल में कम से कम 5 शिक्षक होते हैं, यानि दो लाख 20 हज़ार स्कूल बच्चों के पढ़ने लायक बनेगे, और लगभग तीन करोड़ बच्चों तक शिक्षा पहुंचेगी। लेकिन ये सरकारों की चिंता नहीं है, सरकार तो पुजारियों को ट्रेंड करेगी ताकि आप कर्मकांड ठीक से करवा सकें। आपके टैक्स का पैसा जिससे आपको तालीम और सेहत मिलनी चाहिए थी, उससे पुजारी तैयार किये जायेंगे ताकि आप और कूप मंडूक बन सकें। क्या ये और इसी तरह के जनसरोकार के मुद्दे ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के सन्दर्भ से बहस में जगह पा पाये हैं? इस पर विचार ज़रूर कीजिये !

राहुल गाँधी की मनमोहनी तश्वीर तो नज़र आ रही है पर क्या ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में देश के लोगों की टूटती-बिखरती ज़िन्दगी को जोड़ने की भी कोई कोशिश हो रही है? इस सवाल का ज़वाब कम से कम मीडिया के हवाले से नहीं मिल रहा रहा है। भारत जुड़े और जुड़ा ही रहे अच्छी बात है पर भारतियों को शिक्षा, सेहत और रोज़गार अगर नहीं मिलता तो क्या भारत जुड़ कर भी जुड़ा रह पायेगा, इस सवाल पर शायद आने वाले दिनों में ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के हवाले से कोई ज़वाब आये और अगर नहीं आता है तो हमें ऐसे सवालों को बहस में लाने की कोशिश करनी चाहिए।

ये भी सोचना होगा कि जातीय आधार पर समाज को सदियों से तोड़ा जा रहा है, अब धार्मिक आधार पर भी विध्वंस की इस परम्परा को भारतीय उच्च वर्ग आगे बढ़ा रहा है, ऐसे में कोई भी सियासत जो जातीय और धार्मिक ध्रुवीकरण को हाथ भी नहीं लगाती, वो देश और समाज को क्या सच में जोड़ पायेगी, ये एक बड़ा प्रश्न है।

‘भारत जोड़ो यात्रा’ निश्चित रूप से भारत में बड़े सियासी बदलाव का संकेत है, आरएसएस अपने कुनबे के साथ सत्ता में तो पहुँच गया, लेकिन आर्थिक व सामाजिक मोर्चे पर उसने देश को बर्बाद कर दिया है। देश की हर वो संस्था जो इस समूह के कब्ज़े में पहुँची है, अपनी आत्मा की हत्या कर चुकी है, यहाँ तक कि न्यायपालिका तक में लोगों का रहा सहा भरोसा तेज़ी से टूट रहा है।

देश की आम जनता बदलाव चाहती है और जनता के सामने कांग्रेस ही एक मात्र विकल्प है जिसका दामन थाम कर जनता वर्तमान जनद्रोही हुकूमत से निजात पा सकती है। लेकिन यहीं पर ये सवाल भी ज़रूरी है कि क्या कांग्रेस जनता को उन मुसीबतों से छुटकारा दिलवा पायेगी जिनकी वजह से जीवन मुश्किल हो गया है? फ़िलहाल इस सवाल का कोई ज़वाब नहीं है क्यूंकि कांग्रेस ने अब तक ऐसा कोई कार्यक्रम साझा नहीं किया है।

चंद पूँजीपतियों के हक़ में सरकारों के निरन्तर काम करने और पूँजीपतियों के लूट को सुगम बनाने पर क्या कांग्रेस रोक लगाने का इरादा रखती है, इसका भी कोई ज़वाब फ़िलहाल कांग्रेस की ओर से नहीं आया है। इसी तरह साम्प्रदायिकता आधारित राजनीति भाजपा की ताक़त है लेकिन भाजपा के विकल्प के तौर पर जिस कांग्रेस को जनता देख रही है, उसने इस सियासत पर अब तक कोई हमला नहीं किया है और खुद उसका दामन भी इस सियासत के लिहाज़ से पाक साफ़ नहीं है।

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राहुल गाँधी की मनमोहक तस्वीरों में निहाल होती जनता, कपड़ो पर बहस करती मीडिया एवं सोशल मीडिया अंत में क्या हासिल करेगी, ये प्रश्न अभी फ़िलहाल प्रश्न ही है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ सचमुच टूटते बिखरते लोगों को जीवन देगी या एक सियासी इवेंट बन कर रह जायेगी, ये प्रश्न अभी फ़िलहाल अनुत्तरित है।

कांग्रेस समर्थक मित्र एवं पत्रकार कांग्रेस से सवाल पूछने पर नाराज़गी जताते हैं, लेकिन हमें सोचना पड़ेगा कि सवाल पूछते हुए किसी पार्टी का समर्थन आपको समर्थक बनाता है लेकिन प्रश्न रहित समर्थन से आप भक्त बन जाते हैं। अफ़सोस भारतीय जनता सियासी दलों के समर्थक से भक्त में तेज़ी से बदल रही है।

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इन सबके बावजूद राहुल गाँधी और उनकी पार्टी की फ़िलहाल की कोशिशों का मैं समर्थन करता हूँ और जो लोग ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में सहयोग दे रहे हैं उन्हें सलाम करता हूँ। लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं कांग्रेस से सवाल पूछने के हक़ का समर्पण नहीं करूंगा। जिन तीन सवालों से मैंने बात शुरू की थी, उन पर फ़िलहाल कांग्रेस के तरफ से कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती, लेकिन उनके साथ आम लोगों के जुड़ने की जो गति है, उसे देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि ये जनदबाव उन्हें शायद जनोन्मुख नेता भी बना ही डाले।

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सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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