पुरोहितों से वैदिक रीति से शादी करवाना अपराध है

शूद्र शिवशंकर सिंह यादव

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 In 1819, by the Act 7, the Brahmins prohibited the purification of the women.  (On the marriage of the Shudras, the bride had to give her physical service at the house of Brahmin for at least three nights without going to her mother’s house.)
 ब्रिटिश सरकार ने 1819 में अधिनियम 7 द्वारा ब्राह्मणों द्वारा शूद्र स्त्रियों के शुद्धिकरण पर रोक लगाई। (शूद्रों की शादी होने पर दुल्हन को अपने पति यानि दूल्हे के घर न जाकर कम से कम तीन रात ब्राह्मण के घर शारीरिक सेवा देनी पड़ती थी।)
इस विषय पर एक फिल्म बन चुकी है। कुछ लोगों ने प्रतिक्रिया स्वरूप मुझे यह भी कहा कि आप शूद्रों को कलंकित करने वाली छिपी बुराइयों से पर्दा हटाकर और भी कलंकित कर रहे हैं। कुछ हद तक आपका सोचना सही भी हो सकता है। लेकिन मेरा मक़सद केवल यह बताना है कि एक पीढ़ी का अत्याचार दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लिए आस्था और परम्परा बनती चली आ रही है। यह परंपरा इतनी खतरनाक है कि अत्याचार एक कहानी मात्र बनकर रह जाता है और जहां अत्याचार करनेवाला देवता सिद्ध कर दिया जाता वहीं अत्याचार सहनेवाला नीच-दुष्ट पापी मान लिया जाता है। भारत में ब्राह्मणों द्वारा दुहराए जानेवाले विवाह के सारे मंत्र स्त्री विरोधी हैं। सप्तपदी और चौथी की परम्पराएँ स्त्रियों के लिए न केवल कलंक हैं बल्कि शूद्रों के लिए जीवित अपमान भी हैं। दुर्भाग्य यह है कि अपमानित होनेवाला इन परम्पराओं को ओढ़कर ही गौरव महसूस कर रहा है। ब्राह्मण इसलिए मेरी बात से बौखलाता है क्योंकि मैं उसके द्वारा प्रचारित और थोपी गई गुलामी से लोगों को मुक्त करने का अभियान चला रहा हूँ जिसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि ब्राह्मणों की परजीवी अर्थव्यवस्था मिटेगी। जब शूद्र उसके मंत्रों और पोथी-पत्रों को अपने जीवन में निषेध कर देगा तब या तो ब्राह्मण भूखे मरेगा या फिर मेहनत-मशक्कत करेगा। वह असल में मुझसे इसीलिए खौफ खाता है कि मैं शूद्र होने में नीचता का अनुभव नहीं करता लेकिन सदियों से बहिष्कृत, वंचित और अपमानित अपने भाई-बंधुओं से जुड़ रहा हूँ। इस जुडने से ब्राह्मण का धर्म खतरे में पड़ रहा है। उसका चातुर्वर्ण खतरे में पड़ रहा है।
गौर कीजिये कि जब तक ब्राह्मण हमलोगों को शूद्र कहकर अपमानित करता रहा तब तक उसका धर्म खतरे में नहीं था क्योंकि उसके अपमान से बचने के लिए हम अपनी जातीय पवित्रता तलाश रहे थे। यह जातीय पवित्रता ही दरअसल ब्राह्मणवाद  का सबसे बड़ा हथियार रहा है। वह क्षत्रियों की एकता से खतरे में कभी नहीं पड़ेगा क्योंकि जो भी अपने को क्षत्रिय साबित करेगा वह ब्राह्मणों को श्रेष्ठ बनाए बिना संभव नहीं है। आज तक सभी शूद्रों से घृणा करते रहे हैं। यहाँ तक कि शूद्र भी शूद्रों से घृणा करते रहे हैं। यह घृणा ही ब्राह्मणवाद का सबसे मजबूत आधार है। लेकिन जब मैंने अपने नाम के आगे शूद्र लिखा तो मेरे अंदर शूद्रों के लिए गहरी संवेदना, प्रेम और भ्रातृत्व पैदा हुआ। अचानक लगा कि मेरा परिवार करोड़ों लोगों का है। मेरा ही परिवार सबके पेट के लिए अन्न पैदा कर रहा है। वही सबके लिए कपास और रहने के लिए घर बना रहा है। मैं अपने परिवार के योगदान पर जितना गौरवान्वित हूँ उसकी वंचना, पीड़ा और बहिष्कार से उतना ही आहत हूँ।
लेकिन पिछले कुछ सालों से मैं देख रहा हूँ कि ब्राह्मण मेरी पोस्ट पर कूद-कूद कर आते हैं और बहस करने की कोशिश करते हैं । हारते हैं तो गाली देकर भाग जाते हैं। फिर वे किसी क्षत्रिय बनने वाले शूद्र को मेरे पीछे लगाते हैं लेकिन मैं यह साफ-साफ देख रहा हूँ कि मेरे आंदोलन से ब्राह्मणों में घबराहट है। उन्हें उम्मीद भी नहीं थी कि यह हमारी एकता का इतना बड़ा आधार है जो एकता एक दिन ब्राह्मणवाद को उखाड़ फेंकेगी। इसलिए जिनको शूद्रवाद का भूत सता रहा है उनको भी मैं कहना चाहूँगा कि अपने अपमानों को पहचानें और अपने बिछड़े हुये भाइयों से जुड़ जाएँ।
मैं अपनी उम्र के लोगों को इस बात की याद दिलाना चाहता हूँ। साथ ही कहना चाहता हूँ कि आज की पीढ़ी के लोग अपने दादा-परदादा या अपने आसपास के बुजुर्गों से इस बात की जानकारी ले सकते हैं। उनसे पूछ सकते हैं।
40-50 साल पहले या उसके आसपास के समय में शादी के बाद विदाई के समय बेटियाँ या लड़कियां राग अलापते हुए दर्दनाक, हृदयविह्वल रुलाई रोती थीं कि पूरा माहौल रोने लगता था। मैं खुद ऐसी परिस्थितियों से गुजर चुका हूँ। इस बात को सोचकर बुरा भी लगता था कि बेटी के सुखी दाम्पत्य के लिए एक अच्छा दूल्हा और परिवार खोजने में जिस बाप के जूते-चप्पल घिस जाते थे। घर-द्वार तक बिक जाते थे। ऐसी खुशहाली के समय यह मातम भरी रूलाई क्यों? यह प्रश्न अक्सर मेरे जेहन में आता था। अक्सर लड़की नीचे लिखी पंक्तियाँ रोते हुये कहती थी। रुलाई के समय गाई जाने या कही जाने वाली बातें अपने बुजुर्ग माता या दादी से सुन सकते हैं..
   माई-रे-माई.., काहें कोखिया में जन्मवली रे माई…
  जन्मवते काहें न गलवा दबाई देहली रे माई…
 ..काहे न जहरवा देई देहली रे माई…
  इ दिन काहें के देखे देहली रे माई…
  माई-रे-माई, कांंहे कोखिया में जन्मवली रे माई…
..काहे न कुंववा में फेक देहली रे माई..
..कांहे कोखिया में जन्मवली रे माई... आदि।

हमें विद्वान ब्राह्मण कोई एक मंत्र बता दें, जो शादी के समय, आंधी-तूफान, आग, बारिश या किसी भी अन्य अनहोनी घटना से बचा सके। या फिर शादी के बाद तलाक की नौबत न आने पाए।

धीरे-धीरे लड़कियों के शिक्षित होते जाने और समय के बदलाव के साथ ऐसी परंपरावादी रुलाइयां कम या कहें लगभग बंद होती जा रही हैं।
आपको जानकर आश्चर्य होगा कि ऐसी पारम्परिक रुलाई के पीछे, सदियों से चली आ रही ब्राह्मणवादी अय्याशी औरअत्याचार था।
पहले शादियाँ हिंदू वैदिक रीति से शादी 12-15 की उम्र में ही हो जाया करती थी। शुद्धिकरण के लिए दुल्हन पहले दूल्हे के घर न जाकर, ब्राह्मण पुरोहित के यहां तीन दिन तक के लिए जाती थी। चाहे पुरोहितों की उम्र में 70 की हो या 80 की। दुल्हन जो 12-13 वर्ष की 30-35 किलोग्राम से ज्यादा की नहीं होती होगी। धार्मिक परंपराओं के कारण उसकी सेवा करना उस नयी नवेली दुल्हन की मजबूरी होती थी।
विदाई के समय हृदयविह्वल रुलाई का कारण यही था कि वह भाग्य और भगवान द्वारा बनाई गई परम्परा के अनुसार किसी जल्लाद के यहां जा रही होती थी। तीन दिन बाद जब दुल्हन अपने ससुराल पति के यहां जाती थी, तभी दुल्हन का भाई या पिता चौथे दिन उसकी तबीयत या दयनीय हालात जानने के लिए साथ में कुछ मिठाई या साज-समान के साथ उसके ससुराल जाता था। फिर उनको देखते ही वही दिल को दहला देने वाली रुलाई का सामना बाप या भाई को करना पड़ता था।
द अर्ल आफ मोइरा ने 1819 में एक्ट 7 कानून बनाकर इस प्रथा को बन्द कराया था। यह परम्परा आज भी परम्परागत चौथी के नाम पर चल रही है। परम्परा को मानने वाले कभी इस परम्परा के कारणों को जानना नहीं चाहते बल्कि चौथी की यह परम्परा आज तो बहुत ही विस्तार, दिखावे और उत्साह के साथ निभाई जा रही है।
यह भी एक मुख्य कारण था कि शूद्रों के पहले पुत्र को गंगा-दान रीति रिवाज के अनुसार गंगा, जमुना या किसी अन्य नदी में जिन्दा फिंकवा दिया जाता था। लार्ड बिलियन बैंटिक ने इस हत्या को 1835 में कानून बनाकर बन्द करवाया।
कलेक्टेड वर्क्स ऑफ डा० अम्बेडकर वोल्यूम-17 में लिखा है कि ऐसी प्रथा को हिंदू लोग अपनी इज्जत और भाग्य समझते थे। यहां तक कि राजा लोग भी अपनी रानियों का कौमार्य भंग कराने या शुद्धिकरण के लिए ब्राह्मण को अपने महलों में निमंत्रण देकर गाजे-बाजे के साथ बुलाते थे।

बुनकरी के काम में महिलाओं को न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल पाती

शादी के समय पढ़ा जानें वाला मंत्र भी देख लीजिए।
ॐ श्री गणदिपत गणपति गुंगवा महे, गणतुआ गुंगवा महे, वर कन्यायाम गुंगवा महे!
पणतुआ वसहु मम जान, गर्भधम्रांतु इदम कन्यादेव अर्पण सक्षमेव, गर्भाधिम इति वरं समर्पयामि।।
सामान्य हिन्दी भाषा में अर्थ –
ओम् श्री गणेश जी, घर का मुखिया गूंगा-बहरा है, इसके रिश्तेदार गूंगे-बहरे हैं। वर-कन्या भी गूंगी-बहरी है। प्राणों से प्रिय, तुम मेरे मन में बसी हो, मुझे जानो। मैं कन्या को गर्भवती करने में सक्षम हूं। इस कन्या को मुझे अर्पण कर दो। मैं इसे गर्भवती कर के वर को समर्पित कर दूंगा।
पुरोहित बोलो- स्वाहा (स्व-आ-हा) यानि लड़की  के माता-पिता से जो मांगा गया है, वह दो।
 कन्या का पिता कहता है- स्वहा (स्व-हा), मेरी-हां यानि जो ब्राह्मण द्वारा मांगा गया उसे दे दिया।
 यही नहीं, आज भी शादी के वक्त वधु से सातों वचन जो दिलाए जाते हैं, उसमें सबसे पहला और मुख्य वचन यह होता है।
 पहला वचन मैं अपने पुरोहित की, उनकी इच्छा अनुसार दान-दक्षिणा, सेवा सत्कार करती रहूंगी, उसमें पतिदेव का कोई हस्तक्षेप नहीं  होगा। इस वचन को लेकर शादी के समय कई बुद्धिजीवियों द्वारा विरोध जताने पर अब इस वचन को समझदार पंडितों ने निकाल दिया है।
मैंने कई बार शादी के समय ऐसे वचनों और नियमों का विरोध किया है। कई बार माहौल खराब होने के डर से मैं खुद शादी के समय मंडप में आग्रह करने के बाद भी नहीं जाता हूं।
इसलिए आज भी पत्नियां, पति से ज्यादा अपने पंडित, पुरोहित की बातों  को तवज्जो देती हैं। इसलिए पाखंडी व्रत, पूजा -पाठ, सत्संग और त्योहारों को लेकर कई बार पतियों से मनमुटाव भी हो जाता है। कभी-कभी तो सामाजिक प्रतिष्ठा को देखते हुए और पत्नी की जिद के आगे, पति बेचारे को मजबूरी में झुकना पड़ जाता है। इसलिए पाखंड और अंधविश्वास को बढ़ावा देने में घर की महिलाओं का बहुत बड़ा योगदान रहता है।

पंडितों द्वारा वैदिक मंत्रों से शादी का जो 4-5 घंटे तक कार्यक्रम चलाया जाता है, वह सिर्फ अपनी पेट-पूजा के उद्देश्य से, लोगों को बेवकूफ, अंधविश्वासी, पाखंडी और सभी से अपना पैर पूजवाकर, अपने से सभी को नीच बनाने का एक षड्यंत्र मात्र है। यहां तक कि नीचता का ऐसा घिनौना अपराध जो शादी के समय मधुपर्क विधान के अनुसार, लड़की के बुजुर्ग बाप से दामाद का पैर धुलवाए जाते हैं, जिसे चरणामृत या पादोदक भी कहा जाता है।
अकाल मृत्यु हरणं सर्व व्याधि विनाशनम्।
विप्रो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न लिहयते।।
अर्थात पादोदक पीने से अकाल मृत्यु नहीं होती, सभी रोगों का विनाश हो जाता है और पुनर्जन्म भी नहीं होता है।
मान्यता है कि इस चरणामृत को पीकर कन्यादान करने वाला, अपना दिन भर का व्रत उपवास खत्म करता है। कहीं-कहीं यह भी प्रथा है कि दुल्हन की मां, अपनी बेटी का पैर पखारकर, उसी पानी को पीकर अपना दिन भर का उपवास व्रत तोड़ती थी। अब इस चरणामृत को कोई पीता नहीं है, पंडित कहता है मुंह से सटाकर, सर पर छिड़क लो। जब कि शास्त्रों के अनुसार चरणामृत कहीं और छिड़कना अधर्म है।
यह विधान सिर्फ लड़की के बाप के आत्मसम्मान को नीचा दिखाने का षड्यंत्र है। हमें विद्वान ब्राह्मण कोई एक मंत्र बता दें, जो शादी के समय, आंधी-तूफान, आग, बारिश  या किसी भी अन्य अनहोनी घटना से बचा सके। या फिर शादी के बाद तलाक की नौबत न आने पाए।
सिन्दूरदान से पहले, सबसे महत्वपूर्ण सप्तपदी और अवदान विधि होती है। पंडितों की वैदिक रीति से यह दावा होता है कि शूद्रों की सभी कुंवारी लड़कियां ब्राह्मण की सम्पत्ति होती हैं। लड़की का भाई मंत्रोच्चार से देवता पुरोहित से कहता है कि मेरी बहन को मुक्त कर दो, उसकी शादी के लिए मैंने बहुत ही अच्छा दूल्हा ढूंढ़ लिया है। उसी मौके पर पंडित लड़की को मुक्त करने के लिए लड़की वालों से 101, 501, 1001–10001 आदि हैसियत के अनुसार डिमांड करता है। मांगी गई राशि देने के बाद ही वह उसे मुक्त करता है। तभी देवी-देवताओं द्वारा  आसमान से फूलों की बारिश होती है। जिसे दोनों तरफ से लावा फेंकने के रूप में दिखाया जाता है। इसी को वैदिक मंत्रोच्चार कहा जाता है।
शादी के समय मंत्रोच्चार कर कन्या-दान भी अपराध है।
सांलकारां च भोग्या च सर्वस्त्रां सुन्दरी प्रियांम्।
यो ददाति च विप्राय चंद्रलोके महीवते।।   (देवी भागवत 9/30)
अर्थात  भोग करने योग्य सुन्दर कुंवारी कन्या को वस्त्र आभूषणों सहित ब्राह्मण को दान करेगा, वह चंद्रलोक पहुंच जाएगा।
इसी कन्यादान के कारण ही देवदासी प्रथा चालू हुई और देश भर में लाखों देवदासियां नारकीय जिन्दगी जीने को मजबूर हैं। यही नहीं, आज भी कुछ अंधभक्त अपनी बहन-बेटियों को साधु-संतों को दान देते हैं और आशाराम बापू जैसे लोग पैदा होते रहते हैं।
इसी ब्राह्मण दान के रूप में शादी के समय बाप से बेटी का दान भी कराया जाता है। क्या आपकी बेटी कोई वस्तु है जो आप दान में देते हैं? दान का मतलब ही होता है, दिया और भुला दिया, फिर कभी उसे वापस लेने या उसके बारे में पूछताछ करने का भी अधिकार आपने खो दिया है। जब ससुराल वाले आपकी बेटी को मारते हैं, पीटते हैं, जिन्दा जलाते हैं, तब आपको घड़ियाली आंसू  बहाने का कोई औचित्य नहीं बनता है।
पंडितों से शादी करवाना भी मानसिक गुलामी का सबसे बड़ा कारण है। यही नहीं, आज के इस भगवा शासनकाल में पुरोहित पंडित कभी भी शूद्रों को अच्छा आशीर्वाद या शुभकामनाएं दे ही नहीं सकता। यदि आपने उसकी डिमांड के मनमाफिक दक्षिणा दे दिया, तब तो कुछ गनीमत  है, अन्यथा वर-वधू और पूरे परिवार को बद्ददुआएं ही देता रहता है। साथ ही साथ पाखंड, अंधविश्वास और ऊंच-नीच की भावना भी समाज में पैदा कर चला जाता है। इसलिए पंडितों से शादी-विवाह करवाना अपराध है। यही अपराध आपको ज़िन्दगी भर वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं होने देता है।

कुछ लोग विकल्प की बात करते हैं। विकल्प के रूप में स्वतंत्रता के बाद संविधान लागू होते ही आर्टिकल 13 के अनुसार ऊंच-नीच की भावना से ग्रसित ब्राह्मण से शादी कराने पर प्रतिबंध लगाते हुए कोर्ट-मैरिज का प्रावधान किया गया है। जिसे आजतक संवैधानिक रूप से लागू ही नहीं किया गया है। संवैधानिक वचनबद्धता के साथ यह सबसे शुभ और अच्छा है। आपको इतना ज्ञान तो है कि शादी किसी से भी कराएं लेकिन तलाक के लिए कोर्ट में ही जाना पड़ता है।

कुछ लोग विकल्प की बात करते हैं। विकल्प के रूप में स्वतंत्रता के बाद संविधान लागू होते ही आर्टिकल 13 के अनुसार ऊंच-नीच की भावना से ग्रसित ब्राह्मण से शादी कराने पर प्रतिबंध लगाते हुए कोर्ट-मैरिज का प्रावधान किया गया है। जिसे आजतक संवैधानिक रूप से लागू ही नहीं किया गया है। संवैधानिक वचनबद्धता के साथ यह सबसे शुभ और अच्छा है। आपको इतना ज्ञान तो है कि शादी किसी से भी कराएं लेकिन तलाक के लिए कोर्ट में ही जाना पड़ता है। देखने में भी आया है कि कोर्ट मैरिज का तलाक दूसरों की तुलना में बहुत ही कम होता है।आजकल बौद्ध रीति से शूद्रों में शादियों का प्रचलन खूब चल रहा है।

यदि आप हिन्दू रीति-रिवाज से ही शादी करना या करवाना चाहते हैं तो ब्राह्मण से तो कत्तई मत करवाइये। जैसे आप रिंग सेरेमनी, बरच्छा जैसे काम बिना पंडित से करते-करवाते हैं, ठीक वैसे ही घर की औरतों से ही शादी गीत के साथ, बाराती स्वागत, मिलनी, द्वारपूजा, फिर शादी की सभी मुख्य रस्में वरमाला, सिन्दूर लगाना, सात फेरे और अन्त में वर-वधू से प्रतिज्ञा लिखित या जुबानी बुलवा दीजिए। वर-वधु के साथ पारिवारिक फोटो खिंचवाते हुए आशीर्वाद समारोह सम्पन्न करवाते हुए शादी कीजिये।
पंडितों द्वारा बताए गए अन्य सभी ढकोसलों को बन्द कर दीजिए। ब्राह्मण संस्कृत के मन्त्रों में आपको सिर्फ गाली देता है। आप हिन्दी अर्थ के साथ शादी करने का आग्रह करिए तब वह तैयार नहीं होगा। यदि पंडितों से हिंदी बताने का आग्रह करेंगे तो वे या तो गलत अर्थ बताएँगे या बताने से बचेंगे। कभी तैयार नहीं होंगे। यदि आप सही में पूरी शादी हिन्दी में समझ लिए तो यकीन मानिए, आप तुरंत ही शादी रुकवा कर पंडित को भला-बुरा कहते हुए वहां से भगा देंगे।
इतना जानने के बाद भी कुछ मूर्ख हमें ही अपशब्द बोलते हुए अपने बाप-दादा की चली आ रही परंपरा की दुहाई देते मिल जाएंगे। कहावत भी है कि एक पीढ़ी का शोषण या अत्याचार दूसरी-तीसरी पीढ़ी के लिए श्रद्धा या परंपरा बन जाती है। इसलिए अपनी तर्कसंगत बुद्धि और पैनी नजरों से ब्राह्मणों द्वारा पैदा किए गए ऐसे सभी तरह के पाखंड, अंधविश्वास, श्रद्धा के रूप में, तेरहवीं, दसवां, मृत्युभोज, पिंडदान और ऐसी अन्य परंपराओं को लात मारने में ही शूद्रों की भलाई है।
गूगल @शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
लेखक शूद्र एकता मंच के अध्यक्ष हैं। 
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