जॉनसन और नरेंद्र (डायरी 23 अप्रैल, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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यह कहने की बात नहीं है कि एक दिन में केवल 24 घंटे होते हैं। यह सभी जानते हैं। लेकिन घटनाओं की संख्या के हिसाब से यदि मैं स्वयं का आकलन करूं तो हर घंटे कम से कम दो घटनाएं ऐसी होती हैं, जिन्हें मैं लिख लेना चाहता हूं। वजह भी होती इन घटनाओं के पीछे। जीवन का मतलब भी इसी तरह की घटनाएं हैं और यदि ये घटनाएं ना हों तो फिर जीने में क्या खाक मजा है। तो मैं तो इसी तर्ज पर अपना जीवन जीता हूं। रही बात घटनाओं को दर्ज करने की तो मेरी अपनी सीमाएं हैं। हालांकि नोटबुक में उन्हें कीवर्ड के रूप में दर्ज अवश्य करता हूं।

कल तीन घटनाएं ऐसी हैं, जिनके बारे में लिखना जरूरी है। एक तो यह कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘नरेंद्र’ कहकर संबोधित किया और भारतीय प्रधानमंत्री को यह नागवार नहीं गुजरा। मैं तो सोच रहा हूं कि यदि ऐसा कहनेवाले नेपाल के प्रधानमंत्री होते या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री होते फिर युगांडा के राष्ट्रपति होते तो क्या तब भी हमारे प्रधानमंत्री दांत चिहाड़कर हंसते? शायद नहीं। क्योंकि ब्रिटेन का स्थान अहम है। वह संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और पूर्व भारतीय शासक राष्ट्र भी है। लेकिन इसके बावजूद क्या यह वाजिब था? या फिर  बोरिस जॉनसन और नरेंद्र मोदी दोनों एक ही तरह के लोग हैं। इनमें मैं कॉमेडियन या फिर ऐसा कुछ भी नहीं कह सकता। लेकिन दोनों का स्वभाव गंभीर नहीं है। और इससे भी महत्वपूर्ण भारत की अपनी प्रतिष्ठा है। बोरिस जॉनसन यह भूल गए कि जिसे वे केवल नरेंद्र कह रहे हैं, वह महज एक व्यक्ति नहीं, इस देश का प्रधानमंत्री है। क्या इससे पहले कभी किसी भी विदेशी मेहमान ने ऐसा किया है? कम से कम मेरी जानकारी में ऐसा नहीं है। यहां तक कि परवेज मुशर्रफ जब भारत आए थे तब उन्होंने अटलबिहारी वाजपेयी के लिए जनाब अटलबिहारी वाजपेयी ही कहा था और वह पूरे अदब के साथ। मुशर्रफ तो खैर अच्छी जुबान बोलते थे, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो कि मेरी नजर में सबसे अगंभीर अमरीकी राष्ट्रपति रहे, ने भी नरेंद्र मोदी के लिए सम्मानसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया था।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'नरेंद्र' कहकर संबोधित किया और भारतीय प्रधानमंत्री को यह नागवार नहीं गुजरा। मैं तो सोच रहा हूं कि यदि ऐसा कहनेवाले नेपाल के प्रधानमंत्री होता या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री होते फिर युगांडा के राष्ट्रपति होते तो क्या तब भी हमारे प्रधानमंत्री दांत चिहाड़कर हंसते? शायद नहीं। क्योंकि ब्रिटेन का स्थान अहम है। वह संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है और पूर्व भारतीय शासक राष्ट्र भी है।

खैर, यह तो भारत सरकार को चाहिए कि वह आपत्ति जताए और बोरिस जॉनसन पर दबाव बनाए कि वह भारत से माफी मांगें। अलबत्ता यदि वे अपने मित्र के यहां आए होते वह भी ब्रिटिश प्रधानमंत्री की हैसियत से नहीं तो फिर मुझे भी क्या जरूरत होती यह बात दर्ज करने की। मित्रता में तो आदमी अपने मित्र को कुछ भी कह देता है।

मित्रता से एक बात याद आयी। मेरा एक मित्र था गुरजीत सिंह। दारोगा प्रसाद राय उच्च विद्यालय, चितकोहरा, पटना में मेरे साथ पढ़ता था। उसने फोन किया। मेरे लिए यह एक अंजाने का कॉल था। अब 25-26 साल पहले के लोगों की आवाज कौन याद रखता है। मुझे तो उसका नाम भी याद नहीं था। फोन पर उसने बताया कि वह गुरजीत सिंह है और मेरा सहपाठी मित्र रहा है। मेरा नंबर उसे एक वामपंथी साथी ने दिया है, जो चितकोहरा में ही रहते हैं। मेरे बारे में उसकी दिलचस्पी की वजह यह रही कि मेरा एक आलेख एक पत्रिका में उसने पढ़ा था और उसे यकीन था कि लेखक मैं ही था।

खैर, हमदोनों ने करीब आधे घंटे तक बातचीत की। उससे वादा किया कि अगली बार जब पटना आऊंगा तब हम अपने स्कूल में ही मिलेंगे। फिर चाहे जितने सहपाठी एकत्रित हो सकें।

लालू प्रसाद, जिन्होंने बिहार में जनपक्षीय राजनीति को एक नई दिशा दी, उन्हें दस लाख रुपयों के निजी मुचलके के आधार व शर्तों (राजनीति नहीं करने की शर्त) के साथ रांची हाईकोर्ट ने जमानत दी है। क्या ऐसा करके वे लालू प्रसाद को सीमित कर सकेंगे? और ऐसे शर्त का मतलब क्या है?

तो मैं बात कर रहा था भारत की और इसके साख की। कल ही बोरिस जॉनसन ने कहा कि ब्रिटेन में रहनेवाले आधे भारतीय मूल रूप से गुजरात के हैं और इसलिए वह पहले गुजरात गए। कल ही चुनाव आयोग ने एक प्रस्ताव दिया है कि प्रवासी भारतीयों को ‘डाकमत’ का अधिकार दिया जाए। यह भारतीय लोकतंत्र को अपनी ऊंगली पर नचाने सरीखा है।

खैर, बोरिस जॉनसन और नरेंद्र मोदी के फेर में कहीं मैं दो अन्य बातों को दर्ज करना भूल ना जाऊं। एक तो यह कि कल लालू प्रसाद को जमानत मिल गयी। सोमवार तक वे जेल से बाहर होंगे। कल एक मित्र ने इस संबंध में मुझसे खास की अपेक्षा की। मुझे आश्चर्य हुआ कि लालू प्रसाद, जिन्होंने बिहार में जनपक्षीय राजनीति को एक नई दिशा दी, उन्हें दस लाख रुपयों के निजी मुचलके के आधार व शर्तों (राजनीति नहीं करने की शर्त) के साथ रांची हाईकोर्ट ने जमानत दी है। क्या ऐसा करके वे लालू प्रसाद को सीमित कर सकेंगे? और ऐसी शर्त का मतलब क्या है?

लालू जी का चिर-परिचित अंदाज़

तीसरी बात का संबंध भी बिहार से ही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कल राजद नेता तेजस्वी प्रसाद यादव के द्वारा आयोजित इफ्तार पार्टी में शामिल हुए। यह वाकई एक अलग घटना है क्योंकि आज अमित शाह कुंवर सिंह की स्मृति में आयोजित भाजपा के राजनीतिक कार्यक्रम में भाग लेने बिहार जाएंगे। इसके एक दिन पहले नीतीश कुमार का तेजस्वी के निमंत्रण पर इफ्तार पार्टी में शामिल होने के गहरे निहितार्थ हो सकते हैं। कदाचित यह मुमकिन है कि वे समझ चुके हैं कि भाजपा कुंवर सिंह के नाम पर बिहार में छद्म राष्ट्रवाद का खेल खेलेगी और ऐसे में राजद का संरक्षण उनके लिए अनिवार्य होगा।

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बहरहाल, इफ्तार में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव सरीखे नेताओं का एक साथ आना सुकून देनेवाला है। नफरत चाहे जैसे भी इंसानों के मन से खत्म होना ही चाहिए और इसे खत्म करने की पहल करने की जिम्मेदारी हमारे हुक्मरानों की है।

रही बात खुद की तो कल ग़ालिब को पढ़ते-पढ़ते नींद आ गयी। एक पंक्ति जेहन में पूरी रात रही–

कहूं किससे मैं कि क्या है, शब-ए-गम बुरी बला है,

मुझे क्या बुरा था मरना, अगर एक बार होता? 

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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