एक ऐसा अभिनेता जो हिंदी सिनेमा की परम्परा को तोड़ता है

राकेश कबीर

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फिल्म बरेली की बर्फी एक सीन

आयुष्मान खुराना बॉलीवुड के भरोसेमंद और प्रतिभाशाली अभिनेता हैं। वह फिल्मी दुनिया में बाहरी व्यक्ति हैं मतलब किसी जमे- जमाए परिवार से नहीं आते हैं। उनके साथ एक अच्छी बात यह रही है कि उन्हें ऐसे विषयों पर फिल्में मिलीं जिन पर मुनाफादृष्टि वाले मुंबइया निर्माता-निर्देशक रिस्क समझकर बचते रहे हैं। आयुष्मान ने न केवल ऐसे विषयों वाली फिल्मों में लीड रोल किया बल्कि वे सुपरहिट भी हुईं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकर हैं। न केवल अच्छा अभिनय करते हैं बल्कि गाते भी बहुत अच्छा हैं और दर्शक उन्हें पसंद करते हैं। फिल्म समीक्षकों से भी उन्हें अच्छी प्रतिक्रियाएं मिली हैं। आयुष्मान ने अपनी फिल्मों में स्पर्म डोनर, नपुंसकता, शीघ्र पतन, समलैंगिक और ट्रांसजेंडर, बॉडी शेम जैसे विषयों पर बुने गए चरित्रों को निभाया। नए क्षेत्रों में सफलता पाने के लिए रिस्क लेना पड़ता है, आयुष्मान और उनके फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों ने ऐसे विषयों पर फिल्म बनाकर रिस्क लिए और बड़ी संख्या में दर्शकों के सोचने समझने के स्तर को उच्चीकृत और विस्तृत करने का महत्वपूर्ण काम किया। दरअसल, एक संचार माध्यम के रूप में फिल्मों की यह भूमिका है कि वे जनशिक्षण का कार्य करें और समाज में एक विमर्श और संवाद का माहौल तैयार कर लोकतान्त्रिक वातावरण को समृद्ध करें।

फिल्म गुलाबो सिताबो एक सीन

डब्लू एफ. आगबर्न जैसे प्रसिद्ध मानवशास्त्री ने सन 1922 मे social change with respect to culture and original nature में cultural lag की अवधारणा का प्रतिपादन किया था। भौतिक संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों को समाज तेजी से स्वीकार कर लेता है लेकिन अभौतिक संस्कृति में परिवर्तन धीमी गति से होता है। कार्ल मार्क्स ने भी उत्पादन के साधनों (तकनीकी) में तेज गति से होने वाले गुणात्मक परिवर्तनऔर उत्पादन के संबंधों में होने वाले धीमी और रेखीय परिवर्तनों के अंतर को विशेष रूप से रेखांकित किया था। जीवन के सभी आयामों में निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं। भारतीय समाज में शिक्षा और तकनीकी के प्रसार के साथ मानवीय संबंधों में भी कई बदलाव हुए और कई संबंध जो कानून की नजर में आपराधिक कृत्य माने जाते थे उन्हें अदालत ने अपराध से बाहर कर लीगलाइज़ कर दिया। सन 2018 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने नवतेज सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के केस मे निर्णय दिया कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंध गैर आपराधिक होंगे और भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को अप्रभावी कर दिया था। कई अन्य न्यायालयों ने समय-समय पर विवादित मुद्दों, जैसे लिव-इन-रिलेशनशिप इत्यादि पर भी तार्किक फैसले सुनाए हैं। फिल्मों और कानूनी फैसलों ने बहुत-सी विवादित विषयों पर नयी समझ बनाने और जनता की सोच को बदलने का काम किया है। समाज मे अंतर्विवाह, बहिर्विवाह, प्रतिषिद्ध संबंध (incest taboos), मजाक और दूरी के परिभाषित और परंपरागत संबंध हैं जिसका अनुपालन लोग करते हैं और जिनका उल्लंघन करने पर दंड की भी व्यवस्था है।

बॉलीवुड दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने वाली इंडस्ट्री है जिसमें बहुत सारा पैसा निवेश किया जाता है और लाभ और हानि दोनों उठानी भी पड़ती है। हमें यहाँ फिल्म डर्टी पिक्चर की नायिका सिल्क स्मिता का एक संवाद याद रखना चाहिए जो वह बार-बार दुहराती है, ‘फिल्में क्या हैं इंटरटेनमेंट, इंटरटेनमेंट और इंटरटेनमेंट और मैं इंटरटेनमेंट हूँ। श्लील और अश्लील सिनेमा पर बहस में अक्सर कुछ बड़े फिल्मकार (भट्ट कैंप) यह कहते रहते हैं कि पब्लिक जो देखना चाहती है हम वही सिनेमा बनाते हैं, लेकिन यह कितना सच या झूठ है हम सभी जानते हैं। जनता हमेशा अच्छे और सार्थक व संदेशपरक मनोरंजन को पसंद करती है ऐसा उसने बार-बार साबित किया है। किसी अनछुए या विवादित विषय पर फिल्म बनाने से इसीलिए ज्यादातर फिल्मकार डरते हैं क्योंकि एक फिल्म के असफल होने से उन्हें करोड़ों का नुकसान उठान पड़ता है। परंतु यहीं पर आयुष्मान और उनकी फिल्में हमें सोचने पर मजबूर करती हैं कि वे नए, रिस्क भरे विषयों पर बेहिचक फिल्में बनाते हैं और वे ही फिल्में 100 करोड़ से ज्यादा बिजनेस करके सुपरहिट भी होती हैं।

आयुष्मान खुराना की विविधतापूर्ण प्रमुख फिल्में 

फिल्म नौटंकी साला एक सीन

विकी डोनर (2012) नौटंकी साला (2013), बेवकूफियाँ (2014), हवाइज़ादा (2015), दम लगाके हाइशा (2015), मेरी प्यारी बिन्दु (2017), बरेली की बर्फ़ी (2017), शुभ मंगल सावधान (2017), अंधाधुन (2018), बधाई हो  (2018), आर्टिकल 15 (2019), ड्रीम गर्ल (2019), बाला (2019), शुभ मंगल ज्यादा सावधान (2020), गुलाबो सिताबो (2020), चंडीगढ़ करे आशिक़ी (2021)

फिल्म अन्धाधुन एक सीन

सूजित सरकार जैसे प्रतिभाशाली निर्देशक ने अपनी पहली ही फिल्म विकी डोनर में आयुष्मान को लीड रोल दिया और इसके लिए उन्हें प्रथम फिल्म में अच्छा अभिनय करने वाले अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। दम लगाके हाइशा फिल्म की हीरोइन (भूमि पेंडेकर) मोटापे की शिकार है जिसके साथ शादी के बाद नायक आयुष्मान शर्म महसूस करता है और एक परंपरागत रेस में उसे अपनी पत्नी को पीठ पर लेकर दौड़ता है। साहचर्य से दोनों में प्रेम होता है और बाद में जीवन सामान्य हो जाता है। रंग, कद, बॉडी साइज़ को लेकर महिलाओं को अपमान का शिकार होना पड़ता है, यह फिल्म इस समस्या को सही परिप्रेक्ष्य मे प्रस्तुत करती है। शुभ मंगल सावधान फिल्म में आयुष्मान ने एक ऐसे युवा की भूमिका की है जो शीघ्रपतन (erectile dysfunction) का शिकार है। आपने ट्रेन यात्रा करते वक्त किनारे के दीवारों पर सफेद रंग से पुते इश्तहारों पर हकीमों के नाम, पते और मोबाइल नंबर देखे होंगे जो दावा करते हैं कि ‘’नामर्द, शीघ्रपतन, स्वप्नदोष और गुप्त रोगी संपर्क करें हकीम/वैद्य फलाने’’। शहर के हाशिये पर तने काले तंबुओं में भी लाउड्स्पीकर बजाकर ऐसी बीमारियों का शर्तिया इलाज का दावा ठोंका जाता है। इन नीम-हकीमों और शर्तिया इलाज के इश्तहार वाले डॉक्टरों के पास कितने लोग जाते हैं पता नहीं, लेकिन आयुष्मान खुराना इस समस्या को फिल्म में उठाकर दर्शकों की शर्म और लज्जा को दूर करने का काम जरूर करते हैं। अपनी सबसे बड़ी हिट फिल्म अंधाधुन में आयुष्मान ने एक ब्लाइन्ड पियानो वादक की भूमिका की और तब्बू जैसी समर्थ अभिनेत्री को कड़ी टक्कर दी है।

फिल्म बाला एक सीन

फिल्म बधाई हो में आयुष्मान एक ऐसे नौजवान की भूमिका में हैं जो अपनी गर्लफ्रेंड से शादी करने की तैयारी में है उसी समय उसे पता चलता है कि उसकी माँ गर्भवती है। उसके दोस्त, गर्लफ्रेंड सभी उसका मजाक उड़ाते हैं । वह शर्म से परेशान हो उठता है लेकिन धीरे धीरे इस सच को स्वीकार कर इस दकियानूस समाज को जवाब देना सीख जाता है। मैंने अपने गाँव में कई नौजवान लड़कों को अपने माँ बाप से इस बात पर लड़ते गलियाते देखा है कि उनके माँ बाप बुढ़ापे में कैसे बच्चा पैदा करने की सोच सकते हैं। फिल्म ड्रीम गर्ल भी एक बड़ी हिट फिल्म रही है।

फिल्म चंडीगढ़ करे आशिकी का एक सीन

चंडीगढ़ के रहने वाले आयुष्मान ने पढ़ाई के बाद बिग एफ एम में एंकर की नौकरी से अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत की थी। इस फिल्म मे नौकरी खोजते-खोजते वे एक काल सेंटर मे नए लड़कों, विधुरों और अपनी पत्नियों के व्यवहार से तंग रसिक मिजाज चाचा लोग को एक काल्पनिक लड़की पूजा के रूप में मनोरंजन करता है। एक पुलिसवाला (विजयराज), उसका खुद का बाप (अन्नू कपूर) और उसका होने वाला साला सभी पूजा से शादी करने के सपने देखने में लगे हैं। वह दोहरी ज़िंदगी जीने को मजबूर है और अपने फोन से परेशान है जो 24 घंटे बजता है और उसकी जान सांसत/आफत में डालता रहता है।

फिल्म शुभ मंगल सावधान का एक सीन

बाला फिल्म में उन्होंने गंजेपन के शिकार युवा की भूमिका के माध्यम से सामाजिक ताने-बाने और बॉडी शेम की समस्या को सामने रखा है कि लोग और प्राकृतिक शारीरिक कमियों को भी कलंक समझकर ऐसे लोगों का दर्द और बढ़ा देते हैं। अपनी अगली फिल्म शुभ मंगल ज्यादा सावधान में आयुष्मान ने एक गे की भूमिका की है जिसकी भारतीय समाज में बिल्कुल स्वीकार्यता नहीं है। उनकी अभी रिलीज हुई फिल्म चंडीगढ़ करे आशिक़ी बेहद बोल्ड और संवेदनशील विषय gender dysphoria को प्रस्तुत करती है। एक लड़का जिसके गुण लड़कियों जैसे हैं और वह अपना लिंग परिवर्तन कराकर लड़की (वाणी कपूर-मानवी बरार) बन जाती है। उसके पिता को छोड़कर सभी लोग उससे मारे शर्म के दूरी बना लेते हैं, वह अपना घर-शहर छोड़कर चंडीगढ़ में  रहने लगती है और Zumba dance की ट्रेनर बन जाती है। वहीं जिम में उसकी मुलाकत बॉडी बिल्डर मनु (आयुष्मान) से होती है। दोनों करीब आते हैं शादी करना चाहते हैं लेकिन लड़की जब अपनी सच्चाई बताती है पहलवान मनु के अंदर का पितृसत्तावादी मर्द पागल हो उठता है कि उसने एक लड़के से शारीरिक संबंध बना लिए। इस अफसोस  और कलंक की भावना से वह बहुत मुश्किल से बाहर आ पाता है और दोनों की शादी को सभी स्वीकार भी करते हैं। फिल्म में तो समस्या का समाधान हो जाता है लेकिन भारतीय समाज इस बात को अभी स्वीकार कर पाने में  बहुत समय लगाएगा।

फिल्म आर्टिकल 15 का एक सीन

आयुष्मान खुराना ने एक शहरी मिडिल क्लास युवा की छवि बना ली है जो बॉय नेक्स्ट डोर है। वह अपनी छोटी-बड़ी दिक्कतों से खुद दो-चार होता है और समाधान ढूँढता है।  फिल्म आर्टिकल 15 में वह एक सवर्ण आईपीएस अफसर बने हैं जो बलात्कार और हत्या की शिकार लड़कियों के केस की जांच कर दोषियों को सजा दिलाते हैं। इस फिल्म का एक संवाद जो नायिका (ईशा तलवार) का  है कि ‘हमें किसी नायक का इंतजार करने की जरूरत नहीं है’, बल्कि खुद समाधान का प्रयास करना होगा। तात्पर्य यह है कि हमें दूसरों का इंतजार करने की जगह खुद समाधान का हिस्सा बनना होगा। सच के पक्ष में लड़ना और आवाज उठाना होगा। उनकी फिल्मों के पात्रों के जो नाम दिए गए हैं वह भी बताते हैं कि आयुष्मान एक अर्बन मिडिल क्लास के नौजवान हैं : विकी अरोरा, आरपी/राम परमार,  मोहित चड्ढा, शिवकर बापूजी तलपड़े, प्रेम तिवारी, अभिमन्यु रॉय, चिराग दुबे, मुदित शर्मा,आकाश सराफ़, नकुल कौशिक, रयान रंजन, कर्मवीर/पूजा, बालमुकुंद शुक्ल, कार्तिक सिंह, बाँके रस्तोगी, मानविंदर मुंजाल/मनु, इत्यादि।

फिल्म हवाईजादा का एक सीन

दर्शकों पर प्रभाव

अपने अलग तरह के विषय वाली फिल्मों के माध्यम से आयुष्मान ने अपने दर्शकों का मनोरंजन करने के साथ ही उनकी सोच के दायरे को बढ़ाने और परिवर्तित करने का काम किया है। दर्शकों ने इन अनछुए और गलत समझे जाने वाले मुद्दों के बारे में सोचना और बात करना आरंभ किया है। आयुष्मान और उनके निर्देशक जिस साहस से विवादित और गैर परंपरागत विषयों पर फिल्में बना रहे हैं वह जोखिम भरा लेकिन सराहनीय है। परंपरागत सोच और पूर्वाग्रहों से आगे जाकर सच को, बीमारियों को, प्राकृतिक दोषों को स्वीकार करने के लिए खुद को तैयार करने से समाज के उस तबके को मुख्यधारा में लाने में  सहयोग मिलेगा। गे, लेस्बियन, ट्रांसजेंडर, ओवरवेट व्यक्ति यदि डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, जन प्रतिनिधि बनकर देश की सेवा करते हैं तो उनकी स्वीकारोक्ति बढ़ेगी और उन्हे अपनी पहचान या शरीर की बनावट को लेकर शर्म नहीं करना पड़ेगा। मेरा यह मत है कि आयुष्मान खुराना की फिल्में समाज को ऐसे विषयों के बारे में सोचने और स्वीकार करने के लिए तैयार करती हैं जिन पर कल तक कोई बात करें को तैयार नहीं था।

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लम्बी रेस का घोड़ा है यह अभिनेता 

राजकुमार राव भी फिल्मी दुनिया में आउटसाइडर हैं और अपनी प्रतिभा के दम पर लगातार अच्छी फिल्में कर रहे हैं और सफल भी हैं। उनकी नई फिल्म बधाई दो (2022) भी एक लेसबियन लड़की और गे लड़के के बीच अपने माता-पिता को खुश करने के लिए की गई शादी और उसके बाद के परिणामों पर बनी एक मनोरंजक फिल्म है। ऐसी फिल्मों को देखकर निश्चित रूप से यह कहा जा सकता है कि बॉलीवुड में विषयों में विविधता आने के साथ ही प्रतिषिद्ध विषयों पर भी फिल्में बनने लगी हैं और दर्शक उन्हें पसंद भी कर रहे हैं। यहाँ यह कहना जरूरी हो जाता है कि फिल्में केवल मनोरंजन ही नहीं करतीं बल्कि एक साथ ढेर सारे दर्शकों को प्रभावी संदेश देने का भी काम करती हैं। शारीरिक कमियों, स्वाभाविक जरूरतों को छुपाना या उन्हे कलंक समझना, उनके लिए अपमानसूचक शब्दों का प्रयोग करना मानवीय और कानूनी दोनों तरह से गलत है।

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आयुष्मान खुराना ने ऐसी कई फिल्मों में काम किया है जो गैर परंपरागत विषयों पर बनी हैं वे अपने एक इंटरव्यू में खुद स्वीकार करते हैं, “Quirky and taboo subjects have become ‘my zone’. However, I have always attempted to do something different-case in points being films like Andhadhun and Article 15. I did try for some different stuff. Our country is bursting at the seams with taboo subjects. We may be progressive, but we are also regressive and conservative in some ways. There’s diversity in all areas of life and it helps filmmakers cover such forbidden topics. And there is a need to make movies on such stimulating issues and characters,”. हम उम्मीद करते हैं कि प्रतिभावान और साहसी अभिनेता, गायक और एंकर आयुष्मान ऐसी तमाम विषयों पर फिल्में लेकर आएंगे जो मनोरंजन करने के साथ ही समाज को सकारात्मक संदेश देने और कमियों वाले लोगों को स्वीकार करने सम्मान देने के लिए तैयार करने में मददगार साबित होंगी।

संदर्भ –

Basu, Mohar (2015) Ayushmann Khurrana: I was playing safe by taking up conventional films, in timesofindia.com on 27 january 2015.
Ramchandran, S. (2021) Quirky and taboo subjects have become my zone’: Ayushmann Khurrana on his movies, in The Free Press Journal on November 10, 2021.

राकेश कबीर जाने-माने कवि-कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

4 Comments
  1. Manoj kumar yadav says

    हिंदी सिनेमा की जानकारी में पूर्व की भांति ज्ञानवर्धक लेख

  2. Tarkeshwar Patel says

    हर बार की तरह इस बार भी आपने हिंदी सिनेमा के बारे में एक नई जानकारी दी। सिनेमा का मतलब यह होता है कि वह मनोरंजन के साथ साथ समाज को को एक संदेश दे जिससे समाज का कल्याण और उत्थान हो सके। समाज में व्याप्त कुरीतियों विसंगतियों पर बनी फिल्में वाकई में प्रेरणादायक होती हैं और इनके सुधार में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह लेख पठनीय, रोचक और आत्मसात करने योग्य है। बहुत बहुत बधाई एवम सुभकमनाएं।?????????

  3. Gulabchand Yadav says

    बढ़िया और पठनीय आलेख। आयुष्मान खुराना प्रतिभाशाली और प्रयोगधर्मी एक्टर हैं जो चैलेंजिंग भूमिकाओं को स्वीकारने और उन भूमिकाओं को डूबकर साकार करने का माद्दा रखते हैं। सार्थक और उद्देश्यपूर्ण हिंदी सिनेमा को उनसे काफी उम्मीदें हैं। आपने उनकी विविधरंगी भूमिकाओं और बदलते दौर की अनछुई समस्याओं/विषयों की ओर भी संकेत किया है जिनसे मुंह चुराने की आम प्रवृत्ति रही है।
    आशा है कि इसी कड़ी में आप राजकुमार राव, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, तापसी पन्नू, विद्या बालन, स्वर्गीय इरफान खान, नाना पाटेकर जैसे अन्य कलाकारों की अभिनय कला के विभिन्न आयामों पर भी कलम चलाएंगे।
    इस पठनीय आलेख के लिए आपको बधाई और शुभकामनाएं।

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