आखिरी टुकड़ाः  विवश जन के प्रतिरोध की कहानियां

भोला प्रसाद सिंह

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 कहानीकार संजय गौतम के कहानी संग्रह  आखिरी टुकड़ा की पहली और सर्वाधिक लंबी कहानी है आखिरी टुकड़ा। पच्चीस कहानियों के इस संग्रह में शहर से गांव ज्यादा मुखर है। आखिरी टुकड़ा बिसेसर भैया और उनके बेटे जयप्रकाश की वैचारिक टकराहट की कहानी है।

आखिरी टुकड़ा रोटी का टुकड़ा नहीं है, लेकिन जमीन का वह टुकड़ा है जो रोटी देता है, लोगों को नया जीवन देता है। आदमी की भाषा में इसका नामकरण किया गया है खेत। आखिरी टुकड़ा बिसेसर भैया के खेत की मार्मिक कहानी से जुड़ा हुआ है। यह खेत गांव के सीमांत, चमचमाती चौड़ी सड़क के किनारे है। बिल्डरों के लिए यह खेत नहीं सोने की खान है। प्लाटिंग कर टुकड़े-टुकड़े में बेचकर बिल्डर या नया मालिक मालामाल हो जायेंगे। इसलिए बिल्डर या प्रमोटरों की गिद्ध दृष्टि ऐसे खेतों पर लगी हुई है। खेत-मालिक को भी मुँहमांगी कीमत मिल जायेगी। लेकिन बिसेसर दूसरी मिट्टी के बने हैं। भाइयों में बंटवारे के बाद खेत का जो हिस्सा मिला है, वही उसका आखिरी टुकड़ा है। इस टुकड़े का एक छोटा सा टुकड़ा भी बेचने के लिए वह कतई राजी नहीं है। इरादे के पक्के होने के बावजूद वह हार जाते हैं, किसी दूसरे से नहीं अपने बेटे जयप्रकाश से। जयप्रकाश को आधुनिक साधनों से लैस चमचमाता हुआ फ्लैटनुमा भवन चाहिए। जयप्रकाश दो टूक शब्दों में अपने पिता बिसेसर  से कहता है-  नहीं करना है एग्रीमेंट तो हमारा हिस्सा अलग कर दें। हम बनाएंगे अपनी जिंदगी। हम इनकी तरह नहीं काटेंगे।

संजय गौतम की एक-दो कहानियों में नहीं प्रायः सभी कहानियों में वाराणसी की जनपदीय बोलियों के शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया गया है। इसके कारण पात्रों की भाषा में गंवई मिट्टी की सुगंध मिलती है साथ ही एक नये प्रकार के ध्वनि सौंदर्य का एहसास।

आखिरी टुकड़ा की तरह बसंता का दुख भी गंवई जीवन का एक टीसता हुआ टुकड़ा है। कहानी का नामकरण ही बतलाता है कि इसका केंद्रीय पात्र बसंता है और कथानक है पंचायत चुनाव। पंचायत का चुनाव हो और वहां जात-पात केंद्रीय मुद्दा न हो, यह कैसे मुमकिन है।

बसंता खुटहन गांव का सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा युवक है। वह ग्रेजुएट है लेकिन वह कभी जाति-बिरादरी के दांव-पेंच के कारण, कभी ऊँची बिरादरी और पिछड़ी बिरादरी की टकराहट में और कभी वोटों की खरीद-बिक्री के कारण हारता रहा है। एक पढ़ा-लिखा, समझ-बूझ रखने वाला बसंता पंचायत दफ्तर में कभी पहुंच न सका। इस कहानी का सबसे पीड़ा दायक पक्ष है चुनाव में नीति-सिद्धांत के प्रति गहरी उदासीनता और सदियों से चली आ रही मनुवादी प्रवृत्तियों  का सबसे ऊँची सतह पर फौलादी पंजों की तरह जमे रहनाI बसंता के दुख कई स्तरों पर है। वह यदि पिछड़ी जाति और गरीब परिवार में जन्म नहीं लेता तो बसंत होता, बसंता नहीं।

किताब आखिरी टुकड़ा और लेखक संजय गौतम

बसंता का दुख कहानी को पढ़ते हुए फाफामऊ (इलाहाबाद) के कहानीकार स्वामीनाथ भारती की कहानी पलायन की याद आती है। पलायन में भी पंचायत चुनाव की क्षुद्र और जात-पात की राजनीति का निरपेक्ष चित्रांकन किया गया है।

एक कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी कठोर और खूंखार व्यक्ति का प्रतिरोध कर सकता है, यदि वह निर्भय हो जाय और मौत का भय छोड़ दे। सुग्गी की आँख इसी मनोभाव से प्रेरित कहानी है। आलोच्य कहानी में सुग्गी एक विधवा और बेसहारा स्त्री है। वह गांव के बाहर एक झोपड़ी बना कर रहती है। जीने-खाने के लिए उसके पास डेढ़-बीघा जमीन है। उस पर भी भतीजा की आंख लगी हुई है। उस जमीन को हड़पने में अपने को असमर्थ पाकर उसने गांव के छँटे गुंडे भोनू तिवारी से सांठ-गांठ कर सुग्गी की हत्या करवा दी। पिस्तौल की नोंक पर भोनू तिवारी ने जमीन के कागजात पर ठप्पा लगवा कर सुग्गी की हत्या तो करवा दी। लेकिन उसकी आँखें  भोनू के अंदर प्रवेश कर गईं। जीवन के आखिरी क्षण में सुग्गी ने जिस गजब की मुद्रा में भोनू को देखा उसे वह भुला नहीं पा रहा था। निरीह और बेसहारा के आत्मबल ने अपराधी को अंदर से हिला दिया। एक निहत्था और कमजोर आदमी हत्यारा के सामने गिड़गिड़ाता है, जमीन की भीख माँगता है लेकिन सुग्गी ने ऐसा कुछ नहीं किया जैसे कोई हंसते-हंसते सूली पर चढ़ने जा रही है।

सुग्गी मर कर भी हत्यारे को परास्त कर देती है। अस्पताल के बेड पर पड़े-पड़े भोनू तिवारी के मुँह से बहुत हल्की आवाज़ निकली— चच्चा, इ सुग्गिया की आंख नहीं भूलती है, बहुत कांड किये बाकी ऐसा नहीं हुआ, इ तो लगता है जान ले के छोड़ेगी। बाहुबली तिवारी मानो अंदर से चरमरा गया हो। आलोच्य कहानी गांधीजी के उस नारे की याद दिलाती है मारेंगे नहीं, मानेंगे नहीं। सुग्गी के आत्मबल में प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि के सूरदास की निडरता और दृढ़ता प्रतिबिम्बित होती है। भोनू तिवारी दस्तखत करने के लिए सुग्गी को धमकाता है तो सुग्गी दो टूक जवाब देती है— हमसे अड़बी-तरबी बतियाय रहे हो, धमकी दे रहे हो, जान लोगे बेवा की, हमरे सामने चमकाओ मत, मारना है तो मार डालो, मार के ले लो खेत, कौन है हमरे रोवैया।  जब तक उसकी सांस चलती रही, न तो उसपर किसी धमकी का असर पड़ा और न वह ह्त्या के खौफ के सामने  नतमस्तक हुई। कहानी का शीर्षक सुग्गी की आँख  जरूर है लेकिन उन आँखों में आग्नेय अस्त्र निहित है, उसे जान देना कबूल था पर किसी बड़े से बड़े गुंडे और अपराधी के सामने सिर झुकाना नहीं। अन्याय के विरुद्ध एक बेसहारा और बेवा स्त्री की करूण कथा नहीं बहादुरी और दुसाहस की कथा है। थोड़ी सी गंभीरता से सोचने पर लगता है कि आसमान में कितने सितारे हैं, धरती पर उतनी ही समस्यायें हैं। दुर्घटना कहानी का मुख्य पात्र  बेरोजगारी की समस्या से तो मुक्त हो गया लेकिन महानगर में नौकरी मिलने के साथ आवासीय समस्या मुँह बाये खड़ी हो गयी। दूर की बुआ के यहाँ टिकने का आश्रय तो मिला लेकिन परिवेश दमघोंटू, गंधाता, सार्वजनिक पाखाना, भिन्न-भिन्नाती मक्खियाँ, जल्दी-जल्दी किसी तरह निपट कर वह बाहर निकला और नहाने के लिए कतार में खड़ा हो गया। ऐसे ही अवांछित परिवेश में छः दिन तो कट गये, लेकिन सातवें दिन उसे काफी अचरज हुआ कि पूर्ववर्ती दिनों की तरह बुआ जी के मकान की दमघोंटू परिस्थिति का एहसास नहीं हो रहा था। परिस्थितियों ने युवक के लिए अवांछित परिवेश को ही वांछित के सांचे में ढाल दिया। बदलती हुई परिस्थिति युवक के लिए  घटना नहीं बल्कि एक दुर्घटना है।

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पंख जम जाए तो कहानी का आरंभ एक कौतूहल, खिलंदड़े मनोभाव से शुरू होता है, लेकिन कहानी एक पढ़े-लिखे दामपत्य जीवन की रस्साकश्शी पर केंद्रित है। उनका ईगो ही इस तनाव का आधार हैI

तुम्हारी कहानी में शामिल नहीं होऊँगा– किसानी जीवन का दस्तावेज है। किसानों के एक नहीं ढेर सारे मोर्चे हैं। उसकी बर्बादी में कभी प्रकृति कहर ढाती है कभी चतुराई और धन-दौलत से समृद्ध व्यक्ति। मुकदमेबाजी उस मोटे ग्रंथ की भांति होता है, जो जल्दी खत्म होने का नाम नहीं लेती। किसनों को जोंक की तरह चूसने में वकील से जज तक शामिल हैं। आधुनिक जीवन में निरंतर विश्वसनीयता का ह्रास एक राष्ट्रीय कलंक हैं।

इस संग्रह में लखोटिया साहब एक व्यक्ति केंद्रित कहानी है, कहानी में आद्यंत लखोटिया साहब का व्यक्तित्व आच्छादित है। निस्संदेह लखोटिया साहब कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति हैं, अपने काम को ठीक समय पर पूरा करने की अडिग इच्छा उनमें रहती है और चाहते हैं कि उनके मातहत भी ठीक समय दफ़तर पहुँचें और ड्यूटी आवर पूरा होने पर ही ऑफिस छोड़े। लखोटिया साहब ने कई कर्मचारियों की लेट लतीफी भी छुड़ा दी है। लेकिन कर्तव्यनिष्ठ के अतिशय भाव के कारण उनमें कई ऐसी ग्रंथियां उत्पन्न हो गयी हैं, जिसके कारण उनका दिल दिमाग जड़ बन गया है। इसी का परिणाम है कि अपनी माँ की मृत्यु के दो दिन बाद वे अपने घर पहुंचे। अवकाश ग्रहण करने के बाद भी अकारण ही वह लोगों के सामने थोड़ा हाथ उठाकर थोड़ी गर्दन हिला लेते थे। वे अपरिचितों के साथ भी ऐसी हरकतें करते रहते थे। उन्हें लगता था कि वे अभी भी ऑफिस के बड़े साहब हैं। इसलिए अवकाश के बाद भी वे अपने पुराने रोब-दाब को नहीं छोड़ पाते।

हाशिए से बाहर का शब्द हाशिए पर पड़े रहने कि आत्मपीड़ा की कहानी है। इसका केंद्रीय पात्र एक लेखक है। गिनती के कुछ लेखकों को छोड़कर सबकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती। कुछ प्रतिष्ठित लेखक या तो ऊंची तनख्वाह की नौकरी करते हैं या शिक्षण संस्थानों के ऊंचे पदों पर प्रतिष्ठित हैं। अधिकांश की नियति संघर्षपूर्ण जीवन जीना है। अहिंदी क्षेत्र के लेखकों की स्थिति जरूर बेहतर है और अहिंदी राज्यों की सरकार भी इस संदर्भ में संवेदनशील हैं तथा सजग पाठकों की संख्या भी हिंदी प्रदेशों की तुलना में ज्यादा है। ‘हाशिए से बाहर का शब्द’ कहानी का नायक भी शिक्षण और लेखन दोनों मोर्चें पर सक्रिय है लेकिन आधी उम्र निकल जाने के बाद भी वह अपने टूटे-फूटे मकान की मरम्मत नहीं करवा पाता, जबकि उसका छोटा भाई सुरेश एक बेहतरीन मकान बनवाकर घर-बाहर की तारीफ बटोर लेता है।कथानक के अंदर नागफनी का चुभना नायक की  अन्तर्वेदना की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। अपनी तमाम लियाकत के बावजूद अपने लिए हाशिए पर भी जगह नहीं बना पाते और वे उस शब्द की तरह हैं जिसके लिए हाशिए पर भी कोई ठौर नहीं है।

गांव की गंगा शीर्षक पर नज़र पड़ते ही पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की बहुचर्चित पुस्तक तालाब आज भी खरे हैं, कौंध गई। अनुपम जी ने राजस्थान के गांवों के उन तालाबों की महत्ता की ओर पाठक का ध्यान खींचा है, जिन तालाबों की स्वच्छता का ख्याल पवित्र स्थल की हद तक किया जा रहा है।

कहानियों के क्रम में एक कहानी का नाम चौंकाता है— वह अभी तक मरा नहीं — अनोखेपन के हिसाब से और भी कई कहानियों के नाम लिये जा सकते हैं, यथा- तुम्हारी कहानी में शामिल नहीं होऊँगा, हाशिए से बाहर का शब्द, पंख जम जाए तो आदि। बहरहाल हम वह अभी तक मरा नहीं कहानी पर थोड़ी देर के लिए ठहर जायें। कहानी एक नया एहसास कराती है कि दुर्घटनाओं की फेहरिस्त दुनिया की आबादी की तरह तेजी से बढ़ती जा रही है— ‘जांघिया उतार कर सीने में चाकू घोंप देना’ हत्या के तरकीब पुराने हैं लेकिन 1984 के पहले गैस त्रासदी में बेहिसाब लोगों की मौत का एक नया चेहरा था। ‘सेफ ड्राइव, सेव लाइफ’ के नारे का जितना प्रचार हो रहा है, सड़क दुर्घटनाएं उतनी बढ़ती जा रही हैं। हर शहर सीमा क्षेत्र बन चुका है।

कहीं भी किसी कारण से लींचिंग (यानी जिंदा जबह) की घटनाएं आम हो गयी हैं। देश की आबादी से भी अधिक रफ्तार से आतंकवादियों की फौज बढ़ी है। ऐसे में किसी को यह एहसास होना कि ‘वह अभी तक नहीं मरा’ सोचने वाला साइकियाट्रिक मरीज तो नहीं हो सकता, आतंक के साये में जीने वाला शख्श जरूर हो सकता है।

गांव की गंगा शीर्षक पर नज़र पड़ते ही पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र की बहुचर्चित पुस्तक तालाब आज भी खरे हैं, कौंध गई। अनुपम जी ने राजस्थान के गांवों के उन तालाबों की महत्ता की ओर पाठक का ध्यान खींचा है, जिन तालाबों की स्वच्छता का ख्याल पवित्र स्थल की हद तक किया जा रहा है।

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गांव की गंगा संग्रह की छोटी सी कहानी है, लेकिन बड़ी कहानियों जैसा प्रभाव पाठकों पर डालती है। व्यक्ति का निजी स्वार्थ प्रकृति और प्राणी दोनों का सत्यानाश कर रहा है। गांव की बात छोड़ दें, छोटे-बड़े शहरों में कितने पोखर और डबरे हुआ करते थे। बहुत से शहरों में बड़ी-बड़ी झीलें हुआ करती थीं। सरकारी अधिकारियों की लापरवाही के साथ रिश्वतखोरी और तालाब के मालिक  के गैरकानूनी साठ-गाठ से तालाब का भराव शुरू हुआ। पोखर-तालाब के भरते ही समतल जमीन की कीमत बेतहाशा बढ़ी और शहर, कस्बे और गांव के नक्शे से तालाब, डबरा के साथ बड़े-बड़े बगीचे गायब होते गये। समतल जमीन पर तेज़ी से फ्लैट, मॉल, व्यवसाय के बड़े-बड़े शो रूम से शहर सजने लगे, प्रकृति की छाया जीवन से दूर भागने लगी। बेतहाशा बिजली की जगमगाहट में शहर की कुरुपता निर्जन और गंदी बस्ती में ठेल दिये गये। जीवन का कोई हिस्सा भीड़-भाड़, शोर-शराबे तथा तरह-तरह के वाहनों से मुक्त नहीं रहा। आखिरी टुकड़ा संग्रह की कहानियों का एक बड़ा हिस्सा उस दोहन की कहानी को परोक्ष ढंग से व्यक्त करती है, जिसके कारण खेती-बारी, ताल-तलैया, पशु-पक्षी, सभी नये-नये संकट के शिकार होते जा रहे हैं। व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए समष्टिगत स्वार्थ की बलि बढ़ती जा रही है। संजय गौतम ने छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा गाँव, शहर, खेत-खलिहान, जात-पात, चुनाव आदि का चित्रण किया है।

इस समीक्षा का प्रारंभ ही आखिरी टुकड़ा कहानी की चर्चा से हुआ है, इस बड़े परिप्रेक्ष्य की कहानी के लिए वह टिप्पणी अपर्याप्त लगी। वास्तव में यह कहानी एक स्वतंत्र समीक्षा या टिप्पणी की मांग करती है। दुहराव के लिए पाठक क्षमा करें। पुनः एक छोटी सी भूमिका के लिए निवेदन करता हूँ।

इस देश की आबादी जल्द ही डेढ़ अरब की सीमा को छूने वाली है। संप्रति कुल आबादी 130 करोड़ के आस-पास है, जबकि अंग्रेजी राज में लॉड कर्जन के शासन काल में मात्र 30 करोड़ से ज्यादा नहीं थी। यानी पिछले सौ वर्षों के दौरान आबादी में लगभग सौ करोड़ का इजाफा हुआ है। आबादी बढ़ रही है लेकिन जमीन तो सिकुड़ रही है।

जल प्रदूषण के कारण नदियाँ अपने किनारों का लगातार कटाव कर रही है और ऐसे किनारों के बाशिन्दे शरणार्थी बन रहे हैं। ओटो सिमसन जोहान्स की अंग्रेजी में एक फिल्म  वन एवरी सेकेण्ड बताती है कि दुनिया में कैसे केवल जलवायु परिवर्तन के कारण प्रति सेकेण्ड एक व्यक्ति विस्थापित होता है। नर्मदा बांध के कारण बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं। एकान्त श्रीवास्तव की कविता में नर्मदा नदी के बाँध के कारण विस्थापितों की पीड़ा को व्यक्त किया गया है। संजय गौतम की कहानी आखिरी टुकड़ा में विस्थापन की समस्या नहीं है लेकिन सिकुड़ते हुए खेतों की समस्या चिंताजनक रूप में उपस्थित है। खासकर ऐसे सीमांत गांव जहाँ चिकनी कोलतारी, चौड़ी-चौड़ी सड़कें अवश्य हैं ताकि कारों  की आवाजाही आसानी से हो सके।

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इन नव दौलतियों को शांत और साफ-सुथरा परिवेश चाहिए। बिसेसर के खेत भी सीमांत पर हैं और पक्की सड़क के किनारे भी। इसलिए बिल्डरों या प्रमोटरों के लिए ऐसे खेत तो सोने की खान हैं। ऐसे खेतों की जमीन के लिए प्लाटिंग करने वाले तो मुँहमांगी कीमत देने को तैयार हैं। बिल्डरों ने बिसेसर भइया के बेटे जयप्रकाश को लोभ के जाल में फंसा लिया है। लेकिन कहानी यहीं से शुरू नहीं होती। इसकी शुरुआत तो भारत की स्वाधीनता के बाद से हो गयी है। सबसे पहले महानगरों की बढ़ती आबादी को कोलाहल और उफनती हुई भीड़ की चिल्लपों से बचाने के लिए सैटेलाइट टाउन बनाये गये। महानगर कोलकाता को सेटेलाइट शहर के रूप में साल्ट लेक और न्यूटाउन मिले तो दिल्ली का नोएडा और हरियाणा को गुरुग्राम जैसे नियोजित शहर। महानगरों के बाद छोटे-छोटे शहरों के सीमांत खेतों की ओर प्लाटिंग करने वालों की नजर गयी। घनी आबादी की भीड़-भाड़ से मुक्ति के लिए ही तो नव दौलतिए पैसे बहा रहे हैं।

‘अंगूठा’ मांगने और अंगूठा दान की चर्चा में द्रोणाचार्य और एकलव्य के प्रसंग का याद आना स्वाभाविक है, लेकिन पैसे की जरूरत के लिए अपने अंगूठे को कटवा लेने वाले की कैसी मजबूरी होगी? चलती हुई मशीन के नीचे अपने अंगूठे को रखने के पहले उसे खुद से कितना लड़ना पड़ा होगा? लेकिन उनके सामने अपनी विवशता के घेरे से निकलने का कोई रास्ता न होगा और अंत में उस तेज धारदार मशीन को चढ़ावा के रूप में अपने अंगूठे को सौंप दिया होगा। कैसी-कैसी विवशता में लोग जिन्दगी को झेलते हैं। अंगूठा पाठक को स्तब्ध कर देने वाली कहानी है। कैसी विडम्बना है कि घर के लिए उसने घर छोड़ा और परिवार की जरूरत के लिए अंगूठा, हाथ की सबसे कारगर अंगुली। अस्पताल में कटा हिआ अंगूठा डॉक्टर ने गिलास में रख दिया था। उसे देखकर बड़े भाई ने अपने अंगूठे को देखा, जिसके सहारे अभी वह लिख रहा है। ‘अंगूठा कहानी यदि निर्मम सच्चाई को बयां करती है तो गिफ्ट समकालीन समाज में बढ़ता दिखावा, आर्थिक हैसियत के आधार पर व्यक्ति से व्यक्ति का मिलना-जुलना दिखाया गया है। सम्पन्न वर्ग का नकलचीपन सबसे अधिक उजागर होता है ‘गिफ्ट’ कहानी में।

संजय गौतम की इस कहानी में पंचतंत्र की रंगत है। कहानी के बदले इसे किस्सा कहना ज्यादा अर्थवान होगा। कहानी ग्यारह रातों में सोने के पहले पप्पू को उसकी दादी सुनाती हैं। राजा जो भी छल-प्रपंच रचता है वह जनता के नाम पर और इन प्रपंचों को जनकल्याण के रूप में प्रचार करती है लोमड़ी। लेकिन राजा, मंत्री लोमड़ी की गतिविधियों पर भी चौंकन्नी नजर रखता है ताकि खुद किसी संकट में न पड़े। इस बात को वह हमेशा याद रखता है कि वह जंगल का राजा है, जहां पशु-पक्षी बहुमत में रहते हैं। मोटे तौर पर यह कहना गलत न होगा कि मानवेतर प्राणियों के माध्यम से आदम जात की असलियत को बयान किया गया है, तभी तो राजतंत्र और लोकतंत्र जैसे शब्द कहानी में ध्वनित होते हैं। कहानी इस अर्थ में खास है कि राजा खुद कवि होना चाहता है और अपनी मूर्ति भी स्थापित करवाता है

एक था राजा शीर्षक ही बतलाता है कि कहानी किस्सागोई शैली में लिखी गई है। कहानी विधा के साथ किस्सा शब्द युगों से चलता आ रहा है— किस्सा-कहानी। ‘नयी कविता’ के दौर के चर्चित कवि ‘सोमदत्त’ के नायाब कविता संग्रह का नाम है ‘किस्से अरबों हैं’। वास्तव में किस्सों का इतिहास कहानी से बहुत पुराना है। किस्सागो होना कहानीकार का एक वैशिष्ट्य है। लोक कथाकार विजय दान देथा की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार किस्सागोई है। अलेखू हिटलर और दूजौ कबीर जैसी कथाओं की लोकप्रियता की पृष्ठभूमि में किस्सा शैली की सबल भूमिका है।

संजय गौतम की कहानी का शीर्षक है एक था राजा। उस जमाने को गुजरे हुए बहुत दिन नहीं हुए जब घर-परिवार में नानी-दादी इसी शैली में कहानी शुरू करती थी।

एक कहावत है कि किसी से सत्य उगलवाना हो तो उसे एक मुखौटा दे दो। एक था राजा में राज्य के संचालन में पशु जगत की प्रमुख भूमिका है, लेकिन जो परोक्ष रूप में कहानी की दूसरी धारा चलती है— छल, कपट और प्रपंच से युक्त। लोमड़ी के धूर्त स्वाभाव के कारण जंगल के राजा ने उसे मंत्री पद पर बैठाया है और समय-समय पर वह अपनी धूर्तता के बल पर राजा को उपकृत भी करता है। संग्रह की अन्य कहानियों से यह भिन्न रंग-रूप की कहानी है। संजय गौतम की इस कहानी में पंचतंत्र की रंगत है। कहानी के बदले इसे किस्सा कहना ज्यादा अर्थवान होगा। कहानी ग्यारह रातों में सोने के पहले पप्पू को उसकी दादी सुनाती हैं। राजा जो भी छल-प्रपंच रचता है वह जनता के नाम पर और इन प्रपंचों को जनकल्याण के रूप में प्रचार करती है लोमड़ी। लेकिन राजा, मंत्री लोमड़ी की गतिविधियों पर भी चौंकन्नी नजर रखता है ताकि खुद किसी संकट में न पड़े। इस बात को वह हमेशा याद रखता है कि वह जंगल का राजा है, जहां पशु-पक्षी बहुमत में रहते हैं। मोटे तौर पर यह कहना गलत न होगा कि मानवेतर प्राणियों के माध्यम से आदम जात की असलियत को बयान किया गया है, तभी तो राजतंत्र और लोकतंत्र जैसे शब्द कहानी में ध्वनित होते हैं। कहानी इस अर्थ में खास है कि राजा खुद कवि होना चाहता है और अपनी मूर्ति भी स्थापित करवाता है, अपनी खूबियों या तारीफ की पोथियां भी तैयार करवाता है तथा वह स्वयं को लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे बड़ा रक्षक कहते हुए भी हिचकता नहीं है।

कहानी मध्ययुगीन सा प्रतीत होते हुए भी आज के काइयांपन को प्रकट करती है। जंगल का राजा सोचता है किसी को कवि के उच्चासन पर बैठाने के बदले वह खुद ही क्यों न कवि के रूप में प्रतिष्ठित हो जाय। आधुनिक नेता-बिरादरी में तरह-तरह की प्यास जगी है और तृप्ति के भी तरह-तरह के साधन विकसित किये गये हैं। संजय गौतम ने आधुनिक छल-छद्म के तरह-तरह के मुखौटों और रंग-रूपों को पाठकीय मानस के कैनवास पर उतारने का अनूठा प्रयास किया है। जिंदगी की पेचेदीगियों को महसूस करते हुए पाठक एक नये स्वाद की तृप्ति का अनुभव कर सकता है।

(किताब- आखिरी टुकड़ा, लेखक- संजय गौतम, मूल्य– 220 /– रू.)

भोला प्रसाद सिंह वरिष्ठ लेखक हैं और  उत्तर  24 परगना (पश्चिम बंगाल) में रहते हैं 

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