जीवन के विकट संघर्षों ने सुजाता को सामने नहीं आने दिया

विद्या भूषण रावत

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सुजाता पारमिता नहीं रहीं। यह खबर उद्वेलित कर देने वाली है क्योंकि उनकी खराब सेहत के बावजूद उनमें एक जीवटता थी जो उन्हें चलते रहने को मजबूर करती थी। मेरी उनसे मुलाकात करीब 20 वर्ष पूर्व से शुरू हुई और अम्बेडकरवादी महिलावादी लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता रजनी तिलक जी के साथ कई कार्यक्रमों में हमने शिरकत भी किया था ।
समय-समय पर उनकी माँ कौशल्या बैसंत्री के विषय में भी बात होती थी और वह मुझसे कहती कि माँ ठीक हो जायेंगी तो वह मुझसे बातचीत करवाएंगी। उनकी माँ की आत्मकथा दोहरा अभिशाप उनके अपने जीवन के उन पहलू को शामिल किया जो हर स्थान पर पितृसत्ता के फलस्वरूप हुए अन्याय को दिखाते। उनकी माँ बाबा साहेब के आन्दोलन से जुड़ीं थीं और वहीं शेड्यूल कास्ट फेडेरशन के एक सम्मलेन में कानपुर में उनकी मुलाक़ात बिहार से आये एक व्यक्ति से हुई जो गैरजातीय था और उन्हें प्रगतिशील लगा। कौशल्या जी ने तो अपने बचपन में पितृसत्ता के रौद्र रूप को देखा था और इसलिए वह जाति और प्रान्त से बाहर इस उम्मीद के साथ विवाह करने को तैयार हो गईं कि शायद वहाँ इतनी भयावह स्थिति न हो । लेकिन अपनी आत्मकथा में उन्होंने अपने पति के विषय में भी बड़ी बेबाकी और तल्खी से लिखा है और बताया के वह भी औरतों को घर के अन्दर खाना बनाने और बच्चो की देखभाल से अधिक नहीं चाहते थे।

इस विषय में तो हम केवल उनकी आत्मकथा में लिखी गई बातों के आधार पर ही कह सकते हैं। लेकिन सुजाता जी से मिलने पर कभी उन्होंने अपने पिता के विषय में नकारात्मकता नहीं दिखती थी । दरअसल, मेरे साथ वह और गंभीरता से बातचीत करने लगी थीं जब उन्हें पता चला के मै रेडिकल ह्यूमनिस्ट हूँ ।
उन्होंने मुझे बताया कि उनके पिता भी रेडिकल ह्यूमनिस्ट पत्रिका के लिए लिखते थे। उनकी कई किताबें हैं जिनमें से एक भारत के सामाजिक क्रांतिकारी को भारतीय बौद्ध महासभा , दिल्ली ने प्रकाशित की और वह काफी चर्चित रही । सुजाता के पिता देवेन्द्र कुमार बैसंतरी ने हिन्दी और अंग्रेज़ी में समान रूप से लिखा । वे दृश्य श्रव्य प्रचार निदेशालय के निदेशक (डीएवीपी) रहे । मैंने सुजाता से वे रिफरेन्स मांगे थे लेकिन उनके घर के अपने सवालों के कारण बहुत से कागज और महत्वपूर्ण दस्तावेज उन्हें नहीं मिल पाए।

सुजाता अपनी बेटी जुन्हाई के साथ

मै उनके परिवार को नहीं जानता था लेकिन सुजाता जी से बातचीत से पता चलता था कि वह अपनी माँ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को सहेजना चाहती थी और उनकी पुस्तक दोहरा अभिशाप को लोगों तक पहुंचाना चाहती थीं । बेबी ताई काम्बले की द प्रिजन वे ब्रोक की तरह दोहरा अभिशाप भी अम्बेडकरी आत्मकथाओ में पहले स्थान पर आती है क्योंकि ऐसी बेबाकी कहीं दिखाई नहीं देतीं । ये आत्मकथाएं उनकी करुणामयी दास्ताँ भर नहीं हैं अपितु उनके संघर्षों और अम्बेडकरवादी मूल्यों की सशक्त हस्ताक्षर हैं।
सुजाता जी थिएटर से जुड़ीं एक कलाकार भी थीं और पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया से पास आउट करने वाले शायद पहली दलित महिला कलाकार थीं। वहाँ ओमपुरी जैसे कलाकार उनके साथी थे लेकिन उन्होंने कभी भी अपने बड़े लिनक्स को जाहिर नहीं किया और न ही उनके अन्दर कोई बड़प्पन और बनावटीपन आया।
आर्ट में उनकी बहुत दिलचस्पी थी और इसीलिये पारमिता आर्ट नाम से उनकी गैलरी सन्तूर होटल, मुंबई में थी लेकिन वाजपेयी सरकार में उसके डिस-इन्वेस्टमेंट के बाद उनकी गैलरी भी बंद हो गयी । इसका उन्हें बेहद अफ़सोस था। दरअसल जब मेरा उनसे संपर्क हुआ था तो यही दौर था और वह मधुबनी और वारली पेंटिंग्स को नए रूप में ढालकर दलित महिलाओं के संघर्ष को उनके जरिये दिखाना चाहती थीं।

पहली बार मुझे लगा कि वह एक परंपरागत कला का इस्तेमाल कर और उसमें बदलाव कर उसे अम्बेडकरी वैचारिक ढाँचे में लाना चाहती थीं। हम सब जानते हैं कि मधुबनी पेंटिंग्स बनाने वाले अधिकांश कलाकार दलित महिलाएं हैं। लेकिन उसमें देवी-देवताओं की आकृतियों के अलावा कुछ नहीं मिलता। कई बार हम परम्परा पर चलने वाले लोगों को कोसते हैं लेकिन उनकी क्वालिटी का इस्तेमाल करके नया विकल्प नहीं देते। वे अपनी अम्बेडकरी साथी रजनी तिलक जी की तरह ही वह बिना गाली-गलौच के एक सांस्कृतिक विकल्प के लिए कार्य कर रही थीं। उनमे गज़ब की सकारात्मकता थी और शायद वह यह अच्छी तरह से जानती थीं और यूं कहिये के भुक्तभोगी थीं कि ‘दुश्मन’ को गरियाना तो आसान होता है लेकिन जब आपके अपने मनुवादी हों तो उनसे कैसे लड़ोगे।
उनकी माँ ने अपनी आत्मकथा दोहरा अभिशाप में न केवल अपने पति अपितु अपने गाँव की भी कहानी कही थी। कई लोग ये कह सकते हैं कि उनका विवाह अंतरजातीय या अंतर प्रांतीय था इसलिए ऐसा हो सकता था लेकिन सुजाता जी का एक संघर्ष अपने घर पर भी था। उनके पिता ने बहुत काम किया और बहुत ऊंचे पद पर पहुंचे। शायद खूब सम्पति भी अर्जित की। उनके भाई भी बड़ी-बड़ी कंपनियों में डाइरेक्टर और जनरल मैनेजर के पद तक पहुंचे। शायद परिवार ने पैसा बहुत कमाया। लेकिन यही भाई लोग दिल्ली-गाज़ियाबाद में उनके पिता द्वारा ख़रीदे गए फ्लैट्स में से बहन को हिस्सा देने को तैयार नहीं थे।

प्रख्यात कथाकार सुधा अरोड़ा के घर में सुजाता

एक दिन उनका फोन आया और उन्होंने मुझसे कहा के विद्या भूषण अब मै तुम्हारी पड़ोसी बन रही हूँ । मुझे पहले समझ में नहीं आया। फिर उन्होंने मुझे बताया के जिस अपार्टमेंट में मै रहता हूँ वहा उनके पिता ने दो फ़्लैट ख़रीदे हुए थे। कुछ प्रॉपर्टी शायद दिल्ली में भी थी। वह कई संकटों से गुजर रही थी जिनमें उनका स्वास्थ्य भी एक था । इसलिए अपने पिता की सम्पति में उन्होंने अपना हिस्सा भी माँगा लेकिन दोनों भाइयो ने इस बात से साफ़ इनकार कर दिया।

वह कहती थीं कि देखो मेरे भाइयों के पास पैसे की कोई कमी नहीं है और उनका अधिकांश समय भारत से बाहर ही गुजरा है । लेकिन वे मेरा हिस्सा नहीं देना चाहते । फिर भी सुजाता लगातार उनसे बात करती रहीं लेकिन बात नहीं बनी। एक दिन उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट में अपने भाई के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। यह 2013 की बात है।

दो-तीन सुनवाई के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में निर्णय दे दिया। सुजाता जी बहुत खुश थीं लेकिन जल्दी ही उन्हें अंदाजा हो गया के उनके भाई कोर्ट के फैसले को मानने वाले नहीं हैं । उनके भाइयों ने सोचा कि बहन दोबारा कोर्ट में नहीं जायेगी लेकिन जब मामला नहीं सुलझा तो फिर उन्होंने अपने भाइयों के विरुद्ध न्यायालय की अवमानना का मामला दायर किया। न्यायालय ने इसे बहुत गंभीरता से लिया और फिर 2014 में न्यायालय के आदेश पर उन्हें अपने घर की चाबी मिल गयी। वह कुछ दिन यहाँ रही भी लेकिन स्वास्थ्य और पारिवारिक कारणों से वापस मुंबई चली गयी।

मैंने सुजाता जी कभी कडुआ बोलते नहीं सुना। उनसे जब भी बहस हुई वह केवल यही कहती थीं कि हम दूसरों को तो पानी पी-पीकर कोसते हैं लेकिन अपने आप बदलना नहीं चाहते। दलित आन्दोलन के अन्दर मौजूद पितृसत्ता को वो ब्राह्मणवाद की ही उपज मानती थीं और उसके विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद करना अपना कर्तव्य समझती थीं। इस मामले में वे बिलकुल साथी रजनी तिलक से वैचारिक सहमति रखती थीं।

मैंने बहुत प्रयास किया कि उनके माता-पिता और उनके अपने संघर्षों के विषय में उनसे बातचीत करूँ लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। कई बार परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ लिंक न होने या परिवार वालों के द्वारा ज्यादा दिलचस्पी न लेने से भी ऐतिहासिक महत्व के कई कागजों को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया जाता है। आज के इन्टरनेट के दौर में किताबों और कागजों को लोग कूड़ा समझाने लगे हैं और जब व्यक्ति न रहे तो उसे फेंक ही दिया जाता है ।

मै इस प्रश्न पर चिंतित हूँ। सभी मित्रों से अनुरोध करूंगा कि वे ऐसा जरूर करें कि अपने पास के दस्तावेजों और सूचनाओं को नजदीकी साथियों से साझा करें। उन लोगों से भी अनुरोध करूँगा जो अपने को रिसर्चर कह रहे हैं । वे ऐसे लोगो के साथ उनके अनुभवों को रिकॉर्ड करें और उनके पास जो भी जानकारी है उसे डॉक्यूमेंट करें। हम न केवल साथियों को खो रहे हैं अपितु उनके पास की महत्वपूर्ण जानकारी भी खो रहे हैं । सुजाता जी ने मुझे बताया था कि उनके पिता रैडिकल ह्यूमनिस्ट पत्रिका में लिखते थे।
वे ह्यूमनिस्ट थे तो जो लोग इसकी जानकारी रखते हों बताये। वैसे अपने स्तर पर मैंने उनके भाइयों की फेसबुक प्रोफाइल ओर अन्य सोशल मिडिया प्रोफाइल पर जाकर देखा तो माँ-बाप से संबंधों और उनकी उपलब्धियों के विषय में कुछ भी नहीं था। शायद हम जब ज्यादा पैसा कमाते हैं तो व्यक्तिवादी हो जाते हैं और माँ-बाप की उपलब्धियों या मतभेदों को छुपाकर जीना चाहते हैं।

यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्या सुजाता पारमिता की पुत्री या और कोई साथी उनके संघर्षों और विचार बिन्दुओं को ईमानदारी से एकत्र कर पायेगा। मैं उम्मीद करता हूँ कि सुजाता पारमिता के संघर्ष और उपलब्धियों को कोई न कोई साथी डॉक्यूमेंट करेगा ताकि सभी लोग उनके अनुभवों का लाभ ले सके। सुजाता जी के संघर्षों को सलाम और उनकी स्मृति को नमन।

विद्याभूषण रावत सामाजिक कार्यकर्ता हैं…

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