विनाश का बाँध है सरदार सरोवर

मेघा पाटकर से पुष्पराज की बातचीत

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नर्मदा घाटी परियोजना के प्रस्तावित बड़े बाँधों में सरदार सरोवर भारत का सबसे बड़ा भीमकाय बाँध

 

देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने कारगिल, पोखरण और सरदार सरोवर को भारत की शान कहा था। आडवाणी की शान सरदार सरोवर दुनियाँ का दूसरा सबसे बड़ा बाँध है। नर्मदा घाटी परियोजना के प्रस्तावित बड़े बाँधों में सरदार सरोवर भारत का सबसे बड़ा भीमकाय बाँध है। पिछले 30 वर्षों में यह परियोजना गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के विस्थापितों के द्वारा जारी संघर्षों की वजह से लगातार विवादों और  चर्चे में रही है। सरदार सरोवर से प्रभावित विस्थापितों के संगठन नर्मदा बचाओ आन्दोलन की स्थापना 30 वर्षों पहले मेघा पाटकर ने की थी। नर्मदा बचाओ आन्दोलन अहिंसात्मक, शांतिपूर्ण, गाँधीवादी विचारधारा के कारण आमरण अनशन, जल-समाधि, जल-सत्याग्रह जैसे रास्तों से होकर गुजरता रहा। ‘सरदार सरोवर धोखा है, धक्का मारो मौका है’, ‘कोई नहीं हटेगा, बाँध नहीं बनेगा’, ‘हमला चाहे जितना भी हो, हाथ हमारा नहीं उठेगा’। जैसे नारों के सूत्र वाक्य पर टिका नर्मदा बचाओ आन्दोलन लगातार सरदार सरोवर से मुठभेड़ करता रहा और राज्यसत्ता आन्दोलन को दबाकर बाँध को पूरा करने के रास्ते ढूंढती रही। सरदार सरोवर परियोजना सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन के लाभ के दावों वाली एक बहुउद्देश्यी परियोजना है। यह बाँध नर्मदा घाटी विकास परियोजना का हिस्सा है, जिसमें सरदार सरोवर सहित 30 बड़े बाँध एवं 135 मघ्य स्तर के बाँध शामिल है । इस परियोजना का उद्देश्य गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र जैसे सूखाग्रस्त इलाकों तक पानी पहुँचाना और मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के लिए विद्युत उत्पादन करना बताया गया है। इस परियोजना से मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के 245 गाँवों के 50 हजार से ज्यादा परिवार विस्थापित हो रहे हैं।

खादी की साड़ी, हवाई चप्पल और फटी बिवाई वाली देहाती स्त्रियों सी दिखने वाली मेधा पाटकर और नर्मदा बचाओ आन्दोलन एक-दूसरे के पूरक हो गये हैं । हाल के वर्षों में जब देश की राजनीति का चित-चरित्र बदलने लगा तो मुख्यधारा की मीडिया में नर्मदा बचाओ आन्दोलन की बहुत कम खबरें आम लोगों तक पहुँच रही है। क्या आन्दोलन मीडिया की खबरों पर टिका होता है? देश के सजग नागरिक 30 वर्षों से जारी विस्थापन विरोधी इस अहिंसक आन्दोलन के बारे में क्या रखते है? नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने पहली बार दुनियां में बड़े बाँधों के विरूद्ध प्रश्न चिह्न खड़ा किया। विकास की शर्त पर विनाशकारी विस्थापन को नामंजूर करने वाले इस आन्दोलन के बारे में सहमति-असहमति, तर्क-वितर्क, विरोध-अन्तर्विरोध चलता रहेगा। अगर आप मानते हैं कि विनाश नहीं विकास और विस्थापन नहीं पुनर्वास के मुद्दे अगर नर्मदा बचाओ आन्दोलन की वजह से राष्ट्रीय फलक पर हैं तो मानिए कि पूँजीवादी राज्यसत्ता की नाक पर एक मजबूत हथौडे का नाम मेधा पाटकर है।

मेधा पाटकर को स्वीडन का राईट लाइफहुड अवार्ड, गोल्डेन एन्वायरमेंटल अवार्ड, बीबीसी लन्दन का ग्रीन रिवन अवार्ड, एमनेस्टी इंटरनेशनल का ह्यूमन डिफेन्डर अवार्ड, दीनानाथ मंगेशकर अवार्ड, डॉ. एमए थॉमस ह्यूमन राईटर्स अवार्ड, महात्मा फुले अवार्ड सहित कई राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। मेधा पाटकर ने इन सम्मानों से प्राप्त राशि का निजी जीवन में उपयोग करने से इंकार करते हुए पुरस्कारों की राशि वंचितों के लिए कार्य करनेवाले ट्रस्ट में दान कर दी। कुछ अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों की राशि मेधा पाटकर ने अस्वीकार कर दिए।

मेधा पाटकर से नर्मदा बचाओ आन्दोलन और उनके इर्द-गिर्द हो रही घटनाओं के बारे में जानने के लिए हम हैदराबाद से कर्नाटक के बीजापुर पहुँचे। बीजापुर में 9 मार्च को महिला दिवस के अवसर पर कर्नाटक की स्त्रीवादी संगठनों ने बड़ी सभा आयोजित की है। ‘‘कर्नाटका स्टेट फेडरेशन एगेंस्ट एट्रोसिटी ऑफ वीमेंस’’ ने महिला दिवस को अत्याचार विरोधी दिवस के रूप में आयोजित किया है। 5 हजार से ज्यादा स्त्रियाँ 2 किमी लम्बी रैली तय कर सभा स्थल पर पहुँची है।

डॉ. अनुपमा सहलेखिका हैं। इन्होंने महान क्रान्तिकारी चे ग्वेरा की पुस्तक मोटरसाइकिल डायरी का कन्नड़ अनुवाद किया है। डॉ. अनुपमा मेघा पाटकर के स्वागत में कन्नड़ जुबान में जो कुछ कह रही हैं, उसका आशय है कि मेधा पाटकर आज नर्मदा पाटकर में परिणत हो चुकी है। नर्मदा की हिफाजत के लिए अपनी जिन्दगी के सुख त्यागने वाली मेधा पाटकर अब तुम भारतीय स्त्रियों के हृदय में परिवर्तन, बदलाव और विद्रोह की उफनती हुई नदी होकर बह रही हो। डॉ. अनुपमा की काव्यात्मक अभिव्यक्ति के बाद मेघा पाटकर ने पूछा, मैं क्या मराठी में बोल सकती हूँ। (जाहिर है कि बीजापुर महाराष्ट्र का सीमावर्ती इलाका है इसलिए यहाँ के लोग मराठी समझते हैं) लोगों ने कहा – नहीं। मेधा ने पूछा – अंग्रेजी। कहा – नहीं। हिन्दी-हिन्दी-हिन्दी। (मुझे खुशी हुई, कर्नाटक के लोग हिन्दी ही क्यों सुनना चाहते है? क्या कन्नड़ लेखक कलबुर्गी की हत्या के बाद हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक उदय प्रकाश ने जो सबसे पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस किया और फिर हिन्दी लेखकों ने पुरस्कार वापसी का अभियान चलाया, क्या इन घटनाक्रम से दक्षिण भारत में हिन्दी की इज्जत बढ़ी है?) मेधा ने सबसे पहले कर्नाटक की स्त्रियों की उस ताकत को आह्वान किया, जो पुरुषों पर निर्भरता के बिना पुरूषवादी अत्याचार को चुनौती दे रही हैं। यहाँ अत्याचार से लड़नेवाली वकील, प्राध्यापक, चिकित्सक, किसान, छात्राएँ, महिलाएँ जमा हैं। हम न देवी हैं, न ही दासी हैं। हम न अबला हैं, न सबला हैं। हम क्या हैं? हम इंसान  हैं । हम आरक्षण से नहीं, जन्मजात इंसान है और अभी खतरा किस पर है? इंसानियत पर है तो इंसानियत को कौन बचायेगा? महिलाऐं बचाएंगी । 3 लाख 20 हजार किसानों की आत्महत्या जिन घरों में हुई है, उन घरों में विधवाओं की हालत जानने की हिम्मत किसके पास है? धरती पुरुष है या स्त्री? स्त्रियों ने कहा – स्त्री। स्त्रियों को धरती से क्यो उजाड़ते हो? मुम्बई में झुग्गियों पर बुल्डोजर चलाया गया तो स्त्रियों ने कहा – यह धरती मेरी माँ है। तुम मेरी माँ से मुझे अलग कर रहे हो। तुम मेरी माँ को लूटकर किसका कब्जा कराना चाहते हो? बिल्डरों का। हम अपनी माँ को बिल्डरों के हाथ में जाने देंगे? नहीं जाने देंगे। स्त्रियों की सभा से एकजुट आवाज आयी, नहीं जाने देंगे। धरती माँ को अपने हाथ से छिनकर कॉर्पोरेट  सेक्टर, अदानी, अंबानी, हीरानांदानी के हाथ में जाने देंगे? हमारी मुम्बई की बस्ती में सुनहरी नगर है। सुनहरी नगर, ‘मेरे मन की बात’ नहीं है कहने के लिए नहीं, हकीकत में सुनहरी नगर है, चलकर देख लीजिए। सुनहरी नगर की अनवरी नामक एक मजदूर औरत बिल्डरों के बुल्डोजर से 10 साल से टकरा रही है। पत्रकार पूछ रहे है, महिलाओं को आरक्षण चाहिए? जरूर चाहिए, क्यों नहीं चाहिए। ‘हम हमारा हक मांगते, नहीं किसी से भीख मांगते’। लेकिन मैं कहना चाहती हूँ, आरक्षण से पहले हमें सुरक्षा चाहिए। हम सुरक्षित नहीं हैं। हमारी जिन्दगी सुरक्षित नहीं है। पहले सुरक्षा की गारंटी चाहिए। हम सुरक्षित कहाँ हैं, अगर देश में युवाओं पर हमले शुरू हो गए हैं। होनहार छात्रों पर हमला शुरू हो गया हो तो माताएँ क्या सुरक्षित हैं? हम तो वेश्याओं की भी इज्जत करते हैं पर रोज अगर इस नगर की दो स्त्री जिस्म बेचकर पेट चलाती है तो जिस्म खरीदने वाले जिस्म लुटेरों को हम धिक्कारते भी हैं। तमाम चीजें बेचने के लिए, घटिया से घटिया सामान को बेहतर बताकर बेचने के लिए, एक स्त्री को, उसके स्त्री सौन्दर्य को प्रचार के लिए इस्तेमाल करना, पूँजीवाद का महिला विरोधी आचरण है। यह अत्याचार है। हम इस अत्याचार की मुखालफत करते हैं। हम फाँसी की सजा की मुखालफत करते हैं। जो हिंसा और हत्या बुद्ध को नहीं कबूल, गाँधी, बसवन्ना को नहीं कबूल, वह हत्या और हिंसा स्त्रियों को क्यों कबूल? हम बलात्कार करने वाले को कठोर दण्ड चाहते हैं पर उसकी हत्या हमें मंजूर नहीं। हम रोहित को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करनेवाली व्यवस्था की मुखालफत करते हैं और राज्यसत्ता से जुड़ी उस फूहड़ राजनीति की भी जिसने जेएनयू की छात्राओं का मजाक उड़ाया। यह जेएनयू की छात्राओं की इज्जत से नहीं, पूरे देश की स्त्रियों की इज्जत से मजाक है। गुरू बसवन्ना तो अन्याय, अत्याचार, अहिंसा के विरोधी थे। वे जातिप्रथा और धार्मिक जड़ता के विरोधी थे। मुझे गर्व है कि मुझे गुरू बसवन्ना सम्मान प्राप्त हुआ था। लेकिन हमें इस बात की शिकायत भी है कि कर्नाटक की सरकार गुरू बसवन्ना के रास्ते पर नहीं चल रही है। (2012 में मेधा पाटकर ने कर्नाटक सरकार द्वारा घोषित 10 लाख के बसवन्ना सम्मान को इस आधार पर ठुकरा दिया था कि कर्नाटक सरकार भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों से घिरी थी।) हम मेधा पाटकर के साथ बीजापुर से सोलापुर होते हुए मुम्बई आ गये। मेधा खुद भी नहीं जानती हैं कि कब, कहाँ, कौन उनसे मिलने का इंतजार कर रहे हैं। मुम्बई में झुग्गियों के कानूनी मामलों से लेकर एक-एक बस्तियों की कमिटियों से प्रगति रिपोर्ट की जानकारी लेते शाम हो गयी और हम फिर मुम्बई से बड़वानी की तरफ साथ निकल पड़े। बड़वानी नर्मदा बचाओ आन्दोलन का केन्द्रीय कार्यालय है। बड़वानी कार्यालय में मातम है कि 3 मार्च को आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता भितारा के मानिया सोलंकी की किसी ने हत्या कर दी है। मानिया गुलवट पंचायत का सरपंच था और सरदार सरोवर का मुआवजा पैकेज नाकबूल करने वाला बहादुर आदिवासी आन्दोलनकारी था। बीजापुर से सोलापुर, सोलापुर से मुम्बई और मुम्बई से बड़वानी आकर मेधा पाटकर के साथ पुष्पराज का साक्षात्कार पूरा हुआ।

आपका जन्म आजादी के बाद हुआ तो आजाद भारत का भविष्य सामने था। आपने अपने साथ भारतीय लोकतंत्र को जवान होते देखा है। वह दौर किस तरह का था?

बचपन में 2 कमरे के छोटे से घर में सुबह-शाम मजदूरों की मीटिंग होती रहती थी। पिता वसंत खानोलकर और माँ इन्दु खानोलकर दोनों ने अलग तरह का जीवन चुना था। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह किया था। पिता पूरी तरह नास्तिक थे। माँ आस्तिक और धार्मिक हैं पर घर में कभी सत्यनारायण की पूजा नहीं होती थी। पिता केमिकल इन्डस्ट्रीज से जुड़े कामगारों के ट्रेड यूनियन लीडर थे। नौकरी भी करते थे पर गृहस्थी माँ ही चलाती थी। माँ डाकघर से सरकारी वेतन उठाती थी। पिता महाराष्ट्र हिन्द मजदूर सभा के अध्यक्ष और काफी दिनों तक कॉर्पोरशन  में नगर सेवक रहे। पिता के पूर्णकालिक ट्रेड यनियन कार्यकर्ता होने की वजह से गृहस्थी माँ चलाती रही तो परिवार पुरुष प्रधान नहीं रह गया था। मृणाल गोरे, पन्नालाल खुराना सहित कई बड़े समाजवादी नेताओं का मेरे घर आना-जाना लगा रहता था। मृणाल गोरे को मैं मौसी कहती थी। कहती क्या था, मौसी से ज्यादा ही थी। राष्ट्रसेवा दल एक ऐसा संगठन है, जिसकी स्थापना राष्ट्रीय स्वयं संघ के समानांतर धर्मनिरपेक्षता की संस्कृति के साथ समाजसेवा और नैतिक शक्ति को समाज में प्रतिष्ठित कराने के उद्देश्य से हुई थी। मैं राष्ट्रसेवा दल के शिविरों में लगातार मुम्बई की बस्तियों और मुम्बई से दूर के गाँव-गिरांव जाती रहती थी। उन शिविरों में कृषि कार्य से लेकर, सफाई, कुआँ खोदना, तालाब खोदना, बीमारों की सेवा, सरीखे हर तरह के कार्य शामिल थे। पिता प्रजा समाजवादी दल से चुनाव लड़ते थे। झोपड़ी उनका सिर्फ चुनाव चिह्न ही नहीं था उनके उद्देश्य में झोपड़ी शामिल था। घर के माहौल में जात-पात, धर्म, ईश्वर, पूजा-पाठ के आधार पर कुछ भी तय नहीं होता था। हम मुम्बई में जन्मे जरूर थे पर हमारी दुनियां मुम्बई से अलग की दुनिया थी। हमारे चारों तरफ अलग किस्म की हवा बहती थी। देश-दुनियां की घटनाओं पर जैसी चर्चा आज चैनलों  में होती है, उससे ज्यादा उम्दा तरीके से मेरे घर में होती रहती थी। मुझे याद है कि हमारे मुम्बई में समाजवादियों के बीच ‘शहर छोड़ो, गाँव चलो’ का नारा 70 की दशक में चर्चित हो रहा था। जाहिर है कि मुम्बई में जन्म लेकर भी हम मुम्बई से चमत्कृत तो नहीं थे। एक दूसरा मुम्बई हमारी जेहन में था। मुम्बई के भीतर की बस्तियाँ जहाँ बेशुमार तकलीफें थी, महराष्ट्र के गाँव के खेतिहर किसान जो तब आत्महत्याऐं नहीं कर रहे थे पर शोषण से कराह रहे थे। मैं कह सकती हूँ कि माता-पिता की प्रेरणा ही थी कि वंचितों की तकलीफ से ज्यादा तकलीफ महसूस होती थी। खुलगे बाई मेरी शिक्षिका थीं, मुझसे स्पर्धाओं में मुद्दों पर संवाद कराती थी। मणिपुरी नृत्य सीखने में 4 वर्ष लगाए थे। माँ आरसी (आईने) के सामने खड़े होकर आत्मबल और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ भाषण करना सिखाती थी। घर में गहने, चमकदार वस्त्रों, ठाठ-बाट, सम्पत्ति सृजन का महत्त्व नहीं था तो व्यक्तित्व निर्माण और नैतिक बल के साथ अनुशासित जीवनशैली का विकास पहली प्राथमिकता थी। उस पारिवारिक विरासत से प्राप्त समझ से ही मैं नर्मदा बचाओं आन्दोलन से लेकर नेशनल एलायंस ऑफ पीपुल्स मूवमेंट की तरफ प्रेरित होती रही। पिता अक्सर कहते थे – हम तो ‘‘संगठित क्षेत्र में काम करते रह गये पर असंगठित क्षेत्र में कार्य करने की ज्यादा जरूरत है।’’

जब आपने नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नींव रखी थी तो आपकी उम्र 31 वर्ष थी। एक युवती जिसे अभी अपनी पढ़ाई पूरी करनी थी। आपका पूरा कैरियर आपके सामने था। आपको कभी लगता है कि आन्दोलन में कूदकर कोई गलत निर्णय ले लिया?  

मैंने कभी मुड़कर सोचा नहीं था कि क्या कोई गलती हो गयी। चलो, अभी सोच लेती हूँ। 1985 में शुरू हुए आन्दोलन की ताकत से 1990 में विश्व बैंक को ललकारना आसान नहीं था। मैं तो समझती हूँ, मैंने घर से लेकर अकादमिक शिक्षा से जो हासिल किया था, उसका सरदार सरोवर के मसले को समझने में बेहतर उपयोग किया। विकास के नाम पर त्राहिमाम, सत्यानाश सिर्फ कहने से नहीं होगा, प्रमाणित किया। मैंने सिर्फ अपनी ताकत से नहीं, हिमांशु ठक्कर, संजय संगवई, डॉ. बीडी शर्मा जैसे कितने लोगों ने अपने विवेक, अपनी इच्छा शक्ति से मुझे बल प्रदान किया।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की नींव में आपका दांपत्य भी पीछे छूट गया?

इस समय दांपत्य पर क्या चर्चा करना। यह सब क्या चर्चा का विषय है। लेकिन मुझे लगता है कि गृहस्थी में रहते हुए आन्दोलन में पूर्णकालिक जीवन सम्भव नहीं था इसलिए आन्दोलन की नींव में अगर कुछ पीछे छूट गया, तो इस पर क्यों मलाल करना। शादी करना, शादी न करना या दाम्पत्य में होना या न होना, वैसा मसला नहीं, जिस पर चर्चा करने के लिए आन्दोलन पर जारी चर्चा को प्रभावित किया जाये।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन की शुरुआत ही टकराहट से हुई। सरदार सरोवर को गुजरात के विकास का प्रतीक घोषित किया गया तो जाहिर है कि उस विकास का विरोध कर रहे आन्दोलन को गुजरात का विरोधी बताया जाये।

हमने बाबा आमटे  के नेतृत्व में जब निमाड़ पहाड़ के पाटीदार और आदिवासियों को साथ लेकर 1990 में फेड़कुआ सत्याग्रह का ऐलान किया था तो मालूम नहीं था कि गुजरात के मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल हमारी ‘जन विकास संघर्ष यात्रा’ को रोकने के लिए राज्यसत्ता की सारी ताकत को हमारे सामने खड़ा कर देंगे। हमारी यात्रा के जबाव में गुजरात में भी यात्रा का ऐलान कर दिया गया था। दरअसल हम लोग सरदार सरोवर को दिल्ली-मुम्बई की बजाये सीधे कार्यस्थल पर जाकर रोकना चाहते थे। हमने ऐसा फैसला तब लिया था, जब सरदार सरोवर परियोजना की व्यापक समीक्षा के लिए केन्द्र सरकार एवं गुजरात-मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र की राज्य सरकारों से हम निराश हो चुके थे। 200 किमी की यात्रा तय कर जब हम गुजरात की सीमा पर पहुँचे तो गुजरात की तरफ से बाँध समर्थकों की ‘शांति यात्रा’ हमारी तरफ बढ़ रही थी। निमाड़-पहाड़ के हजारों आन्दोलनकारीयों के साथ दिल्ली, नासिक, पूना, मुम्बई, रायपुर सहित देश और देश के बाहर से आये कुल 20 हजार से ज्यादा समर्थक हमारे साथ सरदार सरोवर की तरफ आगे बढ़ रहे थे। हम नारे लगा रहे थे – ‘हिन्दी मराठी या गुजराती: डूबने वाले एक ही जाति’ ‘सरदार सरोवर धोखा है, धक्का मारो मौका है’। बाँध समर्थकों की संख्या काफी कम थी पर उनके पास काफी संसाधन मौजूद थे। बाँध समर्थकों की देखभाल के लिए पूरी राज्य मशीनरी शामिल थी। निरमा उद्योग के मालिक बढ़-चढ़कर रैली का इंतजाम संभाल रहे थे। निरमा के स्वामी ने धमकी दी थी – हम बाबा को निरमा से धो देंगे। गुजरात के मुख्यमंत्री हेलीकाप्टर से बाँध समर्थकों का उत्साहवर्धन कर रहे थे। हमें गुजरात की सीमा से 50 मीटर की दूरी पर जबरन रोक दिया गया। हमने देवराम माई, लक्ष्मी बहन, खाजा भाऊ सहित छः साथियों के साथ अनशन शुरू कर दिया। हमने 21 दिनों तक अनशन के बाद फेड़कुआ सत्याग्रह समाप्त किया था। फेड़कुआ से लौटते हुए डॉ. बीडी शर्मा ने नारा दिया था ‘मावा नाटे, मावा राज’ (हमारे गाँव में हमारा राज)। फेड़कुआ सत्याग्रह में ठीक है कि हमें सरदार सरोवर तक पहुँचने से रोक दिया गया पर हमारे सत्याग्रह की आवाज तो देश-दुनिया तक पहुँची। उपवास-सत्याग्रह का हमारा लक्ष्य ही होता है – विरोधी के विवेक को जागृत करना। हमने देखा कि गुजरात की जनता तक इस लम्बे संघर्ष से हमारा संदेश पहुँचा। सत्ता ने नर्मदा बचाओ आन्दोलन को अपना विरोधी-शत्रु जरूर घोषित कर दिया था पर गुजरात की जनता हमारे सत्याग्रह का सन्देश समझ चुकी थी।

सरदार सरोवर से जब सबसे बड़ी डूब, सबसे बड़ी बर्बादी, सबसे ज्यादा विस्थापन मध्य प्रदेश का है तो मध्य प्रदेश की राजनीति में सरदार सरोवर बड़ा मुद्दा क्यों नहीं बना?

अर्जुन सिंह, जब दुबारा मुख्यमंत्री हुए तो उन्होंने कहा था कि सरदार सरोवर को मंजूरी देकर बड़ी भूल हुई है। मध्य प्रदेश में उस समय जनसंघ और कांग्रेस दोनों सरदार सरोवर के खिलाफ सड़क पर उतरे थे। सरदार सरोवर राज्य के विरूद्ध है, यह बात तो 1969 से 1979 तक मध्य प्रदेश में पक्ष-विपक्ष एक साथ कहते रहे। तीनों राज्यों में नर्मदा के मसले पर विवाद की वजह से केन्द्र सरकार ने नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण गठित किया था। इस न्यायाधिकरण ने राज्यों के आपसी विवाद समाप्त कराने की बजाय लोगों के जीवन के मुद्दे को प्राथमिकता नहीं दी। अर्जुन सिंह, शंकर दयाल शर्मा दोनों सरदार सरोवर के विरूद्ध थे। गुजरात में कच्छ के लोगों का भी कहना था कि सरदार सरोवर धोखा है। दिग्विजय सिंह ने मुख्यमंत्री होते हुए सदन से सरदार सरोवर को रोकने के मुद्दे पर सर्वदलीय प्रस्ताव पारित कराकर केन्द्र सरकार से राज्य का विरोध प्रकट किया था।

कोकाकोला बॉटलिंग प्लांट के लिए 30 लाख लीटर पानी रोज नर्मदा से आवंटित कर रही है। सूखाग्रस्त इलाके तक पानी पहुँचाने के लिए सरकार मेन केनाल से जुड़े माइक्रो-केनाल नहीं बना पायी। नहरों का जाल फैलाये बिना सूखे इलाकों तक पानी पहुँचाना मुश्किल होगा।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने सरदार सरोवर को राजनीतिक मुद्दा क्यों नहीं बनाया? मध्य प्रदेश की बर्बादी की शर्त पर गुजरात का विकास क्यों? इस तरह के भावनात्मक मुद्दे ज्यादा प्रभावी हो सकते थे?

मध्य प्रदेश के राजनीतिक दल और राजनेता भी कहाँ जानते थे कि सरदार सरोवर से इतनी बड़ी बर्बादी होगी। सरदार सरोवर से होने वाले पर्यावरणीय प्रभाव विस्थापन, जंगलों का विनाश, ऐतिहासिक स्थलों का विनाश – यह सब तो नर्मदा बचाओ आन्दोलन की अध्ययन प्रक्रिया से जुड़े रहने से स्पष्ट हुआ। एक तरफ निमाड़ से पहाड़ तक एक-एक गाँव के एक-एक लोगों को विकास के साथ जुड़े विनाश के छद्म  से अवगत कराना, दूसरी तरफ एक-एक तिनके से स्थानीय सभ्यता-संस्कृति को जानने की कोशिश करना। पूरी दुनिया में पर्यावरण और विस्थापन के मुद्दे पर हो रहे अध्ययन प्रक्रिया के साथ नर्मदा घाटी के एक-एक मुद्दों को समझने की कोशिश करना। हम जब एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तो उस निष्कर्ष से एक नागरिक से लेकर एक राजनेता तक को वाकिफ करा सकते हैं। हम समस्या की पड़ताल, समस्या की भयावहता को जानने की कोशिश करते हुए, दूसरों को जागृत ही कर सकते हैं पर शायद आन्दोलन से यह सम्भव नही था कि आन्दोलन मुद्दों की राजनीतिक पृष्ठभूमि भी तैयार करे। हमने नैतिकता के आधार पर मध्य प्रदेश की बर्बादी की शर्त पर गुजरात का विकास क्यों जैसे भावनात्मक नारे अपनी तरफ से नहीं उछाले पर अब ऐसा लगता है कि मध्य प्रदेश की राजनीतिक पार्टियाँ अगर इस तरह के मुद्दे उछाले तो बुरा क्या है? ‘डूबते को तिनके का सहारा ही सही’

1995 में सरदार सरोवर रुक गया तो आपने अपनी शक्ति एनरान में लगा दी। क्या इससे नर्मदा बचाओ आन्दोलन से केन्द्रित शक्ति में बिखराव आ गया।

सरदार सरोवर परियोजना से विश्वबैंक को भगाने के लिए जिस तरह मजबूर किया गया था, उसमें नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथ जुटे देश भर के समर्थक समूह की शक्ति थी। इस राष्ट्रीय समर्थन समूह के साथ 1992 में नेशनल एलायंस फॉर पीपुल्स मूवमेंट (आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय) गठित हुआ। एनएपीएम ने 4 अप्रैल, 1993 को एनरान के खिलाफ संघर्ष का फैसला लिया। नर्मदा बचाओ आन्दोलन और एनरान विरोधी आन्दोलन का मसला अलग-अलग होते हुए भी ज्यादा अलग नहीं था कि दोनों विकास के नाम पर विनाश की बुनियाद पर टिके थे। हम ‘कोंकण विकास यात्रा’ लेकर मुम्बई पहुँचे थे तो हमारे स्वागत के लिए मुम्बई पुलिस सामने खड़ी थी। हमारी गिरफ्तारी-पिटाई हुई। हमारे साथ 80 से ज्यादा साथी गिरफ्तार हुए थे। महिलाओं पर पुलिस का दमनचक्र उस भाजपा-शिवसेना सरकार के असली चरित्र से हमारा साक्षात्कार था, जो भाजपा-शिवसेना एनरान को समुद्र में फेंकने का नारा देकर सत्ता में आयी थी। परियोजना बहुराष्ट्रीय होते हुए भी अगर एनरान जैसी विवादास्पद हो तो उसके खिलाफ संघर्ष होना मुश्किल नहीं है। हम यूँ ही एनरान के विरुद्ध नहीं खड़े हुए थे। 1990 में न्यू मैक्सिको में एनरान को प्रदूषण फैलाने के आरोप में पौने 4 लाख डॉलर और प्रदूषण की भरपाई के लिए 600 करोड़ डॉलर जुर्माना भरना पड़ा था। 1992 ई. में मैक्सिको में ही एनरान को जल प्रदूषित करने के लिए 1,25,00 करोड़ डॉलर का जुर्माना किया गया। इस कम्पनी को घूसखोरी, भ्रष्टाचार सहित कई मामलों में अमीरीकी अदालत में सजा मिली थी। हमारा एक विरोध यह भी था कि एनरान का इतना खराब रिकॉर्ड होने के बावजूद उसे किसी टेंडर के बिना क्यों बुलाया गया। एनरान, वेक्टेल और जनरल इलेक्ट्रिक सहित 9 कम्पनियों के सहयोग से बने दाभोल परियोजना के लिए पर्यावरण की जितनी बड़ी बर्बादी होनी थी, उसका हिसाब लगाना मुश्किल था। रत्नागिरी जिला के अंजनबेल, बेलदूर और कातलवाड़ी गाँवों की 6000 हेक्टेयर जमीन इस परियोजना से प्रभावित हो रही थी। एनरान का विरोध देश के हर क्षेत्र में विकास के नाम पर थोपे जा रहे विनाश, विस्थापन और विषमता के खिलाफ चल रहे राष्ट्रीय संघर्ष का एक चरम बिन्दु था। 1995 में जब एनरान सौदा रद्द हुआ तो एक अंग्रेजी अखबार  ने अपने संपादकीय में लिखा था – महाराष्ट्र सरकार द्वारा एनरान की दाभोल परियोजना रद्द होने से देश तबाह तो नहीं हो गया, आसमान तो नहीं टूट कर गिर गया। एनरान ने धमकी दी थी कि ‘एनरान रद्द हुआ, तो विदेशी निवेशकों का भरोसा टूटेगा।’ हम समझते हैं कि एनरान के विरूद्ध संघर्ष से एनएपीएम के साथ-साथ नर्मदा बचाओ आन्दोलन को भी नयी दृष्टि मिली।

सरदार सरोवर से प्रभावित राज्यों में महाराष्ट्र, गुजरात क्या एक तरह आन्दोलन के विरुद्ध रहे? क्या बाँध विरोधी अंतर्राष्ट्रीय समर्थन का प्रदेशों की सत्ता-राजनीति पर कोई असर नहीं हुआ। 

विश्व बैंक की स्कडर समिति ने साफ कहा था कि सरदार सरोवर से विस्थापितों के पुनर्वास की कोई राजनीतिक इच्छा शक्ति ही नहीं है। चिमनभाई पटेल गुजरात कांग्रेस की स्थानीय राजनीति करते थे। प्रादेशिक राजनीति इतनी भावनात्मक होती है कि ऐसी राजनीति के सामने तर्क-वितर्क, हक-अधिकार, नीति-नैतिकता की कोई बात सुनी नहीं जाती। महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकार शुरू से गुजरात का साथ नहीं वे रही थी। केशुभाई पटेल भाजपा से ही थे पर गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कहा था कि सरदार सरोवर सौराष्ट्र के हित में नहीं है। केशुभाई ने आन्दोलन को ज्यादा परेशान नहीं किया पर चिमनभाई पटेल ने तो हमारे हर रास्ते पर गुजरात में पुलिस को खड़ा कर दिया था। विदेश से आये पत्रकारों को जबरन पुलिस थानों पर रोक लेना, यह आम बात थी। गुजरात के उस दौर में तो माक्र्सवादियों ने भी मेरा समर्थन नहीं किया था। जल नियोजन और विकास की पूरी आवधारणा पर हमने सवाल उठाया था पर इन्द्रजीत गुप्ता, गीता मुखर्जी के आलावा बहुत लोग हमारी बात समझ नहीं पाये।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन अपने नारे हमला चाहे जितना भी हो, हाथ हमारा नहीं उठेगापर टिका रहा, बावजूद इस अहिंसक आन्दोलन पर भी पुलिस दमन हुए। पुलिस दमन के उस दौर को आप किस तरह याद करती है

6 अप्रैल, 1990 को बड़वानी में शांतिपूर्ण धरने पर घुड़सवार दौड़ाए गये थे। मई महीने में अलिराजपुर तहसील में आदिवासी गाँवों में पुलिस का कहर टूटा था। 28 दिसम्बर, 1990 को हरसूद दिवस की वर्षगाँठ पर कसरावद के आसपास पुलिस कर्फ्यू का माहौल था। रात-बेरात कसराबाद में घोड़े दौड़ना, घरों में घुसकर आन्दोलन से अलग होने के लिए लोगों को धमकाना-पीटना आम बात हो गयी थी। बच्चे-बूढ़े तक जेलों में बंद कर दिये गये। पुलिस का एसपी रामनिवास धमकाता था – सारी धरती खून से लाल कर दूँगा। बाबा आमटे की कुटिया के पास पुलिस वाले लाउडस्पीकर से आन्दोलन के विरुद्ध  अभद्र गालियाँ देते थे। झाबुआ का कलेक्टर राधाकृष्ण जुलवानिया अलिराजपुर क्षेत्र के आदिवासियों पर कहर बरपा रहा था। अंजनवाड़ा में पुलिस की ताकत से शासन सर्वे करना चाह रही थी। आन्दोलन ने ‘हम नहीं हटेंगे, बाँध नहीं बनने देंगे’ के संकल्प के साथ ‘लोक निवाड़ा’ अभियान चलाया था। ‘लोक निवाड़ा’ और ‘सर्वे’ साथ-साथ नहीं चल सकते थे। सर्वे करने आयी पुलिस अंजनवाड़ा में आदिवासियों से भिड़ गयी। पुलिस उनके घर घुसकर चूल्हा तोड़ने, अनाज नष्ट करने, धुनाई-पिटाई करने लगी तो लोगों ने पुलिस का शिविर उजाड़ दिया। पुलिस ने आदिवासियों पर बर्बर तरीके से लाठी चलायी, जिसमें दो सौ लोग जख्मी हुए। पुलिस की गोली से 18 वर्षीय रेहमल पुन्या बसावे शहीद हुआ। इसी तरह मजिबेली में भी पुलिस ने लोगों पर जबरन मणिबेली खाली करने के लिए जुल्म ढ़ाया था। अंजनवाड़ा में हुए पुलिसिया अत्याचार पर सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जाँच का आदेश दिया तो जल संसाधन मंत्री विद्याचरण शुक्ल की आवाज बन्द हुई थी इसलिए कि उनके द्वारा गठित समिति ने मणिबेली में पुलिस अत्याचार की किसी घटना से इंकार कर दिया था।

सरदार सरोवर बांध

सरदार सरोवर सुप्रीम कोर्ट के आदेश से 5 वर्ष तो रुका रहा पर 2000 में पुनर्वास की शर्त पर बाँध बनाने का आदेश दिया तो क्या आन्दोलन को झटका लगा। बाँध का विरोध पुनर्वास की शर्त पर रूक गया? क्या आपने नहीं हटेगा, बाँध नहीं बढ़ेगा नारा भी बदला

इस तरह के अदालती निर्णय से तत्काल हमें इंसान के तौर पर झटका जरूर महसूस होता हे पर जब हम आन्दोलन के लिए संघर्षरत होते हैं, तो झटके क्या हर तरह के हमले झेलने के लिए हम मानसिक तौर से तैयार होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 5 वर्ष बाद बाँध निर्माण को हरी झंडी दिखा दी तो हमने समझौता कहाँ किया? बाँध विरोध का हमारा आन्दोलन आज भी जारी है। हमारे नारे कभी नहीं बदले। नारे आन्दोलन के प्राण होते हैं। हम नारे क्यों बदल देंगे। हमारे पास पुनर्वास स्वीकार करने के अलावा विकल्प ही क्या था? लेकिन नर्मदा घाटी में अभी भी हजारों-हजार परिवारों ने सशर्त पुनर्वास की शर्त (जमीन के बदले जमीन) के आधार पर पुनर्वास पैकेज को हाथ नहीं लगाया है। हमने 2006 के दिल्ली अनशन से तत्काल जीत नहीं हासिल की थी पर 122 मीटर पर हमने 8 वर्षों तक बाँध निर्माण को ‘पुनर्वास न होने तक निर्माण कार्य हरगिज नहीं’ की शर्त पर सुप्रीम कोर्ट से बाँध को रोक कर तो रखा। ‘बड़े बाँध धोखा हैं, विनाशकारी हैं ’ इस मुद्दे से ही हमारी लड़ाई शुरू हुई थी और इसी मुद्दे पर हमारी लड़ाई टिकी हुई है।

गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में आपने क्या नरेन्द्र मोदी से सरदार सरोवर के मुद्दे पर कभी संवाद किया था?

संघ के प्रतिष्ठित सिद्धान्तकार गोविन्दाचार्य हमारी घाटी में भी विस्थापितों के हालत देखने आये थे। वे गुजरात में थे तो उन्होंने कहा था कि आप एक आदमी को समझा लीजिए तो उसका बहुत असर होगा। उस समय नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री नहीं हुए थे। उनके मुख्यमंत्री होने के बाद हमने आन्दोलन की ओर से कई बार उन्हें पत्र लिखे। कभी उनकी ओर से कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। मुख्यमंत्री के रूप में 2006 में नरेन्द्र मोदी जी हमारे आमने-सामने भी आये जब जंतर-मंतर में जारी हमारे 22 दिनों के अनशन के विरुद्ध उन्होंने गुजरात में 51 घंटे का अनशन किया था। मीडिया ने उस समय उनके अनशन को फाइवस्टार अनशन कहा था। मुख्यमंत्री के रूप में दिग्विजय सिंह संवाद करते थे। उनके मुख्य सचिव शरद चन्द्र बेहार को तो गुजरात सरकार एनबीए एक्टिविस्ट कहकर बदनाम करती थी।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन, बाँध विरोध, पुनर्वास के साथ-साथ इन दिनों भ्रष्टाचार से भी मुठभेड़ कर रहा हे। आपने नर्मदा क्षेत्र में भ्रष्टाचार को किस तरह चुनौती दी है?

हर विकास परियोजना में भ्रष्टाचार घोटाला होता है। मुझे तो लगता है कि भ्रष्टाचार-घोटालों के लिए ही विकास परियोजनाओं की परिकल्पना तैयार की जाती है। मध्य प्रदेश में पुनर्वास के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है तो जमीन कागज पर गढ़ना मुमकिन तो नहीं है। आशीष मंडलोई, रणवीर भाई, देवेन्द्र भाई ने ‘जमीन नहीं है, तो रजिस्ट्री किस तरह’ को आधार बनाकर सूचना के अधिकार से फर्जी रजिस्ट्रियों की सूची निकाली। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों पर 67 फर्जी रजिस्ट्री तो हमारे इन कार्यकर्ताओं ने प्रमाणित कर दिये, जिसे सरकार ने भी स्वीकार किया था। हमारे इन साक्ष्यों के आधार पर जबलपुर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एके पटनायक ने 2008 में फर्जी रजिस्ट्री और पुनर्वास स्थल पर हुए निर्माण कार्य में लूट की जाँच के लिए अवकाश प्राप्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति एसएस झा के नेतृत्व में ‘झा आयोग’ गठित किया। 7 साल तक चली जाँच प्रक्रिया के बाद 18 फरवरी, 2016 को झा कमीशन ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट में सुपुर्द कर दी है। मध्य प्रदेश सरकार ने झा कमीशन की जाँच रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है । सरकार की आपत्ति की वजह से झा कमीशन की रिपोर्ट की हकीकत स्पष्ट नहीं हुई है लेकिन झा कमीशन ने अपने प्रगति प्रतिवेदन में कहा था कि ज्यादातर रजिस्ट्री फर्जी है। इस आधार पर हमलोगों का आकलन है कि इस फर्जी रजिस्ट्री घोटोले में 1000 करोड़ रूपये से ज्यादा का भ्रष्टाचार उजागर होगा।

सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में अभी कितने विस्थापित पुनर्वास से वंचित है? कितने लोगों को पुनर्वास हक प्राप्त हुआ है?

भारत में पहली बार किसी विकास परियोजना में इतनी बड़ी तादाद में अपनी शर्तों के साथ पुनर्वास प्राप्त हुआ है। महाराष्ट्र और गुजरात में अब तक कुल 14 हजार परिवारों को जमीन के बदले जमीन का हक प्राप्त हुआ है। महाराष्ट्र में 4 हजार परिवारों को आदर्श पुनर्वास प्राप्त हुआ है। गुजरात में 90 फीसदी विस्थापितों को पुनर्वास प्राप्त हुआ है। मध्य प्रदेश में अब तक सिर्फ 31 परिवारों को जमीन के बदले जमीन का हक प्राप्त हुआ है। मध्य प्रदेश के डूब क्षेत्र में 50 हजार परिवार निवास कर रहे हैं पर सरकार फाइलों में कह रही है कि सबको पुनर्वास प्राप्त हो गया है। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के डूब क्षेत्रों के विस्थापितों के परिवारों की शिक्षा के लिए आन्दोलन के द्वारा जन सहयोग की ताकत पर 9 जीवनशालाऐं संचालित हैं। उक्त जीवनशाला का सूत्रवाक्य है – ‘लड़ाई पढ़ाई, साथ-साथ’। गुजरात से विस्थापितों को एक दशक बाद खदेड़ा जा रहा है। कहा जा रहा है कि 1,000 से ज्यादा लाभान्वितों को अपात्रता के आधार पर पुनर्वास मिल गया था। एक दशक बाद उन्हें अपने पुनर्वास स्थल छोड़ने का निर्देश प्राप्त हुआ है। अब वे कहाँ जायेंगे। मध्य प्रदेश के सैकड़ों विस्थापित गुजरात में प्राप्त जमीन के बंजर होने की वजह से गुजरात छोड़कर लौट आये हैं। गुजरात में विस्थापितों को जमीन के बदले दी गयी। इस जमीन में एक संकट यह भी खड़ा हुआ है कि जो जमीन विस्थापित को दी गयी है, उस जमीन का उचित मुआवजा उस जमीन के भू-स्वामी को अब तक प्राप्त नहीं हुआ है । जमीन का मूल स्वामी उचित मुआबजे के बिना दूसरे को अपनी जमीन पर क्यों कब्जा करने देगा? गुजरात में विस्थापित-विस्थापित के बीच विचित्र तरह की टकराहट पैदा की गयी है।

नरेन्द्र मोदी ने पूर्व उपमुख्यमंत्री आडवाणी के द्वारा घोषित भारत की शान सरदार सरोवर के मामले में प्रधानमंत्री बनने के बाद किस तरह की रूचि दिखायी? क्या आपने प्रधानमंत्री से अपना पक्ष जताया?

मुख्यमंत्री के रूप में मैं नरेन्द्र मोदी के कार्यालय से जिस तरह किसी पत्र का जबाव न देते हुए संवादहीनता कायम रखी गयी थी। उसी तरह की स्थिति प्रधानमंत्री कार्यालय में भी लागू है। नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री का शपथ लेने के बाद जो महत्वपूर्ण फैसले लिये, उनमें पहला निर्णय यही लिया कि सरदार सरोवर से प्रभावित राज्यों से किसी तरह का परामर्श किए बिना 8 वर्ष से 122 मीटर की ऊँचाई पर रुके सरदार सरोवर के निर्माण को 139 मीटर तक बढ़ाने का फैसला लिया। उनके उस फैसले पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने मीडिया से कहा था कि उनसे सहमति तो नहीं ही ली गयी, उन्हें सूचित भी नहीं किया गया। गुजरात की मुख्यमंत्री आनन्दी बेन ने सरदार सरोवर की ऊँचाई बढ़ाने के प्रधानमंत्री के फैसले पर प्रधानमंत्री के प्रति आभार प्रकट करते हुए कहा, ‘लंबित मामले का त्वरित निपटारा हुआ, अच्छे दिन आ गये।’ प्रधानमंत्री ने अपने अधिकार का दुरुपयोग करते हुए जिस तरह अपने पराक्रम का परिचय दिया, इससे सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का उल्लंघन हुआ है, जिसमें स्पष्ट कहा गया है कि ‘पुनर्वास के बिना विस्थापन और बाँध का निर्माण कार्य मंजूर नहीं होगा।’ जाहिर है कि मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात सरकारों के अपने ही रिकॉर्ड के अनुसार अभी हजारों परिवारों का पुनर्वास किया जाना बाकी है।

प्रधानमंत्री ने सरदार सरोवर को अपने लक्ष्य की ऊँचाई प्रदान कर दी तो क्या सरदार सरोवर से घोषित सिंचाई और विद्युत उत्पादन का लक्ष्य पूरा हो रहा है?  

सरदार सरोवर विकास परियोजना पर 1983 में 4200 करोड़ मात्र का लागत अनुमानित था जो ग्यारहवी पंचवर्षीय योजना में 70 हजार करोड़ और इस वर्ष के आकलन के अनुसार 90 हजार करोड़ पहुँच चुका है। सरदार सरोवर से उत्पादित कुल बिजली में 56 प्रतिशत मध्य प्रदेश को 27 प्रतिशत महाराष्ट्र को और 17 प्रतिशत गुजरात को वितरित किया जाना है। गुजरात सरकार, मध्य प्रदेश सरकार और महाराष्ट्र को वादानुसार विद्युत आपूर्ति का दावा कर रही है पर मुफ्त में विद्युत आपूर्ति के वादे को पूरा नहीं किया गया। उत्पादन की संरचना पर हुए व्यय में महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से विद्युत आपूर्ति के प्रतिशत की दर से संरचना व्यय वसूला गया। बड़े कमाण्ड क्षेत्र को सिंचित करने का लक्ष्य अधूरा है। 18 लाख हेक्टेयर क्षेत्र के सिंचित होने के दावे के विपरीत मात्र ढाई लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई हो पायी। अभी सौराष्ट्र और कच्छ तक पानी हकीकत में नहीं विज्ञापनों में ही पहुँचा है। यह विचित्र है कि सरदार सरोवर के कुल जलाशय का 20 फीसदी ही सिंचाई के कार्य में इस्तेमाल हो रहा है। गुजरात ने जिन प्यासे गाँवों को पानी देने का वादा किया था, वे अब तक प्यासे हैं। इंडियन एक्सप्रेस की खबर है कि गुजरात सरकार सानन्द में कोकाकोला बॉटलिंग प्लांट के लिए 30 लाख लीटर पानी रोज नर्मदा से आवंटित कर रही है। सूखाग्रस्त इलाके तक पानी पहुँचाने के लिए  सरकार मेन केनाल से जुड़े माइक्रो-केनाल नहीं बना पायी। नहरों का जाल फैलाये बिना सूखे इलाकों तक पानी पहुँचाना मुश्किल होगा। गुजरात सरकार को नहरों का जाल फैलाने के लिए जमीन अधिग्रहण करने की जरूरत है। गुजरात के किसान खुद नहरों का जाल फैलाने के लिए अपनी जमीन देने के लिए तैयार नहीं हैं।

सरदार सरोवर से सिंचाई का लक्ष्य पूरा नहीं हो रहा है तो सरदार सरोवर की ऊँचाई बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री व्याकुल क्यों थे? आपने क्या सुप्रीम कोर्ट को उनके ही निर्देशों के उल्लंघन का स्मरण कराया?

सरदार सरोवर परियोजना से कोलाकोला के साथ-साथ अडानी, अम्बानी की परियोजनाओं को नर्मदा का पानी मिल रहा है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पूर्व भी कांग्रेस सरकार पर गुजरात सरकार का दबाव था कि सरदार सरोवर के निर्माण से रोक हटा लिया जाय। जयराम रमेश पर बहुत दबाव बनाया गया था। पर्यावरण मंत्रालय ने एटॉर्नी जनरल से राय ली थी तो एटॉर्नी ने कोर्ट की अनुमति के बिना बाँध आगे नहीं बढ़ाने की राय दी थी। इस समय प्रधानमंत्री ने जिस तरह राज्य सरकारों को अंधकार में रखा तो उससे ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कानूनी प्रक्रिया को पूरा नहीं किया गया। हम सुप्रीम कोर्ट से न्याय की अपेक्षा रखते है  पर सुप्रीम कोर्ट में अमित शाह ने अपने वकील यूयू ललित को सीधे सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया है तो यूयू ललित नर्मदा मामलों में हमेशा तैनात रहते हैं। बदले हुए हालात में सुप्रीम कोर्ट में सरदार सरोवर के मामले पर सुनवाई का कोर्ट के भीतर माहौल ही नहीं हैं। अब कोर्ट में उनके वकील मुझे बोलने ही नहीं देते हैं।

प्रधानमंत्री ने सरदार सरोवर की ऊँचाई का लक्ष्य प्रदान करने के बाद दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा के रूप में सरदार पटेल की मूर्ति सरदार सरोवर बाँध पर खड़ा करने का निर्णय लिया है?  

प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने इस बाँध परियोजना की नींव रखी थी। नेहरू बड़े बाँधों को विकास का मन्दिर मानते थे। अब सरदार सरोवर अगर विकास का मन्दिर ही है तो इस मन्दिर में कोई देवता भी चाहिए। सरदार पटेल को विकास मन्दिर का विकास देवता घोषित करने में अगर 3 हजार करोड़ खर्च हो रहा है तो पटेल के जीवनीकार महात्मा गाँधी के पौत्र राजमोहन गाँधी ने सही ही कहा है कि पटेल होते तो आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बहुत निराश होते। मेरा दावा है कि प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट में जिस तरह 182 मीटर ऊँचे दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा के रूप में ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ की घोषणा की गयी है, वह घोषणा पूरी भी हो जाये तो यूनिटी कायम करने में वे कामयाब नहीं हो पायेंगे। आज सरदार पटेल इस बात से कतई सहमत नहीं होते कि उनके नाम पर खड़ी होने वाली किसी परियोजना में लाखों परिवारों की जलहत्या कर दी जाये। जहाँ ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ खड़ा किया जा रहा है, उस स्थल के चारों तरफ 700 एकड़ जमीन अधिग्रहित कर पर्यटन केन्द्र विकसित करने की योजना है। इस पर्यटन केन्द्र के विकास के लिए केवड़िया कॉलोनी, कोठी, वघाडिया, लिम्बडी जैसे गाँवों पर जमीन अधिग्रहण की तलवार लटक रही है। इन गाँवों की जमीन 1961 में सरदार सरोवर की बुनियाद में अधिग्रहित की गयी थी पर मुआवजा अब तक प्राप्त नहीं हुआ है। सरदार सरोवर तो किसानों के नेता थे। वे इस बात को कतई पसन्द नहीं करते कि उनकी मूर्ति को इस तरह खड़ा कर दिया जाये और गाँवों के किसानों को पुलिस की ताकत से खदेड़ दिया जाये।

गुजरात में कार्यरत नर्मदा बचाओं आन्दोलनके कार्यालय को बंद क्यों करना पड़ा?

जब केन्द्र सरकार के जलसंसाधन मंत्री कमलनाथ को मंत्रालय में घुसकर आन्दोलन के प्रतिनिधियों ने घेर लिया था, तब पहली बार बड़ौदा स्थित ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ के कार्यालय पर हमला हुआ था। इसके बाद जब मैं बड़ौदा गयी, तो मुझे ही रेस्ट हाउस में नजरबंद कर दिया गया। मुझे इजराइल में पानी के सवाल पर एक आयोजन में शरीक होना था। लेकिन मुझे अचानक यात्रा रोकनी पड़ी। दूसरा हमला भी मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के कार्यकाल में ही हुआ। साबरमती स्थित गाँधी आश्रम में 2002 के दंगे के बाद शांति सभा में जिस तरह उनके लोगों ने मेरे ऊपर जानलेवा हमला किया था, वह अकल्पनीय था। मुझे स्मरण है कि उस घटना क्रम में मुझसे ज्यादा मार तो पत्रकारों को लगी थी कि वे मुझे पिटते हुए कवरेज कर रहे थे। कुछ पत्रकारों को तो काफी चोटें आयी थी और उन्हें लम्बे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा था। पुलिसिया लाठीचार्ज और भाजपाई गुंडों की मार हमसे ज्यादा पत्रकारों को भुगतनी पड़ी। हमारी पिटाई के फुटेज वाले कैमरों को तोड़ने के लिए उन्होने पत्रकारों को तोड़ना जरूरी समझा। एनडीटीवी के कैमरामैन प्रणव जोशी बेहतर बयां करते लेकिन वे जिंदा नहीं हैं। भाजपा पोषित एनजीओ संचालक वीके सक्सेना और भाजपा के कुछ बड़े नेता इस हमले को जायज़  ठहराते रहे।  उस केस की अभी सुनवाई चल रही है। 10 बार मुझे अहमदाबाद की अदालत में बुलाया गया। हर बार मुझसे इस तरह सबाल-जबाव किया जा रहा है जैसे कि मार खाकर मैंने ही कोई अपराध कर दिया हो। अब उस गुजरात में ‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ का कार्यालय संचालित करना मुश्किल था। हमारे डाक, हमारे फोन, कार्यालय सचिव कोई सुरक्षित नहीं था। हमने तब कार्यालय पर हमलों को बड़ा मुद्दा इसलिए नहीं बनाया कि इससे आन्दोलन का मुख्य मुद्दा पीछे छूट सकता था।

सरदार सरोवर के विस्थापितों और मुम्बई के झुग्गियों के सवालों को आप किस तरह एकसूत्र में बाँधती है? मुम्बई में झुग्गियों का भविष्य क्या खतरे में है?

2004 के दिसम्बर माह से मुम्बई में झुग्गियों का संघर्ष चल रहा है। 2004 के दिसम्बर माह में गोबंडी, दामूनगर, बोरीवली की बस्तियों में लगातार 2 माह तक बुल्डोजर चलाकर 80 हजार झुग्गियों को उजाड़ा गया। मैं बार-बार सरकार के बुल्डोजर के सामने खड़ी होती रही तो उजड़ रहे लोग इकट्ठे होकर विरोध करने लगे फिर ‘घर बचाओ, घर बनाओ मोर्चा’ खड़ा हो गया। मुम्बई की कुल आबादी के 52 प्रतिशत लोग झुग्गियों में रहते हैं। ये बस्तियाँ आज मुम्बई की मात्र 9 फीसदी जमीन पर कायम हैं। धाराबी मुम्बई का सबसे बड़ा स्लम है। जब लोग संगठित नहीं थे तो उन्हें लाठियों की मार से बस्तियों से बाहर किया गया। बुल्डोजर के सामने खड़ा होने के जुर्म में 5-5 हजार रूपये वसूले गये। ऐसे लोग जो बुल्डोजर से एक बार उजाड़े जाने के बाद भी पाॅली चादर टांग कर टिके रह गये, उनकी बस्तियों में संजय गाँधी राष्ट्रीय उद्यान के तेन्दुए छोड़े गए। सरकारी भूखे तेन्दुओं ने इन बस्तियों पर 100 बार से ज्यादा हमले किए, जिसमें 14 लोगों की जान गयी। 2004 के अन्तिम 2 माह में 19 बार तेन्दुए छोड़े गए। वन विभाग के अधिकारी तर्क देते रहे कि वन विभाग की जमीन पर अतिक्रमणकारियों का अवैध कब्जा है।

मुम्बई की झुग्गियों में रह रहे लोग कहाँ से आते हैं?

रोजी-रोटी के लिए अपने गाँवों से भटकता हुआ महानगर आया आदमी अगर मुम्बई आया, तो अपराध क्या है? गाँवों की अर्थव्यवस्था नष्ट हो रही है। कहीं सूखा, कहीं बाढ़, कहीं भूख, कहीं अकाल। रफीकनगर, मीरा नगर अन्नाबाबू नगर, साठे नगर या अन्य दूसरी उजाड़ी जा रही बस्तियों के लोग थैलीशाह नहीं, भूमिहीन, पूँजीहीन, कमजोर दलित-पिछड़े-अल्पसंख्यक हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बंगाल के लोग अपने जन-संसाधन के सही नियोजन के बिना जीवन की तलाश में महानगरों में भटक रहे हैं तो क्या मुम्बई से उन्हें खदेड़ दिया जायेगा। हिन्दी पट्टी के मेहनतकशों ने अपने कठोर श्रम की बदौलत मिट्टी-गिट्टी डालकर दलदली इलाके को मानव वसाब के उपयुक्त समतल बनाया तो बेकार से साकार हुई जमीन पर सरकार पोषित बिल्डर कैसे चढ़ेंगे?

झुग्गियाँ जो 2004 में उजाड़ी गयी थीं, उन्हें क्या अपनी उजड़ी जमीन पर अधिकार प्राप्त हो रहा है?

हमने उजड़ी हुई बस्तियों और उजड़ने वाली बस्तियों में जब ‘घर बचाओ-घर बनाओं’ की कमेटियाँ बना दी तो ये कमेटियां अपने अधिकार के प्रति सजग हो गयी। इन्हें पुलिस और बिल्डरों से लड़ने का तरीका मालूम हो गया है। रफीकनगर से उजाड़े गए लोगों ने कब्रिस्तान में अपना अस्थायी डेरा डाला था। मैंने पूछा – जिन्दा, आदमी कब्रिस्तान में दफन हो सकता है। कहा – नहीं। सबसे पहले रफीकनगर के लोगों ने बिल्डरों के प्राइवेट सिक्यूरिटी गार्डों के पहरे वाले अपने उजड़े इलाके पर कब्जा जमाया। सभी उजड़ी हुई बस्तियों पर लोगों ने अपना कब्जा जमा लिया है। सिर्फ मंडाला में 55 एकड़ जमीन पर बिल्डर का कब्जा अब तक कायम है। इस पर कब्जादारी का संघर्ष चल रहा है। हमने बस्ती के उजड़े हुए लोगों के पास से राशन, मतदाता पहचान-पत्र, बिजली-पानी के का के अधिकृत पत्र जमा किये। सरकारी अधिकारियों के सामने सवाल खड़ा किया, इनके पास मुम्बई में वर्षों से निवास करने का प्रमाण-पत्र मौजूद है। ये 4 दशक से मुम्बई में वोट गिरा रहे हैं तो ये मुम्बई के अनाधिकृत नागरिक कैसे हो गये? चुनाव में इनके वोट ले लो और चुनाव के बाद इन्हें उजाड़कर बिल्डरों को बसा दो, यह नहीं चलनेवाला है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि महानगर परजीवी होते हैं। मंत्रालय के बिल्डिंग बनाने से लेकर बड़े अपार्टमेंटों को कौन चमका रहा है। श्रमिकों का श्रम चाहिए पर श्रमिकों की विकास में हिस्सेदारी नहीं।

देश में सब कुछ कैसा चल रहा है? क्या आपातकाल लाया जा सकता है?

फासीवाद और आपातकाल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। फासीवादी राज्य शक्ति के आतंक से हम लोकतांत्रिक आवाज भी नहीं उठा पा रहे हैं। देश के चारों तरफ हमें आगे बढ़ने से रोका जा रहा है। हमसे पूछा जा रहा है, यह आन्दोलन क्यों? मोदीजी के नेतृत्व में जो कुछ हो रहा है, ऐसा वाजपेयी जी के समय भी नहीं दिखा था। आपातकाल घोषित करें, यह जरूरी नहीं है। हम आपातकाल से ज्यादा बुरे समय में जी रहे हैं। जिन्दगी और जीवन पर हमला, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ताक पर रखकर नर्मदा के गाँवों में जलहत्या की तैयारी, यह लोकतंत्र में सम्भव नहीं था।

आप राष्ट्रवाद की अवधारणा को किस तरह देखती हैं?

राष्ट्रवाद किसी राष्ट्र में शासकीय व्यवस्था को ताकतवर रूप देना ही नहीं, राष्ट्रवाद देश के नक्शे और भौगोलिक पृष्ठभूमि से नहीं, लोगों के जल- जंगल-जमीन और उनकी जीवन-संस्कृति से भी जुड़ा है। एक तरफ जब पूरी दुनियां वैश्विक ग्राम में बदल रही है तो संकुचित दायरे में राष्ट्रवाद के नाम पर समाज को तोड़कर राष्ट्र की नयी परिभाषा कायम करना, राष्ट्रवाद की मिथ्या अवधारणा है। चूँकि राष्ट्रवाद के मुद्दे पर लोगों को भ्रमित करना है और भूमण्डलीकरण के नाम पर देश के संसाधनों को कोर्पोरेट्स के हाथ में कब्जा दिलाना है इसलिए जरूरी है कि राष्ट्रवाद की नयी परिभाषा प्रचारित की जाये। राष्ट्र के भीतर मानवतावादी, विविधतापूर्ण, संस्कृति का सम्मान करना, राष्ट्र के अन्दर मानव संसाधन की पूँजी का बेहतरीन इस्तेमाल करते हुए राष्ट्र को ताकतवर करने के बजाय राष्ट्र के भीतर के मानवबल, मानव प्रतिभा को नजरअंदाज कर चन्द धनिकों को ताकतवर करना राष्ट्रवाद नहीं है। देश के भीतर और देश की सीमा पर सैन्य शक्ति से बन्दूक का शासन कायम करना राष्ट्रवाद नहीं है। उपभोक्तावादी बाजार के लिए चीन और पाकिस्तान के साथ व्यापार बढ़ाने में उन्हें खुशी है पर राष्ट्र की साझी संस्कृति को पाकिस्तान की संस्कृति से जोड़ने में इन्हें खतरा महसूस होता है।

सवाल आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ना क्या आपकी चूक थी? आपके पास पहले कभी चुनाव लड़ने का प्रस्ताव नहीं था?

हाँ, मैं मानती हूँ कि आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ना मेरी चूक थी। चूक का मतलब यह नहीं कि मैंने कोई अपराध कर दिया पर आन्दोलनों की शक्ति को चुनाव में लगाने से आन्दोलन की ऊर्जा का अपव्यय होता है। मेरे पास 2000 से पूर्व कांग्रेस ने मध्य प्रदेश से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया था। अगर सांसद बनना ही मेरे जीवन का उद्देश्य होता तो मुझे कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहिए था। मुम्बई से चुनाव लड़ते हुए मेरा मुम्बई के स्लम इलाके के मुद्दे से मोह जुड़ा था। मुझे लगता था कि हम चुनाव हार भी गये तो झुग्गियों का मुद्दा राजनीतिक मुद्दा तो बन जायेगा। लेकिन मुझे चुनाव के मैदान में कूदकर और बाहर निकलकर यह मालूम चला है कि चुनावी मुद्दे चुनाव के बाद राजनीतिक मुद्दे नहीं बन पाते हैं। अपने आन्दोलन के साथियों की राय से मैंने चुनाव लड़ने का फैसला किया था। राजनीति और जनांदोलनों के हिस्सेदार साथी प्रशांत जी और योगेन्द्र जी ‘आम आदमी पार्टी’ से उस तरह नहीं जुड़े होते तो शायद मैं भी चुनाव मैदान में उतरने का फैसला नहीं करती। मुझे लगा कि स्पर्धा में शामिल होकर हम अपने मानवीय और नैतिक मूल्यों की सीमित ताकत को बचा कर नहीं रख सकते। दलीय एवं चुनावी राजनीति को आधार मानकर टिकने से मुझे लगा कि हमारी जड़ें खत्म हो सकती हैं। आम आदमी पार्टी की पूरी प्रक्रिया इस तरह चलायी जा रही थी, जिसमें मुझे लोकतांत्रिक संवाद की प्रक्रिया नहीं दिखी। मुझे उनके नेतृत्व में एक तरह की अपरिपक्वता और सत्ता केन्द्रित अवसरवादिता ज्यादा प्रबल दिखी। जनांदोलनों के मुद्दे पर वे समर्थक की भूमिका में आ सकते हैं। ऐसा तो लालू-नीतीश, दिग्विजय सिंह भी करते रहे हैं। प्रशान्त भूषण और योगेन्द्र जी ने जिस संगठन को विचारधारा और नैतिक मूल्यों की बुनियाद पर खड़ा करने की कोशिश की थी, उस संगठन से उन्हीं  के साथ अपमानजनक बर्ताव मुझे अपने आत्मसम्मान पर झटका लगा था ओर एक पल के लिए भी मुझे वहाँ टिकना मुमकिन नहीं था। जनांदोलनों के भीतर से निकले जनलोकपाल के मसौदे को स्वीकार करना उनके लिए जरूरी था पर सत्ता के अवसरवाद ने उन्हें धन-लोकपाल का रास्ता दिखा दिया।

आपके बारे में आरोप है कि आप नर्मदा के मुद्दे पर सड़क से लेकर संसद तक वामपंथियों का समर्थन लेती हैं पर उनके पक्ष में चुनाव के मैदान में खुला प्रचार नहीं करती है? क्या आपका गाँधीवादी हठयोग आपको वामपंथियों से दूरी रखने की चेतावनी देता है?

वाम की जो सैद्धान्तिक परिभाषा होती है, उसके आधार पर हम भी केन्द्रीय सत्ता के वाम वाजू में ही हैं पर हमारी आइडियोलोजी जनतांत्रिक समाजवादी है। वामपंथी विचारधारा एक बात है और वाममोर्चे में हर समय साथ देना दूसरी बात है। वाममोर्चें के लोकतांत्रिक संघर्ष में तो हम हर हमेशा साथ रहते ही हैं। सत्ता में होते हुए जब उनसे कोई चूक होती है तो जनता के साथ खड़ा होकर उनकी चूक पर अंगुली रखना भी जरूरी होता है। वे हमारे प्रतिस्पर्धी नहीं हैं, न ही कभी थे। विकास के मॉडल और वर्ग के अलावा जातियों के विभाजन को उनकी स्वीकृति, उनकी विचारधारा के विपरीत है, वाबजूद हमारी आपसदारी कायम है। चुनाव के प्रचार में जनांदोलनों की भूमिका को तटस्थ रखने की स्थिति की वजह से हमने उनके पक्ष में चुनावी प्रचार नहीं किया पर चुनाव के मैदान में उनके साथ खुले समर्थन की बजाय नैतिक समर्थन तो रहा ही है। निर्दलीय और गैर संसदीय शक्तियों की ताकत को खत्म करने की राज्य शक्ति की कोशिशों के विरुद्ध जनांदोलनों के जन की शक्ति को कायम रखना भी वाममोर्चे की जनवादी ताकत को मजबूती प्रदान करता है।

आप पूँजीवाद और फासीवाद के रिश्तों के साहचर्य को किस तरह देखती हैं

पैंसों की ताकत से मनुष्य और रिश्ते को बाजार में आजमाते हैं तो यहाँ बाजार का निर्णय हावी होता है। बाजार की स्पर्धा में प्राकृतिक पूँजी और मेहनतकशों के मानवश्रम को दबाकर एक तरह की मुनाफाखोरी की इच्छा शक्ति के साथ राजनीतिक सत्ता हासिल करने की होड़ में पूँजीवाद आगे बढ़ता है तो इसी बुनियाद पर फासीवाद खड़ा होता है। फासीवाद केवल पूँजीवाद से नहीं आता है। धर्मवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद अलग-अलग मुद्दों को आधार बनाकर, लोकतांत्रिक ताकतों को खारिज कर नयी व्यवस्था को स्थापित करना फासीवाद को ताकतवर करता है। ब्राह्मणवादी शक्तियों का सामंतवाद भी फासीवाद ही था। आज फासीवाद को मजबूत करने के लिए फिर से ब्राह्मणवाद को प्रबल किया जा रहा है।

देश के बुद्धिजीवियों और मीडिया से आपकी क्या अपेक्षा है?

उपेन्द्र बख्शी, प्रभाष जोशी, कमलेश्वर सहित देश के कई प्रबुद्ध बुद्धिजीवी नर्मदा बचाओ आन्दोलन के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में विस्थापितों के पक्ष में याचिकाकर्ता थे। प्रभाष जी की आन्दोलन संबंधी, विकास संबंधी मीडिया संबंधी जो विचारधारा थी, वह विचारधारा ही हमारे देश से खत्म होती जा रही है। बावजूद हम देश के प्रबुद्ध जनों को आगाह करना चाहते हैं कि नरेन्द्र मोदी की जो तानाशाही आज दिख रही है, उसी तानाशाही में नर्मदा में जबरन डूब लायी जा रही है। मोदी जी की अर्थनीति, विकासनीति और राजनीति को चुनौती देने के लिए सरदार सरोवर के विस्थापन से बेहतर दूसरा कोई मॉडल नहीं हो सकता है। हम अभी ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि अगर वे अगले वर्ष दिल्ली में सरदार सरोवर महोत्सव आयोजित करें तो आप भूल नहीं जायेंगे कि इस महोत्सव की बुनियाद में नर्मदा घाटी के 50 हजार आदिवासी किसान-मजदूर परिवारों की जलहत्या शामिल है।

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